अकेलेपन में भी धकेला महामारी ने

इस दौरान जैपनीज़ एसोसिएशन ऑफ़ मेंटल हेल्थ सर्विसेज़ की निदेशक यूकी नीशीमूरा के मुताबिक जापान के समाज में वायरस से बचाव की जिम्मेदारी महिलाओं पर ही ज्यादा डाली गई. यह देखा गया कि परिवार के स्वास्थ्य और साफ सफाई की देखरेख की जिम्मेदारी महिलाओं की ही ज्यादा रही.

Source: News18Hindi Last updated on: February 26, 2021, 11:38 AM IST
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अकेलेपन में भी धकेला महामारी ने
जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा ने इसी महीने की शुरुआत में अपनी कैबिनेट में 'Minister of Loneliness'का पद जोड़ा था.
हामारी से दुनियाभर में तरह तरह की तबाहियों की खबरें आने लगी हैं. एक नई तबाही का पता जापान में एक भयावह संकट से चला है. यह मनावैज्ञानिक संकट है अकेलापन. महामारी से बचाव के उपाय के तौर पर अलगाव और सामाजिक दूरी का तरीका अपनाया गया था. जापान में शोध सर्वेक्षणों से पता चल रहा है कि इससे अकेलेपन की समस्या हद से ज्यादा भयावह हो गई और आत्महत्याओं की घटनाएं बढ़ गईं. संकट इतना बड़ा हो गया कि जापान सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए पिछले हफते एक अलग से मंत्री बनाना पड़ा. इसका नाम ही है मिनिस्टर ऑफ़ लोनलीनेस.

दरअसल जापान में यह मंत्रालय इसलिए बनाना पड़ा है क्योंकि सबसे ज्यादा आत्महत्या दर वाले देशों में शामिल जापान में महामारी के दौरान आत्महत्याओं की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ गई. आंकड़ों के विश्लेषण से चैंकाने वाली बात यह पता चली कि महामारी के दौरान महिलाओं में आत्महत्या की दर अचानक 15 फीसदी बढ़ गई. कोरोना काल यानी 2020 में जापान में 6976 महिलाओं ने खुदकुशी की. यानी मनोवैज्ञानिक रूप से महामारी का सबसे ज्यादा मारक असर महिलाओं पर पड़ा.

इस मामले में जापान को सिर्फ एक बानगी ही माना जा सकता है. इसे एक वैश्विक समस्या के रूप में भी देखा जाना चाहिए. क्योंकि कोरोना संक्रमितों के लिए अलगाव का तरीका और कोरोना से बचाव के लिए सामाजिक दूरी का उपाय दुनिया के लगभग हर देश में अपनाया गया. यानी अभी दूसरे देशों से खबरें भले ही न आ रही हों लेकिन चिंता सभी को करनी पड़ेगी. हमें भी करनी चाहिए.

विशेषज्ञों ने महामारी के दौरान महिलाओं में आत्महत्याओं के कारण को भी समझा है. दरअसल महामारी के दौरान दुनियाभर में जिन्होंने अपना रोज़गार गंवाया उनमें पुरूषों की तुलना में महिलाओं का आंकड़ा ही ज्यादा बड़ा है. माना गया है कि खासतौर पर वर्क फ्राम होम सैटिंग में महिलाओं पर काम का दबाव ज्यादा पड़ा. घर में 24 घंटों मौजूदगी की बाध्यता ने ऑफिस के काम के साथ- साथ महिलाओं से परिवार पर अतिरिक्त ध्यान लगाने की अपेक्षाएं बढ़ा दीं और महिलाओं पर बोझ दुगना कर दिया. एक रिपोर्ट पहले ही आ चुकी है कि महामारी के दौरान पूरी दुनिया में घरेलू हिंसा और कलह की समस्या पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई.
इस दौरान जैपनीज़ एसोसिएशन ऑफ़ मेंटल हेल्थ सर्विसेज़ की निदेशक यूकी नीशीमूरा के मुताबिक जापान के समाज में वायरस से बचाव की जिम्मेदारी महिलाओं पर ही ज्यादा डाली गई. यह देखा गया कि परिवार के स्वास्थ्य और साफ सफाई की देखरेख की जिम्मेदारी महिलाओं की ही ज्यादा रही. और इसीलिए परिवार में संक्रमण आने का अपराधबोध महिलाओं ने ही ज्यादा महसूस किया. यहां जापान की 30 साल की एक युवती के सुसाइड नोट का जिक्र किया जा सकता है जिसे कोरोना संक्रमण हो गया था. उसने नोट में लिखा कि उसके कारण कहीं परिवार के दूसरों को संक्रमण न हो जाए. उसे यह अपराधबोध भी था कि उसके कारण परिवार के दूसरों को परेशानी हो रही है. राजनीतिशास्त्र के एक शोधार्थी की वह रिपोर्ट भी गौरतलब है जिसमें समाज में पीड़ित को ही अपराधी मानने की बढ़ती प्रवृत्ति की ओर इशारा किया गया था.

अपने देश की बात करें तो भारत भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं है. कोरोना काल में ऐसी बीसियों घटनाएं सामने आईं है जिनमें संक्रमण का दोष संक्रमितों के उपर ही मढ़ दिया गया. अपराधशास़्त्र की एक शाखा पीड़ितशास़्त्र यानी विक्टिमाॅलजी के विद्वानों को इस नुक्ते पर सोच विचार पर लग जाना चाहिए.


आत्महत्याओं में बढ़ोतरी की समस्या का एक और पहलू यह भी सामने आया है कि कई देशों में कोरोना काल में फिल्मी कलाकारों और मशहूर हस्तियों की आत्महत्याओं ने भी उनके प्रशंसकों पर बुरा मनोवैज्ञानिक असर डाला. मनोविज्ञान जगत में माना जाता है कि पहले से तनाव और अवसाद से जूझ रहे लोग मशहूर हस्तियों के उठाए कदमों को देख कई बार वैसा ही करने को प्रेरित हो जाते हैं.गौरतलब है कि पूरी दुनिया में अवसाद और तनाव की समस्या पिछले कुछ साल से बढ़त पर है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक पूरी दुनिया में कमोबेश 30 करोड़ लोग अवसाद और उस जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझ रहे हैं. महामारी से बचाव के लिए अपनाए गए सामाजिक दूरी के तरीके और संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए अलगाव के उपाय ने अकेलेपन की समस्या और तेजी से बढ़ा दी है. इसके मद्देनज़र जापान और ब्रिटेने जैसे देशों की तारीफ की जानी चाहिए कि वहां की संजीदा सरकारों ने अपने नागरिकों के लिए अकेलेपन से निपटने और मानव संबंधों में सुधार के लिए एक अलग मंत्रालय बना दिया.

इस मामले में अपने देश भारत की स्थिति पर नज़र डाल लेने का एक अच्छा मौका है. आंकड़ों के हिसाब से अपनी स्थिति भी कुछ कम गंभीर नहीं है. क्राइम ब्यूरों की रिपोर्ट के मुताबिक सन 2019 में एक साल में भारत में एक लाख उनतालीस हजार लोगों ने आत्महत्याएं कीं. देश में इस समस्या की तीव्रता का अंदाजा इस बात से लगता है कि सवा लाख से ज्यादा आत्महत्या करने वालों में 67 फीसद यानी दो तिहाई युवा थे. एक साल में 18 साल से 45 साल के बीच के 93 हजार युवाओं का आत्महत्या करना कम से कम सोच विचार की मांग तो करता ही है.

पूरी दुनिया में आत्महत्या के जितने मामले होते हैं उनमें 17 फीसद भारत में ही होते हैं. यह साल भर पहले की स्थिति थी. अभी अपने देश में लॉकडाउन वाले 2020 के आंकड़े उपलब्ध नहीं है. लेकिन लंबे खिंचे लॉकडाउन से बेरोज़गारी और अकेलेपन से बने हालात का अनुमान जरूर लगाया जा सकता है. इस दौरान घर के भीतर रहने की बाध्यता ने लोगों को अकेलेपन में धकेला ही है.
अधिकतर व्यक्ति कई कई हफते चार दीवारी से बाहर नहीं निकले. उन लोगों की हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता हैं जो अपनी पढ़ाई या दूसरे कामकाज के कारण अपने परिवारो से भी अलग रहते थे. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि एक आपदा से उपजी दूसरी मनोवैज्ञानिक आपदाओं से बचाव के बारे में सोचा नहीं जा सकता. सामाजिक स्तर पर जागरूकता अभियान अपनी जगह हैं लेकिन जापान और ब्रिटेन सरकारों से सबक लेकर अपने यहां भी काफी कुछ किया जा सकता है.

(डिस्क्लेमरः- ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: February 25, 2021, 9:55 PM IST
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