कोरोना काल में असंगठित क्षेत्र की परिस्थिति, चुनौती और सरकारी प्रयास

असंगठित क्षेत्र के लिए सरकार ने नियम और कानून तो बनाया है और इसे बाकायदा असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008 और असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा नियम 2008 नाम भी दिया है. ये लागू भी हैं. इनके जरिए श्रम और रोजगार मंत्रालय ने कपड़ा बनाने वाले बुनकरों, हथकरघा श्रमिकों, मछली पालन करने वाले और मछुआरों, बीड़ी श्रमिकों जैसे सभी मजदूरों के कल्‍याण के लिए श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008 अधिनियमित किया.

Source: News18Hindi Last updated on: July 29, 2020, 1:27 PM IST
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कोरोना काल में असंगठित क्षेत्र की परिस्थिति, चुनौती और सरकारी प्रयास
असंगठित क्षेत्र यानी ऐसे श्रमिक जो संगठित नहीं हो पाए. इनका रोजगार भी अस्‍थायी है.
कोरोना वायरस (Coronavirus) के कारण हुए लॉकडाउन (Lockdown) से भारतीय अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र अब तक के सबसे भीषण त्रासद समय से गुजर रहा है. श्रम और रोजगार मंत्रालय के अनुसार इस क्षेत्र में करीब 42 करोड़ श्रमिक हैं. वहीं, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मुताबिक 12.2 करोड़ भारतीयों ने कोरोना काल (अप्रैल 2020) के दौरान अपनी नौकरी और रोजगार खो दिए थे जबकि मई 2020 में यह आंकड़ा करीब 10.2 करोड़ रह गया था. लोग यह सोच नहीं पा रहे कि भविष्‍य में क्‍या और कैसा होगा? अब तक जो भोगा है, परिस्थितियां वैसी ही रहेंगी या वर्तमान से और बुरी स्थिति में जीना होगा? सरकार पर ही सबकी निगाहें लगी हुई हैं, जिसके अलावा कोई दूसरा पालनहार फिलवक्‍त नजर नहीं आता.

असंगठित क्षेत्र यानी ऐसे श्रमिक जो संगठित नहीं हो पाए. इनका रोजगार भी अस्‍थायी है. ये कभी खेतों में तो कभी सड़कों पर तो कभी किसी बनती इमारत में काम कर रहे होते हैं. अपनी अज्ञानता और निरक्षता के कारण इन्‍हें खुद के हितों और सरकारी योजनाओं की समझ ही नहीं है. जीवन में जो मिल जाता है, ये उसी से गुजारा करते रहे हैं. लेकिन वर्तमान दौर बेहद कठिनाई का हो गया है. कोरोना महामारी के डर से बने हालातों ने छत्‍तीसगढ़, मध्‍यप्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, उत्‍तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, झारखंड और हरियाणा के श्रमिकों के सामने भविष्‍य का संकट खड़ा कर दिया है. यहां सबसे अधिक संख्‍या में रोजगारों में कमी आई है. पहले तो कुछ उम्‍मीदें और भरोसा रहता था, लेकिन अब लोगों में आत्‍मविश्‍वास की कमी हो चली है, निराशा और अवसाद बढ़ रहा है.

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असंगठित क्षेत्र के लिए सरकार ने नियम और कानून तो बनाया है


नियम और कानून तो है, क्‍या कीजिएगा
असंगठित क्षेत्र के लिए सरकार ने नियम और कानून तो बनाया है और इसे बाकायदा असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008 और असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा नियम 2008 नाम भी दिया है. ये लागू भी हैं. इनके जरिए श्रम और रोजगार मंत्रालय ने कपड़ा बनाने वाले बुनकरों, हथकरघा श्रमिकों, मछली पालन करने वाले और मछुआरों, बीड़ी श्रमिकों जैसे सभी मजदूरों के कल्‍याण के लिए श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008 अधिनियमित किया. इसके जरिए राष्‍ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड काम करता है. जब सरकार समय-समय पर दिव्‍यांग (विकलांगता) कवर, स्‍वास्‍थ्‍य एवं मातृत्‍व लाभ, वृद्धावस्‍था सुरक्षा जैसे लाभ देने की योजनाएं लाती है. तब यह बोर्ड सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए अनुशंसाएं ही कर पाता है.

भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के लाइफलाइन पर संकट
ऐसे देखा जाए तो भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में असंगठित क्षेत्र से जुड़े रोजगारों का विशाल बहुमत उसे लाइफलाइन साबित करता है. आर्थिक सर्वेक्षणों की मानें तो कुल कार्यबल में असंगठित क्षेत्र के लोगों का हिस्सा 80 प्रतिशत है. वहीं, करीब 93 फीसदी स्‍वरोजगारी और रोजगार करने वाले कर्मचारियों की संख्‍या इसी क्षेत्र से आती है. जबकि
देश की अर्थव्यवस्था में आधे से अधिक का योगदान करने वाले इस क्षेत्र में छोटे किसान, भूमिहीन खेतिहर मजदूर, बीड़ी श्रमिक, किसी और के खेत में काम कर हिस्‍सा लेने वाले, पशुपालक, मछली पालन करने वाले और मछुआरे, ईंट बनाने वाले, पत्‍थर खदानों के श्रमिक, चमड़ा आदि के काम करने वाले, कपड़ा बनाने वाले बुनकर, इमारत आदि बनाने वाले मजदूर, दैनिक फुटकर काम करने वाले मजदूर, प्रवासी मजदूर, मिलों में काम करने वाले श्रमिक, सफाईकर्मी, बोझा ढोने वाले, तांगा आदि गाड़ी चलाने वाले, घरों में काम करने वाले श्रमिक, सब्‍जी-फल आदि बेचने वाले आदि आते हैं.
इनके बिना आम जन-जीवन की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन कोविड-19 की महामारी ने इस वर्ग पर गहरा संकट ला दिया है. कुछ तो हिम्‍मत हार बैठे हैं, कुछ अब शहरों-महानगरों की तरफ रुख ही नहीं करना चाहते.असंगठित क्षेत्र के बरसों पुराने मुद्दे
बच्‍चों को श्रमिक न बनना पड़े, महिलाओं को प्रसव पूर्व-बाद की सुरक्षा हासिल हो, बच्‍चों को पोषण आहार मिले, टीकाकरण सही ढंग से हो, लोगों को मूलभूत सुविधाएं हासिल हों, लोगों को आजीविका मिले, आवास-पे‍यजल जैसे मुद्दे बरसों से जस के तस हैं. सरकारों के तमाम प्रयास, प्रवीण और अनुभवी अधिकारियों की गति-प्रगति और उपलब्धियां यहां आकर ठिठक जाती है. अवकाश से जुड़े लाभ और न्यूनतम मज़दूरी जैसे मुद्दे यहां किसी मायने के नहीं रह जाते हैं. ऐसे में सरकारों के ऊपर दोहरी जिम्‍मेदारी आ गई है. इस क्षेत्र के महत्‍व को समझते हुए सरकार को समग्र नीति बनानी होगी. इस क्षेत्र के ज्‍यादातर श्रमिक गांव के परंपरागत कार्य करने वाले, भूमिहीन किसान, छोटे किसान, खेतिहर मजदूर हैं. ये लोग बुआई और कटाई के समय तो गांव में रहते हैं जबकि बाकी समय वे आसपास या दूर-दराज के शहरों-महानगरों में आजीविका की तलाश में चले जाते हैं. वर्ष भर काम न मिलने के करण इन्‍हें न्‍यूनतम मजदूरी से भी कम में काम करना पड़ जाता है. असंगठित क्षेत्र में रोजगार गारंटी न होने से इनकी वार्षिक आय भी कम रह जाती है. बिचौलियों या फिर नियोक्‍ताओं ही इनका शोषण करते हैं. कई उद्यम ऐसे हैं जहां श्रम कानून लागू नहीं होते. ऐसे में बाल श्रम, महिला श्रमिकों का शोषण की घटनाएं सामने आती हैं.

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आत्‍मनिर्भर भारत और आयुष्‍मान भारत योजनाओं से इस क्षेत्र को अब तक का सबसे ठोस लाभ और पैकेज दिया जा रहा है.


सरकार कर रही है अभूतपूर्व प्रयास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना संकट काल की चुनौतियों से सबक लेने और इसे अवसर में बदलने का मंत्र दिया है. उन्‍होंने भारत को दुनिया में निवेश का सबसे बड़ा ठिकाना और विनिर्माण केंद्र बनाने पर जोर दिया है. लिहाजा यहां श्रम सुधार और श्रमिकों के वास्‍तविक कल्‍याण पर नीति बनाई जा रही हैं. आत्‍मनिर्भर भारत और आयुष्‍मान भारत योजनाओं से इस क्षेत्र को अब तक का सबसे ठोस लाभ और पैकेज दिया जा रहा है. देश की आर्थिक वृद्धि में इस असंगठित क्षेत्र का सबसे बड़ा योगदान होगा, इसलिए राष्‍ट्रीय स्‍तर पर श्रमिकों की दिशा और दशा सुधार के लिए व्‍यापक कार्यक्रम तय किए जा रहे हैं.
पीएम मोदी ने मार्च 2019 में गुजरात के वस्त्रल में प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन (पीएम-एसवाईएम) योजना का शुभारंभ किया था. इस योजना से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को वृद्धावस्था के दौरान 3 हजार रुपये के मासिक पेंशन का लाभ मिलेगा. आजादी के बाद यह पहला अवसर है जब इस प्रकार की योजना की शुरूआत हुई है.
असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों के लिए मनरेगा, प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम, हथकरघा बुनकर योजना, हस्तशिल्प कारीगर व्यापक कल्याण योजनाएं, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना, मछुआरों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय योजना, प्रशिक्षण और विस्तार, जननी सुरक्षा योजना, राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना आदि कई अन्य रोजगार सृजन/सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को सरकार लागू कर रही है.

इसके अलावा जो सबसे अहम घटनाक्रम है, वह अभूतपूर्व है. सरकार यह भी कर गुजरेगी, ऐसी आशा है. श्रम संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष भर्तृहरि महताब ने बताया है कि समिति ने संगठित श्रमिकों की तरह ही सामाजिक सुरक्षा के तहत प्रवासी श्रमिकों को शामिल करने की सिफारिश की है. सरकार से राज्य सरकारों और श्रम आयुक्तों के माध्यम से असंगठित श्रमिकों को पंजीकृत करने के लिए कहा है. इससे पहले श्रम संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने फरवरी में सिफारिश की थी कि असंगठित प्रवासी मजदूरों को श्रम संहिता विधेयक का हिस्सा होना चाहिए और अंतरराज्यीय प्रवासी मजदूरों को संगठित क्षेत्र के मजदूरों की तरह ही सामाजिक सुरक्षा का लाभ दिया जाना चाहिए. मूल बिल में कहा गया है कि कोड केंद्र और राज्य सरकारों के अनुबंध श्रमिकों पर लागू नहीं होगा. हालांकि, समिति ने लगभग 50 करोड़ असंगठित श्रमिकों को कवर करने की सिफारिश की है.
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First published: July 29, 2020, 12:49 PM IST
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