राजन मिश्र; काशी के कंठ साधक का महामौन

संगीत के राग-रास में चारों प्रहर डूबा रहने वाला बनारस अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के दरमियान संगीत की जिन विलक्षण विभूतियों का स्वर्णिम अतीत बना, पंडित राजन मिश्र उसी उजाले की एक सुरीली किरण बनकर प्रकाशित हुए.

Source: News18Hindi Last updated on: April 26, 2021, 5:46 PM IST
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राजन मिश्र; काशी के कंठ साधक का महामौन
राजन मिश्र का देहांत कोरोना से हुआ है. (File pic)
गूढ़ ज्ञान संगीत-कला का विरसे में आए हैं. गंधर्वों की वाणी को धरती पर लाए हैं…सचमुच विरासतें भी कभी फक्र करती होंगी कि उन्हें काबिल उत्तराधिकारियों ने अपने आचरण, तप और पुरुषार्थ में थामकर समय में उनके होने को संभव किया. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की चली आ रही सदियों पुरानी परंपरा के साथ एक ऐसा ही सुरीला विश्वास कायम रखते हुए पंडित राजन मिश्र ने अपनी कंठ माधुरी का जो सैलाब बिखेरा, वो अपने मुल्क की सरहदें पार कर एक समंदर पार की बुझी और बेचैन राहों का मरहम बन गया.

अपने स्वरों में नाद ब्रह्म को पुकारने वाला गंगातट का यह साधक अब महानाद में विलीन हो गया. संगीत के तीर्थ बनारस में सात दशक पहले इस दुनिया में आने का उद्घोष करने वाली राजन मिश्र की मासूम किलकारी उम्र के इस मुकाम पर सिद्ध स्वरों की कसौटी बन जाएगी, यह खुद राजनजी ने भी न सोचा होगा. दुर्भाग्य से ऐसा तपस्वी गायक अब हमारे बीच नहीं है. इस शापित समय ने उन्हें भी हमसे छीन लिया. संगीत के लाखों कद्रदानों के बीच पंडित राजन मिश्र अपने से पांच बरस छोटे भाई पंडित साजन मिश्र की संगत में गाते हुए शास्त्रीय संगीत में बेमिसाल जुगलबंदी के पैमाने बन गए. कर्कश और बेसुरी होती जा रही दुनिया में पंडित राजन मिश्र का कंठ करुणा की पवित्र धाराओं में मन के प्रक्षालन का आमंत्रण था. निश्चय ही यह हिंदुस्तान के एक संगीत ऋषि का महाप्रयाण है. विडम्बना कहें या नियति की इच्छा कि जीवन के अंतिम समय में अपने देश की राजधानी में सांसों से संघर्ष करने वाले इस पद्मविभूषण कलाकार को 'वक्‍त' पर सहारा न मिल सका और कुमार गन्धर्व के कबीर को याद करते हुए कहें तो- उड़ गया हंस अकेला!

संगीत के राग-रास में चारों प्रहर डूबा रहने वाला बनारस अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के दरमियान संगीत की जिन विलक्षण विभूतियों का स्वर्णिम अतीत बना, पंडित राजन मिश्र उसी उजाले की एक सुरीली किरण बनकर प्रकाशित हुए. 1951 में संगीत मनीषी पंडित हनुमान मिश्र की संतान होने का सौभाग्य उन्हें मिला जिनकी ख़ानदान में गणेश मिश्र, सुरसहाय मिश्र और दादा रामदास जैसे गुणी और संगीत के पांडित्य से भरे पुरखों की विरासत रही.

वैभव की इसी छांह में बैठकर राजन मिश्र ने संगीत के गुर सीखे. गुरु की तालीम और उस दौर की आबोहवा का ही कुछ ऐसा असर था कि किशोर अवस्था में ही राजन मिश्र के कंठ में आरोह-अवरोह की गतियां कामयाबी की राहों की आहत बन गईं.
1956 में भाई साजन मिश्र का जन्म हुआ. कठोर अनुशासन के बीच मुसलसल रियाज़ ने इन दोनों भाइयों को ऐसी कलाकार जोड़ी के रूप में गढ़ा जिनके पास स्वर-संगीत की गहरी समझ के साथ ही बनारस की उन मनोरम अनुगूंजों की सौगातें थीं जिनमें साहित्य और संगीत की आपसदारी आध्यात्मिक आनंद का अलौकिक परिवेश रचने की ताकत बनी. जितना रागदारी में गहरे डूबने का आग्रह, उतना ही उस समंदर से मन रंजन के मानक (मोती) चुन लेने का अहोभाव उनकी गायिकी की पहचान बना. भक्ति का तरल-सरल पवित्र भाव उनके गायन में कुछ इस तरह निखरता कि मंच और महफ़िल नाद ब्रह्म के मंदिर में बदल जाते.

पंडित राजन और साजन की जुगलबंदी का नज़ारा देखते ही बनता. धोती-कुरता धारण कर मंच पर उनकी आमद, मुस्कुराती छवि, नेह भीगा अभिवादन, विनय में डूबा स्वर माहौल में पवित्रता का ऐसा संचार करता रहा, जहां स्वर-देवता को भजने के लिए मानो साक्षात् गन्धर्व अवतरित हुए हों! दोनों बंधुओं की अपनी कलात्मक निपुणता, समन्वय, स्वर की लय-गतियों में साथ होने और अभिव्यक्तियों की स्वतंत्र उड़ान भरने की आपसी समझ तथा कौशल ने जुगलबंदी का ऐसा मोहक वितान तैयार किया कि यह विशिष्ट शैली ही उनकी पहचान बन गयी. यहां बंदिशों की निराली दुनिया में अनंत की यात्रा करने का सुख और आनंद. राजनजी की गान-मुद्रा के साथ ही श्रोताओं से संवाद करने की फितरत भी अनूठी होती. वे अपने पूर्वजों की बंदिश का परिचय देते. उसका भाव-विस्तार करते हुए उसके अर्थ और आशयों की सहज व्याख्या करते. स्वयं की रचना होती तो विनम्रता पूर्वक गुरु का आशीर्वाद मानकर उसे प्रस्तुत करते. इस तरह भक्ति और सादगी का गान, गहरा अंतर्बोध और लोकतत्वों का सौंधा स्पर्श उनके कला-चरित्र को नई आभा से मंडित करता रहा.

गौर करने की बात यह कि ख़्याल गायन से लेकर पूरब अंग के टप्पा, ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और झूला से लेकर तराना तक समान महारथ उन्हें हासिल थी.
उनका मानना था कि संगीत सुरों का गणित भर नहीं है, वह ईश्वर और प्रकृति का दिया उपहार है. हमारी आत्मा में रम जाने वाला रसायन है. अगर यह जगाने की कुव्वत संगीतकार में नहीं है तो वह सिर्फ गले की कलाबाजी है, वह ह्रदय का गान नहीं है. भारत सरकार के पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादेमी सम्मान, मप्र सरकार के राष्ट्रीय कुमार गन्धर्व सम्मान और तानसेन सम्मानों से विभूषित पंडित राजन मिश्र भारत भवन (भोपाल) के न्यासी भी रहे.

एक उद्घोषक के रूप में मुझे (इस लेखक को) पं. राजन-साजन मिश्र को मंच पर आमंत्रित करने और उनसे संवाद करने के अनेक अवसर मिले. उनके व्यक्तित्व की अनेक छापें और उनके सांगीतिक अनुभव तथा ज्ञान से भरी बातें साझा करने का यह सौभाग्य जब भी मिला वह एक अमिट स्मृति की तरह ठहर सा गया. मुझे याद है ग्वालियर में तानसेन सम्मान से विभूषित होने के अगले ही दिन भोपाल के करुणाधाम आश्रम के करुणश्वरी मंडप में उनके गायन की सभा थी. आश्रम के वर्तमान पीठाधीश्वर गुरुदेव सुदेशचन्द्र शांडिल्य की उपस्थिति में इस शक्ति पीठ पर विराजते हुए राजन मिश्र ने कहा था- "आज लग रहा है कि जीवन सफल हो गया. साधना की इस सिद्ध भूमि पर हम जैसे भक्तों की ओर से स्वर के पुष्प अर्पित करने का यह पुण्य अवसर है." उस शाम सचमुच स्वर, आत्मा के आसान पर देवता की तरह विराजे थे. (यह लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: April 26, 2021, 5:46 PM IST
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