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कृषि कानूनः ‘चित्त भी मेरी, पट्ट भी मेरी' की मानसिकता से निकलें आंदोलनकारी

किसान संगठनों (Farmers Union) के तेवर इतने आक्रामक हैं कि वे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) पर ही सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि हम सर्वोच्च न्यायालय नहीं गए थे और ना ही वे किसी समिति के सम्मुख उपस्थित होंगे.

Source: News18Hindi Last updated on: January 13, 2021, 4:49 PM IST
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कृषि कानूनः ‘चित्त भी मेरी, पट्ट भी मेरी' की मानसिकता से निकलें आंदोलनकारी
किसान संगठनों (Farmers Union) के तेवर इतने आक्रामक हैं कि वे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) पर ही सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि हम सर्वोच्च न्यायालय नहीं गए थे और ना ही वे किसी समिति के सम्मुख उपस्थित होंगे.
तीन कृषि कानूनों (New Farm Law) के अमल पर रोक के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के फैसले को देखें तो पहली नजर में यही लगता है कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने ऐसा करके फौरी तौर पर इस मामले पर जारी तनाव को तत्काल खत्म करने की कोशिश की है. तीनों कानूनों के खिलाफ आंदोलन के तहत दिल्ली की घेरेबंदी में बैठे किसानों के समूह में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के शामिल होने या किए जाने के बाद मानवीय चिंताएं उठनी स्वाभाविक हैं. सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने अपने आदेश के जरिए इस मानवीय समस्या को भी संबोधित करने की कोशिश की है. फैसले के पहले देश की सबसे बड़ी अदालत ने बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को आंदोलन स्थल से घरों को भेजने की एक तरह से अपील ही की थी.

ऐसे में अव्वल तो होना यह चाहिए था कि सर्वोच्च न्यायालय की मंशा के अनुरूप आंदोलनकारी सबसे पहले बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को सस्नेह और ससम्मान घर भेजते और फिर अदालत द्वारा गठित समिति की सिफारिशों के आने का इंतजार करते. लेकिन आंदोलनकारी किसान संगठनों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया है. पता नहीं, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की नाफरमानी करना उनकी मंशा है या नहीं, लेकिन यह तय है कि एक तरह से उन्होंने देश की सबसे बड़ी अदालत को भी चुनौती जरूर दे दी है.

आधुनिक लोकतंत्र की कसौटी पर पिछड़ा माने जाने वाले मध्य पूर्व के देशों में फरवरी 2011 में पश्चिमी विचारधारा केंद्रित लोकतांत्रिक चेतना फैलाने में सोशल मीडिया ने जो भूमिका निभाई, उसकी वजह से सोशल मीडिया को अब तक की सबसे महत्वपूर्ण खोज और लोकतंत्र का सबसे बड़ा वाहक माना जाने लगा था. निश्चित तौर पर सोशल मीडिया के अपने सकारात्मक पहलू भी हैं. लेकिन हाल के दिनों में इसने वितंडा और नकारात्मक बोध को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभाई है. इस वजह से सोशल मीडिया में बहुत से अकाउंट उस दैत्य की भूमिका में दिखने लगे हैं, जिनका एक मात्र मकसद किसी यज्ञ आदि को नुकसान पहुंचाना होता था और येनकेन प्रकारेण अपना वर्चस्व बनाए रखना होता था.

सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्मों पर यह कहने वाले कम नहीं हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने एक तरह से मोदी सरकार को ही बचाने की कोशिश की है. सोशल मीडिया के मंचों पर यह भी कहा जा रहा है कि अदालत ने जिन चार लोगों को समिति का सदस्य बनाया है, उनमें से दो तो सरकार के ही समर्थक हैं. अदालत ने भारतीय किसान यूनियन (मान) के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान, देश के पुराने किसान संगठनों में से एक शेतकारी संगठन (महाराष्ट्र) के अध्यक्ष अनिल घनावत के साथ ही अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान दक्षिण एशिया के निदेशक प्रमोद कुमार जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी को शामिल किया है.
कृषि कानून विरोधी किसान संगठनों की ओर से सोशल मीडिया पर भूपिंदर सिंह मान और अनिल घनावत के पत्र प्रचारित किए जा रहे हैं, जिनमें लिखा गया है कि वे कृषि कानूनों का समर्थन करते हैं. वहीं कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी को लेकर किसान संगठनों का कहना है कि वे नीति आयोग द्वारा कृषि के लिए गठित टास्क फोर्स के सदस्य रहे हैं. किसान संगठनों के तेवर इतने आक्रामक हैं कि वे सर्वोच्च न्यायालय पर ही सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि हम सर्वोच्च न्यायालय नहीं गए थे और ना ही वे किसी समिति के सम्मुख उपस्थित होंगे. फैसला आने के बाद दिल्ली की सिंघु सीमा पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन में किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने जो कहा, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, ''हम किसी भी कमेटी के सामने उपस्थित नहीं होंगे. हमारा आंदोलन तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ है. हमने सुप्रीम कोर्ट से कमेटी बनाने का कभी अनुरोध नहीं किया और इसके पीछे सरकार का हाथ है.'' किसान संगठनों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपने आप ही कृषि कानूनों को रद्द कर सकता है. किसान नेता यहीं नहीं रूके. उन्होंने कहा, ''कमेटी में शामिल लोगों के जरिए सरकार यह चाहती है कि कानून रद्द ना हो. वहीं, 26 जनवरी का कार्यक्रम अपने तय समय के अनुसार होगा. वह शांतिपूर्ण होगा और उसके बाद भी आंदोलन जारी रहेगा.''

हाल के दिनों में जिस तरह सर्वोच्च न्यायालय पर सवाल उठाने की परिपाटी स्थापित हुई है, उससे अराजक सोच रखने वालों को ही बढ़ावा दिया है. इस दौरान यह सोच भी स्थापित हुई है कि अगर उनकी मांग के अनुसार फैसला ना आए तो सर्वोच्च न्यायालय भी सरकार से मिला हुआ है. दिलचस्प यह है कि इसी सोच वाले लोग प्रधानमंत्री तक को खुलेआम सोशल मीडिया से से लेकर हर मुमकिन मंचों पर भद्दी गालिया देते हैं. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तक को गालियों की न्योछावर पेश करते हैं. हर बार वे यही स्थापित करने की कोशिश करते हैं कि सिर्फ वे ही सही हैं और उनकी बात का विरोध करने वाले लोग गलत हैं. चाहें उसमें सरकार शामिल हो, राजनीतिक दल शामिल हो, संसद शामिल हो या फिर सर्वोच्च न्यायालय. जाहिर है कि इस सोच को बढ़ावा देने वाले लोगों में एक खास विचारधारा के ही लोग हैं. इससे स्पष्ट होता है कि वे अपने अलावा सबको गलत मानते हैं.दिलचस्प यह है कि पश्चिम से आयातित लोकतंत्र की हिमायत भी जमकर करते हैं. लेकिन उसी लोकतंत्र के तहत स्थापित अपने विरोधी सत्ता तंत्रों को वे गैर कानूनी, असहज और अलोकतांत्रिक मानते हैं. ऐसे लोगों के लिए भोजपुरी की एक कहावत सटीक बैठती है. भोजपुरी इलाके में दबंगों के लिए कहावत कही जाती है, हारबि त हूरबि, जीतबि त थूरबि. यानी हारा तो भी पीटूंगा और अगर जीत गया तो पीटना तो मेरा अधिकार है ही. यह कहावत कुछ-कुछ वैसी ही है, जैसे चित्त भी मेरी पट्ट भी मेरी, अंटा मेरे बाप का. यह सोच तानाशाही व्यवस्था में चल तो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में ऐसा नहीं चलता.

लोकतंत्र में पंच परमेश्वर की अवधारणा को स्वीकार किया जाता है. अगर फैसला आपके मनोनुकूल ना भी हो तो उसे स्वीकार करना चाहिए. लेकिन दुर्भाग्यवश सोशल मीडिया के दबाव वाले दौर में पंच परमेश्वर की लोकतांत्रिक अवधारणा को नकारने और चित्त भी मेरी, पट्ट भी मेरी की अवधारणा को स्वीकार करने की प्रवृत्ति एक खास तबके में बढ़ रही है. जिसके प्रसार के पीछे वह विचारधारा ज्यादा सक्रिय है, जो खुद को प्रगतिशील, वैज्ञानिक और समय के साथ चलने वाली बताती है. जिस तरह किसान आंदोलनकारी फैसले के खिलाफ अवमाननापूर्ण वक्तव्य दे रहे हैं, उससे तो यही साबित होता है.

अव्वल तो होना चाहिए कि आंदोलनकारी कम से कम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति के सामने अपनी बात रखते और उसकी रिपोर्ट आने का इंतजार करते एवं खेती-किसानी के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय को अपने खेतों में बिताते.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदीपत्रकार और लेखक

दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय. देश के तकरीबन सभी पत्र पत्रिकाओं में लिखने वाले उमेश चतुर्वेदी इस समय आकाशवाणी से जुड़े है. भोजपुरी में उमेश जी के काम को देखते हुए उन्हें भोजपुरी साहित्य सम्मेलन ने भी सम्मानित किया है.

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First published: January 13, 2021, 4:49 PM IST
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