स्थानीय खिलौनों की गरिमा लौटाकर संवरेगा स्‍वर्णिम भारत

प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) ने कहा था कि अब सभी के लिए लोकल खिलौनों (Local toys) के लिए वोकल होने का समय है. भारत में खिलौने इंडस्ट्रीज (Toys Industries) का सालाना 15 फीसदी दर से ग्रोथ हासिल कर रहा है. फिलहाल देश में खिलौने की मांग को पूर्ति करने के लिए राज्‍य सरकारें (State government) और भारतीय कंपनियां तेजी से काम कर रही हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: September 22, 2020, 2:17 PM IST
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स्थानीय खिलौनों की गरिमा लौटाकर संवरेगा स्‍वर्णिम भारत
आईएमएआरसी की आंकड़ों पर भरोसा करें तो दुनिया के खिलौना बाजार में भारत की हिस्सेदारी 0.5 फ़ीसदी से भी कम है.
बच्‍चों के खिलौनों, उनके निर्माण और व्‍यापार करने को भारत में अचानक ही तवज्‍जो मिलनी लगी है. केंद्र और राज्‍य सरकारें अपने प्रयासों में जुटी हुई हैं. ऐसा लग रहा है कि इस टॉयज इंडस्‍ट्री में बड़ा निवेश मिलेगा और सरकारें अपनी झोली भर लेंगी. स्‍थानीय खिलौना निर्माता, डिजाइनर्स, श्रमिक और इंडस्‍ट्रीज के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्‍तरप्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी भी खिलौनों को लेकर बेहद संजीदा लग रहे हैं. मन की बात में मोदी, खिलौनों के बारे में अपने विचार जता चुके हैं. ऐसा भी माना जा रहा है कि भारतीय सीमा पर तनाव बढ़ा रहा चीन, अब भारत के निशाने पर आ गया है. उसे करारा जवाब देने और देश की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए खिलौना उद्योग को संवारा जाना तय है. आंकड़ों को देखें तो यकीन होता है कि स्‍थानीय खिलौना उद्योग के जरिए भारत को स्‍वर्णिम दौर में ले जाना संभव है.

वैश्विक महामारी COVID-19 (कोरोना) और गलवान घाटी विवाद के बाद से ही चीन और चीनी उत्‍पादों के प्रति हर भारतीय के मन में गुस्‍सा है. लोग खुद ही चीनी एप्स, खिलौने व अन्‍य सामानों का बहिष्‍कार कर रहे हैं. कुछ चीनी एप्‍स पर तो सरकार ने भी रोक लगाई है. अगर चीनी खिलौनों का खरीदना बंद हो और केवल भारतीय खिलौनों की खरीद हो तो भारत बहुत जल्‍द आर्थिक लय पकड़ लेगा. इस दिशा में राज्‍य सरकारें भी अपने-अपने क्षेत्र में काम कर सकती हैं. स्‍थानीय खिलौनों की गरिमा लौटा कर पर्यावरण की रक्षा करते हुए रोजगार और राजस्‍व बढ़ा सकती हैं. व‍हीं रोजगार देने के लिए भी यह उद्योग सुनहरा अवसर दे सकता है. स्‍थानीय खिलौनों के प्रति सहज लगाव से इस व्‍यापार को बढ़ावा मिलेगा.

ऐसा है दुनिया का खिलौना बाजार और भारत

अभी भारतीय बाजार में चीन से मंगवाए जा रहे खिलौनों की 90 फीसद तक की भागीदारी है. फिलहाल भारत में खिलौने का कारोबार 16,000 करोड़ रुपए का है, जिनमें से संगठित खिलौना बाजार 5,500-7,000 करोड़ रुपए मूल्य का है. वहीं, विश्‍व खिलौना उद्योग 7 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक का है. इसमें भी चीन का ही दबदबा है. चीन के खिलौने, कीमत में कम और दिखने में बेहतर होते हैं. दुनिया भर के करीब 85 फीसदी खिलौने चीन में निर्मित कर भेजे जाते हैं. इसके बाद यूरोप के देशों और अंत में भारत, श्रीलंका, मलेशिया, हांगकांग का नाम आता है. ऐसा माना जा रहा है कि 2025 तक खिलौना कारोबार का मूल्‍य 131 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा जबकि यह 2019 में यह आंकड़ा 105 अरब डॉलर ही था. मार्केट रिसर्च फर्म आईएमएआरसी की आंकड़ों पर भरोसा करें तो दुनिया के खिलौना बाजार में भारत की हिस्सेदारी 0.5 फ़ीसदी से भी कम है.
खतरनाक व जहरीले खिलौनों से दूर रखें नौनिहालों को

विदेशों से आने वाले करीब 66.9 फीसद खिलौने खतरनाक होते हैं. भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआई) ने इस पर बाकायदा जांच कर एक सर्वे और रिपोर्ट तैयार की है. अपने बच्‍चों को इन खतरनाक व जहरीले खिलौनों से बचाना होगा. दरअसल, भारत में 93 फीसद खिलौने बाहर से मंगवाए जाते हैं. दुनिया में खिलौना बनाने में जो कंपनियां सबसे आगे है, उनमें लेगो, मेटल और बान्दाई नामको एंटरटेनमेंट जैसे नाम शामिल है. इनमें से कई के प्लांट चीन में हैं. रिपोर्ट के अनुसार छोटे बच्‍चों के लिए सही समझे जाने वाले साफ्ट टॉयज में थैलेट नाम का एक केमिकल होता है जो कैंसर का कारण बन सकता है. वहीं इसमें से निकलने वाले रेशे, नाक, मुंह, गला और फेफड़ों के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. क्यूसीआई की जांच में लेड, आरसैनिक और मरकरी जैसे खतरनाक हैवी मेटल भी खिलौनों में पाए गए. वहीं, टैंट हाउस, कॉस्‍ट्यूम्‍स आदि खिलौने तेजी से आग पकड़ते हैं. हालांकि कुछ खिलौनों पर जहरीले, नुकीले और खतरे के बारे में लिखा होता है लेकिन जागरूकता के अभाव में खरीदार इस पर ध्‍यान नहीं देता.

दिक्‍कतों को दूर करने में नाकाम हैं कारीगरखिलौने बनाने और संवारने वाले कारीगर, समय के साथ आ रही दिक्‍कतों को दूर नहीं कर पा रहे. अगर कर्नाटक सरकार की पहल चन्‍नापटना के क्राफ्ट पार्क को ही उदाहरण के तौर पर लें तो यह बात आसानी से समझ में आती है. बेंगलूरू-मैसूर हाईवे पर स्थित चन्‍नापटना एक टॉयज क्‍लस्‍टर है. यहां लकड़ी के खिलौने बनाए जाते थे, यह अपनी तरह का भारत का इकलौता पार्क था. यहां केरल, तमिलनाडु व अन्‍य जगहों के कारीगर आते थे. यहां बने खिलौने, भारत के अलावा विदेशों में भी बेचे जाते थे. सरकार ने खिलौनों पर 12 फीसद जीएसटी लगाया है जो पहले 5.5 फीसद वैट लगा करता था. यहां नोट बंदी, जीएसटी और कोरोना के कारण हालात बदतर होते चले गए. अब काम ठप जैसा ही है. सरकार अगर अपने उपक्रमों, स्‍कूल, आंगनबाड़ी के लिए देश में बने खिलौने ही खरीदे तो यह निश्चित ही लाभप्रद होगा, लेकिन यहां भी चीनी खिलौने पहली पसंद बन जाते हैं. 1 सितंबर से भारत में खिलौनों में क्वालिटी कंट्रोल वाला बीएसआई मार्क अनिवार्य कर दिया है जिसके लिए न तो कारीगर और न ही व्‍यापारी तैयार हैं. हालांकि घरेलू टॉय इंडस्ट्रीज को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने फरवरी 2020 में आयात शुल्क में 200 फीसदी की बढ़ोतरी की थी.

बाजी मारने की तैयारी में है उत्‍तर प्रदेश की योगी सरकार

उत्‍तर प्रदेश की योगी सरकार, विश्‍व मानकों पर आधारित खिलौना नीति 2020 और प्रदेश को खिलौना हब बनाने के लिए तैयारी कर चुकी है. सरकार इस कोशिश में है कि खिलौना उद्योग में तीन लाख से अधिक रोजगार पैदा हों और हजारों करोड़ का निवेश भी प्रदेश में आए. सरकार का एमएसएमई यानी सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम विभाग खिलौनों की डिजाइनिंग, मार्केटिंग, ब्राडिंग और दूसरे देशों तक बेचने में मदद करने के लिए तैयार है. देश और विदेश में लगने वाले बड़े मेलों में भी उत्‍तर प्रदेश के खिलौनों का प्रचार-प्रसार कर बड़े पैमाने पर व्‍यापार का लक्ष्‍य तय किया है. सरकार ऐसा कर पाती है तो निश्चित ही बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी खिलौनों का निर्माण किया जा रहा है. यहां निर्मित खिलौनों में भारतीय संस्‍कृति की झलक देखने को मिलती है. इसी तरह देश के कुछ इलाकों में खिलौना निर्माण केंद्र विकसित हो रहे हैं. इनसे स्‍थानीय लोगों को सीधा रोजगार मिल रहा है, तो वहीं परंपरागत खिलौना संरक्षित हो रहा है. तमिलनाडु का तंजौर, कर्नाटक के रामनगरम में चन्‍नापटना, आंध्र प्रदेश के कृष्‍णा में कोंडापल्‍ली, असम में धुबरी और अन्‍य स्‍थान खिलौना केंद्र के रूप में पहचाने जाने लगे हैं.

लोकल खिलौनों के लिए वोकल होने का समय

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि अब सभी के लिए लोकल खिलौनों के लिए वोकल होने का समय है. भारत में खिलौने इंडस्ट्रीज का सालाना 15 फीसदी दर से ग्रोथ हासिल कर रहा है. फिलहाल देश में खिलौने की मांग को पूर्ति करने के लिए राज्‍य सरकारें और भारतीय कंपनियां तेजी से काम कर रही हैं. स्टार्ट-अप और नए उद्यमियों से खिलौना बनाने संबंधी प्रोजेक्‍ट्स पर चर्चाएं हो रही हैं. उत्‍तर प्रदेश में एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) की आने वाली योजनाओं में ट्वाय कलस्टर को भी शामिल किया गया है. खिलौना उद्योग की नीति से उम्‍मीद है कि अकुशल, अर्द्धकुशल और कुशल श्रमिकों और खासकर महिलाओं को इससे काम मिलेगा. इलेक्ट्रानिक और बैटरी से चलने वाले खिलौने का निर्माण को बढ़ावा देने के लिए कोशिश हो रही है. कलस्टर, पार्क और अपने स्तर पर खिलौना निर्माण करने वालों के लिए भी प्रोत्साहन योजना है.

चुनौतियां तो हैं और रहेंगी भी, पर जीत सकते हैं हम

खिलौना उद्योग बहुत व्यापक है. इसमें घरेलू, छोटे, लघु, बड़े उद्योग और अन्‍य उद्योग आते हैं. इनको आगे बढ़ाने के लिए सरकार और देश को चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. भारतीय विविधता और उद्यमशीलता से इसमें जीत हासिल की जा सकती है. सरकार करों में कटौती करें और खिलौना बनाने वाली कंपनियों को सुविधाएं दे तो वातावरण बनेगा. ऐसे खिलौने हों जिनकी गुणवत्‍ता अच्‍छी हो और इनसे पर्यावरण को नुकसान न हो. हालांकि अभी इस क्षेत्र में इनोवेशन की कमी महसूस हो रही है. सवाल यह भी है कि अभी मुकाबला दुनिया की सबसे बड़ी खिलौना इंडस्‍ट्री से है, और भारत अभी टॉप फाइव में भी शामिल नहीं है. इसके अलावा डिजाइन और मार्केट में तालमेल की समझ न होना भी चिंताजनक है. देश के कुछ संस्‍थानों में खिलौने के डिजाइन की पढ़ाई कराते हैं, लेकिन स्‍थानीय खिलौनों को बढ़ावा देने या भारतीय नौनिहालों को ध्‍यान में रखकर क्‍या और कैसे खिलौने चाहिए, पर ध्‍यान नहीं दिया जाता. यहां के स्‍टूडेंट एजूकेशनल टॉयज, प्‍लास्टिक टॉयज या फिर बैटरीज से चलने वाले खिलौनों की बजाए ऑनलाइन गेम बनाने की दिशा में ही काम करते हैं.
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First published: September 22, 2020, 2:17 PM IST
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