Olympics: हमारी हॉकी टीम को भारतीय क्रिकेट नहीं, बल्कि वेस्टइंडीज से प्रेरणा लेने की जरूरत!

Tokyo Olympics: भारतीय हॉकी (Indian Hockey) ने ओलंपिक में रिकॉर्ड 8 गोल्ड मेडल हासिल किए जो बेनज़ीर है तो वेस्टइंडीज की क्रिकेट टीम ने लगातार 3 वर्ल्ड कप के फाइनल में जगह बनाई और 2 बार चैंपियन बनी. दोनों टीमों में एक वक्त के बाद गिरावट आई. वेस्टइंडीज ने दो दशक बाद अपना रिकॉर्ड सुधार लिया. भारतीय हॉकी टीम को अब भी बड़े खिताब का इंतजार बाकी है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 28, 2021, 3:19 PM IST
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Olympics: हमारी हॉकी टीम को भारतीय क्रिकेट नहीं, बल्कि वेस्टइंडीज से प्रेरणा लेने की जरूरत!
Tokyo Olympics 2020: भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने ओलंपिक में अपने 3 में से 2 मैच जीत लिए हैं. (AP)
पता नहीं क्यों भारतीय हॉकी (Indian Hockey) के स्वर्णिम दिनों को याद करते हुए हर बार ओलंपिक (Olympics) से पहले टीम इंडिया से बड़ी-बड़ी उम्मीदें पाल ली जाती हैं? ऐसे में अक्सर वेस्टइंडीज़ (West Indies) का ख्याल आ जाता है. अगर भारतीय हॉकी ने रिकॉर्ड 8 गोल्ड मेडल खेलों के महाकुंभ में हासिल किए जो बेनज़ीर है तो वेस्टइंडीज़ की क्रिकेट टीम ने लगातार 3 वर्ल्ड कप के फाइनल में जगह बनाई और 2 बार चैंपियन बनी. इतना ही नहीं टेस्ट क्रिकेट में 29 टेस्ट सीरीज़ तक अपराजित रहने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी उन्हीं के नाम हैं. लगातार 27 टेस्ट के दौरान बिना हार का मुंह देखने का. लेकिन, एक बार कैरेबियाई टीम 1996-97 में ऑस्ट्रेलियाई से टेस्ट सीरीज़ हारी कि अब तक संभल नहीं पाई. भारतीय हॉकी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

‘देखिये, ये खेल की एक स्वभाविक प्रकिया है. कोई भी टीम चाहे कितनी भी बेहतरीन क्यों ना हो वो हमेशा के लिए शानदार नहीं बनी रह सकती है. ऐसा नहीं है कि जब भारत एक के बाद एक गोल्ड मेडल जीत रहा था तो जर्मनी, हॉलैंड या यूरोपीय देश एकदम फिसड्डी थे. हां, हमारी टीम बेहतर थी.’ ये कहना है 1980 में आखिरी बार गोल्ड मेडल जीतने वाली टीम के सदस्य रहे पूर्व खिलाड़ी ज़फर इकबाल का.

अगर वेस्टइंडीज़ की टीम की हर पीढ़ी को पिछले तीन दशक से हर बार अस्सी के दशक वाली टीम की तुलना से गुज़रना पड़ता है तो पिछले 40 साल से भी ज़्यादा वक्त से हर हॉकी टीम को अतीत की असाधारण कामयाब टीमों की उपलब्धियों के आगे खड़ा करके उन्हें बौना साबित किए जाने की अनचाही कोशिशें अनजाने में जारी दिखती हैं. ‘देखिये, अतीत की महान गाथा को आप मिटा तो नहीं सकते हैं ना? ये तो फख्र करने वाली बात है.’ ये कहना है एक और ओलंपियन और पूर्व खिलाड़ी अशोक कुमार का.

दिग्गजों ने बताया क्यों हॉकी का ऐसा हाल-बेहाल
बहरहाल, जफर इकबाल और अशोक दोनों इस बात पर ज़ोर देते हैं कि भारत में अब इतनी संख्या में युवा हॉकी खेलते नहीं हैं कि आपको विश्वस्तरीय खिलाड़ी नियमित तौर पर भरपूर मात्रा में मिलें. भारत में यूरोपीय मुल्कों की तरह क्लब कल्चर का अभाव है तो अब सिर्फ चुनिंदा एकेडमी से ही हॉकी के खिलाड़ी भारत के लिए खेलते हैं. दोनों दिग्गज ये भी मानते है कि हॉकी में अब कौशल की बजाए फिटनेस और ताकत की तूती ज़्यादा बोलती है. ज़फर तो यहां तक कहते हैं कि मौजूदा समय में भारतीय महिला टीम पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा फिट नज़र आती है. भारतीय हॉकी में गिरावट के लिए अशोक अगर हॉकी प्रशासकों को दोष देते है जिन्होंने बीसीसीआई की तरह अपने महान खिलाड़ियों को ना तो आर्थिक सुरक्षा दी और ना ही कोचिंग में शामिल किया तो जफर इसके लिए भारतीय सोच को दोष देते हैं. ‘हमारे देश में किसी से भी पूछ लीजिए वो राजनीति के मुद्दे पर आपको ढेर सारा ज्ञान दे देगा. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वो कितना पढ़ा लिखा है क्योंकि हर वक्त वो मीडिया में समाज में सिर्फ और सिर्फ राजनीति के बारे में ही सुनता है. अगर ऐसा खेलों के प्रति लोगों की रुचि हो जाए तो भारत की किस्मत भी मेडल जीतने के मामले में ठीक उसी अंदाज़ में बदल जाएगी.’ ये ज़फर इकबाल कहते हैं.

एक और बात जिस पर ये दोनों दिग्गज एक राय रखते हैं और वो ये कि भारतीय युवा बुरे खिलाड़ी नहीं है. लेकिन ओलंपिक खेलों का नाम सुनते ही ये खिलाड़ी अलग तरह का दबाव महसूस करते है और ऑस्ट्रेलिया जैसी टीम के सामने आप बिखर जाते हैं. लेकिन, न्यूज़ीलैंड और स्पेन के ख़िलाफ़ जीत ने दिखाया कि इस टीम को औसत करके भी नहीं आंका जा सकता है.वेस्टइंडीज ने सीखा सबक, भारतीय हॉकी में भी कुछ ऐसा होगा?

खैर, एक बार फिर कैरेबियाई टीम के गौरवशाली दिनों की मौजूदा समय से तुलना करके देखते हैं. वेस्टइंडीज़ की टीम ने पिछले कुछ दशक में एक नई उम्मीद जगाई है. टेस्ट क्रिकेट और वनडे में भले ही वो जूझती दिखी हो लेकिन क्रिकेट के सबसे लोकप्रिय और तेज़तर्रार फॉर्मट में ये टीम सबसे ज़्यादा दो मौकों पर चैंपियन बनी है और हर बार वर्ल्ड कप के दौरान एक प्रबल दावेदार के तौर पर उभरती है. ऐसे में कई बार ये आभास होने लगता है कि वेस्टइंडीज़ की क्रिकेट पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई है.

लेकिन, अफसोस की बात है कि भारतीय हॉकी में ऐसी किसी नई किरण की झलक भी देखने को नहीं मिली है. 1975 में वर्ल्ड कप जीतने के बाद ये टीम कभी भी चैंपियन नहीं बनी तो मेडल तो दूर की बात पिछले चार दशक में ओलंपिक के सेमी-फाइनल में भी भारत नहीं पहुंचा है. ‘आखिरी बार 1984 में हम 5वें पायदान पर थे उसके बाद से तो बस उतार ही देखने को मिला है. पिछले 40 साल में 6ठे नंबर से लेकर हम 12वें पायदान पर भी आकर सिमटे हैं जैसा कि 2012 लंदन खेलों के दौरान हुआ था. लेकिन, इसका मतलब ये नहीं है कि मैंने मौजूदा टीम से उम्मीदें छोड़ दी है. एक बात तो आप मान लें कि अगले 50 तो क्या 100 सालों में कोई भी टीम 8 गोल्ड मेडल हॉकी में नहीं जीत सकती है तो ऐसे में अपनी टीम को हम इस तरह की उम्मीदों के दबाव से क्यों परेशान करें.’ ये कहना है ज़फर इकबाल का.

अगले एक हफ्ते में लगभग ये तस्वीर साफ हो जाएगी कि गोल्ड भले ही ना सही कम से कम हॉकी में एक मेडल जीतने का सूखा कम से कम खत्म हो. और अगर ऐसा होता है तो ये भारतीय हॉकी के लिए इससे बेहतर बात और क्या हो सकती है?
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विमल कुमार

विमल कुमार

न्यूज़18 इंडिया के पूर्व स्पोर्ट्स एडिटर विमल कुमार करीब 2 दशक से खेल पत्रकारिता में हैं. Social media(Twitter,Facebook,Instagram) पर @Vimalwa के तौर पर सक्रिय रहने वाले विमल 4 क्रिकेट वर्ल्ड कप और रियो ओलंपिक्स भी कवर कर चुके हैं.

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First published: July 28, 2021, 9:41 AM IST
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