West Bengal Election: चुनाव आयोग और पार्टियों को ‘मृत्यु मिछिल’ देखने के बाद चेतना आई

West Bengal Election 2021: कोलकाता हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को यहां तक कह दिया कि टीएन शेषन के दसवें हिस्से के बराबर काम करके दिखाइए. ठीक उसी तरह जैसे ऑक्सीजन की कमी पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के लिए कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया.

Source: News18Hindi Last updated on: April 24, 2021, 11:47 am IST
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West Bengal: चुनाव आयोग और पार्टियों को ‘मृत्यु मिछिल’ देखने के बाद चेतना आई
West Bengal Election: सिलीगुड़ी में चुनावी रैली का इंतजार करते समर्थक. (AFP)

कहावत है, देर आए दुरुस्त आए. लेकिन हमेशा देर से आना दुरुस्त नहीं होता. चुनाव आयोग ने गुरुवार को छठे चरण के मतदान के दौरान पश्चिम बंगाल (West Bengal Election) में रोड शो, वाहनों की रैली और 500 से अधिक लोगों की जनसभा पर रोक लगा दी. चुनाव आयोग (Election Commission) ने कहा कि कोविड-19 महामारी को देखते हुए जो एहतियात बरतने के निर्देश दिए गए थे, राजनीतिक दल उनका पालन नहीं कर रहे हैं. इसलिए उन्हें दी गई सभाओं की अनुमति वापस ली जाती है. लेकिन छह चरण बीतने के बाद आयोग का यह फैसला स्वतः नहीं, बल्कि कोलकाता हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद आया. कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि टीएन शेषन के दसवें हिस्से के बराबर काम करके दिखाइए. यानी शेषन के समय आयोग जिस तरह काम करता था, अभी उसका दसवां हिस्सा भी नहीं कर रहा है. चुनाव आयोग की इतनी मलामत शायद पहले कभी नहीं हुई. ठीक उसी तरह जैसे दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के लिए ‘भीख मांगिए, चोरी कीजिए…’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया.


हाई कोर्ट की टिप्पणी और चुनाव आयोग की सख्ती के बाद कई रैलियां रद्द कर दी गई हैं. बाकी दो चरणों के लिए सभी पार्टियों ने वर्चुअल रैली ज्यादा करने की बात कही है. अफसोस की बात है कि चुनाव आयोग की सख्ती और पार्टियों की यह समझ प्रदेश में मृत्यु मिछिल (मौत की रैली) शुरू होने के बाद दिखी.


जहां कोरोना का प्रकोप ज्यादा वहां कम वोटिंग

बाकी राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी कोरोना संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है. गुरुवार को यहां करीब 12 हजार पॉजिटिव मरीज पाए गए. कोलकाता के बाद सबसे ज्यादा मरीज उत्तर 24 परगना जिले में हैं, जहां पांचवें और छठे चरण के दौरान वोटिंग हुई. गुरुवार को प्रदेश के 40% से ज्यादा कोरोना मरीज कोलकाता और उत्तर 24 परगना से ही आए. इसका असर मतदान पर भी पड़ा है. उत्तर 24 परगना में करीब 76% वोटिंग हुई है, जबकि पिछले चुनावों में इस जिले का औसत 82% वोटिंग का रहा है. अगले दो चरणों में कोलकाता में भी वोटिंग होनी है, जहां इन दिनों प्रदेश में सबसे कोरोना मरीज आ रहे हैं.


कोरोना के बढ़ते मामलों के बावजूद उन इलाकों में वोटिंग ज्यादा हुई है जहां अल्पसंख्यक ज्यादा हैं. जैसे, आमडांगा विधानसभा क्षेत्र में करीब 84% मतदाताओं ने वोट डाले. इससे पहले के चरणों में भी अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर 90% के आसपास वोटिंग हुई है. इसका एक कारण ध्रुवीकरण को माना जा रहा है. प्रदेश में 27 फीसदी मुस्लिम आबादी होने के बावजूद प्रदेश की राजनीति में कभी ‘मुस्लिम फैक्टर’ नहीं था. लेफ्ट, कांग्रेस या पिछले चुनावों तक तृणमूल ने धर्म के आधार पर वोट नहीं मांगे. लेकिन इस बार ध्रुवीकरण हावी है. व्हाट्सएप या दूसरे सोशल मीडिया के जरिए अल्पसंख्यक विरोधी वातावरण बनाया जा रहा है. कई स्थानीय नेता हों या दूसरे राज्यों से आने वाले नेता, सबके भाषणों में अल्पसंख्यक निशाने पर होते हैं.


अल्पसंख्यकों और मतुआ तय करेंगे नतीजे!

प्रदेश के ज्यादातर अल्पसंख्यक ग्रामीण इलाकों में रहते हैं. राजेंद्र सच्चर कमेटी की 2006 की रिपोर्ट के अनुसार मुसलमान पश्चिम बंगाल के सबसे गरीब तबके में थे. शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य जरूरी सुविधाओं तक उनकी पहुंच नहीं थी. उनकी हालत सुधारने के उपाय बताने के लिए ममता ने राजेंद्र सच्चर की ही अध्यक्षता में एक और समिति बनाने का वादा किया था, जो कभी नहीं बन पाई. हालांकि उन्होंने मुसलमानों के लिए कई योजनाओं की घोषणा की जिससे अनेक मुसलमान खुश भी हैं. लेकिन यही बात बहुत से हिंदुओं को नागवार गुजर रही है. भाजपा भी इसे मुद्दा बना रही है. ममता ने मुसलमानों के अलावा राजबंशी, नेपाली, लेपचा, भूटिया जैसे समुदायों में पैठ बनाने की कोशिश की तो भाजपा ने इन समुदायों की उप जातियों के बीच सोशल इंजीनियरिंग का काम किया.


भाजपा की उम्मीदें काफी हद तक मतुआ समुदाय पर टिकी हैं. मतुआ 1971 के बाद बांग्लादेश से भारत आए हिंदू हैं. नागरिकता कानून में 2003 में संशोधन करते हुए उसमें अवैध अप्रवासी श्रेणी जोड़ी गई. इससे 1971 के बाद बांग्लादेश से आने वाले हिंदुओं के सामने नागरिकता का संकट खड़ा हो गया. लोकसभा चुनाव के समय लगभग पूरा मतुआ समुदाय इस बात को लेकर आश्वस्त था कि उनकी नागरिकता की समस्या का समाधान भाजपा कर देगी. इसलिए समुदाय का लगभग पूरा वोट पार्टी को गया था.

उसके बाद हालात काफी बदल गए हैं. समुदाय अभी तक नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू होने का इंतजार कर रहा है, लेकिन भाजपा इस विषय पर कुछ भी कहने से कतरा रही है. लोगों की चिंता है कि दिसंबर 2019 में सीएए अस्तित्व में आने के बावजूद अभी तक इसके नियम नहीं बन पाए हैं. असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जारी होने के बाद 15 लाख बंगाली हिंदू बाहर हो गए. यह देख मतुआ समुदाय में भी डर है कि अगर वे कागजात दिखाने में नाकाम रहे तो उन्हें नागरिकता नहीं मिलेगी. तृणमूल कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने भी समुदाय के लोगों के बीच जाकर सीएए पर बात की. नतीजा यह हुआ कि अब समुदाय बंटा हुआ है. ममता बनर्जी ने तो यहां तक कहा है कि लोगों को नागरिकता का कोई सबूत देने की जरूरत नहीं पड़ेगी.


प्रदेश में लगभग 50 लाख मतुआ वोटर हैं. वैसे तो इनकी मौजूदगी करीब 100 से ज्यादा विधानसभा क्षेत्रों में है, लेकिन बांग्लादेश सीमा से लगे उत्तर 24 परगना और नदिया जिले की कम से कम 30 सीटों पर मतुआ समुदाय के काफी लोग हैं. 17 सीटें तो ऐसी हैं जहां 45% मतदाता इसी समुदाय से आते हैं. ये सीटें बनगांव और रानाघाट लोकसभा क्षेत्र के तहत आती हैं. अब देखना है कि समुदाय का भरोसा खुद को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बताने वाली भाजपा में बना रहता है या नहीं. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
सुनील सिंह

सुनील सिंहवरिष्ठ पत्रकार

लेखक का 30 वर्षों का पत्रकारिता का अनुभव है. दैनिक भास्कर, अमर उजाला, दैनिक जागरण जैसे संस्थानों से जुड़े रहे हैं. बिजनेस और राजनीतिक विषयों पर लिखते हैं.

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First published: April 24, 2021, 11:47 am IST

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