मंगल की कामना हैं ये मटियारे रंग

कार्तिक के महीने में भारत की उत्सवधर्मी परंपरा भूमि, दीवार, पत्तों, घड़ों और कागज़ पर उभर आये चित्रों से नई चमक पाती है. कार्तिक ही क्यों, साल का हर महीना ऋतुधर्मी देश में जीवन, प्रकृति और संस्कृति के कलात्मक संयोग की कहानी कहता है. लोक की चित्र परंपरा का संदर्भ लेकर देखें तो आंचलिकता में विन्यस्त कला और कौशल के बहुरूप प्रकट होते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: October 31, 2021, 11:33 PM IST
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मंगल की कामना हैं ये मटियारे रंग

त्सवों का मौसम आता है तो पुरख़ुश मन अभिव्यक्ति के जाने कितने ठौर तलाश लेता है. शुभ और मंगल की कामनाओं से घर-देहरी और द्वार दिपदिपा उठते हैं. उदासियां काफूर होती हैं. आह्लाद से उमगती आत्मा जाने कितने रंग-रूपों में झांकने लगती है. लोक संस्कृति के आंगन में ठहरकर देखें तो यहां जैसे रंगों का कलश छलक उठता है. ये रंग सिर्फ आंखों को सुहाने वाली सुन्दरता नहीं है. इनमें सपनों, स्मृतियों, मूल्यों, विश्वासों और जीवन की धन्यता की सुगंध है. इनमें प्रार्थना और अनुष्ठान के पवित्र भाव हैं. कर्मकाण्ड और रीति रिवाज़ों की चहक-महक हैं. यहां ऋतुओं का राग है, मौसम का अनुराग है. कुल मिलाकर जीवन का मनोहारी छंद है- लोक का चित्रांकन.


कार्तिक के महीने में भारत की उत्सवधर्मी परंपरा भूमि, दीवार, पत्तों, घड़ों और कागज़ पर उभर आये चित्रों से नई चमक पाती है. कार्तिक ही क्यों, साल का हर महीना ऋतुधर्मी देश में जीवन, प्रकृति और संस्कृति के कलात्मक संयोग की कहानी कहता है. लोक की चित्र परंपरा का संदर्भ लेकर देखें तो आंचलिकता में विन्यस्त कला और कौशल के बहुरूप प्रकट होते हैं. गुफाओं और कंदराओं के शैल चित्रों से लेकर घर-आंगन की दरो-दीवार तक उभर आयी आकृतियां लोक आस्था का प्रतिबिंब हैं. ये चित्र मिथकों में मानवीय संसार के रहस्य खोलते हैं. गीत-संगीत, कथा और आख्यान इन चित्रों के साथ लयबद्ध होकर लोक के स्वप्न और सच को रचते हैं.


मधुबनी, नाथ, चेरियालपटम्, मांडना, जिरोती, रंगोली, अल्पना, बारली, फूल चैक, विजूका, संजा सहित सैकड़ों ऐसी लोक चित्र शैलियां है जो आज भी आनंद और विश्वास के विश्व का अंकन करती हैं. देखने वाली बात ये है कि आधुनिकता के तमाम आग्रह और चकाचैंध के बावजूद न तो लोक का मन विचलित हुआ और न ही इन देशज रंगों की आभा पीकी पड़ी. मूर्धन्य चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन के अनुसार लोक चित्रकार के पास अपना कल्पना का संसार है. उसी में वह अपने होने की तलाश करता है. यहीं उसकी वास्तविकता, उसकी जातीय स्मृतियों और विश्वासों में समय और सरोकारों को जुबां मिलती है.


गेरू, खड़िया, कोयला, फूल-पत्ते, वनस्पतियां और धूप-पानी से उसने अपने घर के चैक पूरे और दीवारें सजाई. इस तरह लालित्य और सौन्दर्यबोध की जीवंत पाठशाला बन गये लोक चित्र. एक विश्व दृष्टि जो प्रकृति से प्रेरित है, उसका उद्घाटन हैं लोक चित्र. मनुष्यता का महागान. मंगल का उद्घोष….


हाल ही लोक चित्रांकन पर केंद्रित एक दस्तावेज़ी पुस्तक पढ़ने का योग बना, जिसमें लोक के विभिन्न पक्षों को चित्र के संदर्भ में देखने की नई दृष्टि मिली. लोक ने अपनी कल्पना के अनुसार अपने देव-लोक की सृष्टि भी की है और उसमें हस्तक्षेप करने वाले विरोधी चरित्र भी उसकी अपनी धारणा और कल्पना से भरे हैं. इनकी इस सृष्टि में मानवीय संबंधों में देवत्व का प्रत्यारोपण भी है. इसलिये लोक-चित्र रचना में देवताओं का अंकन कम है, मानवीय रूपाकारों में संबंधों के उच्चता बोध वाले अभिप्रायों का अंकन अधिक है. भाई, बहिन, कन्या, पतिव्रता स्त्री, साधु आदि जिस रूप में कथा में सक्रिय हैं, उसी रूप में वे चित्र में भी परिलक्षित होते हैं.


राक्षसों या असुरों के चित्रांकन में भी लोक ने अपनी कल्पना में आने वाले भयद आकारों के रूप चित्रित किये हैं. काले-कलूटे, बड़े-बड़े दाँतों वाले, स्थूल डील-डौल वाले स्वरूप ही राक्षस अभिप्राय में व्यक्त होते हैं. चित्र में रहस्य के लिए स्पेस छोड़ा जाता है. ये चित्र एक लंबी घटना श्रृंखला की तरह भी रचे गये, ठीक वैसे ही जैसे पुंवारे शैली में गाये गये भगत-गीत होते हैं. इन गीतों में जिस तरह चरित्र-विकास और घटना-श्रृंखला का विवेचन होता है, वैसे इन चित्रों की सीरीज में घटनाक्रम और चरित्र-विकास बताया जाता है. अधिकतर व्रत-उपवासों के कथा-अभिप्राय कामना-पूर्ति वाले होते हैं, अतः चित्र में कामना-पूर्ति के संकेत के रूप में उनके सहप्रयोजन भी अंकित होते हैं.


स्वस्तिक, हाते, फूल, परी, सूरज, चंद्रमा आदि का अंकन कल्याणकारी भावनाओं को प्रदर्शित करने वाला है. कमल-पुष्प, बांस आदि का चित्रण वंश-वृद्धि और उर्वरता हेतु किया जाता रहा है.


लोक-चित्रों में उपलब्ध अधिकांश कथानकों के आधार अवतार चरित्रों पर आधारित हैं. अतः विष्णु, शिव, राम, कृष्ण, दुर्गा, लक्ष्मी आदि चरित्रों के साथ कथानकों का विन्यास है. अधिसंख्य लोक-चित्रों में इन्हीं चरित्रों को विभिन्न लोकनामों से आकृतिवान किया गया है. जैसे बुंदेली चित्र-परंपरा सुरातू में विष्णु का चित्रांकन प्रमुख है. संभवतः यह नाम विष्णु के सुरत्राता नाम का अपभ्रंश है. मालवी में चित्रित जिरौती में शिशुओं की रक्षिका जरासंध की बहिन जरा का अंकन होता है. यही जरा जिरौती बन गयी है. इस तरह की चित्रण शैली का विकास निश्चित ही पिछले डेढ़-दो हज़ार वर्षों में विकसित हुआ है. लोक-चित्रकला में धार्मिक मिथकों का संग्रथन जैन और बुद्ध धर्म के प्रसार के साथ ही हो गया था.


ईसा पूर्व लगभग छः-सात सौ वर्ष पहले बुद्धधर्म की जातक कथाओं का चित्रण अजंता और ऐलोरा की गुफाओं में हो चुका था. यद्यपि अजंता और ऐलोरा की चित्र-भित्तियों में नागर परिवेश है, किंतु इनमें लोक की झलक भी प्राप्त हो जाती है. एक चित्र में बुद्ध के दर्शन करने जाती स्त्री अपनी कांख में बच्चे को दबाये है. कुछ स्त्रियां अपने बच्चों के हाथ थामे पूजा का थाल लिये दर्शनार्थ जा रही हैं. कुछ के अपने हाथों में मुर्गा और बत्तख जैसे पक्षी हैं लोक-जीवन के अंकन की एक संपूर्ण झलक सांची के स्तूप के एक द्वार पर एक पाषण का फलक समेटे है. यह पूरा फलक ग्रामीण जीवन के विभिन्न संदर्भों की अनेक घटनाओं को अपने सहवर्ती दृश्यों के माध्यम से प्रस्तुत करता हैं अपभ्रंश चित्र शैली के विकास में लोक-कला की भूमिका भी रही है.


इस परिदृश्य में यह स्पष्ट हो जाता है कि लोक-चित्र रचना में धार्मिक मिथकों की संरचना का प्रारंभ दो-ढाई हज़ार वर्ष पहले से ही प्रचलन में आ गया था. इन चित्र-संरचनाओं ने क्लासिक चित्र रचना की विभिन्न कलमों के व्यक्तित्व विकास में निश्चित ही अपना योगदान किया होगा. यदि हम लोक-कविता के माध्यम से लोक-चित्रकला के विषय में कुछ जानना चाहते हैं तो यह केवल साहित्य के ऐतिहासिक स्वभाव की परख ही नहीं है. यह लोक में प्रचलित चित्रकला के प्रति दर्शाया गया उसका रूझान भी है. इन रूझान में लोक-चित्रकला की सौंदर्य-चेतना भी अभिव्यक्त होती है.


चित्रकला और साहित्य की अंतरंगता को माध्यमगत भिन्नता के कारण हम एकमेक होते भले न देख पायें, किंतु समूचा साहित्य एक प्रकार का चित्र-विधान ही है. साहित्य में रंग, रूप, रेखाओं का संसार यद्यपि उस तरह से प्रत्यक्षतः अभिव्यक्त नहीं है, किन्तु साहित्य मानस पटल पर निश्चित रूप से अपने चित्र अंकित करता है. इन्हें हम सुविधा के लिए बिंब भी कह सकते हैं. साहित्य की बिंबात्मकता एक तरह की मानसिक चित्र-संरचना है. काव्य में बिंब का संसार व्यापक होता है, और काव्य इन्हीं बिंबों के द्वारा इंद्रिय ग्राह्य भी बनता है. इसलिये चाक्षुष बिंब जहां रूप-दर्शन है वहीं इस दर्शन में घ्राण, स्पर्श, शब्द और रस का समावेश भी इंद्रिय संवेगों के आधार पर निश्चित किये जाते हैं.


स्त्री जो सदियों से घर की चहारदीवारों में कैद रही. अपनी स्वतंत्रता की कामना न केवल अपने गीतों में करती है, बल्कि वह चित्रकला में भी इस स्वतंत्रता को पाने की चेष्टा करती प्रतीत होती है. यदि वह ससुराल की चैखट में बंदिनी बनकर काव्य में कामना करती है कि यदि मैं चिरैया होती तो चारों देशों में उड़ आती. उसकी चिरैया बन जाने की कामना उसके मुक्तिभाव से जुड़ी हुई है, ‘उड़ आवती चराऊ देश चिरैया हो जाती राजा.’ वह अपने मायके के मुक्त संसार की पानी की ललक हर समय पाले हुए हैं. ससुराल में रहकर उसे अपने माँ-बाप, भाई-बहिन नहीं भूल पाते हैं. मायका उसकी स्वतंत्रता का आंगन जो ठहरा. लोकगीतों में उसका मायका अनेक रूपों में अनेक तरह से प्रकट हुआ है.


वह नर्मदा नदी की याद मायके को याद करके ही करती है. नर्मदा चिर क्वांरी नदी है, वह जहां भी है, वही उसका मायका है, इसलिये अन्य नदियों की अपेक्षा नर्मदा के प्रवाह में नर्मदा की गति-भंगिमा में स्वतंत्रता का सतत् उल्लास है, वह चिर विद्रोहिणी भी इस रूप में है. उल्टा प्रवाह उसकी इसी भाव उच्छृंखलता से है. नर्मदा को देखकर ससुराल में रहने वाली बहू को अपने मायके की स्वतंत्रता याद आ जाती है. लोकगीत में यह भाव गहराई से प्राप्त होता है, ‘‘नर्मदा के हाथी दरवाज़े, हाथी दरवाज़े रे, मोय मायके के दियला दिखांय.’’ नर्मदा के किनारों पर बने हाथी दरवाज़ों के कंगूरों पर खड़ी बहू को अपने मायके के जलते हुऐ दीपक दिखाई देते हैं. इन दीपों के प्रकाश में उसकी स्मृतियों की झिलमिलाहट है!


वह स्मृतियों में भी बार-बार उसी स्वतंत्रता में लौटने का उपक्रम करती है. इन स्मृतियों के उद्वेग में वह जिस चित्र को बनाने का संकेत करती है, वह चित्र उसके मायके का ही है. यह चित्र उसकी स्वतंत्र कामना का बेहद आकर्षक भाव-संसार दिखाता है- ‘‘ढिग ढिग लिखियो मोरो मायको नारे सुअटा/अंचरन माई के बोल/माई बैठी मंझघरा नारे सुअटा/बाबुल पौंर दुआर!’’ सुअटा तुम ऐसा चित्र बनाओ जिसकी ढिग में मेरे मायके की समस्त स्मृतियां उभर उठे.


भारतीय लोक चित्र परंपरा भारत की सांस्कृतिक अस्मिता है.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: October 31, 2021, 11:33 PM IST
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