भारत भवन की 39वीं सालगिरह: धूप-छांही मंज़रों से गुज़रता कलाओं का मरकज़

इस कला केंद्र की सांस्कृतिक यात्रा का एक और यादगार चरण 13 फरवरी को पूरा हो रहा है.अपनी रचनात्मक यात्रा के साथ जुड़े स्वर्णिम अध्यायों को याद करते हुए भारत भवन सांस्कृतिक बहुलता की बुनियादी आकांक्षा को वर्षगांठ के इस समारोह में एक बार फिर साकार कर रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 13, 2021, 12:22 PM IST
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भारत भवन की 39वीं सालगिरह: धूप-छांही मंज़रों से गुज़रता कलाओं का मरकज़
भारत भवन आज अपना 39वां स्थापना समारोह मना रहा है.

एक हल्का-सा ढलुआ पठार जो भोपाल की बड़ी झील और उसके पार फैले पुराने-नए शहर की संधि को निहारता है, एक दिन कलाओं का तीर्थ बन गया. यहां के ऊबड़-खाबड़ मैदान पर चार्ल्स कोरिया जैसे मशहूर वास्तुविद ने जिस कल्पना को खूबसूरत इमारत की शक्ल दी, उसे दुनिया आज भारत भवन के नाम से जानती है. इस कला केंद्र की सांस्कृतिक यात्रा का एक और यादगार चरण 13 फरवरी को पूरा हो रहा है.

अपनी रचनात्मक यात्रा के साथ जुड़े स्वर्णिम अध्यायों को याद करते हुए भारत भवन सांस्कृतिक बहुलता की बुनियादी आकांक्षा को वर्षगांठ के इस समारोह में एक बार फिर साकार कर रहा है. संगीत, नृत्य, नाटक, कथा-कविता, रूपंकर और फिल्म जैसे कला माध्यमों में हो रहा महत्वपूर्ण सृजन एक बार फिर इस बहुकला केंद्र के सालाना उत्सव की रंगतों का हिस्सा बना है. इसके गलियारों और इस अंतरंग की चार दीवारी तक कला के वासंती मौसम की लहक-महक को हम सब बहुत गहरे तक महसूस कर रहे हैं. कोरोना की दस्तक के बाद पसरी लंबी ख़ामोशी को सालगिरह का यह उत्सव छांट रहा है.


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एक वक्त था जब भूरी बाई इस कला केन्द्र की बन-संवर रही इमारत को आकार देने वाले श्रमिकों में शामिल थीं.



वर्षगांठ के इस उत्सव के साथ अतीत की अनेक स्मृतियां रौशन हैं. एक वक्त था जब भूरी बाई इस कला केन्द्र की बन-संवर रही इमारत को आकार देने वाले श्रमिकों में शामिल थीं. ये 1981-82 का समय था. रोज़ी की गरज में भूरी के हाथ पत्थर-गिट्टियां ढोने को मज़बूर थे. वक़्त और नसीब ने कुछ ऐसी करवट बदली कि अपने गांव की भूमि और दीवार पर आदिम रंगों की सोहबत छोड़ आई इस भील स्त्री की दुनिया में फिर रंगत लौट आई. सुन्दर इमारत में ढल रहे भारत भवन में काम कर रही इस वामा पर मूर्धन्य चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन की निगाह पड़ी और उन्होंने भूरी के भीतर बैठी रचनात्मक कसक को भांप लिया. यह लम्हा भूरी के भाग्योदय का महान मुहूर्त था. भूरी के जीवन में उसके जनपदीय जीवन की आस्था का उजाला लौट आया. श्रमिक हाथों ने सर्जना का एक नया विश्व रचना शुरू कर दिया. ग़ौरतलब है कि यही भूरी बाई भारत सरकार की ओर से इस बरस पद्मश्री अलंकरण के लिए चुनी गई हैं. वे भारत भवन के 39वें स्थापना समारोह का शुभारंभ करने बतौर अतिथि न्यौती गई हैं.


संयोग ही है कि उनकी कला को नया उन्मेष प्रदान करने वाले लोक और जनजातीय संस्कृति के अध्येता डा. कपिल तिवारी भी इस मौके पर उनके साथ होंगे. तिवारी भी पद्मश्री के लिए चुने गए हैं. कला के उत्कृष्ट मानदंड और कलाकारों के प्रति सम्मान सदा इस केंद्र की पहचान रहे हैं. विवादों के ग्रहण से हालांकि यह संस्थान भी ख़ुद को बचा नहीं पाया. सरकारें बदलती रहीं, प्रशासनिक सूत्र भी हस्तांतरित होते रहे. उनकी हठधर्मिता और मंशाओं ने एक हद तक इस कला केन्द्र की आत्मा को आहत भी किया लेकिन बुनियादी सपना अभी भी भारत भवन की आंख़ों में जि़ंदा है.


कलाओं के इस मरकज़ के गुज़िश्ता सफ़र पर ग़ौर करें तो सांस्कृतिक उत्कर्ष और पराभव के अनेक धूप-धांही मंज़र सामने आते हैं. कुछ छवियां उन मूर्धन्य और प्रतिभाशाली साधक-कलाकारों की ज़ेहन में उतरती हैं, जिन्होंने सृजनात्मकता का उत्कृष्ट परिवेश यहां रचा तो दूसरी ओर वो तसवीरें भी नुमायां होती हैं जिसमें अपनी प्रभुसत्ता या वर्चस्व के लिए राजनैतिक षड्यंत्रों की गंध समाई हैं लेकिन कला के सच्चे और भोले रसिकों ने इन सबसे बेपरवाह रहकर इस घर को आबाद रखा.

भारत भवन बीते युग के कला अनुराग की स्मृतियों और नए ज़माने की कला प्रवृत्तियों का बसेरा है. यहां संगीत, अभिनय, कविताओं, रंगों, मूर्तियों और साहित्य का एक स्वायत्त परिवार है, जिसकी आवाज़ें बड़ी झील की लहरों से टकराकर समंदर पार के देशों तक सुनाई देती हैं. मध्यप्रदेश को इस बात का सौभाग्य रहा है कि भारत भवन की सौगात ने उसे देश-विदेश के मानचित्र पर सांस्कृतिक समृद्धि से मंडित एक अद्वितीय राज्य की छवि प्रदान की है.


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कोरोना की दस्तक के बाद पसरी लंबी ख़ामोशी को सालगिरह का यह उत्सव छांट रहा है.



इस गौरव के पीछे देश के अनेक प्रज्ञा पुरुषों, कलाविदों का परामर्श, उनका पुरुषार्थ और उनका अविस्मरणीय अवदान रहा है. जे. स्वामीनाथन, पं. कुमार गंधर्व, यामिनी कृष्णमूर्ति, ब.व. कारंत, हबीब तनवीर, उस्ताद अमज़द अली खाँ, पं. जितेन्द्र अभिषेकी, मनजीत बावा, विजय तेंदुलकर और पं. जसराज से लेकर राजन मिश्र जैसी अनेक ऐसी विभूतियाँ हैं, जिन्होंने इस केन्द्र को एक इमारत की संज्ञा से अलग सच्चे अर्थों में ‘भारत का भवन’ बनाने में अपना योगदान दिया.


39वीं सालगिरह के सांस्कृतिक समागम में कलाओं के वे तमाम रंग-रूप हैं, जिन्हें हमारी भारतीय परंपरा ने अपने आंचल में थामा और जिन्हें हमारे जीवन-आनंद का हिस्सा बनाया. उल्लास और आनंद से गमकती देहगतियों का मनछूता ताना-बाना लिए अग्रणी कथक नृत्यांगना शमा भाटे वसंत की उमंगों का रूपक रच रही हैं, तो सूफ़ी गायक हंसराज हंस इंसानियत का संगीत अपने कंठ में थामें मौसिकी के कद्रदानों के रूबरू होंगे. तबला, वायोलीन और सरोद की महफि़लें सजेंगी तो नौज़वान पीढ़ी के कलाकार ध्रुवा बैंड की शक्ल में संस्कृत की ऋचाओं को गाएंगे. अदब की दुनिया के वरिष्ठ और युवा रचनाकार कविता और कहानियां सुनाएंगे और इन सबके बीच भारत भवन की दीवारों पर जनजातीय कलाकारों की रंग-रेखाएं आदिम स्मृतियों का सुनहरा आकाश रचेंगी. हाल ही दिवंगत हुए रंगकर्मी बंसी कौल निर्देशित नाटक का मंचन भी होगा.


भारत भवन के परिकल्पित आयोजनों की श्रृंखला को याद करें तो विश्व कविता समारोह, कवि भारती, सारंगी, संतूर, नक्कारा, घटम, बाँसुरी, वायोलीन, जलतरंग और संगीत के विभिन्न घरानों पर एकाग्र समारोह, शास्त्रीय नृत्य की शैलियों पर केन्द्रित घुंघरू और भाव-अनुभाव की सभाएं, मूर्धन्य संगीतकारों पर गायन-वादन पर एकाग्र महिमा, लोक संगीत का ‘लोक-आलोक’, संत पदों के गायन का समारोह ‘संत वाणी’ राष्ट्रीय नाट्य समारोह, द्वैवार्षिक छापा कला दर्शनी, क्लासिक फि़ल्मों के प्रदर्शन पर आधारित ‘छवि’ समारोह सहित सैकड़ों ऐसी गतिविधियाँ हैं जिनमें हमारे वक़्ती दौर का शायद ही ऐसा कोई कलाकार हो जो शिरकत करने न आया हो. इस तारतम्य में तरूण कलाकारों के लिए ‘दिनमान’ के मंच ने यहाँ नई कलात्मक मेधा को प्रोत्साहित करने का अवसर भी जुटाया है. बीच के कुछ अंतराल को छोड़ दें तो भारत भवन की साहित्यिक पत्रिका पूर्वग्रह के प्रकाशन ने फिर से रचनात्मक विमर्श का नया परिवेश निर्मित किया है. हाल ही संस्कृत साहित्य के प्रकांड अध्येता राधावल्लभ त्रिपाठी के समग्र सर्जनात्मक योगदान को संजोता महत्वपूर्ण अंक प्रकाशित हुआ है.

कलाओं का यह दुर्ग एक बार फिर अपनी तमाम रौनकों को समेटता गुलज़ार है.


ये लेखक के निजी विचार हैं. 



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: February 13, 2021, 12:18 PM IST
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