‘गम्मत’ के मंच पर मनोरंजन भी, सबक भी

गम्मत दो शब्दों गम और मत से मिलकर बना युग्म है. गम यानी जाने की क्रिया और मत यानी विचार या सलाह. जोड़कर देखें तो गम्मत किसी विचार या मत की ओर ले जाने वाली कलात्मक प्रक्रिया है.

Source: News18Hindi Last updated on: December 2, 2020, 1:56 PM IST
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‘गम्मत’ के मंच पर मनोरंजन भी, सबक भी
गम्मत दो शब्दों गम और मत से मिलकर बना युग्म है. गम यानी जाने की क्रिया और मत यानी विचार या सलाह. जोड़कर देखें तो गम्मत किसी विचार या मत की ओर ले जाने वाली कलात्मक प्रक्रिया है.
नई दिल्ली. मनोरंजन (Entertainment) के बीच सहज भाव से अपने मन की बात कह देने का कौशल जब रंगमंच साकार होता है, तो मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के निमाड़ अंचल में वह गम्मत (Gammat) की शक्ल ले लेता है. एक ऐसी नाट्य शैली जिसमें गीत, संगीत, नृत्य, संवाद, अभिनय और भाव-भंगिमाएं मिलकर एक रोचक ताना-बाना तैयार करते हैं. यहां आधुनिक रंगमंच की तरह न तो साज-सज्जा के साधन हैं और न ही शास्त्र सिद्धांतों के सबक सीखकर अपनी कलात्मक महत्वाकांक्षाओं के साथ प्रवेश करने वाले चुने हुए कलाकारों का दल है, लेकिन चली आ रही परंपरा के प्रति गहरा अनुराग रखने वाले स्वयं सिद्ध देहाती फनकारों के हुनर और काबिलियत की पेशकश का अपना अलहदा-सा आनंद है. इस लिहाज से निमाड़, मनोरंजन की परिपाटी का घर है. गम्मत इसी आंचलिक परिवेश में परवरिश पाने वाली शैली है. एक ऐसा मंच जहां जनपदीय जीवन अपनी ही कही-अनकही, देखी-अनदेखी कहानियों के किरदारों के संग हंसी-ठिठोली करता मजे-मजे में कोई कीमती संदेश पा जाता है.

अन्य शैलियों की तरह निमाड़ की गम्मत का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. न तो सबसे प्राचीन संस्कृत नाट्य परंपरा से इसके सूत्र जुड़ते हैं और न ही किसी काल-विशेष के सांस्कृतिक आन्दोलन की छाप इस पर दिखाई देती है, लेकिन अपने निजि संज्ञान और देशज परिवेश से प्रेरित होकर निमाड़ के लोक समुदाय ने अभिव्यक्ति के एक सहज माध्यम के बतौर इसका स्वरूप तैयार किया. प्रस्तुति के रंग-ढंग ने दर्शकों को कुछ इस तरह आकर्षित किया कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी गम्मत का कारवां आगे बढ़ता रहा.

विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वत के मैदानी इलाकों में बहती पुण्य सलिला नर्मदा के किनारे बसा निमाड़ का खेतिहर समाज अपनी जिन लोक आस्थाओं और सामाजिक सांस्कृतिक सरोकारों को आत्मसात करता अपना जीवन गुजारता रहा है, गम्मत की रंगभूमि पर वही सब कथा-कहानी, किस्से और घटनाएं बनकर उद्घाटित होते हैं. यह सब इतना सहज और मानवीय होता है कि दर्शकों को अपना और अपने आसपास का लगता है.

मिसाल के तौर पर एक कहानी निमाड़ के पश्चिम अंचल के एक गांव में रहने वाले पटेल और पटेलन की. यानी पति-पत्नी की. दोनों महेश्वर के रहवासी हैं. पटेल धार्मिक पर्यटन के लिए अकेले ही ओंकारेश्वर तीर्थ जाने की योजना बनाते हैं. जब यह बात अपनी पत्नी से साझा करते हैं तो पटेलन भी साथ चलने की जिद करती है. कुछ सहमति-असहमति के बीच दोनों साथ-साथ यात्रा पर निकल पड़ते हैं.
दरअसल यह यात्रा, लोक मन की यात्रा है. एक ग्रामीण युगल का वार्तालाप यहां अत्यंत रोचक बन पड़ा है. प्रवास में आने वाली कुछ मुश्किलें, कुछ आनंद-कौतुहल, कुछ नोक-झोंक और इन सबके बीच मानवीय प्रवृत्तियों पर कटाक्ष, विसंगतियों पर व्यंग्य और सुखी-खुशहाल जीवन जीने के दृष्टांत गम्मत की विषय वस्तु पर प्रस्तुति को मनोरंजक बना देते हैं. यहां लोकोक्तियों और मुहावरों में रची-बसी खांटी निमाड़ी बोली का मटियारा स्वाद है तो, पारंपरिक धुनों में खनकते गीत और ढोलक की थाप पर थिरकते नृत्य का अपना मजा है.

गम्मत की पूरी बुनावट को देखें तो उसके रचनात्मक आयाम और स्थानीय संदर्भ आंतरिक अनुशासन तथा सौन्दर्य बोध का बखान करते हैं. दरअसल इस पूरी बनक के पीछे ग्रामीण जनों की सामूहिक उर्जा और उनका मिलाजुला उत्साह काम करता है. शारदीय नवरात्रि, होली, गणगौर और गणेशोत्सव के अवसर पर निमाड़ के गांव गम्मत के खेलों की आतुरता से प्रतीक्षा करते हैं. जैसे ही कलाकारों की टोली बुलावे पर किसी गांव में दाखिल होती है, गांव के लोग सहयोग के लिए तैयार होते हैं. कोई गम्मत खेल की जगह की साफ-सफाई में लग जाता है, तो कोई कलाकारों सामग्री जुटाने के चाय-स्वल्पाहार का जिम्मा लेता है तो कोई स्थानीय कलाकार की व्यवस्था करता है.

बस, 15 से 20 फीट लंबी-चैड़ी जगह गम्मत के लिए पर्याप्त है. इसी जगह एक खंबा गाड़ा जाता है और गणेश-सरस्वती या अन्य किसी देवी-देवता की प्रतिमा या तसवीर इसी खंबे के नीचे अथवा गरबे के ज्योति कलश के साथ स्थापित कर दी जाती है. गम्मत वाली जगह के आसपास के घर के छज्जों या मुंडेरों से सफेद बड़े कपड़े का चंदोवा तान दिया जाता है. इसी के नीचे दर्शक जमा हो जाते हैं. वे गम्मत का हिस्सा बन जाते हैं. खेल शुरू होने पर चल रही कहानी और पात्रों के संवादों के बीच उचित अवसर पर दर्शक भी अपनी ओर से कोई संवाद या जुमला जोड़ देते हैं. यानी, गम्मत का मंच खुला मंच है. एक अर्थ में लोकतांत्रिक मंच भी.मौखिक या वाचिक परंपरा ही गम्मत को स्वीकार रही हैं. इसीलिए देख-सुनकर और स्मृति में सहेजकर अपनी बुद्धि, कौशल और तर्क से कथानकों में लोक जीवन के अनुभवों को रचकर कलाकार उसे मंच के माध्यम से जन समुदाय को साझा करते हैं. गम्मतों के विषय धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक होते हैं. लोक रीतियां, मर्यादाएं और सांस्कृतिक गरिमा आहत न हो इसका विशेष ख्याल रखा जाता है, लेकिन भटकी हुई सामाजिक प्रवृत्तियों और रूढ़ियों पर खुलकर कटाक्ष किया जाता है. यहां श्रृंगार, हास्य, करूणा, वात्सल्य और वीर रस का उमड़ता सैलाब है तो प्रेम, घृणा, उपहास और सौहार्द के छलकते रंग भी हैं. गौर करने की बात यह है कि गम्मत किसी एक व्यक्ति की रचना का खेल नहीं है, कथानक और गीत सब मिलकर रचते हैं. नृत्य तथा अन्य प्रभावी दृश्यों में भी सभी के सुझाव शामिल होते हैं. इन दृश्यों में ढोलक की थाप नई उर्जा का संचार करती है.

यहां देवी-देवता, राजा, राक्षस, पंडित, नेता, अफसर, पुलिस से लेकर गांव के पटेल और आम स्त्री-पुरूष और बच्चों तक किरदारों की विभिन्न भंगिमाओं में उतरते कथानकों का जादू अवाम के बीच कुछ ऐसा असर करता है कि गम्मत का यह खेल रात के आखिरी प्रहर तक जारी रहता है. झांझ, मृदंग, ढोलक, तबला और हारमोनियम मिलकर सुर-ताल का तिलिस्म जगाते हैं. गीत और धुन जानी-पहचानी हुई तो उस पर थिरकने से भी दर्शक खुद को रोक नहीं पाते.

गम्मत के किरदारों का रूप-सिंगार भी देशज चीजों से ही होता है. चेहरे पर मुर्दारसिंग का पावडर, आंखों में गहरा काजल, होंठ पर हिंगुल या लाल स्याही का इस्तेमाल मुख्यतः किया जाता है. इसके अलावा खड़िया, चन्दन और अभ्रक भी जरूरत के अनुसार उपयोग में लाया जाता है.

गम्मत दो शब्दों गम और मत से मिलकर बना युग्म है. गम यानी जाने की क्रिया और मत यानी विचार या सलाह. जोड़कर देखें तो गम्मत किसी विचार या मत की ओर ले जाने वाली कलात्मक प्रक्रिया है. देहात के मंच अपनी परंपरा में दुनियावी सुख-दुख और उसके बीच मनोरंजन का ऐसा ही ताना-बाना बुनते रहे है, जैसे गम्मत का यह मंच.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: December 2, 2020, 1:56 PM IST
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