कोरोना ने बच्‍चों के कंधों पर लादा बोझ, आखिर कैसे निपटें बालश्रम की चुनौती से

महामारी आने के पहले दुनिया में बाल मजदूरों का आंकड़ा कोई 16 करोड़ था. सन 2002 से यानी जब से विश्व स्तर पर बाल श्रम निषेध दिवस मनाना शुरू हुआ है तब से लेकर आज तक हर साल बालश्रम के आंकड़े में लगातार बढ़ोतरी ही देखी गई है. खासतौर पर गरीब देशों में यह संकट तेजी से बढ़ा है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 12, 2021, 10:33 PM IST
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कोरोना ने बच्‍चों के कंधों पर लादा बोझ, आखिर कैसे निपटें बालश्रम की चुनौती से
किसी न किसी रूप में मजदूरी करने वाले एक करोड़ से ज्यादा बच्चों का आंकड़ा यह मान लेने के लिए पर्याप्त है कि इस सिलसिले में कानूनी उपाय ज्यादा कारगर नहीं रहे हैं.
बारह जून यानी आज के दिन पूरी दुनिया में बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है. इस साल इस विश्व दिवस का महत्त्व ज्यादा ही है. क्योंकि वैश्विक महामारी ने बच्चों को ज्यादा ही संकट में ला दिया है. अतंरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अंदेशा है कि महामारी ने लाखों बच्चों को अनाथ बना दिया. अपने देश में नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइटस के मुताबिक पिछले तीन महीनों में 9300 बच्चे अनाथ हुए हैं.

दूसरे अनुमानों में कोरोना काल में अबतक कोई 30 हजार बच्चों के अनाथ होने का अंदेशा है. हालांकि यह अभी अनुमान ही हैं. महामारी से मची तबाही की सही नाप तौल होना अभी बाकी है. लेकिन इस बात में कोई संशय नहीं होना चाहिए कि पहले से चली आ रही बाल श्रम की समस्या  अचानक तेजी से बढ़ गई है.

महामारी के पहले से ही चिंतित थे
महामारी आने के पहले दुनिया में बाल मजदूरों का आंकड़ा कोई 16 करोड़ था. सन 2002 से यानी जब से विश्व स्तर पर बाल श्रम निषेध दिवस मनाना शुरू हुआ है तब से लेकर आज तक हर साल बालश्रम के आंकड़े में लगातार बढ़ोतरी ही देखी गई है. खासतौर पर गरीब देशों में यह संकट तेजी से बढ़ा है. और इसीलिए सन 2016 में जब विश्व स्तर पर सतत विकास लक्ष्यों का निर्धारण हुआ था तब बाल श्रम उन्मूलन का लक्ष्य भी उनमें शामिल किया गया था.
सन 2030 में उन लक्ष्यों को हासिल करने के इरादे से तमाम काम चालू हैं. लेकिन महामारी ने जिस तरह की तबाही मचाई है उसमें सतत विकास लक्ष्यों को झटका जरूर लगा है. हालांकि अभी बहुत ज्यादा चिंता इसलिए नहीं जताई जा रही है, क्योंकि महामारी से निपटने का तीसरा चरण यानी रिकवरी का काम शुरू होना बाकी है. यानी कई सरकारों के पास तर्क है कि वे नुकसान की भरपाई के काम में लग जाएंगी, और सब ठीकठाक कर लेंगी.

मुश्किल यह है कि बच्चों से मजदूरी करवाने का मामला महामारी से पहले से चला आ रहा है और अच्छी खासी तीव्रता के साथ चला आ रहा है. अपने देश में ही महामारी से पहले करीब एक करोड़ बीस लाख बच्चों के बाल मजदूर होने का आंकड़ा था. यहां यह भी दर्ज कराया जा सकता है कि सरकारों को अपने कानूनी उपायों पर भी बड़ा भरोसा रहता है.


कानूनी उपाय उतने कारगर नहीं रहेकिसी न किसी रूप में मजदूरी करने वाले एक करोड़ से ज्यादा बच्चों का आंकड़ा यह मान लेने के लिए पर्याप्त है कि इस सिलसिले में कानूनी उपाय ज्यादा कारगर नहीं रहे हैं. और ऐसा भी नहीं कि इस क्षेत्र में अपने देश में बहुत पहले से उपाय न हो रहे हों. मसलन सन 1960 में देश में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट यानी बाल न्याय अधिनियम लागू हो गया था. उसके बाद 1986 में चाइल्ड एंड एडेलोसेंट प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन एक्ट बना. इसी तरह 1987 में नेशनल पाॅलिसी ऑन चाइल्ड बनी.

सन 2000 और 2016 में भी कुछ कानूनी उपाय किए गए. लेकिन इन कानूनों का क्रियान्वयन उतनी कड़ाई से होता हुआ दिखाई नहीं दिया. बहरहाल महामारी के बाद बच्चों की दुनिया में इस संकट के बढ़ने का अंदेशा और बढ़ गया है. अब हमें सोचना पड़ेगा कि कानूनी उपायों के अलावा और क्या तरीके अपनाए जा सकते हैं.

सरकार के बस में और क्या है?
माना जाता है कि तमाम समस्याओं की जड़ अर्थव्यवस्था का कमजोर पड़ जाना ही है. और इसीलिए दुनिया भर की सरकारें अर्थव्यवस्था को ठीक करने का ही नारा लगाती हैं. लेकिन बाल श्रम की तीव्रता को देखते हुए अर्थव्यवस्था सुधरने तक इंतजार करना जोखिम भरा है. भले ही बाल श्रम का मुख्य कारण आर्थिक मान लिया गया हो लेकिन बाल श्रम का सीधा संबंध शिक्षा व्यवस्था और बाल विकास में समाज की भूमिका से भी जोड़ा जाता है.

अगर हम सभी के लिए शिक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हों तो बाल श्रम निषेध के लिए कुछ भी करना नाकाफ़ी ही माना जाएगा. जाहिर है कि हमारे सामने मुंह बाए खड़ी बाल श्रम की समस्या के समाधान का उपाय समावेशी शिक्षा व्यवस्था में ही देखा जाना चाहिए. यानी ऐसी शिक्षा व्यवस्था जिसमें बाल श्रम के लिए संवेदनशील बच्चों के लिए भी शिक्षा की व्यवस्था हो सके.


बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर बढ़ी
दुनिया के सामने इस समय सबसे ज्यादा गौरतलब लक्षण है कि महामारी ने स्कूल ड्राप आउट रेट अचानक बहुत बढ़ा दिया है. जिन देशों में लंबे वक्त तक लाॅक डाउन के बाद स्कूल खुले वहां बच्चों का वापस स्कूल लौटना बहाल नहीं हुआ है. अपने देश में अभी इस तरह की प्रवृत्ति की नापतौल नहीं हुई है. लेकिन इसे सार्वभौमिक मानते हुए हमें चैकन्ना हो जाना चाहिए और फौरन ही कोई योजना बना लेनी चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे स्कूलों में पढ़ते नज़र आएं. वरना बाल श्रम, बाल अपचार और बच्चों का शोषण बढ़ते देर नहीं लगेगी.

बाल कल्याण पर सरकारी खर्च बढ़ाने का उपाय
बेशक महामारी ने तमाम देशों की अर्थव्यवस्थाओं को हिलाकर रख दिया है. आर्थिक मोर्चे पर डगमगाईं सरकारें खर्च बढ़ाने में अपनी असमर्थता जता सकती हैं. लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अगर पटरी से उतरी हुई अर्थव्यस्थाओं को वापस पटरी पर लाना है तो निवेश बढ़ाने के अलावा दूसरा और कोई चारा होता भी नहीं है. भले ही वे देश भविष्य की आमदनी की उम्मीद लगाकर वर्तमान में खर्च बढ़ाएं लेकिन ऐसा करना मजबूरी ही होगी. ऐसे में तय करना होगा कि खर्च किया कहां जाए?

सामाजिक क्षेत्र क्यों है बेहतर
अगर सिर्फ अपने देश की बात करें तो निकट भूतकाल का एक कटु अनुभव रहा है कि उत्पादक क्षेत्र यानी उद्योग और सेवा क्षेत्र में ताबड़तोड़ निवेश बढ़ाकर देखा जा चुका है. तरह तरह के राहत पैकिज का अपेक्षित असर उतना दिखाई नहीं दिया है. पिछले साल सकल घरेलू उत्पाद का आंकड़ा सात फीसद से ज्यादा कम हो गया है. और अर्थशास्त्र के जानकार इसका कारण यह बता रहे हैं कि दिक्कत औद्योगिक उत्पाद के विनिर्माण की नहीं थी बल्कि उपभोक्ताओं के कमजोर पड़ जाने की थी. अगर अब उपभोक्ताओं की जेब तक पैसा पहुंचाना है तो वे क्षेत्र पहचानना पड़ेंगे जो भले ही उत्पादक न हों लेकिन भविष्य के लिए धरोहर बन जाएं.

बच्चों की शिक्षा पर जरूरत से ज्यादा खर्च या निवेश बुद्धिमत्तापूर्ण उपाय हो सकता है. याद दिलाया जा सकता है कि सरकारी खर्च किसी भी मद में बढ़े वह घूमफिर कर पहुंचता उपभोक्ता की जेब में ही है. उपभोक्ता की जेब से ही बाजार फलता फूलता है और उसी से गिरी हुई, सुस्त अर्थव्यवस्था में जान आ जाती है.


इस साल के बाल श्रम निषेध दिवस का विषय है ‘एक्ट नाव (Act Now)’ यानी अब कुछ करिए. शिक्षा व्यवस्था पर ताबड़तोड़ खर्च करके हम एक साथ कई मोर्चो को साध सकते हैं. आज भी और कल के लिए भी.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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First published: June 12, 2021, 9:59 PM IST
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