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राहुल द्रविड़ को पूरा सम्मान संन्यास के बाद मिला, शायद चेतेश्वर पुजारा भी उसी राह पर हैं!

सिडनी टेस्ट में बेहतरीन खेल दिखाने वाले चेतेश्वर पुजारा (Cheteshwar Pujara) की शैली की आलोचना हो रही है. तब भी जब दूसरे छोर पर कोई भी साथी टिक कर खेलने को तैयार नहीं था?पुजारा तो पुजारा हैं. ठीक अपने आदर्श राहुल द्रविड़ (Rahul Dravid) की तरह. आलोचनाओं से विचलित नहीं होते हैं. वही काम करते हैं जो टीम हित में सर्वोपरि होता है. 

Source: News18Hindi Last updated on: January 11, 2021, 7:42 PM IST
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राहुल द्रविड़ को पूरा सम्मान संन्यास के बाद मिला, शायद चेतेश्वर पुजारा भी उसी राह पर हैं!
चेतेश्वर पुजारा का आकलन करते समय फैंस ही नहीं जानकार भी अक्सर दूसरा चश्मा पहन लेते हैं.
आखिरकार जब टीम इंडिया (Team India) ने साहसिक तरीके से बेहद विषम हालात में सिडनी टेस्ट मैच (Sydney Test) को ड्रॉ कराने में कामयाबी हासिल कर ली तो हर किसी ने हनुमा विहारी के ज़ज्बे और रविचंद्रन अश्विन की दिलेरी और सूझ-बूझ की तारीफ की. प्रशंसा तो युवा ऋषभ पंत की भी हुई जिन्होंने एक चमत्कारिक जीत की उम्मीद जगा दी थी. लेकिन इन सभी हीरो के बीच तीसरे नंबर में बल्लेबाज़ी करने आए मौजूदा टीम की दीवार चेतेश्वर पुजारा (Cheteshwar Pujara) के योगदान को शायद ना तो सोशल मीडिया सम्मान दे सकता है और ना ही टी20 पीढ़ी वाले क्रिकेटर और इसके फैंस. हैरानी की बात तो तब होती है जब इस जमात में शेन वार्न और रिकी पोटिंग जैसे दिग्गज भी पुजारा की शैली को लेकर बेहद आलोचनामत्क रुख़ अपना लेते हैं.

पुजारा तो पुजारा हैं. ठीक अपने आदर्श राहुल द्रविड़ (Rahul Dravid) की तरह. आलोचनाओं से विचलित नहीं होते हैं. वही काम करते हैं जो टीम हित में सर्वोपरि होता है. आखिरी, सिडनी टेस्ट की पहली पारी में सबसे ज़्यादा रन (साझे तौर पर) बनाने वाले और सबसे ज़्यादा गेंद खेलने वाले पुजारा की शैली की आलोचना क्यों हो रही थी, जब दूसरे छोर पर कोई भी साथी टिक कर खेलने को तैयार नहीं था? अब पंत 2 घंटे के दौरान धुआंधार पारी खेलकर एक अंसभव से दिखने वाले रन चेज़ को जीत में तब्दील करने का माद्दा तो रखते हैं लेकिन हर मौके पर विरोधी आक्रमण को कुंद करने का भरोसा तो पुजारा जैसा खिलाड़ी ही दे सकता है. मैच के चौथे दिन आखिरी सत्र में सबसे तनाव वाले लम्हे में पुजारा ही दृढ़ दिखे और यही दृढ़ता उन्होंने पाचंवे दिन लंच के बाद वाले सत्र में भी बरकरार रखी. पुजारा ने वो हौसला दिया कि अगर जब तक मैं क्रीज़ पर हूं, जीतने वाले रन भले ही दूर रह जाएं लेकिन टीम को हारने नहीं दूंगा.

द्रविड़ के ही नक्शे-कदम पर तो चल रहे हैं पुजारा
राहुल द्रविड़ भी तो नई सदी में टीम इंडिया के लिए यही काम किया करते थे. लेकिन, द्रविड़ से पहले वीरेंद्र सहवाग जैसा धुरंधर बल्लेबाज़ी करने आता तो उनके बाद सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण और फिर एम एस धोनी. पुजारा निश्चित तौर पर द्रविड़ की टीम से तुलनात्मक तौर पर कमज़ोर बल्लेबाज़ी यूनिट के साथ मैदान पर उतरते हैं. इसके बावजूद अगर 6000 टेस्ट रन बनाने के मामले में गांगुली और लक्ष्मण जैसे दिग्गजों से आगे हैं तो उनके कौशल को कोहली की महानता की तरह एक ख़ास तरीके से सम्मान क्यों नहीं मिलता है?
6 हज़ार की रेस में छठे सबसे तेज़, फिर भी कछुआ?
टेस्ट क्रिकेट में 6000 रन पूरे करने वाले वो सिर्फ 11वें भारतीय हैं और अपना 80वां मैच खेलते हुए पुजारा ने सबसे तेज 6000 टेस्ट रन बनाने वाले छठे भारतीय बल्लेबाज भी बने हैं. पुजारा ने 134वीं पारी में 6000 टेस्ट रन पूरे किए हैं. उनसे आगे इस सूची में तो सिर्फ क्रिकेट इतिहास के महान नहीं, बल्कि महानतमों में से एक जैसे सुनील गावस्कर (117 पारी), विराट कोहली (119 पारी), सचिन (120 पारी), सहवाग (123 पारी) तो वहीं द्रविड़ ने यह कारनामा 125 पारियों में किया था. लेकिन, पुजारा को क्रिकेट उनकी तेज़ी के लिए नहीं बल्कि उनके संयम के लिए पहचानता है. ठीक द्रविड की ही तरह. सिडनी टेस्ट की पहली पारी में पुजारा ने पहले 100 गेंद पर सिर्फ 16 रन बनाए तो टी20 पीढ़ी वाले फैंस विचलित होने लगे. लेकिन, इसके बाद 40 का निजी स्कोर पहुचने तक पुजारा ने सिर्फ 133 गेंद खेली और उनका. अर्धशतक 174 गेंदों पर पूरा हुआ. निश्चित तौर पर पुजारा का अपना एक ख़ास तरीका है और उसमें उनका एक अटूट विश्वास है जो अक्सर कामयाब होता है. अगर सहवाग और पंत को इस बात की छूट मिल सकती है कि वो अपनी मर्जी से हर गेंद पर प्रहार करते हुए टेस्ट क्रिकेट खेल सकते हैं और अगर 10 में से 4 बार कामयाब हुए तो टीम का फायदा तो यही बात पुजारा के साथ लागू क्यों नहीं होती है? ऑस्ट्रेलिया में अगर पिछली बार भारत ने 70 साल के सूखे को तोड़ते हुए पहली टेस्ट सीरीज़ में जीत हासिल की तो गेंदबाज़ों के अहम योगदान के अलावा 30 से ज़्यादा घंटों तक क्रीज़ पर टिके रहने वाले पुजारा का योगदान भी उतना ही अहम था.

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11 जनवरी को द्रविड़ का जन्मदिन देश में मनाया जाता है (तेंदुलकर के जन्मदिन की तरह सोशल मीडिया पर हलचल और ट्रेंडिग न्यूज़ नहीं होती) औऱ पुजारा अपने द्रोणाचार्य को इससे बेहतर तोहफा और क्या दे सकते थे? टेस्ट क्रिकेट में 52 से ज़्यादा का औसत रखने वाले द्रविड़ का स्ट्राइक रेट करीब 42.5 का रहा. वहीं पुजारा का औसत 47 से ज़्यादा और स्ट्राइक रेट 45.50 से बेहतर है. तो पुजारा फिर सुस्त क्यों करार दिए जाते हैं? ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और साउथ अफ्रीका जैसे मुश्किल देशों में द्रविड़ और पुजारा का स्ट्राइक रेट लगभग एक जैसा ही है जो ये दिखाता है कि दोनों खिलाड़ियों ने अपने अपने अंदाज़ में अपनी अपनी टीमों के स्टोक-प्लेयर को जलवा बिखरने का मौका देना में अपना भरपूर योगदान दिया है.

ये ठीक है कि पुजारा का गेम परफेक्ट नहीं है. वो तो कोहली का भी नहीं है, रहाणे का नहीं. पुजारा ना तो विकेट के बीच चीते की फुर्ती से दौड़ते है और ना ही उनके पास कोहली या रहाणे की तरह आपको हतप्रभ करने वाले आक्रामक शॉट्स हैं. लेकिन करीब 47 की औसत से टेस्ट क्रिकेट में 6000 रन बनाने वाले वो क्रिकेट इतिहास के चुनिंदा 38 खिलाड़ियों में शुमार है. द्रविड़ इसलिए महान बने क्योंकि जब वो दोहरा शतक बनाते थे उन्हें कोई बोरिंग या समय की बर्बादी नहीं बताता था.


धारणाओं का क्या है अगर आपने मन में बैठा लीं तो बैठा ली. फैंस तो फैंस अगर क्रिकेट के जानकार और पूर्व खिलाड़ी जैसा कि मार्क वॉ ने कामेंट्री के दौरान कहा कि हर किसी को ग़लतफ़हमी हो सकती है. सिडनी की पहली पारी में जब पुजारा इत्मीनान से बल्लेबाज़ी कर रहें थे, वॉ ने दलील दी कि पुजारा को स्पिनर के ख़िलाफ तो कम से कम आक्रामक रवैया अपनाना चाहिए. अब वॉ को जाकर ये कौन समझाता कि भाई साहब टेस्ट मैचों में स्पिनर के ख़िलाफ़ पुजारा का औसत और स्ट्राइक रेट 53 का है. और जिस पारी का ज़िक्र वॉ कर रहे थे उसमें दुनिया के नंबर 1 स्पिनर नाथन लॉयन के ख़िलाफ पुजारा ने 36 गेंदों पर 30 रन बनाए थे!

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पुजारा का आकलन अक्सर दूसरा चश्मा पहनकर?
कहने का मतलब ये है कि पुजारा का आकलन करते समय फैंस ही नहीं जानकार भी अक्सर दूसरा चश्मा पहन लेते हैं. ज़्यादातर मौके पर इस चश्मे से वो टी20 की रफ्तार को ही देखते हैं. सिडनी की पहली पारी में पुजारा ने भले ही अपने करियर का सबसे धीमा अर्धशतक बनाया हो लेकिन आपको ध्यान होगा कि ऑस्ट्रेलिया के पिछले दौरे पर उनका सीरीज़ में कुल स्कोर 521 रन था. सिडनी की दूसरी पारी में भी पुजारा ने एक बेहतरीन अर्धशतक बनाया. बस, ये प्रयास बाकी खिलाड़ियों के ही उतने अच्छे खेल के चलते थोड़ा छिप सा गया. ठीक वैसे ही जैसा द्रविड़ के करियर में अक्सर होता था जब किसी सहवाग या तेंदुलकर या फिर लक्ष्मण और यहां तक की गांगुली की आभा के आगे उनकी चमक कुछ समय के लिए उतनी तगड़ी नहीं दिखती थी लेकिन जब द्रविड़ का करियर ख़त्म हुआ तो लोगों ने माना कि टेस्ट में वो तेंदुलकर से किसी भी तरह से उन्नीस नहीं थे. पुजारा ने अब तक रोहित शर्मा जैसे बेहद प्रतिभाशाली से खुद को बेहतर टेस्ट बल्लेबाज़ साबित किया है और जब अपना करियर वो ख़त्म करें तो शायद उनकी गिनती भी अपने हीरो द्रविड़ की तरह भारत के महानतम टेस्ट बल्लेबाज़ों में हो? (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.) 
ब्लॉगर के बारे में
विमल कुमार

विमल कुमार

न्यूज़18 इंडिया के पूर्व स्पोर्ट्स एडिटर विमल कुमार करीब 2 दशक से खेल पत्रकारिता में हैं. Social media(Twitter,Facebook,Instagram) पर @Vimalwa के तौर पर सक्रिय रहने वाले विमल 4 क्रिकेट वर्ल्ड कप और रियो ओलंपिक्स भी कवर कर चुके हैं.

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First published: January 11, 2021, 7:42 PM IST
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