महफिलों के महकते मंजर 'विश्वरंग 2020'

पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) ने पिछले वर्ष 'विश्वरंग' को परंपरा और आधुनिकता का संयोग कहा था. मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में गए बरस शुरू हुए इस विराट महोत्सव की मेजबानी इस साल दुनिया के पन्द्रह से भी ज्यादा देश कर रहे हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: November 22, 2020, 11:43 AM IST
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महफिलों के महकते मंजर 'विश्वरंग 2020'
पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) ने पिछले वर्ष विश्वरंग को परंपरा और आधुनिकता का संयोग कहा था. मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में गए बरस शुरू हुए इस विराट महोत्सव की मेजबानी इस साल दुनिया के पन्द्रह से भी ज्यादा देश कर रहे हैं.
रोशनी के छंद गाती कार्तिक की सुरमई शामें.... संस्कृति की तन्मय तान, विरासत का विजय गान और संवादों की लय पर विचारों का आदान-प्रदान. एक खुला आसमान जहां शब्द, दृश्य, रंग, ध्वनि और छवियों का संसार मनुष्यता की इबारत रच रहा है. कला की कस्तूरी बह रही है. लालित्य की लालिमा से ओर-छोर दमक रहा है. यूं वक्त की किताब में एक सुनहरा पन्ना जिसके माथे पर लिखा है- 'विश्वरंग'. साहित्य और संस्कृति का ऐसा अनुष्ठान, जहां सृजन का अभिषेक सारी कायनात के अमन, सुकून, प्रेम और भाईचारे के लिए है.

कुछ ऐसे ही चंपई अहसास जब यादों के दरीचे खटखटाते हैं तो विश्वरंग (Vishwarang) के खुलते आंगन में चहक-महक से तारी महफिलों के मंजर उजले होने लगते हैं. ये महफिलें हिन्दुस्तानी तहजीब के छलकते समंदर और उसमें सदियों से लहराती रवायतों के दरिया के किनारे बैठकर चौन के लम्हे गुजारने का बेशकीमती जरिया है.

अदब और तहजीब की रंग-ओ-महक के बेमिसाल सिलसिलों को थामता एक उत्सव. एक आन्दोलन. एक अभियान. एक मिशन. हमारे वक्ती दौर के जरूरी और ज्वलंत मुद्दों और विषयों पर बहस-मुबाहिसों का एक ऐसा समावेशी मंच, जहां तमाम खानाबंदियों से निकलकर विचार की खुली सांस भरी जा सकती है. यह मुमकिन हुआ है- 'विश्वरंग' में.

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में गए बरस शुरू हुए इस विराट महोत्सव की मेजबानी इस साल दुनिया के पन्द्रह से भी ज्यादा देश कर रहे हैं. दिलचस्प यह कि इस सांस्कृतिक अनुष्ठान का सपना रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय जैसे निजी शैक्षणिक संस्थान ने देखा और उसे बड़ी ही सूझबूझ भरी रचनात्मक आपसदारी के साथ पूरा किया. यहां शब्द, दृश्य, रंग-लय और ध्वनियों का खूबसूरत ताना-बाना रचने साहित्य, संस्कृति, कला, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, पर्यावरण, मीडिया और उद्यमिता की गुणी और नामचीन शख्सियतें साथ-साथ हैं. 20 से 29 नवंबर के दरमियान 'विश्वरंग 2020' अपने वर्चुअल मंच के जरिये दुनिया भर में दस्तक दे रहा है.
एक उत्सव के संयोजन में भारतीय भाषाओं और इंसानी उसूलों की महक को थामना उसके मकसद को खुलासा करता है. यह मकसद तब और गहरा हो जाता है जब कोविड-19 (Covid-19) की महामारी (Pandemic) से जूझती दुनिया अवसाद से घिरी है. 'विश्वरंग' के स्वप्न दृष्टा, कथाकार-कवि और टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे इस अभियान को अपने समय की एक जरूरी सांस्कृतिक हस्तक्षेप की पहल बताते हैं.

पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी ने पिछले वर्ष 'विश्वरंग' को परंपरा और आधुनिकता का संयोग कहकर इसकी अहमियत को रेखांकित किया था. विश्वरंग की अवधारणा के मूल में हिन्दी और तमाम भारतीय भाषाओं तथा संस्कृतियों के बीच परस्पर सम्मान का रिश्ता है. यहां बोलियों की मटियारी महक है. साहित्य और कला की विभिन्न विधाओं के बीच वो संवाद है, जहां जीवन का छलकता रस-रंग है. प्रयोग और नवाचारों की श्रृंखला में इस बार अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह और बच्चों के लिए चहक-महक भरी गतिविधियां जुड़ीं तो युवा और नौनिहाल पीढ़ी की उमंग-तरंग भी यहां तैरने लगी है.

विश्वरंग की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां इस सच के पास ले जाती हैं कि साहित्य और कलाओं के अन्तर्सबंधों की बुनियाद में सदा से एक सृजनात्मक बेचैनी रही है. वो अकुलाहट जो नया, अनूठा और बहुरंगी रचना चाहती है. हमारा समूचा सांस्कृतिक परिवेश इसी कलात्मक विविधता, सौन्दर्य बोध और अपार आनंद से सराबोर है. कहीं कोई कविता, कोई छंद, सुर-ताल से हमजोली कर रहा है, कहीं देह की भाषा उसके मर्म को नृत्य में अभिव्यक्त कर रही है, कहीं कोई कथा-उपन्यास और नाटक रंगमंच पर अभिनय की छवियों में साकार हो रहे हैं तो रंग-रेखाओं और मूर्ति-शिल्पों में कोई भावमय लगन जीवन के देखे-अनदेखे दृश्यों को उकेर रही है. खेत-खलिहानों से लेकर गाँव की चौपाल और छोटे कस्बों और शहरों से लेकर राजधानियों और महानगरों तक कलात्मक कौतुहल की ये बानगियां देखी जा सकती हैं. आपाधापी भरी बोझिल और बेस्वाद होती जा रही दुनिया आखिर थक-हार कर संस्कृति की छांव में ही सुस्तानी चाहती है.इस जखीरे में क्या कुछ नहीं है. इबादत के पाक सुरों में घुली ध्रुपद की तानों से लेकर शहनाई का मंगल गान, गुदुम बाजा का खिलखिलाता नाद, संतूर और बांसुरी की जुगलबंदी पर भक्ति और प्रेम की मोहर लगाती बंदिशें, कबीर, टैगोर और परंपरा के लोक गीतों का संगीत बिखेरता कोरस, उत्तरपूर्वी राज्य शिलांग की धरती से उठी स्वर लहरियां और इन तमाम रंगों-महक को चरम पर ले जाती सूफियाना मौसिकी की महफिलें. 'विश्वरंग' की इसी सुंदर थाल में थिरकती जनजातीय और लोक नृत्यों की लय-ताल और मुद्राओं की नृत्यमय छवियों को निहारना भी सुखद है.

रंगमंच पर संवाद और अदाकारी की बेमिसाल प्रस्तुतियों का सिलसिला भी और दरो-दीवार पर चस्पा चुनिंदा कलाकृतियां जो रंग-रेखाओं के जरिए कलागुरु टैगोर के प्रति कृतज्ञता से भरा श्रद्धा सुमन हैं. रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के टैगोर विश्व कला एवम् संस्कृति केन्द्र के संयोजन में तैयार हुआ यह सांस्कृतिक ताना-बाना इस बात की ताईद करता है कि जीवन को सुन्दर' खुशहाल और यकीन से हरा-भरा बनाती संगीत, नृत्य, नाटक और चित्रकला जैसी सृजन की विधाएं प्रार्थना के पलों सी सात्विक हैं. यहां मन का रंजन है तो बहुलता में एकता का संदेश भी सघन है.

दुनिया के इस पहले और अकेले महोत्सव के मुख्य सूत्रधार संतोष चौबे इस प्रकल्प की सफलता को लेकर कहते हैं- लगभग दो वर्षों से 'विश्वरंग' की परियोजना तैयार की जा रही थी और मैं कहूं कि आधा काम तो हमने करके दिखा दिया है. यानी इस उत्सव की पृष्ठभूमि या कहें पूर्वरंग में पुस्तक यात्राएं निकलीं. युवा उत्सव हुए. इससे जो व्यापक हलचल पैदा हुई है, इससे जो ऊर्जा पैदा हुई है, उसको अब समन्वित कर रहे हैं. एक बहुत जरूरी बात यह कि जितने उत्सवी समारोहों होते हैं वो कभी स्थानीय संस्थाओं को शामिल नहीं करते.

हमारी कोशिश रही है कि हमारे शहर के, हमारे प्रदेश की जो संस्थाएं हैं वो उसका हिस्सा बनें और बहुत ही प्रसन्नता की बात है कि भोपाल की सभी संस्थाओं ने पूरे दिल से इसमें शामिल होने का निर्णय लिया. धीरे-धीरे तिनका-तिनका जोड़कर हम बड़ी टीम बनाते गए और जैसे कि कृष्ण भगवान ने पूरा पर्वत उठा लिया था और बहुत सारी उंगलियां उसमें लगी थीं, इस तरह से बहुत सारे लोगों का हाथ इसमें लगा. हमारे कार्यकारी समूह के सभी विश्वविद्यालय, हमारी पूरी टीम 'विश्वरंग' की जिम्मेदारियां सम्हालती रहीं. मुझे लगता है एक आपसी समझदारी, पारिवारिकता, समावेषी प्रवृत्ति बहुत बड़ी चीज है, जो कि इसको आगे ले जाती है और यह भी इस उत्सव का बड़ा हासिल है.

इस विश्वव्यापी रचनात्मक अभियान से गुजरते यह धारणा गहरी होती है कि मनुष्य को विज्ञान की जितनी जरूरत है और कलाओं की भी उतनी ही. अगर हमें सन्तुलित, विचारशील, संवेदनशील मनुष्य बनाना है तो वह विज्ञान की तकनीकों को हासिल करेगा, लेकिन कलाओं की तकनीकों को भी प्राप्त करेगा और कलात्मक रूप से सोचने के लिए वह समृद्ध होगा.

'विश्वरंग' का बीज मंत्र मनुष्य की महिमा का उद्घोष है जो शताब्दियों से चली आ रही महान सांस्कृतिक परंपरा के गौरव को गाना, अपने समय की नई धड़कनों को सुनना चाहता है. परिकल्पना, संयोजन और पूरे सांस्कृतिक विन्यास में 'विश्वरंग' की यह मंशा मूर्त होती दिखाई देती है. गीतकार रामवल्लभ आचार्य का 'छंद' कहता है- 'जिसमें सम्वेदन की सुगंध, अनुराग-राग के ललित बंध, यह 'विश्वरंग' यह 'विश्वरंग.'
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: November 22, 2020, 11:43 AM IST
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