खुद का विकास चाहते हैं तो सहमत के मुकाबले असहमत को अपने करीब रखें

कुदरत एक ऐसा सहअस्तित्व सिखाती है जिसमें एक ही जंगल में शेर और हिरण एक साथ जी लेते हैं, और अपनी-अपनी जरूरतों भर के लिए खाते-पीते हैं. इस कुदरत ने इंसानों को भी विविधता दी थी, और वह तब तक चलती भी रही जब तक इंसान कुदरत से अधिक करीब रहे.

Source: News18Hindi Last updated on: August 11, 2020, 1:15 PM IST
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खुद का विकास चाहते हैं तो सहमत के मुकाबले असहमत को अपने करीब रखें
प्रतीकात्मक तस्वीर
इन दिनों सार्वजनिक जीवन के लोगों, और लिखने-पढऩे वाले लोगों की जिंदगी का रुख सोशल मीडिया से भी कुछ हद तक मुडऩे लगता है. लोग जो पढ़ते हैं, जो सुनते हैं, उससे उनकी खुद की सोच पर असर पड़ता है, और यह सिलसिला पहाड़ से लुढ़कते हुए पत्थर की तरह रफ्तार भी पकडऩे लगता है.

फेसबुक के बारे में यह कहा जाता है कि इसका एल्गोरिद्म आपके दोस्तों की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त में से कुल 25 लोगों की पोस्ट आपको दिखाते चलता है, और अगर ऐसा है, तो आपकी पोस्ट भी सीमित लोगों तक ही जाती होगी, बाकी के दोस्त आपके पेज पर आकर आपका लिखा और पोस्ट किया देख सकते होंगे. जिस तरह पुराने जमाने से यह सिलसिला चले आ रहा है कि बाजार में जब बहुत से अखबार रहते हैं तो लोग उस अखबार को अधिक पसंद करते हैं जो उनकी अपनी विचारधारा का होता है. ऐसा जायज ही है.
किसी कॉमरेड से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे दिन की शुरुआत पांचजन्य या सामना से करें, और पूरे दिन के लिए अपना मूड बर्बाद कर लें. ठीक इसी तरह शाखा से लौटकर घर पहुंचते ही किसी स्वयंसेवक को अगर लोकलहर या कोई और वामपंथी अखबार पढऩे की बेबसी हो, तो वह बात किए बिना भी नर्क भुगतने जैसा हो जाएगा. इसलिए लोग अपने हमख्याल अखबार को पढऩा पसंद करते हैं, वैसा ही समाचार चैनल देखते हैं, और फेसबुक या ट्विटर पर वैसे ही दोस्त बनाते हैं, वैसे ही लोगों को फॉलो करते हैं.

इसका कुल जमा नतीजा यह होता है कि लोग अपनी ही सोच के साथ सहमति रखने वाली बातें पढ़ते हैं, सुनते हैं, उनसे सहमति पोस्ट करते हैं, उन्हें आगे बढ़ाते हैं, और धीरे-धीरे उसी विचारधारा के लोगों से घिरते चले जाते हैं. जब लोगों का असहमति के तर्कों से सामना ही कम होने लगता है, तो फिर अपनी बात से परे कोई और बात सही लगना भी कम हो जाता है. लोगों को अचानक सामने आई कोई असहमति खटकने लगती है, आंखों की किरकिरी हो जाती है, और सहमति के, हमख्यालों की सोच के पुलाव में वह अनायास असहमति कंकड़ की तरह खटकने लगती है.
लेकिन कुदरत ने अपने आपमें तो विविधता रखी है. कमल को नर्म पंखुडिय़ां दी हैं, पानी में नीचे सिंघाड़े को तीखे कांटे दिए हैं, कैक्टस को कांटे ही कांटे दिए हैं, लेकिन उसके ऊपर ऐसे गजब के नर्म फूल दिए हैं कि देखते ही रह जाएं. पहाड़ों पर विशाल चट्टानें दी हैं, लेकिन उनके बीच से निकलकर लहराती नदियां भी दी हैं. कड़े खोल वाला नारियल दिया है, लेकिन उसके भीतर नर्म गूदा और मीठा पानी दिया है. कुदरत की सारी विविधता देखने लायक है, और सीखने लायक भी है.

कुदरत एक ऐसा सहअस्तित्व सिखाती है जिसमें एक ही जंगल में शेर और हिरण एक साथ जी लेते हैं, और अपनी-अपनी जरूरतों भर के लिए खाते-पीते हैं. इस कुदरत ने इंसानों को भी विविधता दी थी, और वह तब तक चलती भी रही जब तक इंसान कुदरत से अधिक करीब रहे. उनमें से कुछ जानवरों को मारकर खाते थे, उन्हीं में से कुछ फसलें उगाने लगे, उन्हीं में से कुछ पेड़ों के फल और कंदमूल खाते थे.

ऐसी विविधता की जिंदगी को आगे चलकर अमेरिकी बाजारों में आधा दर्जन फास्टफूड ब्रांड ने एक सरीखा कर दिया, और आबादी का एक बड़ा हिस्सा एक किस्म का खाने लगा, एक किस्म का पीने लगा, और एक ही किस्म की जींस पहनने लगा.जिस तरह अमेरिकी बाजार ने खानपान को बदला, कुछ उसी तरह उसी अमेरिका से उपजे सोशल मीडिया ने सोच को बदल दिया. आज हम चाहे-अनचाहे धीरे-धीरे एक ऐसे अंत की तरफ बढ़ रहे हैं जिसकी राह में किनारे खड़े असहमत लोग धीरे-धीरे हमें दिखना बंद हो जाते हैं, या हम ही उन्हें धीरे-धीरे नजरों से हटा देते हैं. फेसबुक पर एक नया फीचर है- किसी की पोस्ट को 30 दिनों के लिए अपनी नजरों से हटा देना.

मैं अपनी खुद की बात करूं तो नफरत की पोस्ट करने वाले बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें मैं 30-30 दिन के लिए हटाते हुए जाने कितनी बार हटा चुका हूं. और जाहिर है कि बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जो नफरत के खिलाफ लिखी मेरी पोस्ट की वजह से मुझको भी 30-30 दिनों के लिए हटाते हुए आखिर में पूरी तरह हटा देते होंगे.

इस बात पर चर्चा जरूरी इसलिए है कि जब हम किसी दूसरी सोच, या अपनी सोच से असहमति के बिना रह जाते हैं, तो हमारी अपनी विचारधारा का विकसित होना, उसका परिपक्व होना, उसका आंच में तपकर खरा होना, सब कुछ थम जाता है. और कुछ कड़वे शब्दों में कहें, एक कीड़े से माफी मांगते हुए कहें, तो इंसान धीरे-धीरे अपनी ही सोच के लोगों से घिरते हुए वैसी वैचारिक मौत मरने लगते हैं जैसी कि मौत रेशम का एक कीड़ा ककून बनाते हुए उसके भीतर घिरकर कैद होकर पाता है. वह अपने ही बनाए हुए ककून की कब्र में मर जाता है. हमारी सोच कुछ उसी तरह हमें एक विचारधारा के भीतर कैद कर लेती है कि सोच का विकास रेशम के कीड़े की तरह मर जाता है.

सोशल मीडिया पर आपके जो दोस्त हों, उनसे एक दिलचस्प बात पूछ सकते हैं कि उनके दोस्त किस-किस जेंडर या सेक्स-प्राथमिकता वाले लोग हैं, किस-किस देश के हैं, किस-किस प्रदेश के हैं, किन धर्मों और जातियों के हैं, उनके अपने पेशे से परे के कितने हैं, उनके अपने शहर से परे के कितने हैं, उनके अपने कुनबे से परे के कितने हैं, उनकी अपनी राजनीतिक सोच से अलग वाले कितने हैं? ऐसे सवाल दूसरे से पूछने के साथ-साथ अपने आपसे पूछना भी मायने रखता है, और जरूरी है.

मैं हजार से अधिक फेसबुक दोस्तों पर एक नजर डालता हूं, तो हिन्दुस्तान के आधे प्रदेशों में मुझे कोई दोस्त याद नहीं पड़ते हैं. राजनीतिक सोच में असहमति वाले तो हैं, धर्मों में भी दूसरे धर्मों के लोग भरपूर हैं, लेकिन बहुत से पेशे ऐसे हैं जिनके लोग मेरे फेसबुक दोस्तों में नहीं हैं. इसी तरह ट्रांसजेंडर या दूसरी सेक्स-प्राथमिकता वाले लोग इक्का-दुक्का ही हैं.

लोगों को विविधता के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए. अपनी ही सोच के लोगों से घिरे रहना एक कीर्तन में ढोल-मंजीरों के बीच सिर हिलाने से अधिक कुछ नहीं होता जिससे रात भर के आखिर में कुछ हासिल नहीं होता. लोगों को बकवासी और फसादी लोगों से घिरे रहकर भी कुछ नहीं मिलता, और लगातार झूठ पोस्ट करने वाले बदनीयत लोगों से भी कुछ नहीं मिलता, महज साख खराब होती है कि आप ऐसे लोगों के दोस्त हैं, या ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं, या ऐसे लोग आपको फॉलो करते हैं.

आप असल जिंदगी में धीरे-धीरे वही बनने लग जाते हैं जो कि सोशल मीडिया पर आपका दायरा होता है. एक समय लोगों पर गुरु का असर पड़ता था, परिवार का असर पड़ता था, या दोस्तों की चौकड़ी का असर पड़ता था. अब वक्त बदल गया है. अब रूबरू लोगों के मुकाबले आभासी लोगों का असर अधिक हो गया है. और आभासी दुनिया में आप कैसे लोगों के साथ हैं यह तो मायने रखता ही है. आप कैसी-कैसी सोच का सामना करने का हौसला रखते हैं, यह भी आपके व्यक्तित्व को बनाने वाला होता है. असहमति से सामने के हौसले का मेरा मतलब किसी कोने से भी नफरत और हिंसा करने वाले लोगों को इर्द-गिर्द रखने से नहीं है.

वे लोग तो आभासी दुनिया में रहने लायक भी नहीं हैं, और असल दुनिया में भी खुले रहने लायक भी नहीं हैं. लेकिन मेरा यह मतलब जरूर है कि जो लोग तर्कों के आधार पर, तथ्यों के आधार पर अपनी एक अलग और दूसरी सोच, आपसे असहमति की बात करते हैं, उनकी बात को सुनना, पढऩा न सिर्फ दिलचस्प होता है, बल्कि अपनी सोच को भी आत्ममंथन का एक मौका उससे मिलते रहता है.

अपने खुद के विकास के लिए, अपनी खुद की परिपक्वता के लिए अलग-अलग दायरे के लोगों की सोच और असहमति, आसपास के चुनिंदा दायरों के लोगों की सहमति के मुकाबले अधिक मायने रखती है.
ब्लॉगर के बारे में
सुनील कुमार

सुनील कुमारसंपादक, दैनिक छत्तीसगढ़

लेखक 1976 से अख़बारों में काम कर रहे हैं. इन दिनों वे दैनिक 'छत्तीसगढ़' के संपादक हैं. दुनिया के बहुत से देशों से उन्होंने लिखा है. मीडिया पढ़ाना, और फोटोग्राफी भी उनके पसंदीदा काम हैं.

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First published: August 11, 2020, 1:15 PM IST
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