‘बंदिश बैंडिट्स’ और हिंदुस्तानी संगीत

ये सच है कि संगीत (Music) आत्मा की पुकार है. यह एक ऐसी कला (Art) है जिसमें नौ रसों को व्यक्त करना सबसे आसान है. यही वजह है कि कई बरसों से अलग-अलग सभ्यताओं ने संगीत को अपनी अभिव्यक्ति का ज़रिया (Mode of expression) बनाया है. चाहे वह राजे-रजवाड़े की महफिलें हो या जनजातियों के उत्सव, संगीत नैसर्गिक रूप से झरता रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 23, 2020, 2:15 PM IST
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‘बंदिश बैंडिट्स’ और हिंदुस्तानी संगीत
‘बंदिश बैंडिट्स’ एक ऐसी वेब सीरीज़ जिसमें शंकर-एहसान लॉय ने हिन्दुस्तानी संगीत के प्रति पुरानी और नई पीढ़ी में रूचि और जिज्ञासा की नई कौंध जगायी है.
मनोरंजन के बाज़ार में किसी भी चीज़ का मिलावटी होना नयी बात नहीं. संगीत भी इस घालमेल से अछूता नहीं रहा लेकिन आत्मा की गहराइयों में वही स्वर कायम रहे, जिनमें इंसानी तहज़ीब और उसूलों की आवाज़ों का असर था. मौसिकी की ऐसी ही बेमिसाल परंपराओं में रची-बसी बंदिशें इन दिनों संगीत के कद्रदानों के लिए सुकून का पैग़ाम बन रही है, ज़िक्र ‘बंदिश बैंडिट्स’ एक ऐसी वेब सीरीज़ जिसमें शंकर-एहसान लॉय ने हिन्दुस्तानी संगीत के प्रति पुरानी और नई पीढ़ी में रूचि और जिज्ञासा की नई कौंध जगायी है. इस बहाने एक बार फिर शास्त्रीय संगीत की आध्यात्मिक शक्ति और नये दौर में उसकी अहमियत को पहचानने का सिलसिला चल निकला है.

ये सच है कि संगीत आत्मा की पुकार है. यह एक ऐसी कला है जिसमें नौ रसों को व्यक्त करना सबसे आसान है. यही वजह है कि कई बरसों से अलग-अलग सभ्यताओं ने संगीत को अपनी अभिव्यक्ति का ज़रिया बनाया है. चाहे वह राजे-रजवाड़े की महफिलें हो या जनजातियों के उत्सव, संगीत नैसर्गिक रूप से झरता रहा है. मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक घटित होने वाली तमाम घटनाएँ संगीत के सात स्वरों में अलग-अलग भाव-छवियाँ लिए प्रकट होती रही हैं.

इन सभी अभिव्यक्तियों में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की अलग-अलग रागों का अपना महत्त्व रहा है. माना जाता है कि तानसेन ने सोलहवीं शताब्दी में ग्वालियर के राजा राम चंद के संरक्षण में अपने जीवन के 60 सालों तक संगीत का अध्ययन किया और संगीत के नवाचारों की शुरुआत की, उसके बाद उन्होंने अकबर के दरबार में गाना शुरू किया. कई संगीतज्ञ तानसेन को हिंदुस्तानी संगीत के संस्थापक के रूप में मानते हैं. संगीत के प्रति गहरी रूचि रखने वाले जानते है कि अलग-अलग राग सुबह से लेकर रात तक, हर मौसम, हर भाव को सुनने वाले के मन तक तक पहुँचाते हैं. संगीत आपके मन के भाव बदलने की ताकत रखता है, बैठे-बैठे आपको संसार के भेद बता सकता है, विचलित मन को शांत कर सकता है.

संगीत जीवन के कण-कण में बसा है, विज्ञान से लेकर अध्यात्म तक संगीत का अपना महत्त्व है. कहते हैं 432hz की फ्रीक्वेंसी का संगीत हीलिंग या उपचारात्मक संगीत होता है. इसे सुनने से मन व शरीर को शांति व आराम महसूस होता है. क्योंकि संगीत में 432hz पर सल्फेजिओ फ्रीक्वेंसी हमारे ग्रह के दिल की धड़कन के साथ जुड़ती है. डॉक्टर्स का कहना है कि हमारे मस्तिष्क की तरंगें 8hz पर पूरी तरह से प्रतिध्वनित होती हैं. इसलिए जब यह फ्रीक्वेंसी हमारे अंदर प्रतिध्वनित होगी तब किसी भी भावनात्मक रुकावट से हमें छुटकारा मिल सकता है और हम ब्रह्माण्ड की धड़कनों या तरंगों को हम आत्मसात कर सकेंगे. योग व ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ आचार्ययाज्ञवल्क्य जी कहते हैं- संगीत एक प्रकार का योग है. इसकी विशेषता है कि इसमें साध्य और साधन दोनों ही पवित्र और आनंदमय हैं. अतः संगीत एक उपासना है, इस कला के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति होती है. यही कारण है कि भारतीय संगीत के सुर और लय की सहायता से मीरा, तुलसी, सूर और कबीर जैसे कवियों ने भक्त शिरोमणि की उपाधि प्राप्त की और अन्त में ब्रह्म के आनन्द में लीन हो गए. इसीलिए संगीत को ईश्वर प्राप्ति का सुगम मार्ग बताया गया है. संगीत में मन को एकाग्र करने की अद्भुत शक्ति होती है इसलिए लोग ईश्वर की आराधना के लिए इसका प्रयोग करते हैं.
हिंदी सिनेमा में भी संगीत ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ में भी संगीत का प्रयोग किया गया था. और उसके बाद से जैसे बिना संगीत के सिनेमा की कल्पना करना असंभव हो गया. किसी फिल्म का संगीत उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है. कई बार सिर्फ गानों के कारण फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट या फ्लॉप हो जाया करती है. वह फिल्म के भावों को दर्शकों तक पहुंचाने और उन पर उसकी छाप छोड़ने में सक्षम होता है.

फिल्मों में संगीत के साथ कई नवाचारों का प्रयोग होता है. पहले सिर्फ हिंदुस्तानी संगीत पद्धति का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन फिल्म के संगीत में ड्रामा और भराव के लिए संगीतज्ञों ने 1950 के दशक से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रारूप को थोड़ा बदलते हुए उसमे पाश्चात्य वाद्ययंत्रों का फ्यूज़न करना शुरू कर दिया. इसलिए उस समय के कई शास्त्रीय संगीतकार, सिनेमा के संगीत से एक दूरी बना कर रखने लगे. लेकिन बैजू बावरा और मुग़ल-ए-आज़म जैसी फिल्मों में यह अपवाद बना. यहाँ तक कि देखा जाये तो हिंदुस्तानी संगीत के पंडितों के बिना हिंदी सिनेमा का संगीत अधूरा माना जायेगा. लेकिन धीरे-धीरे पाश्चात्य संगीत दर्शकों को परोसा जाने लगा और वह हमारे हिंदी सिनेमा उद्योग में घर कर गया. बीच बीच में हमारा हिंदुस्तानी संगीत उमराव जान, साज़, पाकीज़ा जैसी फिल्मों में अपनी दस्तक भरपूर देता रहा, लेकिन वह अपनी वापसी पूरी तरह न कर सका. हाल ही में बंदिश बैंडिट्स नामक एक शो में शंकर एहसान लॉय हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को बहुत ही खूबसूरती से वापस लाये हैं. इस शो का संगीत स्वयं स्व. पंडित जसराज द्वारा भी सराहा गया था. उन्होंने इस प्रयास को काफी सराहनीय और सफल कहा था. आशा है कि इससे भारतीय सिनेमा में इस संगीत पद्धति की सफल वापसी होगी.

एक इंटरव्यू में सिने पाश्र्व गायक सुरेश वाडकर ने कहा था कि, श्रोताओं की अपनी कोई मांग नहीं होती. उन्हें जो परोसा जाता है वह उसी में कुछ न कुछ ढूंढ लेते हैं, इसलिए हिंदुस्तानी संगीत का पूरी तरह से उन्मूलन बिलकुल ज़रूरी नहीं है. अक्सर हमारे मन को छू जाने वाले गाने किसी भारतीय राग पर आधारित होते हैं. सिनेमा के व्यवसायीकरण और ग्लोबलाईजेशन के कारण इन्ही रागों को बड़े स्तर पर पसंद किया जाने लगा व पहचाना जाने लगा. यहाँ तक कि मशहूर बैंड बीटल्स के बेस गिटारिस्ट जॉर्ज हैरिसन, पंडित रविशंकर से सितार की शिक्षा लेने हिंदुस्तान आये थे. यह पहली बार था जब किसी रॉक बैंड द्वारा सितार को व्यावसयिक रूप से रिकॉर्ड किया गया था. तभी से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत फ्यूज़न का हाथ पकड़े धीरे-धीरे व्यावसायिक रूप से भी आगे आने लगा है.गायक येशुदास के गाये गीत 'प्रकृति के कण-कण में संगीत' में इस बात को बहुत सुंदरता के साथ दर्शाया गया है कि हमारे जीवन में संगीत किस तरह विद्यमान है. यह कहना गलत नहीं होगा कि संगीत के बिना निरामय जीवन संभव नहीं है. इसलिए अच्छा संगीत आत्मसात करें, यह धरती पर किसी स्वर्ग को पाने से काम नहीं है. यह आपको और आपके आसपास की हर चीज़ को सकारात्मकता से ओत-प्रोत कर देगा. इस तरह बंदिश बैंडिट्स ने संगीत के विचार की फिर एक नई खिड़की खोल दी है.
ब्लॉगर के बारे में
विभोर उपाध्याय

विभोर उपाध्यायलेखक, संगीतकार

बदलते संदर्भों, विषयों और वैचारिक मुद्दों पर नए सोच का लेखन. कंटेंट राइटर्स के रूप में अनेक उपक्रमों के साथ काम. युवा संगीतकार.

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First published: September 23, 2020, 2:15 PM IST
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