नदी के आईने में....

नदी के प्रवाह में समय की पुकारें हैं. काल चक्र की कथाएं हैं. नदी खुद कभी ऋचा नहीं हो सकती लेकिन ऋचाएं ज़रूर नदी के प्रवाह को उसके सौन्दर्य को गा सकती है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 2, 2021, 10:39 AM IST
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नदी के आईने में....
जब-जब नदी की ओर निगाह जाती है, एक सम्मोहन सा जागता है. (File Pic)

इधर माघ शुक्ल पक्ष की सप्तमी आई तो सौन्दर्य की नदी नर्मदा का यशोगान गूंजने लगा. लेकिन अक्सर जयंति के भावुक जयकारों के बीच नदी और संस्कृति से जुड़े इंसानी सरोकारों के तकाज़े ख़ामोशी ओढ़ लेते हैं. इस तारतम्य में याद आया ‘सदानीरा उत्सव’. नदी की संस्कृति और संस्कृति की नदी पर आधारित आठ दिनों का यह समारोह तीन बरस पहले बहुकला केन्द्र भारत भवन ने रचा था. संगीत, नृत्य, चित्र, कविता, सिनेमा और संवाद में नदी का नाद कल-कल बहता रहा. दरअसल यह एक सांस्कृतिक परिक्रमा थी जिसकी धुरि में धमनियों का वह संगीत था जिसका हर स्वर दरिया की एक-एक बूंद के लिए धन्यता की पुकार बन गया.


अंतरंग में गूंज उठा- “विपाशा किसी नदी या नारी का नाम नहीं है. बल्कि किसी पुराने स्मृति-कोष्ठ से निकलकर आए. एक सूख गये जल-संसार का धुंधला-सा बिंब है. जिसे मैं सोचता हूं. …शायद ही मेरी कोई कविता उसे सहेज पाए”. हिन्दी के सुपरिचित कवि कुमार विकल की इस कविता में लयबद्ध होकर यादों की नदी के जाने कितने कूल-किनारे पुकारने लगते हैं. नदी, कि जिसकी लहरों पर बिछलता जीवन और समय सदियां पार करता अनंत की तरफ दौड़ लगाता रहता है. एक अर्थ में यह हमारे वजूद को देखने-सोचने और उसकी विचित्र लीलाओं में ध्यान लगाने की अंतः प्रेरणा भी है… यूं नदी सिर्फ दो किनारों के बीच बहता पानी भर नहीं है, वह जीवन, संस्कृति और प्रकृति की परस्परता में मनुष्यता का पवित्र उद्घोष है.


नदी के प्रवाह में समय की पुकारें हैं. काल चक्र की कथाएं हैं. ये सच है कि भारत के स्वर्णिम इतिहास की लेखनी अगर सिंधु है तो गंगा, यमुना, गोदावरी, सरयू, नर्मदा और कावेरी जैसी अनेक नदियां भारत के वैभवशाली अतीत की ही कहानियां कहती हैं.

दुनिया के मानचित्र पर निगाहें डालें तो मिस्र की सभ्यता की साक्षी नील है तो बेबीलोन के साम्राज्य के उत्कर्ष की गवाही-टिगरिस नदी है. यानी नदी की संस्कृति में सांस लेता रहा है मनुष्य. हमने नदियों को मां कहा और जल को देवता की तरह पूजा. यहीं से जीवन और सृजन की संभावना ने जन्म लिया और समय के अनंत विस्तार में संस्कृति अपने मूल्यों को गढ़ती मनुष्यता का अभिषेक करती रही.


ये नदियों के किनारे ही हैं जहां ऋषि परंपरा ने उद्घोष किया- ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया’. यहीं गुरुकुलों और मठों की शरण में आकर जीवन के जटिल प्रश्नों और जिज्ञासाओं के समाधान का प्रकाश फूटा. इन्हीं किनारों पर हरी-भरी वनस्पतियों और जंगलों का साम्राज्य फैला. हमारे आदिम पुरखों ने नदी के पास आकर ही जीवन का सपना बोया. आश्वस्ति की आवाज़ें सुनीं. समुदाय का विस्तार किया और अपनी दुनिया को सुन्दर, खुशहाल बनाये रखने के पाठ पढ़े. यहीं पुरुषार्थ ने पांव पसारे और यहीं मोक्ष की कामना भी जागी.


नदियों के साथ जुड़ी ऐसी अनेक स्मृतियां और संदर्भ साहित्य और कलाओं में उद्घाटित होते रहे हैं. सृजन की ऐसी कोई भी विधा नहीं, जिसकी अभिव्यक्ति में नदी का बिंब न लहराता हो. दरअसल नदी की एक भरी-पूरी संस्कृति हमारे सृजन का आधार है.

जब-जब नदी की ओर निगाह जाती है, एक सम्मोहन सा जागता है. यह उसकी प्रकृति ही है जो घेरती है, बांधती है, मोह-जगाती है और कला के जाने-कितने रूपों में बहने लगती है. ये वे छवियां हैं, जिनमें नदी के बहाने समूची मनुष्यता को नाप लेने का आग्रह है. यहां लालित्य की लहर है, करूणा के छंद है, जीवन की अविराम अनंत यात्रा की पदचापे हैं. मंगल का उद्घोष है. मोक्ष की कामनाएं हैं. ऐसा प्रवाह जो हमेशा वाचाल है. बोलता है. नदी के इन्हीं स्वरों में मनुष्य ने संगीत खोजा, गीत खोजे, उस कल्पना की तलाश की जिसने कहीं अजंता रचा, तो कहीं खजुराहो, कोणार्क और ताज. उसके बोल अतीत की इबारतें, वर्तमान के सृजन और भविष्य के वो चिराग हैं जिनकी उन्नत शिखाओं को इन बोलों के तरल स्पर्श से जगमगा जाना है. नदी के तटों पर परंपराएं मुस्कुराईं और कला की जुबान से मानवता के मंत्र झरने लगे. मनुष्य की कहानी, नदी और संस्कृति की जुगलबंदी की कहानी है. इसलिए नदी की संस्कृति और संस्कृति की नदी के पास जाकर हम अपना ही अक्स निहारते हैं.


नदी खुद कभी ऋचा नहीं हो सकती लेकिन ऋचाएं ज़रूर नदी के प्रवाह को उसके सौन्दर्य को गा सकती है.

जब हमारे आदि-पूर्वजों ने नदी की स्तुति की तो, उनके कंठ से फूटा वह गान सिर्फ नदियों की महिमा और गरिमा का गान नहीं वह जीवन देने वाले सरिताओं से निर्मित संस्कृति, सभ्यता, संस्कार, परंपरा और परस्परता का संगीत था. नदियों के प्रति कृतज्ञता, धन्यता और प्रार्थना का स्वर था. इस विश्वास और वचनबद्धता का इज़हार भी था कि इन पुण्यदायी नदियों और उसके आसपास हरियाते जीवन की वे पूरी हिफाज़त करेंगे. भारत का समूचा लोकजीवन इसी आश्वासन में बंधकर आज भी नदियों की लहरों का संगीत गाता-गुनगुनाता है. जानें कितने बिंब, कितनी उपमाएं, कितने प्रतीक, कितने ही रूपकों में यह धरोहर लोक गीतों की आत्मा के आसन पर बिराजी हैं. भोर से लेकर रात के आखिरी प्रहर तक और जन्म से लेकर मृत्यु तक नदियों का नाद गूंज रहा है.


इस तारतम्य में आदिशंकराचार्य का ‘नर्मदाष्टकम्’ के छंद सहसा अंतरंग में कौंधते हैं. नर्मदा के अप्रतिम सौन्दर्य पर मोहित होकर ओंकारेश्वर के पवित्र तीर्थ पर शंकराचार्य की आत्मा गा उठी-“त्वदीय पाद पंकजम् नमामि देवि नर्मदे”. भूपेन हजारिका के कंठ ने गंगा को गाया तो वह गीत जैसे हर भारतीय के के ओठों का राग बन गया- “ओ गंगा बहती हो क्यों…”? सूरदास के भक्ति पदों में यमुना के कुंज-कछारों की जाने कितनी कहानियां हैं. तुलसी रामचरितमानस में सरयू तट की महिमा का बखान करते हैं. आधुनिक कविता भी आज तक नदी के गीत गा रही है. यहां शिवमंगल सिंह सुमन याद आते हैं- “मैं क्षिप्रा सा ही तरल-सरल बहता हूं. मैं कालिदास की शेष कथा कहता हूं. मुझको न मौत भी भय दिखला सकती है. मैं महाकाल की नगरी में रहता हूं”.


शायरों की बात करें तो उनके जाने कितने अशआरों में नदी के बिंब तैरते हैं- “हम तो दरिया हैं/हमें अपना हुनर मालूम है/जहाँ से भी गुजरेंगे/रास्ता बना लेंगे”. ग़ज़लकार विनोद तिवारी कहते हैं- “चट्टानों में कठिन थी राह/नदी गाती हुई चल दी/बहुत ख़ामोश था जंगल/नदी गाती हुई चल दी”. चित्रपट की दुनिया के गुणी गीतकार स्व. अभिलाष की अमर रचना को कैसे भुला सकते हैं- “संसार है एक नदिया/दुख-सुख दो किनारे हैं/ना जाने कहां जाएं. हम बहती धारे हैं”. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: March 2, 2021, 10:39 AM IST
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