मिज़ाज को संवार देता है जायका

खाना बनाना दुनिया की सबसे बड़ी कला है, किसी आर्ट गैलरी में लगी पेंटिंग से भी बड़ी, क्योंकि वह कला आंखों को अपनी ओर आकर्षित करती है, लेकिन खाना आंखों को अपनी ओर खींचता है, नाक को अपनी ओर खींचता है, जु़बान को अपनी ओर खींचता है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 30, 2020, 9:52 AM IST
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मिज़ाज को संवार देता है जायका
जु़बान पर आया कोई जायका यादों की महफ़िल, जमाना बखूबी जानता है. (Pic- Social Media)
अगर आपसे पूछा जाए कि इंसान को पैसे की जरूरत कौन सी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए है तो आप तपाक से कहेंगे- 'रोटी, कपड़ा और मकान'. सौ फीसदी सही भी है लेकिन गौर कीजिएगा कि कैसे सहज ही मुंह से सबसे पहले रोटी निकलता है. दरअसल खाना इंसान की मूल प्रवृत्ति में शामिल रहा है. सारी दुनिया की जद्दोजहद सिर्फ खाने पर आकर टिक जाती है. खाना सिर्फ हमारे शरीर की जरूरत ही नहीं बल्कि हमारे लिए एक भावनात्मक अहसास भी है. वरना अपनी मां के हाथ के खाने का स्वाद यूं ही हमें घर से दूर भावुक न कर देता.

जु़बान पर आया कोई जायका यादों की महफ़िल जमाना बखूबी जानता है. दिन की शुरुआत से लेकर रात तक भोजन ही है जो हमारी ऊर्जा और मनोदशा को संतुलित रखता है. सुबह नाश्ता करते समय अगर खाने का स्वाद खराब हो तो आपका सारा दिन उसी मानसिकता के साथ गुज़रता है. अक्सर लंबे समय तक भूखे पेट रहने से मन भी उदास रहने लगता है. लेकिन एक लज़ीज व्यंजन आपके दिन और मनोदशा को पलट कर रख सकता है. सुबह के नाश्ते को दिन का सबसे महत्वपूर्ण भोजन यूं ही नहीं कहा जाता.

खाना बनाना दुनिया की सबसे बड़ी कला है, किसी आर्ट गैलरी में लगी पेंटिंग से भी बड़ी, क्योंकि वह कला आंखों को अपनी ओर आकर्षित करती है, लेकिन खाना आंखों को अपनी ओर खींचता है, नाक को अपनी ओर खींचता है, जु़बान को अपनी ओर खींचता है.


‘चीनी कम’ फिल्म में अमिताभ बच्चन ने क्या खूब कहा है- एक खाना बनाने वाले की सबसे बड़ी प्रतिभा होती है बिना सामने वाले को जाने उसके स्वाद की रुचि को पहचानना. सिनेमा हॉल में फिल्म देखने जाते वक्त उस महकते पॉपकॉर्न की खुशबू आपको जेब हल्की करने पर आमादा करती है. बाजार में निकलते वक्त चाट के उस ठेले को आप कितनी ही हेय नज़रों से देखें लेकिन उससे आ रही खुशबू से आपकी रूह आपको उस स्वाद के सागर में डूबने के लिए विवश ज़रूर कर देती है. उसे कितना भी नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करें लेकिन बार-बार ध्यान वहीं जाता है और आखिर में हारकर जब आप उसका स्वाद ले ही लेते हैं तब अनायास ही आपकी आंखें, पल भर के लिए ही सही, तुष्टि से बंद हो जाती हैं.
जिस तरह दुनिया में वक्‍त के साथ हर चीज की अपनी एक दास्तां होती है, या यूं कहें कि अपनी एक यात्रा होती है, उसी तरह हर जगह, हर प्रान्त, हर क्षेत्र के भोजन की अपनी एक यात्रा और कहानी है. जैसे हम सभी का चहेता समोसा जिसे हम पूरी तरह से भारतीय मानते हैं. असल में मध्य पूर्व और मध्य एशिया में जन्मा था जिसे संबुसा के नाम से जाना जाता था और फिर मध्य एशियाई तुर्क राजवंशों के साथ यह भारत आ पहुंचा. दिल्ली की मशहूर मसालेदार चाट और स्ट्रीट फूड असल में मुगलों की देन है. दरअसल दिल्ली के आसपास यमुना नदी का पानी काफी दूषित होने और उसे सादा ग्रहण करने के कारण लोग बीमार पड़ने लगे थे इसलिए चूंकि सभी मसलों में औषधीय गुण होते हैं, खाने में मसालों की तादाद बढ़ाई गई और इस तरह ’चाट’ प्रचलन में आई.

लोकप्रिय चाइनीस व्यंजन वेज मंचुरियन दरअसल पूरी तरह भारतीय हैं. इसकी भी एक रोचक कहानी है कि हाका मूल के लोगों को चीन के सम्राटों द्वारा जब निकाला गया तब वे सभी बिखर गए, तब हाका मूल के लोग का एक झुंड टोंग आचि नाम के व्यापारी के साथ भारत में आया और उन्होंने कोलकाता के पास के छोटी सी जगह में एक गांव बसाया. वहीं टोंग आचि की आज समाधि भी है और उस जगह का नाम अचीपुर पड़ा. उसी के पास टंगड़ा बसा, और वहीं पर हिंदुस्तानी चाइनीस के कई व्यंजनों का ईजाद हुआ जो चीन या भारत में अस्तित्व नहीं रखती थीं और पूरी तरह भारतीय मूल के स्वाद और पसंद को ध्यान में रख कर बनाया गया था. और वेज मंचूरियन उन्हीं व्यंजनों में से एक है.

शास्त्र कहता है-
अन्नं ब्रहृमा रसो विष्णुर्भोक्ता देवो महेश्वरः
इति संचिन्त्य भुज्जानं दृष्टिदोषों न बाधते


इसका मतलब है कि अन्न ब्रह्य के समान है, उसका रस विष्णु के समान है और उसका भोग करने वाला स्वयं महेश्वर है. अगर हम इस विचार के साथ भोजन ग्रहण करते हैं तो हमारे शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और हमारा शरीर निरोगी रहता है. भारत में अक्सर अन्न ग्रहण करने से पहले ईश्वर को भोग लगाने की प्रथा रही है. हमारे सभी देवी देवताओं को भोग चढ़ाने के लिए अक्सर उनके प्रिय भोज को व्यंजन अथवा फलों को ध्यान में रखा जाता है, जैसे गणेश जी को मोदक या मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाया जाता है, विष्णुजी को खीर या सूजी के हलवे का नैवैद्य बहुत पसंद है. हिंदू धर्म में माता अन्नपूर्णा को विशेष स्थान प्राप्त है. अन्नपूर्णा का शाब्दिक अर्थ है अन्न की अधिष्ठात्री.

सनातन धर्म में माना जाता है कि प्राणियों को भोजन माता अन्नपूर्णा की कृपा से ही प्राप्त होता है. यज्ञ में हवन की अग्नि को भी भगवान के मुख के रूप में माना जाता है जिसमें स्वाहा की ध्वनि के साथ सामग्री समर्पित की जाती है. मनुष्य के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक घटित होने वाली सभी प्रमुख घटनाओं पर भी भोजन को ख़ास महत्व दिया गया है. अन्न का दान बहुत सम्मान की नज़रों से देखा जाता है. माना जाता है कि ज़रूरतमंदों को अन्न दान करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और लोक और परलोक में सुख के द्वार खुल जाते हैं.

तो आप ही बताइये जब भोजन हमारे जीवन में इतना महत्व रखता है तो क्या हमें इसकी ज़रा भी उपेक्षा करनी चाहिए? यह दुनिया भर की भाग दौड़, इतनी मेहनत, और आखिर में सुकून भरा भोजन ही नसीब न हो, तो फिर क्या मतलब इन सब का. आपसी सौहार्द बढ़ाएं, अच्छा खाना खाएं और खिलाएं, इस कोरोना काल में निश्चित ही सामाजिक दूरी और सुरक्षित दूरी के साथ. लेकिन कोई अपना मिले को ज़रूर गाना गाएं 'आओ तुम्हें प्रेम से खिलाएं.'

प्रीति भोज की परंपरा में भोजन करने वालों की संख्या और व्यंजनों से ज़्यादा अहमियत प्रीति या प्रेम के उस भाव की है जो भोजन के साथ अगर न उपजा तो सारे व्यंजन और सारा आयोजन व्यर्थ है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
विभोर उपाध्याय

विभोर उपाध्यायलेखक, संगीतकार

बदलते संदर्भों, विषयों और वैचारिक मुद्दों पर नए सोच का लेखन. कंटेंट राइटर्स के रूप में अनेक उपक्रमों के साथ काम. युवा संगीतकार.

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First published: September 30, 2020, 9:50 AM IST
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