धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय

आप जब भी कोई नया काम शुरू करते हैं, तब मुमकिन है कि असफलताएं हर मोड़ पर आपका स्वागत करें. लेकिन हर असफलता से सीख लेना आप पर निर्भर करता है. यह निर्णय पूरी तरह से आपका है कि आप उस असफलता को एक ऊपर जाने का पायदान समझते हैं या अपनी हार की ओर एक कदम.

Source: News18Hindi Last updated on: October 11, 2020, 10:39 PM IST
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धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
धैर्य से सही दिशा में किया गया कठोर परिश्रम कभी भी निष्फल नहीं जाता (सांकेतिक तस्वीर)
आज के समय में किसी इंसान का धैर्य परखना हो तो उसे किसी कम्प्यूटर पर स्लो इंटरनेट के साथ काम करने के लिए कह दीजिये, उनका असली रूप आपके सामने आ जायेगा. तेज़ इंटरनेट, तेज़ गाड़ियां, कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा काम पूरा होना, वक़्त की बचत के लिए हम हर संभव चीज़ करने के लिए तैयार रहते हैं. लेकिन इस वक़्त की बचत की आड़ में हम जीवन में धैर्य की महत्ता खोते जा रहे हैं. हमें फ़ूड भी फ़ास्ट नहीं, इंस्टेंट चाहिए होता है. ज़रा भी इंतज़ार करने पर हम झल्ला जाते हैं. हम कहीं न कहीं ये भूल गए हैं कि फ़ास्ट सिर्फ बर्गर बना करते हैं, अगर बिरयानी का असल स्वाद चखना हो तो इंतज़ार करना ही पड़ता है.

आज तक आप सभी ने कई लोगों के सफलता की महान कहानियां सुनी होंगी. उनके संघर्ष की कहानी कि किस तरह उन्होंने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाया, क्या नीतियां अपनाई वगैरह-वगैरह. लेकिन एक चीज़ है जिसके बारे में कोई नहीं बताता वह है- ’धैर्य’. यह ऐसी चीज़ है जो किसी के न देने से मिल सकती है और न किसी से उधार मांगी जा सकती है. जिस तरह ज्ञान की पूंजी इंसान को ख़ुद हासिल करनी होती है उसकी तरह ज्ञान के मिलने पर धैर्य भी अपने से मिलता है. जब तक इंसान स्वयं उसे स्वीकार नहीं करता किसी भी तरह की या कितनी भी समझाईश नाकाम ही रहेगी.

एक जैसी नहीं हो सकती हर किसी की यात्रा
आज के तकनीकी युग में बच्चों को भले ही कछुए और खरगोश की कहानी सुनाई जाती हो, लेकिन असल ज़िन्दगी में उससे सिर्फ जीत की अपेक्षा रखी जाती है. जीत का मंत्र तो उनके कानों में फूंक दिया जाता है लेकिन उसका उपयोग कब और कैसे करना है इसका इल्म उन्हें नहीं दिया जाता. इस कारण अक्सर कुछ विफलताओं के बाद व्यक्ति लोक-लाज व कभी-कभी स्वयं ही हार मान कर उस कार्य को बीच में छोड़ देता है. वे भूल जाते हैं कि हर इंसान की अपनी एक खूबी होती है और सबसे बड़ी बात, चूंकि हर किसी के जीवन की दौड़ एक ही रेखा से शुरू नहीं होती, इसलिए हर किसी की यात्रा भी एक जैसी नहीं हो सकती. लेकिन धैर्य और अनुशासन के साथ हर मुकाम को हासिल किया जा सकता है.
दरअसल आप जब भी कोई नया काम शुरू करते हैं, तब मुमकिन है कि असफलताएं हर मोड़ पर आपका स्वागत करें. लेकिन हर असफलता से सीख लेना आप पर निर्भर करता है. यह निर्णय पूरी तरह से आपका है कि आप उस असफलता को एक ऊपर जाने का पायदान समझते हैं या अपनी हार की ओर एक कदम. यहीं फर्क आ जाता है उन लोगों में जिन्होंने अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाते हुए उन चुनौतियों और असफलताओं को स्वीकार कर अपने सफर का हिस्सा मान लिया था जिनसे उन्होंने अपनी हर गलती का सूक्ष्मता से विश्लेषण कर हर बार धैर्य के साथ दोबारा सफर शुरू किया. इसे इस तरह समझते हैं- जब भी आप अपने फ़ोन के किसी गेमिंग एप पर गेम खेलते हैं, तब अगर आप उसे पहली बार खेल रहे हों तो क्या आप पूरा गेम एक बार में पार कर लेते हैं? नहीं आप बार बार अटकते हैं, दोबारा शुरुआत करते हैं और फिर धीरे-धीरे धैर्य के साथ आप उस गेम को इस तरह खेलने लगते हैं कि आप एक बार में पूरा गेम पार कर जाते हैं. उसी तरह किसी भी प्रक्रिया में इसी तरह असफल होने पर उसी धैर्य और नए अनुभवों के साथ नयी शुरुआत करेंगे आपका लक्ष्य हासिल करना महज़ एक सपना नहीं रहेगा.

अंत की बजाय अगले कदम पर रहे ध्यान
लेकिन अगर ये धैर्य कहीं से मिलता नहीं है तो फिर इसे प्राप्त करने का तरीका आखिर है क्या? इसका सबसे कारगर तरीका है ध्यान लगाना, उससे आपका मन एकाग्रचित्त होगा, आपके विचार आपको नहीं बल्कि आप अपने विचारों को नियंत्रित कर सकेंगे. जब आप अपने विचारों को नियंत्रित कर सकेंगे तब किसी कार्य को शुरू करते समय आपका ध्यान अंत की ओर नहीं बल्कि अगले कदम की ओर होगा, जब हर कदम को सोच समझ कर सावधानी से रखेंगे तब आपके असफल होने की सम्भावना भी काम होती जाएगी, और जब कार्य की प्रक्रिया को समझते हुए आप उसे पूरा करेंगे तो वह काम अपने आप आपके लिए अनायास ही सरल और आनंददायी हो जायेगा.
संत कबीर कहते हैं- ‘‘धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय/माली सीचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय!’’


मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है. अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़ों से भी पानी देगा तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेंगे. उसी प्रकार किसी भी सफलता को पाने के लिए जिस दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है वह निश्चय ही धैर्य से ही मिलता है. धैर्य से सही दिशा में किया गया कठोर परिश्रम कभी भी निष्फल नहीं जाता. विक्टोरियन युग के प्रसिद्ध अंग्रेजी कला आलोचक जॉन रस्किन ने कहा था- “धैर्य ही सारे आनंद और शक्तियों का मूल है.“

धीरज एक इम्तहान है. यहां धीरज की कसौटी अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र होकर साधना की है. उद्यम की है. परिश्रम की है. धैर्य कोरे विश्वास का नाम नहीं है, वह कोशिशों के साथ क़ामयाबी के रूप में खिलता है. देखना ज़रूरी है कि धैर्य का रूपांतरण आलस्य में न हो. इस जुमले का सहारा न लिया जाए कि ‘‘जीवन में पर्याप्त धीरज रखा गया, पर क़िस्मत ने साथ न दिया’’. जैसा कि पहले कहा गया मन की शक्ति को क़ायम रखते हुए समय को धीरज से पार कर लेना ही हुनर है. धैर्य इस बात को जांचने का अवसर भी देता है कि हमसे भूलें-चूकें कहां हुई. हमें अब कौन-सा नया रास्ता या नई दिशा में कदम बढ़ाना है. धैर्य का मतलब ठहर जाना नहीं, लक्ष्य के लिए चलते चले जाना है. बड़ा मशहूर शेर है कि- ‘मंज़िल मिले या न मिले इसका ग़म नहीं/मंज़िल की जुस्तजू में मेरा काँरवा तो है.’
ब्लॉगर के बारे में
विभोर उपाध्याय

विभोर उपाध्यायलेखक, संगीतकार

बदलते संदर्भों, विषयों और वैचारिक मुद्दों पर नए सोच का लेखन. कंटेंट राइटर्स के रूप में अनेक उपक्रमों के साथ काम. युवा संगीतकार.

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First published: October 11, 2020, 10:39 PM IST
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