अभिनेता के कर्ज़ पर ज़िंदा रहता है किरदार

मोहन आगाशे का सितारा अपने आसमान पर एक ऐसी ही चमकती और चलती-फिरती मौजूदगी है. यह उजास सि़र्फ सिर्फ रंगमंच, सिनेमा और टीवी के परदे पर फैली उनके अभिनय की आभा नहीं है. एक क़ामयाब और बेमिसाल कलाकार से अलहदा उनकी ख्याति एक सफल मनोचिकित्सक की भी है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 17, 2021, 3:42 PM IST
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अभिनेता के कर्ज़ पर ज़िंदा रहता है किरदार
रंगमंच और सिने अभिनेता डॉ. मोहन आगाशे (फाइल फोटो)
(रंगमंच और सिने अभिनेता डॉ. मोहन आगाशे से ख़ास बातचीत)
सितारा छवियों के जगमग संसार में अक्सर उन कि़रदारों के काम और चेहरे ओझल हो जाते हैं जो अपने हिस्से की पारी खेल वक्त के एक मुकाम पर नेपथ्य की शरण ले लेते हैं. लेकिन इन्हीं में कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जिन्हें श्रांत भवन में टिके रहना रास नहीं आता. चरैवेति का मंत्र थामकर वे फिर किसी उस डगर पर चल पड़ते हैं जिसके अगले मोड़ पर कोई मंजि़ल बाँह पसारे उनके इंतज़ार में खड़ी होती है. मोहन आगाशे का सितारा अपने आसमान पर एक ऐसी ही चमकती और चलती-फिरती मौजूदगी है. यह उजास सि़र्फ सिर्फ रंगमंच, सिनेमा और टी.वी. के परदे पर फैली उनके अभिनय की आभा नहीं है. एक क़ामयाब और बेमिसाल कलाकार से अलहदा उनकी ख्याति एक सफल मनोचिकित्सक की भी है.

मानवता की सेवा को वे महान निधि मानते हैं और ख़ुद उदारमन से ज़रूरतमंदों के लिए दान का हाथ आगे बढ़ाते हैं. घर-परिवार के किसी बड़े-बुजुर्ग या पुरखे की तरह उनकी प्रेमिल उष्मा हमारे भीतर उतरने लगती है. दंभ और अभिमान से दूर बहुत अपने से लगते आगाशे इस यक़ीन के पास ले जाते हैं कि रंगमंच जि़ंदगी का हो या कला का, कसौटियाँ दोनों तरफ हैं. कि़रदार को निभाना, उसे अभिनय के साँचे में उतरना आसान तो नहीं!

बहरहाल सत्तर पार की उम्र में भी वे ऊर्जा से लबालब हैं. मनोचिकित्सक होने के नाते ‘मन’ की गहरी सतरों तक उतरना और व्यक्ति को समग्रता में समझने की फि़तरत उन पर हावी है. वे बचपन को याद करते हुए महाराष्ट्र के गणेशोत्सव के मंच पर पहुँच जाते हैं जहाँ पहली बार एक कि़रदार में ढलकर संवाद बोले थे. निशांत, मंथन, सदगति जैसी दर्जनों फि़ल्में सामने आती हैं. अनेक टी.वी. धारावाहिक जिनमें मुख्तलिफ भूमिकाएँ और अभिनय के बदलते आयाम उनके कद्रदानों को रास आते हैं. पद्मश्री और संगीत नाटक अकादेमी सम्मान उनकी अपार स्वीकृति और योगदान की ताईद करते हैं. डा. मोहन आगाशे से हाल ही हुआ यह दुर्लभ संवाद उनके कला जीवन का सार है जहाँ वे तमाम तजुरबों से गुज़रते हुए एक सबक की तरह पेश आते हैं.
वो कौन सा मुकाम था, वो कौनसा लम्हा था जब मोहन अगाशे को ये पता चला कि उनके भीतर एक अभिनेता है?

एक चीज़ ऑनेस्टली बताना चाहता हूँ कि जैसा आप सोचते हैं ऐसा मुझे कुछ हुआ नहीं. मेरा मानना है, कहना है और अनुभव ये है कि हम सारे लोग अपने जीवन का प्रारम्भ एक्टिंग से करते हैं. दो या तीन साल का कोई भी बच्चा या बच्चे एक्टिंग में पारंगत होते हैं. उस उम्र में हम स्टार होते हैं. क्यूँ? Because we choose our audience, so we show acting, display acting on our own only to select audience of our parents or grandparents sometime to teachers you act and show how the dad behaves, mom behaves और घर आकर बोलते हैं हमारी टीचर ऐसी-वैसी पेश आती है. फिर उसके हाव-भाव उतारने की कोशिश करते हैं. छोटे-मोटे नाटक तो हम सभी लोग करते ही रहते हैं क्योंकि जिन्दगी के बारे में एक बेहतर तरीका, यह इमीटेशन है. आज भी मैं अगर किसी अच्छे आदमी को मिलता हूँ उसकी आवाज़ पसंद है, उसकी खूबियाँ पसंद है तो मैं पहले कोशिश करता हूँ कि क्या मैं उस तरह के बातें कर सकता हूँ? उस तरह का मूवमेंट कर सकता हूँ? मुश्किल ये होती है कि बहुत बार लोग समझते हैं कि मैं मज़ाक उड़ा रहा हूँ लेकिन असल में मैं मज़ाक नहीं उड़ा रहा हूँ मैं वो बनने की कोशिश कर रहा था क्योंकि मैं उनसे प्रभावित हूँ और दूसरे को जानने का ये जो तरीका है कि जो कि़रदार आप निभाना चाहते हो, वो अगर आप होना चाहते हो तो समझ अच्छी आती है जिसका उपयोग या फायदा मुझे नाटक में हुआ है, फिल्म में हुआ है और सबसे ज्यादा मनोविज्ञान में हुआ है. मैं यह भी बताना चाहता हूँ ईमानदारी से कि cerebral skills don’t help performance skills, आप अच्छी किताब लिखें कुकिंग पर, लेकिन खाना बढ़िया बनेगा ये नहीं बोल सकते. जो खाना बढ़िया बनाता है उसे शायद बताना नहीं आता होगा कि कैसे करना है? दोनों अलग चीज़ें है. एक चीज़ है अच्छी तरह देखकर समझकर अपने में articulate करके बताना है और दूसरी बात देखने के लिए, सुनने के लिए, स्पर्श के लिए, स्वाद के लिए और सूंघने के लिए जो हम बचपन से, ध्यान से अपने भीतर पाते हैं कुदरती. बुद्धि पहले कभी डेवलप नहीं होती पहले हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ विकसित होती हैं. These are called Senses. और दुनिया के बारे में सारी जानकारी हम उन ज्ञानेन्द्रियों से लेते हैं. उसकी शुरुआत ही मुँह से, हम माँ के स्तन से जब दूध पीते हैं उससे होती है.

निश्चित रूप से हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ विकसित होती हैं. संवेदनाएं ही दरअसल हमारे भीतर एक अच्छे मनुष्य को तलाशने और उसे गढ़ने में मददगार होती है मैं ऐसा समझ पा रहा हूँ. मेरा जो प्रश्न था और उस प्रश्न के आस-पास अपने बहुत महत्वपूर्ण बातें की. आपको कब ऐसा लगा कि आपके भीतर एक अभिनेता है लेकिन अब मैं उसमे एक चीज़ और जोड़ता हूँ कि मोहन अगाशे को पहले-पहल एक अभिनेता के रूप में कब और कौन सा मंच मिला?आप जानते होंगे कि महाराष्ट्र में गणेश फेस्टिवल बहुत होता है. मेरे बचपन में भी गणेश फेस्टिवल में दस दिन कार्यक्रम चलते रहते थे उसमें एक दिन हमेशा बच्चों का वेराइटी एंटर्टेन्मेंट होता था. उसमे मैं बचपन से हिस्सा लेता रहा हूँ. लेकिन उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण बात है सई परांजपे जो जानी-मानी निर्देशिका हैं, लेखिका हैं वो National School Of Drama से पहले अपने पति अरुण जोगलेकर के साथ पूना में बहुत ही इंटरेस्टिंग चिल्ड्रेन थिएटर चलाती थी. जब मैं स्कूल में था पांचवी-छठी में. उसी समय ऑल इंडिया रेडियो पर वह ‘बालोद्यान’ नाम का कार्यक्रम हर रविवार को चलाती थी और those were the most favourite programs of all children और उसी समय में मैंने पत्ते नगरी, पक्षियों का कवि सम्मेलन जिसमें मैंने काम किया है कौवे का और ऐसे ही कई नाटकों में काम किया. तो मेरा अभिनय से लगाव बचपन से जुड़ा हुआ है.

तो आप यह मानते हैं कि एक नैसर्गिक प्रतिभा आपके भीतर पहले से थी, फिर एक अवसर आया और आपके भीतर का अभिनेता नए निखार के साथ बाहर निकला. आपकी यात्रा को देखें तो सई परांजपे आपका एक टरनिंग पॉईंट रहीं.

सई परांजपे के अलावा हमारी पाठशाला में गोड़बोले नाम के शिक्षक थे जो बेहतरीन नाटक करते थे स्कूल में. उन्होंने मुझे सातवीं कक्षा में बुला के कहा कि शाम को घर आ जाओ, नाटक करना है. तो दोनों जगह मैं नाटक करता था. उसके बाद मेडिकल कॉलेज में आया तो जब्बार पटेल, जो मेरे सीनियर थे, उनसे मुलाक़ात हो गयी. मैंने लगातार 15-20 साल उनके साथ जो काम किया, उसे भूल नहीं सकता. उनका निर्देशन अद्भुत होता था. उन्होंने ज़्यादा काम नहीं किया लेकिन जो काम किया है उसकी क्वालिटी ऐसी है कि शब्दों में बया करना कठिन है. सतीश आरेकर जी जो बहुत ही महत्वपूर्ण लेखक हैं, वे भी हमारे ग्रुप में थे. आपने सही कहा कि यह सहज प्रवृत्ति है मेरी. और आगे चलकर मैं सच बताऊँ आपको, मुझे बहुत सारा जीवन नाटक और फिल्म में देखने को मिला है और बहुत नाटक जि़ंदगी में देखने मिला है.

जिस समय आपकी रुचि रंगकर्म और अभिनय के साथ जुड़ी तभी आपके सामने कॅरियर भी था. आप मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे. दो ख्वाहिशें एक समय में टकराती हैं और यह तय कर पाना मुश्किल होता है कि आने वाला कल दरसल हमें कहाँ ले जाएगा. मोहन आगाशे के साथ भी ऐसा हुआ होगा?

बिलकुल नहीं. क्योंकि मैं आपकी तरह सोचता ही नहीं हूँ. मैं सोचता हूँ कि हमारी दो आँखें हैं, हमारे दो कान हैं, हमारी नाक के दो हिस्से हैं. हमारी दायीं और बायीं बाँह है, पैर हैं. जीवन को सही रूप से देखने के लिए पोसिटिव-नेगेटिव होना बहुत जरूरी है. और भारत जैसे देश में जहां इस बात की कोई प्रामाणिकता नहीं है कि आप अपना जीवन यापन उस काम के आधार पर कर लेंगे जो आपको पसंद है. आपको दो व्यवसायों की ज़रूरत है, एक जीवन-यापन के लिए और दूसरा उसको काबिल बनाने के लिए. आपको दिलचस्पी एक चीज़ में हो सकती है लेकिन आपके गुण ऐसे होते हैं कि जिससे आप सर्वाइव कर सकते हैं. मुझे गाना बहुत अच्छा लगता है पर मुझमें सुर नहीं है तो क्या करूँ मैं? तो मैं गाने पर एक किताब लिखना चाहूँगा.

कि़रदार एक अभिनेता को कई निभाने पड़ते हैं और मैं निदा फाजली को याद करते हुए कहूँ तो वे कहते हैं- ‘‘हर आदमी में छिपे होते हैं दस-बीस आदमी, जब भी देखना, कई बार देखना’’. तो मोहन आगाशे कई बार जब मंच पर जाते हैं, कई बार सिनेमा के किरदारों में ढल कर सब तक पहुँचते हैं तब यह तय करना बहुत मुश्किल है कि इसमें खुद मोहन आगाशे कहाँ हैं? क्या आपको कभी लगा कि कोई चरित्र आपकी जि़ंदगी से भी टकराया होगा और आपको उसको करने में आनंद मिला होगा?

यह सच है कि अभिनय के बारे में बहुत सारे मिथ गढ़े गए हैं. डॉ. लागू वैचारिक अभिनेता थे, वे कहते थे- you should be aware of yourself as a person and you should be aware of the person you are portraying. So you should be a participant observer. यह बहुत ज़रूरी है. एक बात और बताना चाहता हूँ आपको, पाचुकि साहब थे, उन्होंने एक कि़रदार निभाया रंगमंच पर. प्ले पूरा होने पर अंदर आ गए और एक घंटे तक मेक-अप रूम में अकेले यूँ ही बैठे रहे. तो कि़रदार से बाहर आने के लिए एक घंटा लगता है उनको. कमाल की चीज़ है. यह बहुत ही ज़रूरी है कि आपका एक व्यक्ति के रूप में अपने चरित्र के साथ क्या संबंध है. और यह ज़रूर मैं मनोचिकित्सक का अभ्यास करते हुए समझ गया हूँ. जैसे डॉक्टर का मरीज़ के साथ में क्या रिश्ता होना चाहिए, मरीज़ को क्या अनुमति है, डॉक्टर को क्या अनुमति नहीं है. मरीज़ डॉक्टर के प्रेम में पड़ सकता है, डॉक्टर मरीज़ के प्रेम में नहीं पड़ सकता नैतिकता की दृष्टि से. वैसे आप जो भी कि़रदार निभाते हैं उसके लिए कि़रदार कि जो माँगें होती हैं भावनाओं की. वह आपकी व्यक्तिगत माँगें हैं नहीं. किसी लेखक ने कि़रदार का निर्माण किया है. और उनका अनुभव दर्शकों तक पहुँचना है इसलिए मेरा इस्तेमाल हो रहा है. तो डॉक्टर लागू ने बहुत ख़ूब कहा है कि हम तो कुली हैं. लेखक और दिग्दर्शक जो बता दे वह माल पहुँचा देना दर्शकों तक, बस यही काम है हमारा. और यह काम करने के लिए जो करना पड़ता है वह कैसे करें हम? वह भाव कि़रदार के लिए हम लाएँ कहाँ से? तो जीवन मल्टिपल एमोशन से भरा हुआ है, अनुभव से भरा हुआ है. तो एक कि़रदार निभाने के लिए आपको अभिनेता के सचमुच के भाव, अनुभाव उधार लेना पड़ता है. और वह एक ऐसा कर्ज़ है जो चरित्र कभी अभिनेता को वापस नहीं कर सकता. यह एक विरोधाभास है कि ऐसा करते-करते बहुत सारे अभिनेताओं में इमोशनल वेक्यूम होता है क्योंकि यह बहुत सारा इमोशनल लोन कि़रदार को दिया गया है जो वापस नहीं मिलता. तो इसमें इमोशनल इनबेलेंस हो सकता है.

इस्तेमाल होने की बात आप कर रहे थे. श्रीराम लागू यह कहते हैं कि हम तो इस्तेमाल होते हैं और जिस भी कि़रदार के लिए हमारा निर्देशक हमको पुकारता है, हमको उसमें ढल जाना पड़ता है. लेकिन एक निजी संसार अपना भी अभिनेता का होता है. बहुत सारे अनुभवों की छापें उसके भीतर है. उन सारे तन्तुओं से मिलकर उसके व्यक्तित्व का और निजी मनुष्य का निर्माण होता है. मेरे पास एक कविता है दादा जो प्रेमशंकर शुक्ल ने लिखी है जो हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि हैं. वे कहते हैं कि- ‘‘नाटक करते-करते/उसकी जिन्दगी में शामिल हो गया है नाटक/उलझनों-मुश्किलों में घिरा रहता है/और खुश रहने का नाटक करता रहता है सारा दिन/अपने भीतर की चोट की, गहरे आघात की/ख़बर ही नहीं लगने देता है/करते हुए सुखमय जीवन का अभिनय/आँख के भीतर आँसू दबाकर/हँस-हँस कर बात करने में/नाटक से आगे निकल जाने का/आए दिन का उसका दृश्य होता है!/उसके ऐसे नाटक में/अपने पसीने से ही भीग-भीग जाया करता है नाटक भी !‘‘

यह बहुत संवेदनशील कविता है और बहुत अच्छी कविता है which portrays the unsuccessful actor as an actor because that means his character has influenced him. और वही paradox मैं बात कर रहा था कि एक तरफ़ से theatre is very therapeutic for the audience, but psychological morbidity is very high because they are unable to keep this separation, margin between as acting and themselves as a person. ख़ैर.... आदमी अपना provision का marketing करता है. तो बहुत चढ़ाया गया है एक्टर को. कला के माध्यम से... Theatre is not a solo art. It is a team art. What you have said is correct. लेखक कुछ लिखता है, to transcend that and to interpret it visually is for director, जहां वह दिखाई देता है. और उसके बाद जाके जो दिखाना है, जिस तरह से दिखाना है वह एक्टर का काम है. एक चीज़ ध्यान में रखो कि ऐरा-गैरा डायरेक्टर और बहुत अच्छा एक्टर अच्छा नाटक कर सकता है. लेकिन एक गधा एक्टर और बहुत ही गतिशील दिग्दर्शक नाटक अच्छा नहीं कर पाएगा. लेकिन एक बहुत अच्छा दिग्दर्शक और average actor can make a very good film. But a very good actor without help of a director and editor can never make a good performance.

वाह! आपका तजुर्बा बोलता है. इन्हीं तजुर्बों के साथ जब आपसे बात कर रहे हैं तो एक बड़ा फलसफा बातचीत का हमारे सामने खुलता है. चलिए विषयांतर करते हैं, थोड़ी दार्शनिक मुद्रा हम लोगों की हो गयी. हम यह जानना चाहते हैं कि जिस वक्त मोहन आगाशे के भीतर अभिनय करने की इच्छा जागृत हो रही थी और जब वह अपनी नैसर्गिक प्रतिभा को पहचान रहा था तब उनके सामने बहुत सारी ऐसी नायक छवियाँ थी जो हमारे रंगमंच और सिनेमा पर दाखिल हो चुकी थी और उनका अपना एक नाम था, अपनी एक कीर्ति थी. पैमाना अपने अभिनय का उन्होंने गढ़ा. मोहन आगाशे के सामने यह अभिनय कहाँ ठहरता था? आपका भी अपना कोई प्रिय अभिनेता रहा होगा जिसको देखकर आपने भी अपने अभिनय को या अपने रंगमंच और सिनेमा के आने वाले भविष्य को लेकर कुछ ख़्वाब बुने होंगे.

कितने मुश्किल सवाल पूछते हैं आप!
देखिए ऐसा है कि you can like many girls but you can marry only one. सौभाग्य की बात यह है कि you don’t have to like only one actor or actress, you can like many. और उम्र के हर तबके में, जैसे आप बढ़ते हो, आपका अनुभव बढ़ता है, your taste keep on changing. if you reflect on what you have seen, what you have done, तो इसका एक जवाब नहीं होता. तो जैसे डॉक्टर लागू के लिए पॉल मुनि थे, नसीरुद्दीन के लिए और हमारे लिए दिलीप कुमार थे because he brought new style of acting in cinema. वहीं नसीर ने कितने नए लोगों के लिए एक अच्छा उदाहरण बना दिया. मेरे समकालीन और पूर्वकालीन जब्बार खुद बहुत बढि़या एक्टर थे. हालाँकि उन्होंने बंद कर दी एक्टिंग विजय तेंदुलकर के एक नाटक ‘पंछी ऐसे आते हैं’. तो मेरे साथ के नसीर, ओम पुरी, स्मिता, शबाना, अमरीश ये जो कूलभूषित लोग थे, ये बहुत अच्छे अभिनेता थे. मराठी में भी भक्ति बड़वे, दिलीप अच्छा काम करते हैं. नसीर का नया नाटक ‘अभिनेता‘ देखिए. कमाल! मस्त!

ज़रा तकनीकी बात आपसे करना चाहता हूँ. रंगमंच, सिनेमा और टी.वी. तीन अलग-अलग मंच हैं. इन तीनों मंचों पर जाते हुए मोहन आगाशे किस तरह अपने आप को साबित करते हैं?

एक तो मैं बात कहूँ बहुत प्रामाणिकता से कि मैं किसी को कुछ भी साबित नहीं करना चाहता. मुझे जो कुछ भी साबित करना है वह खुद को करना है, दूसरों को नहीं करना. लेकिन एक बात सही है कि जब मैं रंगमंच पर जाता हूँ, यह बात बुजुर्गों ने भी बतायी है कि रंगमंच एक फ्रेम का सिनेमा है. सिर्फ एक बात जो दोनों में एक है वह है कि नाटक और सिनेमा दोनों ही टाईम और स्पेस के साथ खेल सकते हैं. लेकिन रंगमंच पर जब आप काम करते हैं तो आपके पास दर्शक होते हैं जो पहली पंक्ति में भी बैठे होते हैं और बालकनी में भी बैठे होते है. आख़री पंक्ति में भी. तो देह बोली वहाँ महत्वपूर्ण हैं. वहाँ कैमरा पास नहीं जा सकता. मन के भीतर की बात करना है. तो फिल्म में बहुत आसान हो जाता है. भावनाएँ दिखानी हैं तो कैमरा आपके इतने पास जा सकता है कि आप कुछ बहुत ही छोटा मूवमेंट कर सकते हैं जो आप जीवन में करते हैं जो कि लोगों को नज़र नहीं आता. लेकिन आपके बगल में जो खड़ा है उसे नज़र आता है. तो कैमरे में वह क़ाबिलियत है. लेकिन हमारा परफारमेंस स्क्रीन में टुकड़ों में होता है. रंगमंच के जैसे उसमें नियमितता नहीं होती टाईम और स्पेस की. तो वह मुश्किल है ज़्यादा. क्योंकि फिल्म में आख़री शॉट सबसे पहले लिया जा सकता है और सबसे पहला शॉट आख़री में. तो आपको उस तरह का अन्दाज़ बनाना पड़ता है. उसमें समय लगता है. टी.वी. बीच में कहीं होता है. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: January 17, 2021, 3:42 PM IST
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