प्रदूषण से सिर्फ राहत नहीं, बल्कि समाधान की दरकार

सर्दियों में दिल्ली पर जहरीली धुंध कोई इसी साल नहीं छाई है. पिछले चार पांच साल से सर्दियां आते ही यह समस्या आती है और हर साल इसी तरह से चिंता जताई जाती है. समस्या के कारणों पर बात होती है. गुनहगारों की तलाश होती है. समस्या के उपायों की बातों को दोहराया जाता है. इतनी लंबी बात होती है कि तब तक सर्दियां गुज़र जाती हैं और दिल्ली में छाई घनी धुंध दिखना बंद हो जाती है और फौरन ही प्रदूषण की चर्चा भी बंद हो जाती है.

Source: News18Hindi Last updated on: December 3, 2021, 12:58 PM IST
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प्रदूषण से सिर्फ राहत नहीं, बल्कि समाधान की दरकार


दिल्ली-एनसीआर में धुंध यानी वायु प्रदूषण की चिंता करने का काम जारी है. इस समस्या के कारणों और समाधान के उपायों की बातें फिर दोहराई जा रही हैं. इसी कड़ी में नई बात यह है कि अदालत ने केंद्र सरकार और संबधित राज्य सरकारों को चेतावनी दे दी है कि अगर वायुगुणवत्ता प्रबंधन आयोग के दिशा निर्देशों का पालन न किया गया तो अदालत एक टास्क फोर्स बनवाकर यह काम करवाएगी.


आज गुरूवार को सुप्रीमकोर्ट में दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण को लेकर सुनवाई का दिन था. माना जा रहा था कि आज अदालत  केंद्र और संबधित राज्य सरकारों को कोई निर्देश दे सकती है. लेकिन आज यह निर्देश जारी हुआ है कि इस मामले के पक्षकार 24 घंटे के भीतर वायु प्रदूषण को कम करने के ठोस उपाय लेकर आएं. अब स्थिति यह बनी है कि अदालत कल यानी शुक्रवार को सबेरे फिर सुनवाई के बाद कोई कड़े निर्देश जारी कर सकती है.


हालांकि ये अनुमान लगाया जाना मुश्किल है कि दिल्ली सरकार या केंद्र सरकार इस दौरान कौन से नए उपाय सोचेगी और अदालत को बताएगी. वायु प्रदूषण पर अब तक अदालत के भीतर और अदालत के बाहर हुई बहसों और सोच विचार पर गौर करें और कोई विश्लेषण करें तो इतना साफ हो चुका है कि वायु प्रदूषण का मसला हद से ज्यादा जटिल है. इसके वैज्ञानिक उपायों को अगर लागू करने में अड़चन आ रही है तो आगे चलकर नए सिरे से सोच विचार की जरूरत पड़ सकती है.


कल अदालत जो भी निर्देश देगी वह तो लागू करके देखे ही जाएंगे लेकिन इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए अब एक व्यवस्था की ज़रुरत तो है ही, बहरहालए वायु प्रदूषण की समस्या के तात्कालिक समाधान के लिए लगभग हर स्तर पर संजीदगी से कवायद होती दिख रही है. लेकिन समस्या का एक पहलू मूल कारणों पर नज़र डालने का और दीर्घकालिक यानी पुख्ता समाधान सोचने का भी है.


क्या कोई आपदा है प्रदूषण

वायु प्रदूषण को आपदा की श्रेणी में इसलिए नहीं रखा जा सकता क्योंकि यह अचानक आई समस्या नहीं है.  एनसीआर में यह समस्या सर्दियां आते ही अब हर साल कुछ ज्यादा ही विकट होने लगती है. इसीलिए बस इन्हीं दिनों चिंता जताई जाती है. लेकिन विशेषज्ञों और दूसरे पक्षकारों को इस बात पर भी गौर कर लेना चाहिए कि समय के साथ यह समस्या कहीं हर साल ज्यादा तीव्र और व्यापक तो नहीं बन रही हैघ्


इस साल क्यों हो रही है ज्यादा चिंता

इस साल लग रहा है जैसे प्रदूषण ज्यादा है. लेकिन हर साल ऐसा ही लगता है. वैसे इस बार अदालत कुछ ज्याद संजीदा है. इसके अलावा अभी सर्दियों का चरम आना बाकी है. इसलिए अखबारों में फिलहाल एनसीआर की ज़हरीली धुंध को कुछ ज्यादा जगह मिल रही है. लेकिन हमें भूलना नहीं चाहिए कि अभी दो साल पहले ही दिल्ली और एनसीआर प्रदूषण की भारी चपेट में आ गया था और उस समय उपाय के तौर पर बड़े जोरशोर से एक व्यवस्था की चर्चा हुई थी.


उस व्यवस्था का नाम था ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान. लेकिन ज्यादा पता नहीं चला कि वह प्लान कितना कारगर रहा था या आज भी कितना असरदार है. बहरहाल जब तक वायु प्रदूषण का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं मिलता, तबतक पुरानी बातों को दोहराते रहने में हर्ज भी क्या है. लेकिन सोचने की बात ये है कि क्या वायु प्रदुषण सिर्फ इन्ही कुछ महीनों की समस्या है.


ये फौरी समस्या नहीं

सर्दियों में दिल्ली पर जहरीली धुंध कोई इसी साल नहीं छाई है. पिछले चार पांच साल से सर्दियां आते ही यह समस्या आती है और हर साल इसी तरह से चिंता जताई जाती है. समस्या के कारणों पर बात होती है.  गुनहगारों की तलाश होती है. समस्या के उपायों की बातों को दोहराया जाता है. इतनी लंबी बात होती है कि तब तक सर्दियां गुज़र जाती हैं और दिल्ली में  छाई घनी धुंध दिखना बंद हो जाती है और फौरन ही प्रदूषण की चर्चा भी बंद हो जाती है.


लेकिन क्या यह भी गौरतलब नहीं है कि वायु प्रदूषण के मामले में कई भारतीय शहर पूरे साल ही मुख्य प्रदूषित शहरों की श्रेणी में शीर्ष पर रहने लगे हैं, लेकिन वायु प्रदुषण पर चिंता उस हिसाब से पूरे साल नज़र नहीं आती है. लिहाजा एक सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इस बार भी पहले की तरह ज्यादा कुछ नहीं हो पाएगा या इस साल कुछ होने की उम्मीद लगाई जाए. इस तरह का जवाब ढूंढने के लिए कुछ तथ्यों पर गौर जरूर कर लेना चाहिए.


पहले क्या करके देखा





याद रहना चाहिए कि वायु प्रदूषण के मामले में दिल्ली एनसीआर के शहर देश के ही नहीं, बल्कि पूरी दूनिया के शहरों में सबसे कुख्यात होते जा रहे हैं. इतना ही नहीं विश्व के सबसे ज्यादा प्रदूशित 15 शहरों की सूची में अपने देश के 12 शहरों का नाम है. यह स्थिति कोई इसी साल की नहीं, बल्कि कमोबेश पांच साल से चली आ रही है. कोरोना के पहले यानी अभी दो साल पहले ही दिल्ली जब वायु प्रदूषण की गंभीर चपेट में दिखी थी तो भारी चिंता जताई गई थी.


तब एयर क्वालिटी इंडेक्स सभी पैमानों को तोड़ते हुए 1200 पॉइंट तक पहुंच गया था. तबकी चिंता की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जाना चाहिए कि हवा की गुणवत्ता नापने का पैमाना  ही 500 पॉइंट पर जाकर खत्म हो जाता है. 500 पॉइंट की श्रेणी को आपातकाल का नाम दिया गया है. याद दिलाया जा सकता है उस समय दिल्ली एनसीआर में पैमाना तोड़ प्रदूषण को कम करने के लिए पहले से बना ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान लागू किया गया था.


वैसे इस प्लान को आजमाया तो 2017-18 में भी गया था और ग्रेप के नियमों को लागू तो इस साल भी किया गया है. लेकिन, पिछले प्रयासों के बाद ज्यादा पता नहीं चला कि वह प्लान कितना कारगर रहा. अगर वह तरीका व्यावहारिक और ज्यादा कारगर रहा होता तो उस योजना का जिक्र प्रमुखता से इस साल सुनाई जरूर देता. दरअसल ग्रेप नाम का वह प्लान तात्कालिक उपाय ही था. जिसमें सिर्फ यह सोचा गया था कि जैसे जैसे वायु प्रदूषण की तीव्रता बढ़ेगी वैसे वैसे हम अपने उपायों की तीव्रता बढ़ाते जाएंगे.


यानी समाधान के उस उपाय में तात्कालिक राहत की बात तो थी, लेकिन इस समस्या की दीर्घकालिक तीव्रता को कम करने का आश्वासन नहीं था. उस प्लान में समस्या की तीव्रता के लिहाज़ से निर्माण कार्यों,  कारखानों, वाहनों और स्कूल कॉलेजों को बंद करने के उपाय थे. ये सभी उपाय तात्कालिक थे. इससे समस्या का स्थायी उपाय मिलने की कोई स्थिति नहीं थी. इन उपायों से समस्या का बढ़ना कुछ समय ठहर तो सकता है, लेकिन आगे के लिए समाधान की स्थिति नहीं बनती.


इस बार तो तात्कालिक उपाय करना भी मुश्किल

सरकार भले ही यह तर्क दे रही है कि 2019 के मुकाबले पिछले साल वायु गुणवत्ता में सुधार आया है, लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यह सुधार कोरोना के चलते सभी आर्थिक गतिविधियों के ठप्प हो जाने के कारण ज्यादा दिखाई दिया. पूरे देश में तालाबंदी होने की वजह से ना वाहन चले न ही निर्माण कार्य हुए. एक तरह से ग्रेप व्यवस्था में बताए गए उपाय खुद ब खुद लागू हो गए.


लेकिन अब हालात अलग हैं. आर्थिक गतिविधियों को कुछ समय के लिए रोककर प्रदूषण को कम कर लेना दो साल पहले फिर भी सोचा जा सकता था. लेकिन कोरोना काल के चरम के बाद अब देश के आर्थिक हालात पहले से ज्यादा नाज़ुक हैं. अब ज्यादा समय कारखाने या दूसरी गतिविधियों को रोक कर नहीं रखा जा सकता. लंबे अरसे बाद खुल पाए बच्चों के स्कूल और कॉलेज भी आखिर कब तक बंद किए जा सकते हैंघ.


फटकार सुनने के बाद शुक्रवार से स्कूल फिर से बंद ज़रूर हो गए हैं, लेकिन आगे क्या ये बात नहीं उठेगी कि ज्यादा  ज़रुरत प्रदूषण को रोकने की है. वायु प्रदूषण के लिए चार छह हफ्ते पराली जलने पर कितना ही दोष मढ़ लिया जाए, लेकिन गौर किया जाना चाहिए कि प्रदूषण की यह समस्या साल में अब पूरे 12 महीनों की बनती जा रही है. वैसे भी कई रिपोर्ट  आ  चुकी हैं जिनमें कुल प्रदूषण में पराली के जलने की उतनी बड़ी भूमिका साबित नहीं हुई है.


प्रदूषण के दूसरे कारणों की कुल गुनहगारी पराली से कहीं ज्यादा है. और ये सभी कारण हमारी आर्थिक गतिविधियों से सीधे जुड़े हैं. मसलन 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक वायु प्रदूषण में लगभग 75 फीसद योगदान औद्योगिक कारखानों, निर्माण कार्य और दूसरी गतिविधियों से उड़ने वाली धूल और वाहनों से निकले धुंए का है. जाहिर है कि जब एनसीआर में भयावह प्रदूषण की रोकथाम या न्यूनीकरण की योजना सामने आएगी तो सबसे पहले यही सवाल उठेगा कि अगर आर्थिक गतिविधियों रोकते हैं तो अर्थव्यवस्था का क्या हाल होगा.


तो फिर उपाय क्या

अगर यह मान लिया जाए कि एनसीआर और खासतौर पर दिल्ली या देश के दूसरे शहरों में प्रदूषण का मूल कारण औद्योगिक गतिविधियां हैं तो योजनाकारों को सोचने पर मजबूर होना पड़ सकता है कि प्रदूषण मुक्त आर्थिक गतिविधियों का कैसा प्रारूप बनाया जाए. जाहिर है कि प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार जीवाष्म ईंधन यानी कोयला, डीजल, पेट्रोल वगैरह के विकल्प जल्द से जल्द लागू करने पड़ेगे.


खेतों में अगली फसल की जल्द बुआई के लिए पराली हटाने का कोई व्यावहारिक तरीका सोचना पड़ेगा. एक अनुमान जताया जा सकता है कि ये विकल्प राजनीतिक या वैधानिक उपायों से पैदा नहीं किए जा सकते, बल्कि विज्ञान जगत से उम्मीद लगाई जानी चाहिए कि वह ऐसा विज्ञान और ऐसी प्रौद्योगिकी बनाने के बारे में सोचे जो मानव जीवन के लिए प्रदूषण जैसी आपदाएं पैदा न करे और जिसे आर्थिक रूप से लागू करना व्यावहारिक भी हो.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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First published: December 3, 2021, 12:55 PM IST
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