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Bengal Election 2021: ऐसे नारे और पैरोडी बंगाल में पहले कभी नहीं दिखी

West Bengal Election 2021: ममता ने सबसे पहले ‘मां माटी मानुष’ का नारा दिया था, जो 2009 के आम चुनाव और 2011 के विधानसभा चुनाव में काफी हिट रहा. यह उस समय के सबसे हिट राजनीतिक नारों में एक था.

Source: News18Hindi Last updated on: February 23, 2021, 4:54 PM IST
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Bengal Election 2021: ऐसे नारे और पैरोडी बंगाल में पहले कभी नहीं दिखी
पश्चिम बंगाल चुनाव के मद्देनज़र टीएमसी और बीजेपी आक्रामक प्रचार में जुटी हैं. फाइल फोटो
‘भद्रलोक’ का प्रदेश पश्चिम बंगाल दशकों से चुनावी हिंसा के लिए भी जाना जाता रहा है. इस बार भी हिंसा कम नहीं हो रही, लेकिन 2021 का विधानसभा चुनाव नए नारों और पैरोडी के लिए भी जाना जाएगा. चुनावों में इस तरह की पैरोडी कम से कम इस प्रदेश में पहले नहीं दिखी. और तो और, वाम दल भी खुद को इससे अलग नहीं रख पाए हैं. सबसे नया नारा तृणमूल कांग्रेस का है- ‘बांग्ला निजेर मेयेकेई चाय’. यानी बंगाल को अपनी बेटी ही चाहिए. यहां बेटी से मतलब तृणमूल प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से है. जगह-जगह इस नारे और ममता की फोटो के साथ होर्डिंग लग रहे हैं.

तृणमूल का मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से है, जिसे वह बार-बार बाहरी साबित करने की कोशिश कर रही है. शनिवार, 20 फरवरी को लांच किया गया यह नारा पार्टी की इसी रणनीति का हिस्सा है. लांचिंग के मौके पर पार्टी महासचिव पार्थ चटर्जी ने कहा भी, “हम नहीं चाहते कि बाहरी लोग बंगाल के बारे में फैसला करें.” पार्टी के दूसरे नेता कहते हैं कि भाजपा के नेता ‘चुनावी पर्यटन’ के लिए बंगाल आए हैं.

ममता का ‘मां माटी मानुष’ नारा खूब चला था
वैसे तृणमूल के लिए यह कोई पहला चुनावी नारा नहीं है. ममता ने सबसे पहले ‘मां माटी मानुष’ का नारा दिया था, जो 2009 के आम चुनाव और 2011 के विधानसभा चुनाव में काफी हिट रहा. यह उस समय के सबसे हिट राजनीतिक नारों में एक था. विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ममता ने इसी शीर्षक से एक किताब लिखी. इस नाम से एक गाना भी रिकॉर्ड किया गया था. पार्टी का एक और नारा खूब चला था- ‘चुप चाप, फूले छाप’. यानी चुपचाप फूल (पार्टी का चुनाव चिन्ह) पर वोट दीजिए.
2011 के चुनाव में तृणमूल ने एक और नारा दिया था- ‘बदला नॉय, बदल चाइ’. यानी बदला नहीं, बदलाव चाहिए. उनका यह नारा चुनावी हिंसा को देखते हुए था. राज्य में हाल के सभी चुनावों में बड़े पैमाने पर हिंसा देखने को मिली है. इसलिए पार्टी के एक कार्यकर्ता की हत्या के बाद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने ट्वीट करते हुए नया नारा दिया- ‘बदला-ओ हबे, बदल-ओ हबे’. यानी बदला भी होगा और बदलाव भी.

भाजपा का जवाब ‘पीसी जाओ’
तृणमूल के ‘बांग्ला निजेर मेयेकेई चाय’ नारे के जवाब में भाजपा ने उसी दिन एक पैरोडी लांच की- ‘पीसी जाओ’. बांग्ला में बुआ को पीसी कहते हैं. भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने अपने ट्विटर हैंडल से इसे लॉन्च करते हुए लिखा, “जो लोग सिर्फ स्लोगन जारी करने में रुचि रखते हैं, उनके लिए ठेठ बांग्ला शैली में ये है स्लो-गान (गाना).” भाजपा की इस पैरोडी के बोल हैं, “बांग्लाय शुधू दंगाबाजी, पीसी जाओ पीसी जाओ पीसी जाओ जाओ जाओ जाओ....” यानी बंगाल में सिर्फ दंगाबाजी, बुआ जाओ, बुआ जाओ.... जाहिर है, यहां ममता बनर्जी को बुआ कहा गया है.यह पैरोडी इतालवी गाने की नकल है, जिसमें शब्द हैं ‘बेला चाओ’. इसका अर्थ है ‘विदा सुंदरी’. 19वीं सदी में इटली में किसान और श्रमिक आंदोलनों में विरोधस्वरूप यह गाना गाया जाता था. इस गाने के साथ लेफ्ट के आंदोलन का इतिहास भी जुड़ा है. कोलकाता में सीएए और एनआरसी के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में भी इसका इस्तेमाल किया गया था.

वाम दलों का ‘टुंपा सोना’
वाम दल भी खुद को नारों और पैरोडी से दूर नहीं रख पाए हैं. लेफ्ट का नया नारा है, ‘हाल फेराओ, लाल फेराओ’. यानी पुराना हाल वापस लाओ, लाल (वामदल) को वापस लाओ. शुक्रवार, 19 फरवरी को वामदलों ने चर्चित बांग्ला गाने ‘टुंपा सोना’ की पैरोडी भी लांच की. मूल टुंपा सोना गाना नवंबर 2020 में आया था. पैरोडी के बोल कुछ इस तरह हैं- ‘टुंपा तोके निए ब्रिगेड जाबो...’. यानी टुंपा, तुम्हें लेकर ब्रिगेड जाऊंगा.

दरअसल, 28 फरवरी को कोलकाता के मशहूर ब्रिगेड परेड ग्राउंड में वामदलों की रैली है. वामदलों के साथ मिलकर यह चुनाव लड़ रही कांग्रेस का भी इस रैली को समर्थन है. कांग्रेस के साथ आने की वजह से लेफ्ट नेता बता रहे हैं कि इस बार यहां 10 लाख से अधिक लोग आएंगे, और यह हाल के वर्षों में सबसे बड़ी रैली होगी. जिला स्तर के नेताओं को समर्थकों को जुटाने का लक्ष्य दिया गया है. वामदलों और कांग्रेस की रैली के बाद 7 मार्च को ब्रिगेड ग्राउंड में भाजपा की भी सभा होगी, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने की चर्चा है.

‘खेला होबे’ पर सभी दलों की खींचतान
इन दिनों दो और शब्द बंगाल चुनाव में खूब प्रचलित हैं- ‘खेला होबे’ यानी खेल होगा. ‘खेला होबे’ एक गाना है, जिसे 2017 में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी से पहले बांग्लादेश टीम के प्रशंसकों ने तैयार किया था. वैसे ‘खेला होबे’ बांग्लादेश में भी राजनीतिक मंच पर ही लोकप्रिय हुआ था. वहां शेख हसीना की आवामी लीग के नेता शमीम उस्मान ने इन शब्दों को लोकप्रिय बनाया था. रोचक बात यह है कि पश्चिम बंगाल में सभी दल ‘खेला होबे’ का इस्तेमाल कर रहे हैं. एक ही नारे को लेकर ऐसी खींचतान पहले कभी नहीं दिखी थी.

तृणमूल से भाजपा में जाने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम की सभा में इसका इस्तेमाल किया, तो तृणमूल के अनुब्रतो मंडल ने शुभेंदु को जवाब दिया, “खेला होबे, भयंकर खेला होबे.” उत्तर परगना के नैहाटी में 13 फरवरी को पार्टी की एक सभा के बाद मंच से किसी नेता ने खेला होबे कहा. इसके बाद गाना बजा और वहां मौजूद कार्यकर्ता देर तक नाचते रहे. भाजपा की राज्यसभा सांसद रूपा गांगुली का कहना है, “खेला होबे का मतलब समझते हैं? इतने लोग मारे गए हैं….” इसके बाद पूर्वी वर्धमान में भाजपा की एक परिवर्तन यात्रा में भी यह गाना बजा. वामदलों और कांग्रेस की सभाओं में भी ‘खेला होबे’ गाया जा रहा है.

पिछले चुनावों में तृणमूल ‘हॉय एबार, नॉय नेभार’ (इस बार नहीं तो कभी नहीं) और ‘उल्टे देखून पाल्टे गैछे’ (पलट कर देखिए, बदल गया है) नारा भी दे चुकी है. इन दिनों तृणमूल नेता मदन मित्र का भी एक गाना वायरल है, जिसमें वे हाथ में कुम्हड़ा (कद्दू) लेकर नाच रहे हैं.

प्रदेश में चुनाव की तारीखों की घोषणा अभी नहीं हुई है, पर माना जा रहा है कि अप्रैल-मई में ही चुनाव होंगे. तब तक ऐसे ही नारों और पैरोडी का मजा लीजिए.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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First published: February 23, 2021, 4:34 PM IST
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