महिला दिवस 2021: भारत में किस मुकाम पर है स्त्री-पुरुष समानता

International Women's Day: आज यानी आठ मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की रस्म मनाने का दिन है. महिलाओं की स्थिति पर चर्चा करने का इससे अच्छा और कौन सा दिन हो सकता है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 8, 2021, 12:57 PM IST
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महिला दिवस 2021: भारत में किस मुकाम पर है स्त्री-पुरुष समानता
स्‍त्री और पुरुष के समानता. (File pic)
दुनिया की आधी आबादी महिलाओं की है. आज के लोकतांत्रिक विश्व में क्या उस हिसाब से महिलाओं की स्थिति को नहीं देखा जाना चाहिए? इतना तय है कि किसी भी देश का आर्थिक या सामाजिक विकास उसकी आधी आबादी के विकास के बिना मुमकिन नहीं है. आज यानी आठ मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (International Women's Day) की रस्म मनाने का दिन है. महिलाओं की स्थिति पर चर्चा करने का इससे अच्छा और कौन सा दिन हो सकता है.

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि आठ मार्च के अलावा महिलाओं की स्थिति पर सोच विचार न होता रहता हो. कई बार बड़ी गहराई से चिंतन मनन होता है. नियमित सर्वेक्षण भी होते हैं. ये अलग बात है कि उन सर्वेक्षणों की व्याख्या ज्यादा नहीं हो पाती. कम से कम अतंरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उन शोध सर्वेक्षणों का ज़िक्र जरूर किया जाना चाहिए.

वर्ल्‍ड इकोनोमिक फोरम यानी विश्व आर्थिक मंच पर हर साल ही दुनिया में लैंगिक भेदभाव का सूचकांक जारी होता है. बाकायदा अलग अलग देशों में लैंगिक भेदभाव की नापतौल बताई जाती है.


बिल्कुल नया आंकड़ा 2020 का है. पता चला कि भारत ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स यानी लैंगिक भेदभाव की खाई के मामले में पिछले साल की तुलना में और नीचे पहुंच गया. जहां 2018 में अपने देश की रैंक 108 थी वो 2020 में गिर कर 112 पर आ गई. यह रैंक दुनिया के 153 देशों के बीच है. जो विशेषज्ञ संस्थाएं इस तरह का सूचकांक निकालती हैं वे कई पैमानों पर इस तरह का आकलन करती हैं. मसलन ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में लैंगिक समानता नापने के लिए चार पैमाने इस्तेमाल किए जाते हैं.
पहला पैमाना है इकोनोमिक पार्टीसिपेशन एंड ऑपरच्यूनिटी. इसमें यह देखा जाता है कि महिलाओं और पुरुषों के बीच वेतन के मामले में कितना फर्क है. यह भी देखा जाता है कि अतिकुशल कार्यों में महिलाओं की भागीदारी में किस तरह की समानता है. यानी उच्च पदों पर महिलाओं के पहुंच पाने की स्थिति क्या है? इस पहले पैमाने पर हमारी स्थिति बेहद चिंतनीय है. इस मामले में 153 देशों के बीच भारत की रैंक 149 है.

दूसरा पैमाना है लैंगिक आधार पर शिक्षा तक पहुंच. इस मामले में हम 112वें नंबर पर हैं. यह बता रहा है कि देश में लड़कों की तुलना में लड़कियों के लिए शिक्षा तक पहुंचने के मौके कितने कम हैं. इससे यह भी पता चलता है कि अभी लड़कों की तुलना में लड़कियां उच्च शिक्षा की स्थिति तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पातीं. आंकड़ा यह है कि देश में आज जहां 82 फीसद पुरुष साक्षर हैं वहां सिर्फ 66 फीसद महिलाएं ही साक्षर हैं. शिक्षा में लैंगिक विसंगति पर गौर इस लिहाज से ज्यादा ही गौरतलब है क्योंकि शिक्षा ही वह चीज़ है जो महिलाओं को आत्मनिर्भर बना सकती है. उनके लिए आर्थिक समानता का लक्ष्य साधने के लिए भी शिक्षा की बड़ी भूमिका है.

लैंगिक समानता के आकलन का तीसरा पैमाना हेल्थ एंड सरवाइवल यानी स्वास्थ्य और जीवन संभाव्यता का है. यह आंकड़ा दुख देता है कि इस मामले में 153 देशों में भारत नीचे के तीन देशों में यानी 150 वें नंबर पर है.
अपने देश में लैंगिक भेदभाव की ऐसी हालत सरसरी तौर पर भले ही न दिखाई देती हो लेकिन दुनिया के दूसरे देशों से अपनी तुलना करते हुए देखें तो इस आंकड़े पर हैरत भी नहीं होनी चाहिए. खासतौर पर देश के दो तिहाई हिस्से यानी ग्रामीण भारत में महिलाओं के पास स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच ज्यादा छुपी हुई नहीं है.

लैगिक समानता के आकलन का चौथा पैमाना महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण की नापतौल करता है. इसमें देखा जाता है कि राजनीतिक क्षेत्र में नीति निर्धारण में महिलाओं की भागीदारी कितनी है. इस मामले में भारत की स्थिति काफी बेहतर बताई गई है. इस मामले में हम 153 के बीच 18वें नंबर पर हैं. भारत का यह प्रदर्शन दुनिया के विद्वानों को चैंकाता है. और जब गहराई से देखा जाता है तो पता चलता है कि राजनीतिक क्षेत्र के निचले स्तरों पर महिलाओं के लिए सीमित आरक्षण की व्यवस्था ने बड़ा फर्क डाल दिया. इस क्षेत्र में भारत के अच्छे प्रदर्शन का एक कारण इस रिपोर्ट में यह दर्ज किया गया कि भारत में पिछले 50 साल में 20 साल एक महिला राष्ट्राध्यक्ष रहीं.

लैंगिक समानता के आकलन के इस चौथे पैमाने पर विश्व के विद्वान आज भी सोच विचार कर रहे हैं. क्योंकि यह पहले से माना जा रहा है कि कसी भी देश में महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए उन्हें नीतिनिर्माण में ज्यादा भागीदार बनाया जाना चाहिए. लेकिन यह दुविधा हमेशा बनी रहती है कि राजनीतिक क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए किया क्या जाए. आरक्षण जैसे वैधानिक उपाय अपनी जगह हैं लेकिन उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार के बिना उन्हें सशक्त बनाना एक छलावा भी हो सकता है. वैसे भी पितृसत्तात्मक समाजों में महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र में बढ़ावा देने के बावजूद प्रभुत्व पुरूषों का ही नज़र आता है. महिला आरक्षण से हासिल उनकी राजनीतिक भूमिका में कई बार पुरूष ज्यादा दखल देते हैं. इस समस्या का कारण महिलाओं की कच्ची आर्थिक और सामाजिक स्थिति को ही माना जाना चाहिए. फिर भी देश की राजनीति में जो मेधावी और हौसले से मजबूत महिलाएं असाधारण प्रदर्शन कर रही हैं वे एक तरह से लैंगिक भेदभाव को कम करने में बड़ी भूमिका निभाती दिख रही हैं. (यह लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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First published: March 8, 2021, 12:57 PM IST
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