रवींद्रनाथ टैगोर: मेरे चित्र, मेरी पद्य रचना हैं

दुर्भाग्य से भारत में उनकी चित्रकला को ठीक से पहचाना न जा सका. रवींद्रनाथ अपने चित्रों में, स्वाभाविक रूप से पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं के प्रसंगों और पात्रों को चित्रित कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

Source: News18Hindi Last updated on: May 7, 2021, 9:46 AM IST
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रवींद्रनाथ टैगोर: मेरे चित्र, मेरी पद्य रचना हैं
गुरुदेव रबींद्रनाथ रवींद्रनाथ ने बार-बार चित्रों को 'समझने' के स्थान पर 'अनुभव' करने की बात कही है. (फाइल फोटो)
सच्चा कलाकार आजीवन अपनी ही खोज में रहता है और कभी-कभी खुद की तलाश करते हुए कई विधाओं की देहरी पर दस्तक देते नज़र आते हैं. रवींद्रनाथ टैगोर के रूप में एक ऐसा ही कलाकार शख्स हमें संस्कृति के विश्व में चमकता हुआ दिखाई देता है. वे एक साथ कविता, कहानी, नाटक, संगीत, चित्रकला, मूर्ती कला आदि विधाओं में आवाजाही करते हुए अपनी और जगत की कही-अनकही को उकेरते रहे. इस तरह उन्होंने अपनी विभिन्न विचार धाराओं को अलग-अलग विधाओं में व्यक्त किया. अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर उन्होंने शब्दों के कोलाहल से दूर रंग और रेखाओं का हाथ थामा जिसमें वह अपने मन की बात कहने का संतोष पाते रहे.

देखा जाए तो रवींद्रनाथ टैगोर का संगीत और उनका साहित्य अनगिनत लोगों के द्वारा न सिर्फ सराहा गया बल्कि अनेक लोगों के लिए के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा लेकिन उनकी चित्रकला जिस तरह विश्व के अन्य देशों में लोकप्रिय रही, पर दुर्भाग्य से भारत में वह उपेक्षित रही. यह 1930 के आसपास का वक़्त था और अनेक पश्चिमी देशों में टैगोर के चित्रों के प्रति ख़ासा आकर्षण उमड़ रहा था.

रवींद्रनाथ टैगोर के चित्रों के बारे में उस समय भारत का कला जगत क्या राय रखता था यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन उनके इस रचनात्मक जीवन में आये बदलाव के प्रति वे अत्यंत सजग थे. वे इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि आने वाले समय में उन्हें जब भी याद किया जाएगा, उनकी कलाकार की भूमिका को भूला न जा सकेगा. उन्होंने चित्रकला को 'शेष बोयेशेर प्रिया' या 'जीवन संध्या की प्रेयसी' माना था. रवींद्रनाथ ठाकुर ने चित्रकला को 'खेल के बहाने वक़्त गुज़ारने की संगिनी माना था' (खेलार छले बेला काटानोरशोंगिनीएईचित्रोकला). शब्दों की दुनिया के शोर से दूर एक शान्ति भरी कला में लीन हो जाने को हम शायद उन्हीं की बातों से बेहतर समझ सकते हैं.

टैगोर के सम्पूर्ण कला-कर्म पर गहन शोध करने वाले देश के विख्यात चित्रकार और कला चिंतक अशोक भौमिक बताते हैं कि चित्रकला को किसी प्रान्त या देश की सीमा में बांधने के पक्षधर रवीन्द्रनाथ ठाकुर कभी नहीं रहे. चित्रकला चूंकि किसी भाषा पर आधारित कला नहीं है इसलिए रवींद्रनाथ एक तरफ़ जहां साहित्यकार के रूप में स्वयं को बांग्ला भाषा के साथ जोड़ते हैं, वहीं चित्रकला के उस खास उदार स्वरुप को समझते हुए वे चित्रकला में स्वयं को वैश्विक मानते हैं और इस प्रकार चित्रकला को अपनी 'मानवतावाद' की अवधारणा के सबसे करीब पाते हैं. उन्होंने अपने चित्रों के सन्दर्भ में इस बात को बार-बार दोहराया है.
चित्रकला के सन्दर्भ में 'अर्थ' या 'मायने' के बारे में उन्होंने कहा था, लोग अक्सर मुझसे मेरे चित्रों के अर्थ पूछते हैं. मैं खामोश रहता हूं, ठीक जैसे मेरे चित्र ख़ामोश हैं. उनका (चित्रों का) काम अपने को अभिव्यक्त करना है, व्याख्या नहीं. उनके अपने रूप के पीछे ऐसी कोई गूढ़ या गुप्त बात नहीं है, जिसे चिंतन द्वारा खोजा जा सके और शब्दों द्वारा वर्णन किया जा सके.'

रवींद्रनाथ ने बार-बार चित्रों को 'समझने' के स्थान पर 'अनुभव' करने की बात कही है. अपने चित्रों के लिए किसी शीर्षक से वे परहेज़ करते रहे हैं क्योंकि उनका मानना था कि चित्रों के शीर्षक, दर्शक द्वारा चित्रों का स्वतंत्र अनुभव करने की प्रक्रिया में आड़े आते हैं. टैगोर के चित्रों को देखते हुए एक बात तो साफ़ समझ में आती है, कि उन्होंने 'चित्रकला क्या है?' इस प्रश्न पर न केवल गहरा मंथन किया था, बल्कि अन्य कला रूपों से 'चित्रकला' भिन्न क्यों है, इस पर भी गंभीरता से सोचा था. उनका मानना था कि 'अन्य कलाओं की तुलना में, हमारा साहित्य का ज्ञान बेहतर है. यह इसलिए है क्योंकि साहित्य का वाहक भाषा होती है और भाषा अंततः 'अर्थ' पर आश्रित होती है. लेकिन रेखाओं और रंगों की कोई ज़ुबान नहीं होती. पूछने पर वे खामोश अपने चित्रों की ओर निर्देशित करते हुए मानो कहते हैं कि स्वयं ही देख लो और कोई सवाल मत पूछो.'

फिल्म निर्देशक और कथाकार सत्यजीत रे ने रविंद्रनाथ ठाकुर के चित्रों पर अपनी राय जताते हुए कहा है, - रवीन्द्रनाथ ठाकुर के चित्रों और रेखाचित्रों की संख्या दो हज़ार से कहीं ज़्यादा है. चूंकि उन्होंने चित्र रचना देर से शुरू किया था, यह एक चकित करने वाली उर्वरता है. यहां इसका विशेष उल्लेख ज़रूरी है कि वे किसी देशी या विदेशी चित्रकार से प्रभावित नहीं थे. उनके चित्र किसी परंपरा से विकसित नहीं हुए. वे निसंदेह मौलिक हैं. कोई उनके चित्रों को पसंद करे या न करे पर ये तो मानना ही पड़ेगा कि वे अनूठे हैं.'अशोक भौमिक टैगोर के चित्रों का गहराई से अवलोकन करने के बाद अपने शोध में कहते हैं कि टैगोर के चित्रों में मूल रूप से प्रकृति देखने को मिलती है. पेड़, वनस्पति, विचित्र जीव-आकृतियां. उनकी सुन्दर-असुंदर की अवधारणा देखी जा सकती है. वे अपने चित्रों को भाषा, जाति, प्रान्त या किसी भी वर्ग में बांधना नहीं चाहते थे. वे चाहते थे कि उनके चित्रों को वैश्विक रूप से स्वीकारा जा सके. किसी भी पृष्ठभूमि के व्यक्ति को उनके चित्रों से जुड़ने में कोई बाधा न आ सके. और इसी के चलते उनकी चित्रकला की प्रदर्शनी फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका, डेनमार्क, स्विट्ज़रलैंड आदि देशों में होने के साथ उनके प्रशंसकों का एक नया समूह तैयार हुआ.

दुर्भाग्य से भारत में उनकी चित्रकला को ठीक से पहचाना न जा सका. रवींद्रनाथ अपने चित्रों में, स्वाभाविक रूप से पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं के प्रसंगों और पात्रों को चित्रित कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उनके किसी भी चित्र में किसी परिचित कथा-नायक या कथा सन्दर्भ नहीं देखने को मिलता है. इससे उनकी कठिन और निःसंग कला यात्रा की कल्पना की जा सकती है. टैगोर का कहना था 'मेरे चित्र, रेखाओं के माध्यम से की गयी मेरी पद्य रचना है.'

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विभोर उपाध्याय

विभोर उपाध्यायलेखक, संगीतकार

बदलते संदर्भों, विषयों और वैचारिक मुद्दों पर नए सोच का लेखन. कंटेंट राइटर्स के रूप में अनेक उपक्रमों के साथ काम. युवा संगीतकार.

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First published: May 7, 2021, 9:46 AM IST
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