आखिर विराट कोहली क्यों बनना चाहते हैं T20 में ओपनर?

जब भारत के लिए कोहली और रोहित के ओपनर बनने की चर्चा सामने आयी तो हर किसी ने करीब 15 साल पहले बेहद कामयाब फॉर्मूले सचिन तेंदुलकर और सौरव गांगुली की जोड़ी का वन-डे क्रिकेट में सफल अभियान का उदाहरण देने में एक पल भी नहीं गंवाया.

Source: News18Hindi Last updated on: March 31, 2021, 8:53 AM IST
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आखिर विराट कोहली क्यों बनना चाहते हैं T20 में ओपनर?
विराट कोहली ने खराब शेड्यूलिंग की आलोचना की थी (PIC: AP)
बल्लेबाज़ी करते हुए शानदार टाइमिंग विराट कोहली की एक बड़ी ताकत है. शानदार टाइमिंग के चलते ही वो अपनी मनमर्जी वाले शॉट इत्मिनान से खेलतें हैं. इंग्लैंड के ख़िलाफ़ टी20 सीरीज़ में जैसे ही कोहली सबसे ज़्यादा रन बन बनाने वाले बल्लेबाज़ बनें ((231 रन व भी स्ट्राइक रेट 147.13 की), उन्होंने एक भी पल नहीं गंवाया ये कहते हुए कि भविष्य के लिए टी20 को लेकर उनकी निजी योजना क्या है. कोहली की दलील थी रोहित शर्मा के साथ वो टी20 वर्ल्ड कप में दूसरे ओपनर की भूमिका निभाना चाहते हैं क्योंकि अगर दोनों बल्लेबाज़ सेट हों तो किसी भी आक्रमण को बखियां उधेड़ सकते हैं. अब कोहली तो कप्तान हैं और अगर उन्होंने ये ठान लिया तो उन्हें मना तो कोई करेगा नहीं. कम से कम कोच रवि शास्त्री तो नहीं ही ये तकल्लुफ उठायेंगे. साथ ही कोहली ने ये भी कह दिया कि इस सीज़न वो अपनी आईपीएल टीम रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के लिए भी ओपनर बनेंगे. कोहली पहले भी बीच-बीच में इस भूमिका में नज़र आ चुके हैं लेकिन अब उन्होंने इस रोल को पूरी तरह से अपनाने की घोषणा कर दी है.

कोहली के ओपनर बनने से किसको होगा फायदा?
लेकिन, अहम सवाल वहीं का वहीं बना हुआ है? क्या कोहली के ओपनर बनने से बैंगलोर को कोई फायदा होगा? बैंगलोर की सबसे बड़ी ताकत कोहली और एबी डिविलियर्स का मिडिल ओवर्स में मौजूद रहना रहा है. कोहली ने तो एक सीज़न में सबसे ज़्यादा करीब 1000 रन बनाने का भी रिकॉर्ड बनाया बावजूद इसके उनकी टीम चैंपियन नहीं बन पायी क्योंकि बल्लेबाज़ी से ज़्यादा उनकी टीम में समस्या रणनीति और कप्तानी की रही है.

ख़ैर, जब भारत के लिए कोहली और रोहित के ओपनर बनने की चर्चा सामने आयी तो हर किसी ने करीब 15 साल पहले बेहद कामयाब फॉर्मूले सचिन तेंदुलकर और सौरव गांगुली की जोड़ी का वन-डे क्रिकेट में सफल अभियान का उदाहरण देने में एक पल भी नहीं गंवाया. जब सुनील गावस्कर जैसे दिग्गज भी इसको शानदार प्लान बताने लगे तो भला दूसरों के लिए अलग तर्क देने का कितना मौका रह जाता है.
लेकिन, अच्छे से अच्छे जानकार अब भी यही सोचते हैं कि टी20 फॉर्मेट वन-डे क्रिकेट का छोटा प्रारूप है लेकिन हकीकत इससे बिलकुल जुदा है. ये तो ठीक 1970-80 के दशक वाली उस थ्योरी की तरह है जहां वन-डे क्रिकेट को टेस्ट क्रिकेट का छोटा रूप मान लिया गया था. वन-डे क्रिकेट में एक ओपनर पहली 20-25 गेंदें खुद को जमने के लिए आराम से दे सकता क्योंकि वो पारी (300 गेंद) का 10 फीसदी हिस्सा भी नहीं होती है. लेकिन, टी20 में तो हर गेंद से मैच का रुख़ पलट जाता है और 12 गेंदें तो पारी का 10 फीसदी हिस्सा होती हैं. ऐसे में किसी बल्लेबाज़ को 20-25 तो क्या 10-12 गेंद भी जमने के लिए टीमें नहीं दे सकती है. ऐसा क्रिस गेल जैसे खिलाड़ी के संदर्भ में अपवाद है क्योंकि वो बाद में छक्कों की बरसात करते हुए शुरुआती धीमी चाल का टीम पर असर नहीं पड़ने देते हैं.

कोहली को रोहित की भी सुननी चाहिए
टीम के उप-कप्तान रोहित शर्मा ने उसी दौरान एक दिलचस्प बयान दिया. रोहित का कहना था कि अभी टी20 वर्ल्ड कप में काफी वक्त है और अभी से ओपनर के बारे में एक ठोस राय नहीं बनायी जा सकती है. उनका मानना था कि आखिरी टी20 मैच में के एल राहुल की बजाए कोहली का ओपन करना एक मैच के लिए रणनीति में बदलाव के तौर पर ही देखा जाना चाहिए. रोहित के इस बयान से साफ है कि सबसे ज़्यादा 5 मौके पर कप्तान के तौर पर आईपीएल ट्रॉफी जीतना इत्तेफाक नहीं है. शायद रोहित ये कहना चाहते हों कि राहुल को वक्त दिया जाना चाहिए.
विराट कोहली ने इंग्लैंड के खिलाफ टी20 सीरीज में रोहित शर्मा के साथ की ओपनिंग (PIC: AP)


राहुल के साथ नाइंसाफी?
ये सच है कि पिछले 5 टी20 मैचों में राहुल ने सिर्फ एक मौके पर दहाई (14) का आंकड़ा पार किया लेकिन ये उचित है कि इतने शानदार खिलाड़ी को वर्ल्ड कप के 6 महीने पहले ये कह दिया जाए को वो अब ओपनर के लायक नहीं है? राहुल ने वन-डे सीरीज़ के दौरान मिडिल ऑर्डर में ही सही एक धुआंधार शतक लगाकर ये दिखाया कि आखिर क्यों उन्हें हर फॉर्मेट का शानदार खिलाड़ी माना जाता है. वैसे भी, अगर गहराई से राहुल के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो आपको भी ये लगेगा कि उनके साथ कोहली ज़्यादती कर रहे हैं. 11 दिसंबर 2019 से लेकर 6 दिसंबर 2020 तक राहुल ने 91, 45,54, 56, 57*, 27, 39, 45, 51, 30 जैसी पारियां खेलीं जिसका मतलब है करीब 500 रन वो भी करीब 55 की औसत और 145 से ज़्यादा के स्ट्राइक रेट से. आप सभी को शायद ये याद ही होगा कि कैसे पूर्व कप्तान एम एस धोनी ने रोहित शर्मा को मध्य-क्रम से ऊपर भेज कर उनके करियर कि दिशा बदल दी थी. 2012 में श्रीलंका के दौरे पर रोहति के बल्ले से 5 मैचों में कुल 13 रन निकले थे लेकिन रोहित को भविष्य के लिए हर फॉर्मेट का खिलाड़ी धोनी मानते थे और हर हाल में उन्हें टीम इंडिया में बनाया रखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने रोहित को मिडिल ऑर्डर के दबाव से मुक्त करके ओपनर बना दिया. कहने का मतलब ये है कि अगर कोई शानदार बल्लेबाज़ मध्य क्रम में जूझ रहा हो तो उसे ओपनर बनाना कोई ग़लत मूव नहीं है क्योंकि वहां पर खिलाड़ी को रन बनाने का सबसे बढ़िया अवसर मिलता है. तेंदुलकर के साथ तब के कप्तान अज़हर ने गांगुली के साथ खुद उस दौर के कप्तान तेंदुलकर ने वही किया.

पिछले 5 टी20 मैचों में राहुल ने सिर्फ एक मौके पर दहाई (14) का आंकड़ा पार किया (PIC: AFP)


डेटा भी काफी कुछ कहता है
एक और अहम बात. आखिर कोहली टी20 में खुद ओपन क्यों करना चाहतें है? टी20 दरअसल, सबसे ज़्यादा डेटा से प्रभावित होने वाला खेल है. हर गेंद और हर शॉट की जहां विवेचना होती है तो कोहली का ध्यान इस बात से तो नहीं छूटा होगा कि दुनिया के बड़े खिलाड़ी जब पारी की शुरुआत करते हैं तो उनका औसत 37 का और स्ट्राइक रेट करीब 150. का रहता है. जब यही खिलाड़ी मिडिल ऑर्डर में उतरते हैं तो औसत गिरकर 28 का और स्ट्राइक रेट करीब 141 का हो जाता है. (source- Jarrod Kimber’s Sports Almanac) जैरड किंबर ने खूबसूरती से दिखाया है कि कैसे टी20 में ओपनिंग से बेहतर जगह कोई और नहीं है.

टीम से ज़्यादा खिलाड़ी के लिए ओपनिंग के फायदे बहुत
टी20 ही नहीं वन-डे क्रिकेट में भी ओपन करने के फायदे बहुत ज़्यादा हैं. यही वजह है कि महान तेंदुलकर ने 2003 वर्ल्ड कप के दौरान मध्य क्रम में बल्लेबाज़ी करने से इंकार कर दिया था. उस वक्त कोच जॉन राइट और कप्तान गांगुली चाहते थे मध्य-क्रम को मज़बूती देने के लिए तेंदुलकर नीचे आयें लेकिन वो नहीं माने थे. तेंदुलकर को इसका निजी तौर पर फायदा भी हुआ. भारत भले ही चैंपियन नहीं बना लेकिन तुंदलकर ने टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा रन बनाकर सर गारफील्ड सोबर्स ट्रॉफी जीती. एक बात और कितने लोगों को याद है कि 2011 में जो टीम वर्ल्ड चैंपियन बनी उसमें गौतम गंभीर की भूमिका की भूमिका कितनी अहम रही थी लेकिन उस टूर्नामेंट में भी एक स्वभाविक ओपनर गंभीर को तीसरे नंबर पर खेलना पड़ा था क्योंकि तेंदुलकर और वीरेंद्र सहवाग ओपनिंग छोड़ने को तैयार नहीं थे.

पंड्या-पंत के लिए कोहली का मध्य-कर्म में होना ज़रुरी?
चाहे वन-डे क्रिकेट हो या फिर टी20 , मध्य क्रम में बल्लेबाज़ी की चुनौती ज़्यादा मुश्किल है क्योंकि टीम की ज़रुरत के हिसाब से आपको ताबड़तोड़ अंदाज़ में गियर बदलते रहना पड़ता है जैसा कि डिविलियर्स करते हैं या फिर हार्दिक पंड्या और ऋषभ पंत इस भूमिका को भारत के लिए निभा रहे हैं. ऐसे में इन युवा आक्रामक बल्लेबाज़ों को दूसरे छोर से गाइड करने के लिए कोहली जैसे अनुभवी और धुरंधर बल्लेबाज़ हो तो टीम को कितना फायदा होगा. खुद सोचिए कि अगर शुरू में ही रोहित-कोहली आउट हो गए तो टीम पर कितना ज़्यादा दबाव आयेगा? इसकी झलक टीम इंडिया 2015 और 2019 के वर्ल्ड कप सेमीफाइनल के अलावा 2017 के चैंपियंस ट्रॉफी फाइनल में भी देख चुकी है.

इन युवा आक्रामक बल्लेबाज़ों को दूसरे छोर से गाइड करने के लिए कोहली जैसे अनुभवी और धुरंधर बल्लेबाज़ हो तो टीम को कितना फायदा होगा (PIC : AP)


कोहली आरसीबी के लिए कप्तान या बल्लेबाज़ के तौर पर सफल होतें है या नाकाम इससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. 2013 से कप्तानी करने के बावजूद उनकी टीम कभी भी चैंपियन नहीं बनी है तब भी उनकी कप्तानी को लेकर चर्चा तक नहीं होती है. लेकिन, टीम इंडिया के लिए कोहली की नाकामी इतनी आसानी से कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती है. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विमल कुमार

विमल कुमार

न्यूज़18 इंडिया के पूर्व स्पोर्ट्स एडिटर विमल कुमार करीब 2 दशक से खेल पत्रकारिता में हैं. Social media(Twitter,Facebook,Instagram) पर @Vimalwa के तौर पर सक्रिय रहने वाले विमल 4 क्रिकेट वर्ल्ड कप और रियो ओलंपिक्स भी कवर कर चुके हैं.

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First published: March 31, 2021, 8:42 AM IST
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