टोक्यो ओलंपिक भारतीय बॉक्सरों के लिए सबसे यादगार हो सकता है

Olympics 2020: महिला मुक्कबाजों में अखिल को सिमरनजीत कौर से ठीक वैसी ही उम्मीदें हैं, जैसे कि वो विकास कृष्णन से कर रहे हैं. मैरीकॉम के बारे में अखिल सिर्फ एक बात कहते हैं कि उनकी सोच बिलकुल बिंद्रा जैसी ही है. आज मैरीकॉम के पास मेडल भी हैं, नाम भी, पैसे भी लेकिन अपने मेडल का रंग बेहतर करने की ललक ने उन्हें 6 बार वर्ल्ड चैंपियन बनाया है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 22, 2021, 11:49 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
टोक्यो ओलंपिक भारतीय बॉक्सरों के लिए सबसे यादगार हो सकता है
टोक्यो ओलंपिक में भारत के लिए निशानेबाजी के बाद अगर सबसे ज्यादा पदकों की उम्मीद किसी और खेल से शायद है, तो वो मुक्केबाज़ी ही है. इस बार रिकॉर्ड नौ मुक्केबाजों ने खेलों के महाकुंभ के लिए क्वालीफाई किया है, जिसमें से 5 पुरुष वर्ग से और 4 महिला वर्ग से हैं. 2008 बीजिंग ओलंपिक के दौरान, बस पदक जीतते-जीतते रह गए पूर्व मुक्केबाज अखिल कुमार का इस मुद्दे पर साफ कहना था कि नौ की संख्या को देखकर भावना में ना बहें.

“आपको मुक्केबाजों की संख्या ज्‍यादा इसलिए लग रही है, क्योंकि आप इसकी तुलना अतीत से कर रहें हैं. लेकिन, आप ये भूल रहे हैं कि पहले महिला मुक्केबाज ओलंपिक में भाग नहीं लेती थी. इसलिए इस बार, चार महिलाओं के होने से आपको दल बड़ा दिख रहा है. हकीकत यही है कि लगभग इतने ही बॉक्सर लंबे समय से ओलंपिक में भारत के लिए भाग लेते आ रहे हैं.”

जो इतिहास में नहीं हुआ, इस बार टोक्यो में होगा!
इतिहास को टटोलें तो अब तक भारत ने मुक्केबाजी में सिर्फ दो मेडल ही जीते हैं. 2008 में विजेंदर सिंह के मेडल ने ना सिर्फ उनके राज्य हरियाणा, बल्कि पूरे भारत में मुक्केबाजी की संस्कृति में जबरदस्त बदलाव लाया. वहीं, लंदन ओलंपिक में मैरीकॉम की कामयाबी ऐसी रही कि उनके जीवन पर जो फिल्म बनी, वो भी सुपरहिट हो गई. अखिल कुमार का मानना है कि जितने मेडल अब तक भारत ने अपने इतिहास में मुक्केबाजी में जीते हैं, उसकी बराबरी वो अकेले टोक्यो खेलों के दौरान ही कर सकता है.
”इतनी सकारात्मक सोच और जबरदस्त उम्मीद की वजह है कि हाल के सालों में मुक्केबाजी फेडरेशन, खेल मंत्रालय और मुक्केबाजों के बीच आपसी ताल-मेल बहुत ही बढ़िया रहा है. पहले, अलग-अलग तरह के कई ग्रुप हुआ करते थे, जो इस खेल और खिलाड़ियों को अलग-अलग दिशा में भटकाते थे. अब राजनीतिक तौर पर भी खेलों को लेकर बदलाव दिख रहा है. आप देखें ना, किस तरह से भारत के प्रधानमंत्री खुद ही युवा खिलाड़ियों की हौसला अफजाई के लिए आगे आ जाते हैं.”

पुरुष वर्ग में अमित पंघाल और विकास पर है दारोमदार
इस ओलंपिक में पुरुष वर्ग की भारतीय टीम में 5 मुक्केबाज हैं. जिसमें, 52 किग्रा में अमित पंघाल, 63 किग्रा में मनीष कौशिक, 69 किग्रा में विकास कृष्णन, 75 किग्रा में आशीष कुमार और 91 प्लस में सतीश कुमार शामिल हैं. इस बार, पदक जीतने के सबसे बड़े दावेदार अपना पहला ओलंपिक खेलने वाले पंघाल और तीसरी बार शिरकत करने वाले विकास पर है. हरियाणा के रोहतक जिले में एक किसान परिवार से आने वाले अमित इस समय दुनिया के नंबर-1 खिलाड़ी हैं.
इतिहास गवाह है कि आज तक भारत का कोई भी मुक्केबाज नंबर एक की हैसियत से खेलों के महाकुंभ में नहीं पहुंचा है. अगर रैंकिग के आधार पर मेडल जीतने का पैमाना तय किया जाए, तो अमित को गोल्ड जीतना चाहिए. लेकिन, हम सब जानते हैं कि रैंकिंग एक अलग बात है और ओलंपिक रिंग के दबाव वाले लम्हे में अपनी सर्वोच्चता साबित करना दूसरी बात. उम्मीदों के दबाव के आगे कहीं अमित बिखर तो नहीं जाएंगे?


“भले ही अमित का ये पहला ओलंपिक हो, लेकिन वह एशियन और कॉमनवेल्‍थ गेम्स जैसे बड़े मुकाबलों का हिस्सा रह चुके हैं. मैं निजी अनुभव से आपको कह सकता हूं कि जब बॉक्सर एक बार रिंग के अंदर होता है, तो उसे सिर्फ अपना विरोधी ही दिखता है और जीत की उम्मीद. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि विरोधी की रैंकिंग क्या है और वो ओलंपिक में हैं या किसी अन्‍य खेल में. कुछ साल पहले अमित को मैंने उज्बेकिस्तान के एक मुक्केबाज से हारते हुए देखा था, लेकिन तब भी उन्होंने अपने खेल से प्रभावित किया था. तब, मुझे एहसास हुआ था कि यह खिलाड़ी लंबी रेस का घोड़ा साबित हो सकता है.” ऐसा अखिल कहते हैं.

विकास कृष्‍णन से सभी ने लगा रखी हैं उम्‍मीदें
बहरहाल, अखिल मानते हैं कि उनके लिहाज से अमित या किसी और बॉक्सर के मुकाबले अनुभवी विकास कृष्णन के मेडल जीतने के आसार सबसे ज़्यादा हैं. “आपको तो याद ही होगा, 2018 के कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स का फाइनल, जहां उन्होंने कैमरून के मुक्केबाज को कैसे शिकस्त दी थी? (विकास ने तब डियूडन विल्फ्रेड सेई को 75kg category में हराया था). इसके अलावा, एशियाई खेलों में भी विकास ने अपना जलवा बिखेरा था. उनका दिमाग काफी तेज चलता है. उनसे ज्यादा चालाक दिमाग का कोई भी भारतीय बॉक्सर नहीं है, इसलिए मैं उन पर दांव लगा रहा हूं.”

अखिल की बातों में, विकास की संभावनाओं को लेकर एक अभूतपूर्व भरोसे की झलक मिलती है. विकास के साथ एक फायदा और यह भी है कि वह बाएं हाथ के मुक्केबाज हैं और अब वे 69 kg वर्ग में खेल रहे हैं. इन दोनों के अलावा, आशीष कुमार (75kg) और मनीष कौशिक (63kg) भी चौंकाने वाले नतीजे दे सकते हैं. लेकिन, अखिल के मुताबिक, सतीश कुमार (+91kg) एक बेहद स्पेशल बॉक्सर हैं. क्योंकि, इस कैटगरी में शिरकत करने वाले वो पहले भारतीय हैं, जो एक बहुत बड़ी बात है. पूर्व ओलंपियन अखिल कुमार इस बार सतीश को छुपा रुस्तम बॉक्सर मानते हैं.

कितना कुछ बदल गया डेढ़ दशक में!
अखिल के समकालीन विजेंदर सिंह ने जब बीजिंग खेलों के दौरान कांस्य पदक जीता, तो उसके बाद से भारत में मुक्केबाजी का खेल और लोकप्रिय हो गया. आलम ये है कि मौजूदा दौर के बॉक्सर ही नहीं, उनके परिवार वालों की जानकारी इतनी ज़्यादा बढ़ गई है कि उन्हें भी पता है कि मुक्केबाजों की दिनचर्या कैसी होनी चाहिए, उन्हें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए. सोशल मीडिया, इंटरनेट और यूट्यूब के ज़रिए नई-नई तकनीक और रणनीति से भी मौजूदा खिलाड़ी खुद को रुबरु रखते हैं और इसकी झलक हमें उनके आत्म-विश्वास में देखने को मिलती है.“

नई पीढ़ी के मुक्कबाजों में जीत के लिए एक अलग भूख दिखती है. चाहे पुरुषों की बात करें या फिर महिलाओं की. ये एक बहुत बड़ा बदलाव भारतीय खेलों में देखने को मिला है और इसका क्रेडिट मैं काफी हद तक अभिनव बिंद्रा को देता हूं. बिंद्रा के पास वो तमाम सुख सुविधाएं बचपन से ही मौजूद थीं, जो कोई आम एथलीट उम्मीद कर सकता है. इसके बावजूद, वे हर कीमत पर गोल्ड जीतने का इरादा रखते थे. ये कहना है मेलबर्न कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान देश के लिए गोल्ड मेडल जीत चुके अखिल कुमार का.

मैरीकॉम से बड़ी दावेदार सिमरनजीत!
अगर महिला वर्ग की टीम की बात करें तो निश्चित तौर पर 51 किग्रा में एमसी मैरीकॉम पर सबसे पहले आपकी नजर जाएगी. लेकिन, मैरी के अलावा 60 किग्रा में सिमरनजीत कौर भी चौंकाने वाले नतीजे ला सकती हैं, जबकि  69 किग्रा में लोवलीना बोरगोहेन और 75 किग्रा में पूजा रानी भी उम्मीद करेंगी कि वे मेडल जीतने का सपना पूरा करें.

ओलंपिक में मेडल जीतना सिर्फ मेहनत, लगन और भूख से नहीं होता है. नाज़ुक लम्हे में भाग्य का भी साथ होना, उतना ही जरूरी होता है. कई बार रेफरी के गलत फैसलों के चलते भारतीय बॉक्सर को अतीत में मेडल से हाथ धोना पड़ा है, लेकिन उनकी शिकायत को सुनने वाला या फिर उनके लिए लड़ने वाला कोई नहीं होता था.


अखिल कुमार मानते हैं कि अब भारतीय बॉक्सिंग में काफी कुछ बदल गया है. रिंग के बाहर भी काफी कुछ बदल गया है. जिस तरह से बीसीसीआई के मज़बूत होने से भारतीय क्रिकेट टीम पर फर्क पड़ा है, ठीक उसी अंदाज में हमारे फेडरेशन के मजबूत होने से, उनकी भागीदारी और सक्रियता से मुक्केबाज़ों को काफी मदद मिली है.

खेल मंत्रालय ने भी अपनी भूमिका तरीके से निभाई है, तभी तो आज ओलंपिक में जाने से पहले प्रधानमंत्री खिलाड़ियों से मिलते हैं. उन्हें शुभकामनाएं देते हैं. वर्ना पहले जब-तक मेडल नहीं जीतते थे, तब-तक चाय पर मुलाकात या फिर फोटो खिंचाने का मौका खिलाड़ियों को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के साथ भला कहां मिलता था?

महिला मुक्कबाज़ों में अखिल को सिमरनजीत कौर से ठीक वैसी ही उम्मीदें हैं, जैसे कि वो विकास कृष्णन से कर रहे हैं. मैरीकॉम के बारे में अखिल सिर्फ एक बात कहते हैं कि उनकी सोच बिलकुल बिंद्रा जैसी ही है. आज मैरीकॉम के पास मेडल भी हैं, नाम भी, पैसे भी लेकिन अपने मेडल का रंग बेहतर करने की ललक ने उन्हें 6 बार वर्ल्ड चैंपियन बनाया है.

अगर वाकई में उम्मीद और अपनी साख को मुक्केबाज नतीजों में तब्दील करने में कामयाब होते हैं, तो टोक्यो ओलंपिक भारतीय मुक्केबाजों के लिए सबसे यादगार अध्याय साबित हो सकता है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विमल कुमार

विमल कुमार

न्यूज़18 इंडिया के पूर्व स्पोर्ट्स एडिटर विमल कुमार करीब 2 दशक से खेल पत्रकारिता में हैं. Social media(Twitter,Facebook,Instagram) पर @Vimalwa के तौर पर सक्रिय रहने वाले विमल 4 क्रिकेट वर्ल्ड कप और रियो ओलंपिक्स भी कवर कर चुके हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: July 21, 2021, 2:38 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर