अपना शहर चुनें

States

व्हाट्सएप, सिग्नल या टेलीग्राम... एकांत में दस्तक या दखल?

Whatsapp New Privacy Policy: बचपन में हम सभी ने एक निबंध ज़रूर लिखा है, "टेक्नोलॉजी-वरदान या अभिशाप". उस निबंध को लिखते समय शायद किसी ने उसे भविष्य में जीने की कल्पना भी नहीं की थी. हम सभी उसके अंत में यह लिख कर भूल गए कि विज्ञान के हर अविष्कार के सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों होते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: January 20, 2021, 6:30 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
व्हाट्सएप, सिग्नल या टेलीग्राम... एकांत में दस्तक या दखल?
यू.एस. कांग्रेस के सामने हुई सुनवाई में मार्क ज़ुकरबर्ग ने यह स्वीकार किया था कि फेसबुक अपने उपभोक्ताओं का डाटा इकठ्ठा करता है. फाइल फोटो
हमसे दूर हमारे अपनों से जुड़े रहने की हमारी आस हमेशा से हमें नए विकल्पों की तलाश में जुटाए रखी है. शुरुआत पत्रों से हुई थी, जहाँ एक चिट्ठी को भेजना और उसके जवाब की प्रतीक्षा का उत्साह हमारे लिए सब कुछ हुआ करता था. टेक्नोलॉजी का हाथ पकड़े धीरे-धीरे हम इंस्टेंट मेसेजिंग तक आ गए और इंतज़ार की घड़ियों के साथ हमारे रिश्तों की दूरियां भी कम होती गयीं, और इस बीच इस क्रांति की आग में घी का काम किया व्हाट्सएप ने. 2009 में लाँच हुए इस ऐप ने 2010-2011 में अपने पाँव पसारना शुरू किए और अचानक यह हम सभी के जीवन का ऐसा अंग हो गया, जिससे अलग हो पाना नामुमकिन सा है. किसी का व्हाट्सऐप इस्तेमाल न करना आश्चर्य की निगाहों से देखा जाने लगा. लेकिन, हाल ही में व्हाट्सएप की एक प्राइवेसी पॉलिसी अपडेट के चलते हर कोई अब इसे इस्तेमाल करने से घबरा रहा है. आइये इस पर थोड़ी रोशनी डालते हैं.

"होठों में ऐसी बात मैं दबा के चली आई/खुल जाये वही बात तो दुहाई है दुहाई". हाल ही में आई व्हाट्सऐप की प्राइवेसी पॉलिसी के चलते हर कोई अब अपनी प्राइवेसी को लेकर चिंतित है. सही बात भी है, कोई भी नहीं चाहेगा कि उनके निजी जीवन में चल रही बातें किसी और के हाथ लग जाएं. वह पॉलिसी जो 8 फरवरी के बाद व्हाट्सएप चलाने वालों के लिए अनिवार्य होगी, व्हाट्सऐप अब आपका डाटा जिस तरह प्रोसेस करता है उसका स्वरुप बदल जायेगा. और इसके बाद से हर उपभोक्ता इसी बारे में बात करते नहीं थक रहा. लेकिन आखिर कुछ दिनों बाद व्हाट्सऐप ने यह साफ़ तौर पर कहा था कि वह उपभोक्ताओं की निजी बातचीत में कोई दखलंदाज़ी नहीं करेगा.

लेकिन क्या वाक़ई हमारा डाटा सुरक्षित है? सोशल मीडिया हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है. यह इस कदर हमें घेरे हुए है कि अब लोग डिजिटल डीटॉक्स पर जाने लगे हैं. सोशल मीडिया से दूर रहना अपने आप में एक "काम" बन गया है. पहले लोग जीवन और खुद को गहरा समझने के लिए विपश्यना केंद्रों में जाते थे, लेकिन अब डिजिटल डीटॉक्स के लिए भी जाने लगे हैं. और यह बात हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि सोशल मीडिया पूरी तरह से हमारे पैटर्न्स को समझकर हमें उसी तरह का कंटेंट दिखाता है जो हमें पसंद है, ताकि हम ज़्यादा से ज़्यादा समय बिता सकें.

हर शॉपिंग वेबसाइट पर फेसबुक द्वारा लॉग-इन किया जा सकता है और यह इतना आसान है कि यह हर किसी का पहला विकल्प होता है. लेकिन यही वह डाटा है जो वह इकठ्ठा करके उससे सम्बंधित चीज़ें आपके सामने रखी जाती हैं. कुछ वर्षों पहले इंस्टाग्राम और फिर व्हाट्सएप भी फेसबुक द्वारा खरीद लिया गया और इस तरह यह एक ही कंपनी द्वारा संचालित होने लगे. कहने का तात्पर्य यह कि जिस प्राइवेसी के खंडन की हम चिंता कर रहे हैं, उसे हम पहले ही खो चुके हैं. अगर हम सोशल मीडिया से जुड़े हैं तो हमारा डाटा पहले से ही मॉनिटर किया जा रहा है. इन्हीं बातों के चलते फेसबुक के सीईओ मार्क ज़ुकरबर्ग को यू.एस. कांग्रेस के सामने गवाही देने के लिए भी पेश होना पड़ा था.
एक वह समय था जब एक पोस्टकार्ड पर अपनी बातों को लिख कर हम डाकिये के हाथ भिजवा दिया करते थे, बिना इस बात की चिंता किये कि हमारी बातें कोई और पढ़ सकता है. लेकिन इंटरनेट की बातों का प्रभाव कुछ इस तरह होता है कि आज वही बात हमारे सोचने में इस कदर आ रही हैं कि अब व्हाट्सएप इस्तेमाल करना या न करना एक बहुत अहम फैसला हो गया है.

अक्सर कहा जाता है कि "इंटरनेट पर प्राइवेसी अपने आप में एक मिथक है." इंटरनेट यानी कोई भी हैकर आपका डाटा बड़ी आसानी से देख सकता है और उसे इस्तेमाल कर सकता है. हैकिंग के तो हमने कई किस्से सुने ही हैं. लेकिन जैसा कि कहा जाता है, बहुत ज़्यादा ज्ञान और अधूरा ज्ञान दोनों ही खतरनाक होते हैं. जब तक किसी चीज़ के बारे में हमें पता नहीं होता तब तक हमें उसका डर भी नहीं होता, लेकिन जब हमें उस बारे में ठीक जानकारी नहीं होती तो हम जो सही करने जाते हैं, वह भी गलत हो जाता है.

यू.एस. कांग्रेस के सामने हुई सुनवाई में मार्क ज़ुकरबर्ग ने यह स्वीकार किया था कि फेसबुक अपने उपभोक्ताओं का डाटा इकठ्ठा करता है. लेकिन, वह उसे किसी को बेचता नहीं है, बल्कि कंपनियां उन्हें पैसा देती हैं कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर लोगों को उनकी पसंद-नापसंद के आधार पर विज्ञापन दिखाए जाएं. जीवन में अक्सर हम बहुत-सी चीज़ों को बिना सोचे-समझें अपना लेते हैं. उनकी अपने लिए अहमियत, सीमाओं और ज़रूरतों का हमें ठीक से इल्म नहीं होता. बस, एक होड़ या अहम् होता है कि हम किसी की तरह साधन संपन्न दिखना चाहते हैं.नई टेक्नालॉजी के साथ भी हमारा रिश्ता कुछ ऐसा ही है. अब यह खुली किताब की तरह सच है कि सोशल मीडिया ने इंसानी जीवन पर, सरोकारों पर, आपसी विश्वास पर कितना प्रतिकूल असर किया है. दरअसल सारी समस्या उस सामाजिक ताने-बाने की है जो कथित मर्यादा और अनुशासन के नाम पर अपने कंफर्ट ज़ोन से किसी तरह का समझौता नहीं करना चाहता.

बचपन में हम सभी ने एक निबंध ज़रूर लिखा है, "टेक्नोलॉजी-वरदान या अभिशाप". उस निबंध को लिखते समय शायद किसी ने उसे भविष्य में जीने की कल्पना भी नहीं की थी. हम सभी उसके अंत में यह लिख कर भूल गए कि विज्ञान के हर अविष्कार के सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों होते हैं. वैसे तो व्हाट्सएप के विकल्प भी तुरंत तैयार हैं- सिग्नल और टेलीग्राम और कई लोगों ने व्हाट्सएप छोड़ कर उन्हें अपनाना शुरू भी कर दिया है, लेकिन आखिर कब तक?

इंटरनेट पर कोई भी ट्रेंडिंग चीज़ शहर के उस प्राइम लोकेशन वाले प्लॉट की तरह होती है, जिस पर हर किसी की नज़र होती है, जिस तरह फेसबुक ने व्हाट्सएप को ख़रीदा है. वैसे ही शायद सिग्नल और टेलीग्राम पर भी किसी की नज़र हो. अब या तो हम इससे भागते रह सकते हैं और इसे अपना कर इसे भी अपने जीवन का हिस्सा बनाना मंज़ूर कर सकते हैं. क्योंकि, आखिरी फैसला अब भी हमारा है.

*ये लेखक के निजी विचार हैं.
ब्लॉगर के बारे में
विभोर उपाध्याय

विभोर उपाध्यायलेखक, संगीतकार

बदलते संदर्भों, विषयों और वैचारिक मुद्दों पर नए सोच का लेखन. कंटेंट राइटर्स के रूप में अनेक उपक्रमों के साथ काम. युवा संगीतकार.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: January 20, 2021, 6:30 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर