Tokyo Paralympics: सोशल मीडिया के चलते कैसे पैरा-एथलीटों को मिलने लगा वो सम्मान जिसके थे वो हकदार

टोक्यो पैरालंपिक (Tokyo Paralympics) में भारत ने अबतक 10 मेडल जीत लिये हैं जो भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. पैरा-एथलीटों को अब वो प्यार और सम्मान मिलने लगा है जिसके वो हकदार थे.

Source: News18Hindi Last updated on: August 31, 2021, 7:46 PM IST
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Tokyo Paralympics: सोशल मीडिया के चलते कैसे पैरा-एथलीटों को मिलने लगा वो सम्मान जिसके थे वो हकदार
पैरा-एथलीटों को मिलने लग वो सम्मान जिसके वो हकदार थे. (Twitter/NarendraModi)

ऐसा नहीं है कि इससे पहले पैरा-एथलीट ने ओलंपिक खेलों में अपना जलवा नहीं बिखेरा हो. सच तो ये है कि देवेंद्र झाझरिया ने तो 2004 के एथेंस खेलों के दौरान ही भारत की तरफ से जैवलीन थ्रो में पहला गोल्ड जीता था जब नीरज चोपड़ा ने इस खेल के बारे में सुना भी नहीं था! लेकिन, झाझरिया तब तक सुर्खियों में नहीं आये जब 12 साल बाद उन्होंने रियो ओलंपिक के दौरान दोबारा इस प्रतिस्पर्धा में गोल्ड जीता. इस बार यानि कि जापान में वो अपना तीसरा गोल्ड जीतने से चूके और सिल्वर हासिल किया और अब कोई उन्हें भारतीय खेल इतिहास के सबसे कामयाब एथलीटों में से एक में गिन रहा है. सुशील कुमार के अलावा किसी और एथलीट ने ओलंपिक में निजी तौर पर 2 मेडल नहीं जीते थे जबकि झाझरिया ने 3 जीते हैं. ये सच है कि ओलंपिक और पैरा-ओलंपिक की सीधे तुलना नहीं हो सकती है और कई मायनों में वो जुदा है और इस लेख का इरादा उस बहस में पड़ने का भी नहीं है. लेकिन, जो एक सबसे अच्छी बात उभरकर आयी है वो ये कि अब आम खेल प्रेमी और देश की जनता ने भी पैरा-एथलीटों को वो सम्मान और तारीफ देनी शुरु कर दी है जिसके वो लंबे समय से हकदार थे.


आखिर नज़रिया अचानक बदला कैसे?

दरअसल, प्रिंट मिडिया के बड़े अख़बारों और अंग्रेज़ी के टॉप अख़बारों के अपवाद को छोड़ दिया जाए तो ऐतिहासिक तौर पर पैरा-ओलंपिक खेलों की कवरेज के साथ सौतेले से भी बुरा रवैया अपनाया गया है. यूं तो इस मुल्क में पहले से ही क्रिकेट को राजा और बाकि खेलों को प्रजा का खेल के तौर पर देखा जाता था लेकिन नई सदी में ख़ासकर 2004 एथेंस मुकाबलों से दूसरे खेलों की अहमियत और उनकी चर्चा आम जनमानस में बढ़ने लगी. लेकिन, पैरालंपिक्स को तो अब भी कोई पूछने वाला नहीं था. मैं खुद रियो ओलंपिक की कवरेज के लिए दो हफ्ते के लिए रियो में अपने न्यूज़ चैनल के लिए था लेकिन दो हफ्ते के बाद वापस लौट आया क्योंकि पैरा-ओंलपिक्स के बारें में ना तो किसी भी चैनल को सुध थी और ना ही रिपोर्टर को. लेकिन, जैसे ही दीपा मलिक ने मेडल जीता हर किसी को उनके मेडल से ज़्यादा उनके संघर्ष की कहनी ने प्रभावित किया. देवेंद्र झाझरिया ने दोबारा गोल्ड जीता और मरियप्पन ने भी गोल्ड जीता तो पहली बार नई पीढ़ी को शायद ये एहसास हुआ कि वाकी में पैरा-एथलीट भी किसी से कम नहीं है.


चेतना जगाने में सोशल मीडिया का रोल अहम

पारंपारिक मीडिया तो पहले भी था और इसकी कवरेज करता था लेकिन टीवी मीडिया जिसका हिस्सा ये लेखक भी दो दशक से ऊपर के समय रहें हैं, ने हमेशा ही इन खेलों को नज़रअंदाज़ किया. ऐसे में 2016 रियो खेलों के दौरान सोशल मीडिया के ज़रिये आक्रामक कवरेज ने लोगों को ध्यान इन खेलों की तरफ खींचा. आज जैसे ही कोई एथलीट एक मेडल जीतता है उसकी पूरानी तस्वीरें और संघर्ष की कहानी सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल हो जाती हैं. जिन खिलाड़ियों को कल तक कोई जानता नहीं था , उसे बधाई देने वालों में सबसे पहले मोदी जी आ जाते हैं. ऐसे में हर किसी को एहसास होता है कि पैरा-एथलीट किसी दूसरे ग्रह के प्राणी नहीं बल्कि हमारे अपने ही हैं. ये सुख बदलाव भारतीय खेलों के अध्याय में एक शानदार बात है.


पैरा-एथलीट को लेकर सामाजिक सोच में भी आया बदलाव

पिछले एक दशक में चाहे नेत्रहीन क्रिकेट वर्ल्ड कप रहा हो या फिर दूसरे ऐसे खेल जहां पर शारिरिक और मानसिक तौर पर उन खेलों में सामान्य तौर पर हिस्सा नहीं लेने के चलते दूसरे फॉर्मेट का ईजाद हुआ, उसके चलते भी लोगों की बुनियादी सोच में फर्क आया. आम-लोगों को लगने लगा कि खेल का मतलब सिर्फ सचिन तेंदुलकर, विश्वनाथन आनंद और अभिनव बिंद्रा ही नहीं बल्कि झाझरिया और मलिक भी हैं.


नेता और सेलेब्रेटी का योगदान





सोशल मीडिया के दौर में हर किसी को अपने फॉलोवर्स बढ़ाने की चिंता है. ऐसे में किसी एथलीट की कामयाबी पर तारीफ करने वाले पोस्ट डालने से क्रिकेट स्टार, नेताओं और दूसरे सेलेब्रेटिज़ को भी निजी फायदे होतें हैं। अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें ट्रोल का भी सामना करना पड़ता है. एक तरह से देखा जाय अंजाने में ही इस इकको-सिस्टम ने पैरा-एथलीटों का भला कर दिया. जब खिलाड़ियों की कामयाबी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी निजी तौर पर रुचि लेते हैं तो ऐसे में कॉर्पर्टे के बड़े घराने कैसे पीछे रह सकते हैं? इस तरह के बदलाव से पैरा-एथलीटों को स्पांसर भी मिल रहें है और उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो रही है. आज दीपा मलिक कॉर्पेट इवेंट में मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर धूम मचा रही है. टोक्यो ओलंपिक के बाद मलिक की ही तरह कई और एथलीट इस कैटेगरी में शामिल हो जायेंगे. ये खेलों के बेहतर भविष्य के अच्छा ही कदम माना जायेगा.


इतिहास बदलते देख रहें हैं हम सभी

पहले पैरा-ओलंपिक केलों का आयोजन 1960 में रोम खेलों के दौरान हुआ था जिसमें 23 देशों से सिर्फ 400 एथलीटों ने हिस्सा लिया था. लेकिन, इन खेलों की असली बुनियाद Stoke Mandeville Games, से हुई थी जिस टूर्नामेंट का आयोजन पहली बार 1948 में हुआ था जिसमें दिव्तीय विश्वयुद् के सेना में शामिल 16 पुरुष और महिला एथलीटों ने शिरकत की थी. भारत के लिए 1972 में मुरलीकांत पेटकार ने तैराकी में पहली बार पदक जीतकर हलचल मचायी लेकिन सबसे बड़े हीरो रहे जोगिंदर सिंह बेदी जिन्होंने 1984 खेलों के दौरान एक सिल्वर और दो ब्रांज़ जीते थे. इस रिकॉर्ड को झाजरिया ने अब बराबर कर लिया है. बेदी सर को शायद नई पीढ़ी याद नहीं करती हो लेकिन झाझरिया भाग्यशाली हैं कि वो इस दौर में खेल रहें हैं जहां उनकी कामयाबी के लिए नीरज चोपड़ा भी तालियां बजा रहें है और भरपूर सम्मान दे रहें हैं. अगर अब भी पैरा-एथलीटों को बराबरी का सम्मान नहीं मिलेगा तो कभी भी नहीं.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विमल कुमार

विमल कुमार

न्यूज़18 इंडिया के पूर्व स्पोर्ट्स एडिटर विमल कुमार करीब 2 दशक से खेल पत्रकारिता में हैं. Social media(Twitter,Facebook,Instagram) पर @Vimalwa के तौर पर सक्रिय रहने वाले विमल 4 क्रिकेट वर्ल्ड कप और रियो ओलंपिक्स भी कवर कर चुके हैं.

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First published: August 31, 2021, 7:34 PM IST
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