यादों का मौसम

बचपन से लेकर बड़े होने तक कुछ यादें हमारे भीतर यूं बस जाती हैं कि जीवन कितना ही बदल जाए, कहीं न कहीं एक बार रुक कर उन्हें महसूस करना ही पड़ता है. जैसे हर मौसम के साथ हमारे बचपन के बिताये दिनों के एहसास रह-रह कर हमें याद आते हैं. शुरुआत करें आती हुई गर्मियों से तो मार्च का महीना उस जाती हुई ठण्ड और होली के त्यौहार की ख़ुशी के साथ घुला हुआ रहता था.

Source: News18Hindi Last updated on: October 24, 2020, 10:45 AM IST
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यादों का मौसम
मई-जून आते ही दफ्तर में बैठे-बैठे गर्मी की छुट्टियों के वो दिन याद आने लगते हैं जब भाग दौड़ जीवन की रेस में नहीं बल्कि मैदान में यार दोस्तों के साथ खेलने में हुआ करती थी.
"मौसम आएंगे-जाएंगे, हम तुमको भूल न पाएंगे." अहमद हुसैन- मोहम्मद हुसैन के सुरों में पगी यह ग़ज़ल जितनी मन को भाती है उतनी ही ज़्यादा मन को रह-रह कर याद दिलाती है कि हर मौसम की यादों की महक भी जुड़ी होती है. उम्र के सफ़र में जि़न्दगी के बिखरते रंगों का नाम ही यादें हैं. ये यादें ही हैं जो हमें अकेले वक़्त में कभी हंसा देती हैं, कभी रुला देती हैं, कभी अपनों की याद दिला देती हैं. कभी आप की तरक्कियों तो कभी नाकामियों के पन्ने खोल देती है. अपने अतीत में नज़रें रख कर भविष्य की ओर नहीं बढ़ा जा सकता. लेकिन भविष्य की ओर जाते समय अपने रियर व्यू में यादों की झलकियां भी ज़रूरी हैं.

बचपन से लेकर बड़े होने तक कुछ यादें हमारे भीतर यूं बस जाती हैं कि जीवन कितना ही बदल जाए, कहीं न कहीं एक बार रुक कर उन्हें महसूस करना ही पड़ता है. जैसे हर मौसम के साथ हमारे बचपन के बिताये दिनों के एहसास रह-रह कर हमें याद आते हैं. शुरुआत करें आती हुई गर्मियों से तो मार्च का महीना उस जाती हुई ठण्ड और होली के त्यौहार की ख़ुशी के साथ घुला हुआ रहता था, चल रही या आने वाले इम्तहान का तनाव. मुझे बाकी बच्चों का तो नहीं पता लेकिन मैं तो उनमें से बिलकुल नहीं था जो साल भर पढ़ाई करके तनाव मुक्त हो कर एग्ज़ाम दिया करते थे. इसलिए आज भी जब मार्च का महीना आता है तो अनायास ही मन में एग्ज़ाम के उन दिनों की याद भीनी-भीनी सी आने लगती है.

मई-जून आते ही दफ्तर में बैठे-बैठे गर्मी की छुट्टियों के वो दिन याद आने लगते हैं जब भाग दौड़ जीवन की रेस में नहीं बल्कि मैदान में यार दोस्तों के साथ खेलने में हुआ करती थी. गर्मी की छुट्टियां जैसे अपने आप में एक नया एपीसोड होता था, स्कूल से मिले असाइनमेंट्स भी जानते थे कि उन्हें आखरी के हफ्ते में पूरे किया जायेगा. इन छुट्टियों की प्लानिंग में उन सारे अरमानों को जमा किया जाता था जिनका सपना फाइनल एग्जाम के वक़्त पढ़ते वक़्त या एग्ज़ाम देते वक़्त देखा करते थे. दोस्तों के साथ खेलने जाना, दादी-नानी के घर जाना, उनके निःस्वार्थ प्रेम के झरनों में भीगना, देर रात तक जागने की आज़ादी. अब वहां जब जाते हैं तो बचपन की यादें किसी कोने में पोटली में बंद सम्हाल के रखी मिलती हैं. सच है, किसी स्कूल के दिनों में गर्मी की छुट्टियां किसी त्योहार से काम नहीं थीं. कोई क्रिकेट की किट उठाये कोच सर का शागिर्द हो जाता था, तो कोई, कला के मंदिर की घंटी बजता था. गर्मियों की बात हो और आम का जि़क्र न हो यह तो वही बात हुई की सत्यनारायण की कथा के बाद प्रसाद न मिले. खैर आम के शौक़ीन तो आज भी हैं लेकिन, गर्मी की छुट्टियों में बाहर तपती दोपहरी से बचकर उस नागपुरी कूलर की ठंडक में बैठ कर, किसी भी प्रकार के तनाव से मुक्त हो कर, टीवी पर आ रही किसी फिल्म को आम खाते हुए देखने का जो आनंद था, उसे आज पाने की इच्छा सुदर्शन फ़ाकिर साहब की इस ग़ज़ल में बखूबी महसूस की जा सकती है.

'ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मग़र मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी’
बात हुई बारिश की तो आइये बढ़ते हैं बारिश के मौसम की ओर जब जून के आखरी 10 दिनों में कभी आयी पहली झड़ी गर्मी के मौसम के साथ छुट्टियों के ख़त्म होने का संकेत होती थीं. सारी छुट्टियों में अलमारी में क़ैद हुई किताबें अपनी आंखें खोलती हैं और उन पर घिसती कलम चल-चल कर अपनी अंगड़ाइयां लेती दिखाई देती हैं. 1 जुलाई को जहां स्कूल के वापस खुलने का उत्साह रहता था, वहीं गर्मी की छुट्टियों के विदा हो जाने का दुःख. लेकिन बचपन की सबसे खूबसूरत बात जानते हैं, वह हर परिस्थिति में कुछ नया ढूंढ कर हसीन यादें बनाना जानता है. बारिश के मौसम में कागज़ से बनाई कश्तियां जैसे हर किसी की यादों में समान है. दोस्तों के साथ बारिश में भीगते हुए खेलना और फिर घर आ कर डांट खाना जैसे अपने आप में किसी रिवाज़ से कम नहीं था. और फिर बारिश के मौसम में किसी दिन अचानक तेज़ बारिश के कारण स्कूल की छुट्टी हो जाना जैसे करोड़ों रुपये की लाटरी जीतने के बराबर था. आज अगर दफ्तर बारिश की वजह से बंद भी हो तो वर्क फ्रॉम होम दे दिया जाता हैं. आज बारिश में भीगते तो हैं लेकिन मजबूरी में. लेकिन स्कूल का जीवन हो या आज का, अगस्त में गणेश चतुर्थी के साथ अचानक खुशियों की दस्तक होती हैं.

और अब बात निजी तौर पर मेरे पसंदीदा मौसम की, यानि सर्दियों की. नवरात्रि के साथ ठण्ड की हल्की दस्तक और सड़कों पर रौनक के साथ हवा में एक भीनी खुशबू साथ लिए आती है. अचानक सडकों पर साल भर चमकने वाली लाइटें कुछ अलग निखार ले आती हैं.
एक बार फिर जीवन खिलता सा महसूस होता हैं. और दशहरा आने पर अपने आप यह मान लिया जाता था कि अब से दिवाली तक माहौल के मिज़ाज़ को बरकरार रखा जायेगा. वह मोहल्ले के दोस्तों के साथ मिल कर रावण बनाना, घर में रोज़ त्यौहार के व्यंजन बनना, सड़कों पर रौनक होना.
लगता था जैसे बस जीवन यूं ही चलता रहे. ठण्ड के मौसम में हर चीज़ का मज़ा हैं, मेल-जोल का, खाने-पीने का घूमने का. और फिर जब गुलाबी सी ठण्ड उतरती हैं जनवरी में तो उसके साथ उतरता हैं खुमार इन मौसमों का. आ जाते थे हम वास्तविकता के धरातल पर.

कहने का सार कुछ यूं हैं कि जीवन आपका वर्तमान में कैसा भी चलता रहे लेकिन उन्हें मनाने का उत्साह आपके भीतर बदलते मौसमों की यादें ही लेकर आती हैं. आज भी 26 जनवरी और 15 अगस्त आते हैं लेकिन सुबह स्कूल जा कर झंडा वंदन का जो उत्साह आया करता था वह आज दफ्तर से मिली छुट्टी को मनाते हुए एक बार ही सही याद तो आता ही हैं, और याद आता है वह घर वापसी के समय मिलता बूंदी का लड्डू. आप अपनी यादों को संजो कर रखें न रखें लेकिन यादों को सब याद रहता है.
हरिहरन भी तो अपनी आवाज़ में यही पुकारते हैं- "बातें भूल जाती हैं, यादें याद आती हैं."
ब्लॉगर के बारे में
विभोर उपाध्याय

विभोर उपाध्यायलेखक, संगीतकार

बदलते संदर्भों, विषयों और वैचारिक मुद्दों पर नए सोच का लेखन. कंटेंट राइटर्स के रूप में अनेक उपक्रमों के साथ काम. युवा संगीतकार.

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First published: October 24, 2020, 10:44 AM IST
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