महामारी के दौर में घातक राजनीति

अब ये मुख्यमंत्री ही चाहते हैं कि लॉकडाउन हो और एक बार फिर इसकी पहल प्रधानमंत्री या गृह मंत्रालय करे. स्पष्ट है कि राज्यों के कर्णधार अपनी राजनीतिक विचारधारा और निष्ठा के हिसाब से कदम उठा रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: April 18, 2021, 4:41 pm IST
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महामारी के दौर में घातक राजनीति
देश कोरोना की दूसरी लहर की चपेट में आ चुका है. (Pic- AP)

जिस चीन में कोरोना का वायरस पैदा हुआ, जहां से पूरी दुनिया में वह फैला, उसी चीन में कोरोना तकरीबन काबू में आ चुका है. इसके लिए चीन सरकार ने क्या किया? जिन जगहों पर कोरोना का प्रकोप ज्यादा था, उन जगहों को संवेदनशील स्पॉट घोषित किया. उनकी चाकचौबंद तालाबंदी की. सबकी जांच कराई, जरूरतमंद को अस्पताल भेजा. इस प्रक्रिया पर किसी ने सवाल उठाने या चूं-चपड़ करने की कोशिश की, उन्हें चीन के अधिकारियों ने नहीं बख्शा. चीन अगर ऐसा कर पाया तो इसकी बड़ी वजह यह है कि वहां एकाधिकारवादी शासन व्यवस्था है. वहां पश्चिमी मॉडल वाला लोकतंत्र नहीं है. जरा पश्चिमी लोकतंत्रों को देखिए. अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों में बंदी को स्वीकार करने से नागरिकों ने अपने लोकतांत्रिक अधिकार का उल्लंघन माना. फिर क्या हुआ? वहां की मौतों की कहानियां नतीजों की गवाही देती हैं.


इस संदर्भ में अपने देश को देखिए. ठीक एक साल पहले जब केंद्र सरकार ने महामारी अधिनियम 1887 और आपदा प्रबंधन कानून 2005 के तहत अपने हाथों में पूरे अधिकार लिए तो क्या कहा गया? कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा और वामपंथ शासित राज्यों और उनके मुख्यमंत्रियों ने इसका विरोध किया.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इसे संविधान में वर्णित संघवाद (फेडरलिज्म) का उल्लंघन बताने से पीछे नहीं हटे. अशोक गहलोत ने तो खुलकर कहा था कि लॉकडाउन लगाने का अधिकार राज्यों को मिले. इसके लिए तर्क भी दिया गया था. स्वास्थ्य संविधान की राज्य सूची का विषय है. हालांकि नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य का भी अधिकार है. चूंकि स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है और कोरोना की महामारी सीधे स्वास्थ्य से जुड़ी है, लिहाजा ज्यादातर विपक्ष शासित राज्यों ने खुद को लॉकडाउन लगाने और उन्हें कार्यान्वित करने का अधिकार देने की मांग की थी. अशोक गहलोत ने इसे लेकर एक राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल से बात भी की थी. ममता बनर्जी ने तो लॉकडाउन के कड़े प्रावधान लागू करने से इनकार करने के लिए इस तर्क का हवाला दिया था कि चूंकि केंद्र प्रवासी मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए खुद ही रेलगाड़ियां चला रहा है, रेलगाड़ियों में भीड़ जा रही है, लिहाजा वे भी कड़ा लॉकडाउन नहीं लगा सकतीं. तब गृह मंत्रालय को कड़े प्रावधान करने पड़े थे.


कोरोना की दूसरी लहर के बाद कई राज्यों में स्थितियां अराजक हो गई हैं. कई राज्य सरकारों को लगता है कि स्थितियां उनके नियंत्रण में नहीं हैं. वैसे भी पिछले लॉकडाउन के चलते कई राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति खराब है.

राजस्व की वसूली उस स्तर पर नहीं हो पा रही है. लेकिन कोरोना की दूसरी लहर की वजह से उनके यहां स्थितियां नियंत्रण से बाहर होती नजर आ रही हैं तो अब वे राज्य ही चाहते हैं कि पिछली बार की तरह प्रधानमंत्री और गृह मंत्रालय ही केंद्रीय स्तर पर लॉकडाउन लगाने का फैसला ले और उसकी घोषणा भी करे. इसकी एक वजह यह भी है कि अगर केंद्र एक बार फिर 1887 के महामारी अधिनियम या 2005 के आपदा प्रबंधन कानून या दोनों के आधार पर लॉकडाउन लगाने का फैसला लेता है तो राज्यों को होने वाले नुकसान और इलाज आदि पर होने वाले खर्च की कम से कम आधी रकम केंद्र की तरफ से राज्यों को दिया जाना अनिवार्य होगा.


पिछले लॉकडाउन के दौरान उम्मीद की गई थी कि उस दौरान कामकाज बंद रहने के दौरान नियोक्ता अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देते रहेंगे. यह बात और है कि जब महाबंदी बढ़ती गई तो नियोक्ताओं की भी स्थिति खराब होने लगी. तब मजबूरीवश अपने कर्मचारियों और मजदूरों को वे वेतन देने में नाकाम रहने लगे. इसके बाद शहरों से बेतहाशा पलायन बढ़ा. मजदूर भूखे-प्यासे, बदहवासी में अपने घरों को लौटने के लिए मजबूर हुए. ऐसे वक्त में कायदे से राजनीति को अपनी रोटी नहीं सेंकनी चाहिए थी. प्राकृतिक आपदा की वजह से उपजे बुरे हालात से निपटने के लिए राजनीति को एक होना चाहिए था, लेकिन राजनीति ने इसमें भी मीन-मेख निकालना शुरू कर दिया. लोकपीड़ा का राजनीतिक फायदा उठाने में विपक्ष, विपक्ष शासित राज्य सरकारें, नागरिक समाज और स्वयंसेवी संगठन जुट गए. इस हालत के लिए सिर्फ केंद्र सरकार को ही निशाने पर लिया गया. किसी भी तरफ से यह सवाल नहीं उठा कि इस दौरान विपक्ष शासित राज्यों की भी अपनी जिम्मेदारी थी और वे भी अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने में नाकाम हुए.


पिछले लॉकडाउन के दौरान कुप्रबंधन और ढिलाई की वजह से पश्चिम बंगाल के कोलकाता समेत कुछ स्थानों के साथ ही मुंबई, पुणे, इंदौर और जयपुर का अधिकार प्राप्त केंद्रीय समूह के निर्देश पर केंद्र सरकार के अधिकारियों की टीमों ने दौरा किया, जिसका पश्चिम बंगाल में विरोध हुआ था. ममता बनर्जी ने तब इसे संघवाद के खिलाफ बताते हुए ट्वीट किया था. जिसका हिंदी अनुवाद है, “मैं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और गृह मंत्री अमित शाह जी से इस संबंध में जानकारी साझा करने का आग्रह करती हूं. मुझे संदेह है और तब तक हम आगे कोई कार्रवाई नहीं कर पाएंगे. क्योंकि बिना किसी ठोस आधार के यह कदम संघवाद की भावना के खिलाफ होगा.”


पिछले साल 27 अप्रैल को जब प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों से बातचीत के बाद आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए उन वस्तुओं को लेकर जाने वाले वाहनों को छूट देने को कहा तो झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी केंद्र के आदेश को मानने से इनकार करते हुए लॉकडाउन को कड़ा रखने का फैसला लिया था. लेकिन अब ये मुख्यमंत्री ही चाहते हैं कि लॉकडाउन हो और एक बार फिर इसकी पहल प्रधानमंत्री या गृह मंत्रालय करे. स्पष्ट है कि राज्यों के कर्णधार अपनी राजनीतिक विचारधारा और निष्ठा के हिसाब से कदम उठा रहे हैं.


वैसे भी सोशल मीडिया पर कोरोना की दूसरी लहर के लिए सिर्फ प्रधानमंत्री को निशाना बनाया जा रहा है. राज्यों ने इस दौरान जो ढिलाई दिखाई, स्थानीय प्रशासन ने नागरिकों से कोरोना प्रोटोकॉल का पालन कराने में जो हीलाहवाली की, उसका कहीं जिक्र नहीं हो रहा और ना ही इसके लिए राज्यों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

इससे साफ है कि हमारा पूरा तंत्र समग्रता में सोचना और कदम उठाना भूल गया है. लोकतंत्र के बहाने हम अपनी राष्ट्रीय स्मृति और सोच को भी दरकिनार कर रहे हैं. जहां समष्टि का भाव होना चाहिए, वहां भी हम अपनी राजनीतिक और व्यक्ति निष्ठा के हिसाब से कदम उठा रहे हैं. मौजूदा व्यवस्था में चूंकि राजनीति समाज का महत्वपूर्ण और नेतृत्वकारी अंग है, उसकी भी निजी लिप्साएं चिंतित करती हैं. राजनीति के लिए कोरोना की महामारी का भी इस्तेमाल को कम से कम विपक्ष शासित राज्यों के कदम साबित तो कर ही रहे हैं. इससे अंतत: राष्ट्र और उसके नागरिक का ही नुकसान होना है. इसलिए जरूरी है कि राजनीति अपने दोहरे चरित्र से बचे. अभी उसका एकमात्र मकसद होना चाहिए अपने राजनीतिक फायदा और घाटे को पीछे छोड़ते हुए इस महामारी का मिलकर मुकाबला करना. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदीपत्रकार और लेखक

दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय. देश के तकरीबन सभी पत्र पत्रिकाओं में लिखने वाले उमेश चतुर्वेदी इस समय आकाशवाणी से जुड़े है. भोजपुरी में उमेश जी के काम को देखते हुए उन्हें भोजपुरी साहित्य सम्मेलन ने भी सम्मानित किया है.

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First published: April 18, 2021, 4:41 pm IST
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