सच्चा गुरू अपने शिष्यों में जीवित रहता है

गुरू स्वयं 'ज्ञान रूप' हैं, वे ज्ञान के लिये किसी शास्त्र पर निर्भर नहीं, वे ऐसी विभूति हैं जिन्होंने 'ज्ञान' को अपना 'आचरण' बना लिया है. यही वह प्रमुख कारण है जिसके चलते 'गुरू की सन्निधि' का इतना महत्व है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 24, 2021, 7:00 AM IST
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सच्चा गुरू अपने शिष्यों में जीवित रहता है
गुरू और शिष्य के संबंधों के पीछे की आध्यात्मिक अवधारणा पर डॉ. कपिल तिवारी का कहना है कि गुरू-शिष्य संबंध और इस संबंध की परंपरा जानना आवश्यक है. हमारे पारंपरिक संज्ञान में 'संसार' को संबंधों का संसार कहा गया है. कुछ संबंध हैं जो 'रक्त संबंध' हैं, वे हमारा चुनाव नहीं जो सामाजिक संबंध हैं, उन्हें हम अपने प्रयोजन से निर्मित करते हैं. गुरू-शिष्य संबंध न तो रक्त संबंध हैं और न ही किसी प्रयोजन से बनाया गया सामाजिक संबंध. यह तत्वतः एक 'आध्यात्मिक संबंध' है.

गुरू के पास हम एक विशेष ज्ञान, विशेष प्रतिभा, विशेष साधना, विशेष सर्जना, विशेष आचरण और विशेष सिद्धि के लिये जाते हैं. एक शिष्य का 'समर्पण' ही इस संबंध की आधारशिला है. गुरू-शिष्य परंपरा का पहला रूप आध्यात्मिक साधना से संबंध रखता है. आत्मज्ञान प्राप्ति के लिय सदियों-सदियों से भारत में जिज्ञासु, शिष्यत्व ग्रहण करने सिद्ध गुरूओं के पास जाते रहे हैं. योग साधना और तंत्र साधना तो बिना गुरू के संभवव नहीं है.

शैव और वैष्णव परंपरा में भी यहां तक कि निराकार ब्रह्म साधना में भी 'गुरू' का सानिध्य और उनका मार्गदर्शन आवश्यक माना गया है. सिख धर्म तो गुरू-शिष्य परंपरा का ही धर्म है. महान सिख गुरूओं के ज्ञान, साधना और कर्म के सन्निधि में जो भी दीक्षित है वह सिख या शिष्य है. बौद्ध और जैन धर्म जैसे श्रवण परंपरा के धर्मों में तथा बौद्ध परंपरा के जापानी रूप झेन साधना तथा इस्लामिक सूफी साधना में गुरू बहुत महत्वपूर्ण हैं.


ज्ञान की परंपरा का एक रूप है, जहां संसार खोजा जाता है, लेकिन जिस परंपरा की बात यहां की जा रही है, उसमें संसार या संसार के विषयों की खोज नहीं, बल्कि स्वयं अपनी खोज की जाती है. जो सब विषयों को खोजता है, वह अपनी खोज में लग जाता है. एक सिद्ध गुरू के सानिध्य में साधना से वह एक दिन स्वयं को पा लेता है. यही हमारी परंपरा में 'समग्रता' का ज्ञान है. यह परम उपलब्धि है, फिर खोजने और पाने को कुछ बचता नहीं.
आत्मगर्भ से अपने से अपने को जन्म देकर व्यक्ति पहली बार जीवनमुक्त होता है. इस स्थिति में सिर्फ 'पाप' नहीं 'पुण्य' भी छूट जाता है और सिर्फ 'राग' नहीं 'विराग' भी खो जाता है, केवल 'होना' शेष रहता है. यह है 'सदगुरू' का 'काम' यही है उनकी 'करूणा'. इसी 'उपकार' के लिए 'संत' अपनी रचनाओं में 'गुरू की महिमा के गीत' गाते हैं, फिर भी कोई 'गीत' और कोई 'कृतज्ञता' उस महिमा को पूरा नहीं कर पाती.

गुरू का महत्व प्रतिपादित करने वाली पद्धतियां
अब सवाल है कि क्या आध्यात्मिक ज्ञान अन्य संसाधनों से प्राप्त नहीं किया जा सकता? हमारे यहां वे कौन-सी पद्धतियां हैं, जिनमें गुरू का महत्व प्रतिपादित हुआ है? इस सवाल पर डॉ. कपिल तिवारी का कहना है कि शिष्य की वास्तविक क्षमता को सिर्फ सिद्ध गुरू जानते हैं. शिष्य की अपनी क्षमता और पात्रता क्या है, इसे सम्यक् रूप से समझकर ही वे कोई विधि, कोई सूत्र, कोई साधना और कोई शब्द देते हैं. साधना की प्रगति में वे प्रत्येक स्तर पर शिष्य की सहायता और मार्गदर्शन करते रहते हैं.एक सीमा के बाद वे स्वयं को शिष्य से दूर कर लेते हैं, ताकि वह उन पर निर्भर न हो जाये. यह भी आध्यात्मिक मार्ग पर गुरू की करूणा है, ताकि शिष्य विकसित हो और गुरू पर निर्भर न रहे. सत्य की खोज का मार्ग अंततः अकेले ही करना होता है, उसका कोई पूर्व निर्धारित मार्ग नहीं है. अकेले चलने का साहस विकसित हो, गुरू ऐसा इसलिए करते हैं. आध्यात्मिक क्षेत्र में हम जिस गुरू-शिष्य परंपरा की चर्चा कर रहे हैं, उसमें गुरू के 'सानिध्य' का बड़ा महत्व है.

गुरू स्वयं 'ज्ञान रूप' हैं, वे ज्ञान के लिये किसी शास्त्र पर निर्भर नहीं, वे ऐसी विभूति हैं जिन्होंने 'ज्ञान' को अपना 'आचरण' बना लिया है. यही वह प्रमुख कारण है जिसके चलते 'गुरू की सन्निधि' का इतना महत्व है. गुरू-शिष्य परंपरा का दूसरा रूप लालित्य के क्षेत्र में रहा है. विविध कला अनुशासनों में दक्षता और सिद्धि के लिये शिष्य, योग्य गुरूओं के सानिध्य में नाट्य, चित्र, शिल्प और विशेष रूप से संगीत का ज्ञान प्राप्त करने जाते रहे हैं. आज इसे समझना कठिन है.


कला व्यावसायिक हो गई है. वह विभिन्न आयोजनों में लोगों के मनोरंजन का साधन है, उस पर प्रचार माध्यमों और बाजार का दबाव है. लेकिन एक समय रहा है जब लालित्य की पृष्ठभूमि अपने आध्यात्मिक आधार से जुड़ी थी. संगीत और नृत्य 'आराधना का एक ढंग या पद्धति' के रूप में मान्य थे. अधिकांश शास्त्रीय नृत्य मंदिरों की परंपरा से जुड़े रहे हैं तथा संकीर्तन और ध्रुपद गायन का विकास भी बहुत कुछ इसी परंपरा में हुआ है. वैष्णव भक्ति आंदोलन के साथ तो भारतीय कला के विकास का एक अद्भुत उन्मेष हुआ.

भारतीय काव्य परंपरा के श्रेष्ठतम् की रचना इसी समय हुई. आध्यात्मिक साधना और लालित्य सर्जना इसमें जुड़े रहे हैं इस पूरी 'रचना विरासत' में भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की शक्ति विन्यसत है. लालित्य की सिद्धि के लिये भी एक श्रेष्ठ 'कला सिद्ध' की आवश्यकता है. एक सच्चा जिज्ञासु किसी माध्यम विशेष का व्याकरण सीखने भर नहीं, बल्कि उस माध्यम में 'अन्तर्निहित सत्य' को जानने वर्षों एक गुरू के सानिध्य में अभ्यासरत रहता था.

अपनी साधना और समर्पण में कला का रहस्य प्रकट होने तक वह साधक तल्लीन रहता था. इसमें केवल एक कला माध्यम में सिद्धि प्राप्त करने का प्रश्न उतना महत्वपूर्ण नहीं था, जितना यह कि प्रत्येक कला माध्यम अपने आप में सत्य की अभिव्यक्ति के लिये 'परिपूर्ण' है किसी और देव, किसी और प्रार्थना, किसी और शास्त्र की आवश्यकता नहीं. क्योंकि 'कला का आत्यंतिक रहस्य' जीवन से बड़ा नहीं है. यदि स्वयं अस्तित्व एक साधक के सामने अपना सत्य प्रकट करता है, तो कला का सत्य उसमें प्रतिफलित होगा ही, वह कला बहुत बड़ी हो जाती है.

गुरू-शिष्य परंपरा में तीसरा क्षेत्र था- विद्या का. शिक्षा के लिये एक उपयुक्त जानकार गुरू के पास शिष्य का जाना. विद्या, एक शिष्य की रूचि, प्रतिभा और पात्रता का प्रश्न है. एक शिष्य में विद्या के कौन से रूप और क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करने की क्षमता है इसे परख कर ही योग्य गुरू एक विद्या विशेष में शिष्य को शिक्षित करते थे. तत्वतः यह 'ज्ञान' का क्षेत्र था.

आज के शैक्षणिक वातावरण में गुरू की क्या अर्थक्ता है?
आज शिक्षा के केन्द्र में 'ज्ञान' नहीं 'जानकारी' है. 'प्रतिभा' और 'पात्रता' का प्रश्न बचा ही नहीं है. 'गुरू' की जगह 'नौकरीपेशा अध्यापक' ने ले ली है और 'शिष्य' की जगह 'छात्र' ने. विद्या प्राप्त करने की 'जिज्ञासा' का प्रश्न नहीं, शिक्षा प्राप्त करने की अनिवार्य बाध्यता है. सारा ध्यान केन्द्रित है ऐसी शिक्षा पर जो 'नौकरी' दे सके, इसे कहा गया-व्यावसायिक शिक्षा.

अब 'ज्ञान' की शिक्षा का कोई अर्थ नहीं रहा. दर्शन, साहित्य, भाषा या ललित कलाओं की शिक्षा 'रोजगार' नहीं दे सकती तो इनका कोई मूल्य नहीं बचा. प्राकृतिक विज्ञान, वाणिज्य और प्रबंधन तथा कम्प्यूटर की शिक्षा ही सबको चाहिये. रही-सही कसर शिक्षा के व्यवसायीकरण ने पूरी कर दी. शिक्षा अब 'लाभदायक धंधा' है और दुष्ट राजनीति के पंजे में फँसी है. कुछ चीजें जीवन में ऐसी रही हैं जो 'धंधे' या लाभ-हानि के 'गणित' और राजनीति से बची रहीं शिक्षा उनमें एक थी.


अब यह संभव नहीं रहा. लेकिन एक बात तय है- परंपरा ने हमें बताया कि 'विद्या' का 'धंधा' नहीं किया जा सकता, जो लोग विद्या का भी धंधा कर लें वे एक दिन अपनी 'आत्मा' का भी धंधा शुरू कर देते हैं, फिर कोई सीमा नहीं. परंपरा ने हमें यह भी बताया कि 'जानकारी' कभी 'ज्ञान' का विकल्प नहीं हो सकती जो समाज शिक्षा के नाम पर 'जानकारी' को ज्ञान का विकल्प बना रहे हैं वे देर-सबेर एक 'सम्पन्न मूर्ख' समाज में बदल जायेंगे. यही उनकी नियति है.

'ज्ञान' अपना विकल्प स्वयं है. विद्या सिर्फ 'शिक्षा' नहीं वह एक गुरू की सन्निधि में प्राप्त होने वाला 'दुर्लभ संज्ञान' है, इसलिये विद्या का क्षेत्र 'गुरू-शिष्य' परंपरा का क्षेत्र रहा है. आध्यात्मिक साधना, लालित्य के क्षेत्र में सिद्धि और विद्या के माध्यम से ज्ञान प्राप्ति ये तीन क्षेत्र विशेष रूप से भारत में गुरू-शिष्य परंपरा के क्षेत्र रहे हैं. जब भी हम गुरू-शिष्य परंपरा का स्मरण करें, इन तीनों क्षेत्रों को उल्लेखित करना चाहिए.

लोक कला-संस्कृति में गुरू-शिष्य के संबंधों की गहरी परंपरा का कारण
जहां तक पारंपरिक संस्कृति में गुरू-शिष्य परंपरा का प्रश्न है, उसे थोड़ा भिन्न संदर्भ में समझने की आवश्यकता है. अधिकांश लोग यह समझते हैं कि गुरू-शिष्य परंपरा केवल शास्त्रीय कलाओं में रही है क्योंकि यहां कला के एक विशिष्ट व्याकरण और अनुशासन में दक्ष होना पड़ता है जबकि लोक कलाओं में इसकी आवश्यकता नहीं होती. वास्तविकता यह है कि लोक जीवन में एक सांस्कृतिक परंपरा स्वयं 'गुरू' होती है. एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सहज ही यह ज्ञान हस्तांतरित करती है.

विभिन्न पर्वों-त्यौहारों और अवसर-अनुष्ठानों पर होने वाले नृत्य-संगीत में बुजुर्गों के साथ युवा भागीदारी करते हैं. जैसे सांस्कृतिक संज्ञान की परंपरा सहज ही हमारा उत्तराधिकार होती हे, ठीक वैसे ही लोक और जनजातीय जीवन की कला परंपरा भी. यहां कोई व्यक्ति 'गुरू' नहीं होता. सभी सामुदायिक कला परंपराओं में 'परंपरा' स्वयं 'गुरू' होती हैं यह बहुत बड़ी घटना है, क्योंकि इसमें सिर्फ एक 'नृत्य' में कुशलता प्राप्त करने का सवाल नहीं है, उसके पीछे जो सांस्कृतिक परंपरा और संज्ञान, वह भी एक नई पीढ़ी तक आता है.

एक कला माध्यम में दक्षता प्राप्त करने से बहुत व्यापक है यह. क्योंकि यह 'सांस्कृतिक परंपरा के पूरे बोध' का प्रश्न है. मैंने अनेक अवसरों पर, अनेक तरह से भारतीय जीवन में 'वाचिक परंपरा' का उल्लेख किया है. मैं लंबे अर्से से यह स्पष्ट करने का प्रयत्न करता रहा हूं कि जब हम इस देश में 'वाचिक' का उपयोग करें तो यह साफ तौर से समझ लें कि भारत में वाचिक केवल 'मौखिक साहित्य' परंपरा ही नहीं है. वास्तविकता यह है कि भारत में सारा 'पारंपरिक संज्ञान' वाचिक है.

वाचिक की व्याप्ति का क्षेत्र भारत में इतना व्यापक है. वह शब्द की परंपरा में है- वह नृत्य, संगीत, चित्र, शिल्प, स्थापत्य, कृषि, मौसम, स्वास्थ्य विज्ञान, ज्योतिष, वास्तु और अनुष्ठानों तक फैला है. यह तो पूरी जीवन परंपरा है. एक किसान के पास अपने पुत्र को मौसम, बीज और खेती का ज्ञान सिखाने कौन-सा शास्त्र अथवा व्याकरण है? एक मिट्टी अथवा काष्ठ शिल्पी अपने परिवार के लोगों को कैसे शिल्प सिखाता है? कोई किताब है? कोई कक्षा है? कोई अध्यापक है? ऐसा तो कुछ भी नहीं.


यह तो सारा ज्ञान उस क्षेत्र में काम करते-करते एक बच्चा सीख जाता है. जैसे मातृ भाषा कौन सिखाता है? लेकिन प्रत्येक व्यक्ति बोलने के लिये एक भाषा जानता है. मेरे कहने का आशय है कि 'वाचिकता' परंपरा की मातृभाषा है. इसी अर्थ में कह रहा हूं कि लोक परंपरा में जो गुरू-शिष्य परंपरा है, वह वाचिक है. इसके माध्यम से एक पूरी परंपरा का संज्ञान नई पीढ़ी को होता है. यह 'व्यक्ति केंद्रित' गुरू-शिष्य परंपरा से बहुत बड़ी चीज़ है, अनेक आयाम हैं उसके.

साथ ही, यदि कोई सांस्कृतिक परंपरा एक जीवंत परंपरा भी हो, तो उसे एक निरंतरता में समझने की जरूरत है. वह सदा के लिये खो गई एक परंपरा की 'स्मृति' नहीं, बल्कि जीवन्त वर्तमान है. अभी प्रवाहित है वह नदी सूखकर खो नहीं गई है. भारत में परंपरा पर विचार करते यह ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि इस पर बहुत सारी चीज़ें निर्भर करती हैं.

मौजूदा समय में गुरु की जरूरत
अब सवाल यह है कि विज्ञान और तकनीक के फलते-फूलते समय और समाज में गुरू की उपस्थिति कितनी जरूरी और महत्वपूर्ण रह गई है? इस पर डॉ. कपिल तिवारी का कहना है कि समय के परिवर्तन से, विज्ञान और तकनीक ने अनेक साधन और विधियाँ हमें दी हैं. थोड़ा समझने की कोशिश करिये-तकनीक स्वयं आध्यात्म, लालित्य और विद्या के क्षेत्र में क्या कर सकती है? वह अभिव्यक्ति और संप्रेषण के ढंग में परिवर्तन कर सकती है, स्वयं ज्ञान, सौंदर्यबोध और विद्या नहीं हो सकती.

आखिर हम इतने सारे साधनों और तकनीक के बावजूद क्यों कुछ विशिष्ट और दुर्लभ रूपाकारों और शैलियों के ज्ञान के लिये गुरू-शिष्य परंपरा के कुछ केंद्र स्थापित कर रहे है? हम अनेक शास्त्रीय नृत्यों और ध्रुपद जैसी संगीत शैलियों के लिये गुरू-शिष्य परंपरा पर आधारित कुछ कला केंद्र स्थापित कर उसकी पुनर्स्थापना कर रहे हैं? तकनीक 'ज्ञान और सौन्दर्यबोध' का विकल्प नहीं है. उसकी भूमिका अब संरक्षण, दस्तावेजीकरण और अभिव्यक्ति के क्षेत्र का विस्तार करने में है.

तकनीक की अपनी यह क्षमता बड़ी विशाल है और वहां उसका उपयोग किया जाना चाहिये. प्रविधि और तकनीक संगीत पैदा नहीं कर सकतीं, लेकिन संगीत रसिकों के समाज का दायरा बहुत बढ़ सकती हैं और उसने यह किया भी है. पहिले एक महान संगीतकार के अवसान के साथ ही एक स्वर सदा के लिए खो जाता था. शिष्यों और घरानों के रूप में एक परंपरा जरूर बचती थी, लेकिन स्वयं उस आवाज़ को बचाने का कोई उपाय नहीं था. हमें तकनीक का ऋणी होना चाहिए कि उसने यह दिया.

सौंदर्यबोध और ज्ञान बहुत व्यक्तिनिष्ट हैं, वहां तकनीक की कोई भूमिका नहीं. वह कुछ नहीं कर सकती. जैसे 'प्रतिभा' पैदा नहीं की जा सकतीं, उसे अभ्यास से केवल 'प्रखर' को उत्पन्न नहीं किया जा सकता. ठीक इसी प्रकार सौंदर्यबोध लालित्य दृष्टि के दर्शन के रूप में भारतीय काव्य शास्त्र का विकास रस, अलंकार, वक्रोक्ति और ध्वनि आदि संप्रदायों में हुआ है. यह एक पूरी परंपरा है. यह 'कल्ट' या 'स्कूलिंग' है. दर्शन के क्षेत्र में इसी प्रकार की प्रवृत्ति देखने मिलती है.


भारत में गुरू-शिष्य परंपरा और एक विशेष 'विचार' के आधार पर विकसित 'संप्रदाय' या 'गुरूकुल' रहे हैं जहां समवेत रूप से एक विचार का विकास बहुत सारे लोगों ने एक साथ किया और वह एक परंपरा बन गई. दरअसल मैं यह कहना चाहता हूं कि भारत में गुरू-शिष्य परंपरा को कोई आयामों में समझने की जरूरत है. तकनीक और प्रविधि के क्षेत्र दूसरे हैं, वे कला के क्षेत्र में सम्प्रेषण और माध्यम के विस्तार में भूमिका निभाते हैं, स्वयं कला का विकल्प नहीं बन सकते.

कला सृजन मानीवय अद्वितीयता और अनूठापन है, वह प्रतिभा और साधना है, वह सौंदर्यबोध की विशेष क्षमता और उसकी अभिव्यक्ति का कौशल है. जब तक यह 'अद्वितीयता' है तब तक तकनीक की भूमिका सीमित होगी.

शिष्य को गुरू के रूप में स्वीकृति
गुरू भी कभी शिष्य रहे होंगे. प्रशिक्षण और ज्ञान अर्जन की प्रक्रिया में कब वह क्षण आता है जब एक शिष्य गुरू में बदल जाता है या कि उसे गुरू के रूप में स्वीकृति मिल जाती है? इस सवाल पर डॉ. कपिल तिवारी का कहना है कि गुरू अचानक पैदा नहीं हो जाते. शिष्य तो होना ही होता है. कुछ अपवाद साधना के क्षेत्र में हैं, जहां एक सिद्ध व्यक्ति की कोई गुरू परम्परा नहीं थी, किन्तु उनसे स्वयं एक परम्परा का आरंभ हुआ.

बुद्ध के पहले कोई 'बौद्ध परम्परा' नहीं थी, वे एक महान आध्यात्मिक परम्परा का आरंभ हैं, जबकि भगवान महावीर चौबीस जैन तीर्थकरों की परम्परा में अन्तिम हैं, उनमें एक परम्परा का समापन है. संगीत के क्षेत्र में महान् संगीतज्ञ तानसेन और बैजू-बावरा ने गुरू-शिष्य परम्परा में स्वामी हरिदास से संगीत सीखा किन्तु हरिदास की कोई गुरू परम्परा नहीं थी वे 'स्वयं गुरू' थे.

जहां तक एक शिष्य के गुरू के रूप में अनुभव के क्षण का प्रश्न है- आध्यात्म में 'आत्मोपलब्धि' और लालित्य में पूर्ण 'सौन्दर्यानुभव' को व्यक्त करने की अपनी माध्यम में एक 'विशेष क्षमता' ही जब साधक और शिष्य के अनुभव में आ जाती है, एक शिष्य गुरू हो जाता है. जहां तक स्वीकृति का प्रश्न है- गुरू के रूप में स्वीकृति तो एक सामाजिक प्रश्न है. अनेक क्षमतावान गुरू हुए जिन्हें एक अनुकूल परिस्थिति में बहुत युवा अवस्था में ही गुरू की मान्यता प्राप्त हो गई.

अनेक सिद्ध ऐसे भी हुए जिन्हें उनके जीवनकाल में कोई नहीं जानता था. इससे विशेष अन्तर नहीं पड़ता. एक आध्यात्मिक गुरू अपनी आत्मा के सत्य को जान ले, उसने समग्र जान लिया फिर कौन चिन्ता करता है तुम्हारी सामाजिक मान्यता की? समाज मान्यता दे, सम्मान या अपमान करे, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. समाज जीता है अतीत में, समाज के पास सिद्धों को समझने की आँख नहीं होती, उसके पास पूर्व निर्धारित मान्यताएँ और धारणाएँ होती हैं, जबकि ज्ञान की परम्परा में कोई दोहराव नहीं होता.

कबीर, बुद्ध के जैसे नहीं हैं, बुद्ध, कृष्ण की भाँति नहीं, नौ नाथ और चौरासी सिद्ध भी बिल्कुल एक जैसे नहीं हैं, नानक की महिमा बिलकुल अलग है, जबकि समाज के पास आत्मा को उपलब्ध कए महापुरूष के चित्र और मूर्तियाँ होती हैं- धारण और ग्रहण होते हैं. समाज चाहता है जब तक कोई उसकी धारण के अनुकूल नहीं होगा तो वह उसे ज्ञानी सिद्ध कैसे मान लें? उसे राम, कृष्ण, बुद्ध और करीब जैसे महापुरूष ही चाहिये. उनके जैसे रूप, उनके जैसी वेशभूषा, उनके जैसे विचार, उनके जैसे प्रणाली. तभी मान्यता.


यद्यपि ज्ञान सनातन है किन्तु ज्ञान अपने को उसी रूप में कभी दोहराता नहीं है. ज्ञान की अभिव्यक्ति प्रत्येक गुरू, प्रत्येक सिद्ध, प्रत्येक महापुरूष के पास बिलकुल अलग और अनूठी होती हैं महानता कभी पुनरूक्ति और दोहराव नहीं, 'अद्वितीयता' है. न उसके पहिले और न कभी उसके बाद उसके जैसी अभिव्यक्ति संभव होगी. बुद्ध इस संसार में अकेले हैं- बौद्ध बहुत हो सकते हैं, कबीर अनूठे हैं, ठीक उस रूप में फिर कोई कबीर नहीं होगा, कबीरपंथी हो सकते हैं.

न तो 'ज्ञान' और न ही उसे जानने वाले 'ज्ञानी' एक जैसे होते हैं. समाज 'ज्ञान' को पकड़ लेता है. एक ज्ञानी के 'रूप' और 'ढंग' को पकड़ लेता है- वैसा ही चाहिये, नहीं तो मान्यता में दिक्कत है. एक वास्तविक 'गुरू' समाज की मान्यता के लिये अपने को वैसा बनाने से रहा जिसे हम मान्य करते हैं. लालित्य में यही हैं उस्ताद अलाउद्दीन खाँ जैसे महान संगीतज्ञ एक ही होते हैं. वे घरानों से आते हैं फिर भी वे घरानों की विरासत और विरासत की सीमा का अतिक्रमण एक साथ हैं.

पंडित कुमार गंधर्व अद्वितीय हैं वे बाबा अलाउद्दीन जैसे नहीं. सर्जना में 'प्रतिभा' अनूठी और अद्वितीय है. उस अद्वितीयता को समाज समझे तब तक बहुत देर हो जाती हैं हम जीवित प्रतिभाओं का अपमान और अपेक्षा करते हैं, बाद में उनकी मूर्तियाँ बनाते हैं- शास्त्र पढ़ने हैं, पंथ और सम्प्रदाय बनाते हैं, इनके लिये विवाद करते हैं, वे लोग तो जा चुके हैं जिनके लिये यह सब कुछ होता रहता है. क्या जीवन काल में और क्या बाद में आपको ऐसा लगता है कि हम सचमुच इनका समादर करते हैं.

क्या फर्क है गुरू और शिक्षक में?
क्या गुरू का संबंध सिर्फ ज्ञान के हस्तांतरण से है. अक्सर अकादेमिक संस्थाओं के शिक्षकों को भी गुरू की संज्ञा दी जाती है. क्या फर्क है गुरू और शिक्षक में? इस पर डॉ. कपिल ने बताया कि गुरू और शिष्य के बीच संबंध ज्ञान के 'हस्तांतरण' का नहीं होता. ज्ञान हसतांतरित नहीं किया जा सकता. वह कोई भौतिक सम्पत्ति नहीं है. गुरू, शिष्य के लिये ज्ञान की क्षमता देते हैं, एक वातावरण, परिवेश और जीवनचर्या देते हैं, जिससे हम ठीक ढंग से ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता प्राप्त कर सकें. पात्रता जरूरी होती है.

वे हमें एक 'पात्र' बना देते हैं. अपात्रता दूर हो जाती है. फिर 'ज्ञान' जो हैं वह मूलतः अनुभव है- शास्त्रों की जानकारी, भाष्य, टीका, विद्वता, पांडित्य नहीं. एक वास्तविक आध्यात्मिक परम्परा में ज्ञान 'आचरण' है. एक सच्चे ज्ञानी को 'वाक्' में नहीं उसके 'आचरण' में देखना चाहिये. जो ज्ञान-अनुभव निपट एकान्तिक है, उसे हस्तांतरित नहीं किया जा सकता. गुरू और शिक्षक में अंतर पर मैं पहिले कुछ टिप्पणी कर चुका हूं. मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि एक अध्यापक और एक गुरू में अंतर है.

दोनों की यह असंगत तुलना या प्रयोग है. अध्यापक शिक्षित करता है- गुरू 'मुक्त' कर देता है. मुक्ति, अज्ञान और अविद्या से, मुक्ति अहंकार से, मुक्ति संसार से हमारे राग-द्वेष से, मुक्ति इच्छा और वासना से. वे अज्ञान से मुक्त करते हैं, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि वे 'ज्ञान' से भी मुक्त कर देते हैं. एक सीमा के बाद ज्ञान का बोध भी 'शुद्ध आत्मा' के लिये एक बंधन हैं. पाप ही से नहीं, पुण्य से भी मुक्ति. शिक्षक हमें तैयार करते हैं समाज के लिये और जीवन के लिये.

गुरू हमें समर्थ बनाते हैं अपने लिये और फिर अपने से मुक्त करने के लिये. वे समाज भर के लिये नहीं हैं, सारे अस्तित्व के लिये भेंट करने हमें निर्मित करते हैं.

गुरू-शिष्य परंपरा में सान्निध्य का कितना महत्व है?
गुरू-शिष्य परम्परा का सारा महत्व 'सान्निध्य' में है. गुरू की सन्निधि में शिष्य 'साधना' करता है. आध्यात्मिक परंपरा में गुरू स्वयं 'ज्ञान रूप' और 'ज्ञान' गुरू का आचरण है. हम सहज ही समझ सकते हैं कि गुरू की 'सन्निधि' में एक शिष्य कितना सीख सकता है. साधना के सारे प्रयोग व्यवहारिक हैं, एक गुरू की देखरेख और मार्गदर्शन में ही वे किये जाते हैं, अन्यथा उन प्रयोगों का कोई महत्व नहीं. कोई साधक शास्त्र और ग्रंथ पढ़कर अपने बलबूते इन प्रयोगों को नहीं कर सकता, इसके अपने जोखिम हैं.

एक शिष्य की क्षमता को सिद्ध गुरू अच्छे से जानते हैं, हम क्षमता के आधार पर ही किसी खास प्रयोग को आरंभ किया जाता है, जरूरी नहीं कि सभी शिष्यों को एक से प्रयोग, एक सी विधियों पर काम कराया जाये, इसमें शिष्य की पात्रता महत्वपूर्ण है. गुरू की गहन सन्निधि के बिना यह संभव नहीं. सान्निध्य का ही महत्व है. उदाहरण के लिये उपनिषदों को देखिये. 'उपनिषद' का शाब्दिक अर्थ है 'निकट बैठना' पास-पास बैठना. एक 'गुरू' के पास 'शिष्य' का 'जिज्ञासु' का निकट बैठना.


उपनिषद जिज्ञासु शिष्य के प्रश्न और ऋषि के उत्तर है. सिर्फ एक जिज्ञासु के लिये दिये उत्तर है. वह कोई भीड़ या सभा को सम्बोधन नहीं दिया गया है. दो लोगों के बीच गहन संबंध है. जब सच्ची जिज्ञासा के तल पर प्रश्न हैं और जिसने जान लिया है उसके उत्तर है. शिष्य है विनय और श्रद्धा में और गुरू है आत्मीयता और करूणा में. तब जो 'संवाद' संभव हुआ वह 'उपनिषद'. गुरू-शिष्य परंपरा में ज्ञान की सन्निधि. कभी-कभी एक वास्तविक 'पात्र' या सच्चे शिष्य की जीवन पर 'प्रतीक्षा' की गई है.

यदि वह नहीं आया तो वह ज्ञान किसी को नहीं दिया गया. बहुत सारे उपनिषद संभव नहीं हुये हैं, क्योंकि उनके लिये उपयुक्त 'शिष्य' नहीं थे. उन 'प्रश्नों' को पूछने वाली 'प्रतिभा' नहीं थी. यदि 'प्रतिभाशाली शिष्य' भी थे, तो गुरू के प्रति वह 'समर्पण' और श्रद्धा नहीं थी जिसके चलते परम प्रश्नों के सहज उत्तर दिये जा सकते. शिष्य हो, सच्ची जिज्ञासा हो और समर्पण भी हो तभी कुछ प्रश्नों के उत्तर संभव होते हैं. दूर से अनेक 'गुरू' रहे हैं जिन्हें 'ज्ञान' था, वे उत्तर दे सकते थे, उनमें सामर्थ्य था, लेकिन 'शिष्य' नहीं थे.

जीवन व्यतीत हो गया प्रतीक्षा में- शिष्य नहीं आया तो वह उत्तर वह ज्ञान गुरू के साथ ही चला गया-किन्तु अपात्र को नहीं दिया गया. इसलिये कह रहा हूं कि बहुत सारे उपनिषद अभिव्यक्त नहीं हो सके हैं. उस स्तर का सानिध्य संभव नहीं हो सका. शिष्यों की प्रतीक्षा में कितना ज्ञान प्रकट ही नहीं हो सका, अंदाज लगाना मुश्किल है. लेकिन जितना प्रकट हुआ है, वह आध्यात्मिक क्षेत्र की दुनिया का श्रेष्ठतम् है. मुझे नहीं मालूम कि धरती पर कहीं भी और कभी भी वैसी कोटि के प्रश्न और उतनी महिमा के उत्तर संभव हुये हैं.

यहां सदियों-सदियों तक जितनी विधियों और प्रणालियों पर गुरूओं और शिष्यों के समूहों ने काम किया है, वैसा कहीं भी संभव हुआ होगा, मुझे बड़ा संदेह है. बिना सानिध्य के यह कैसे सम्भव होता? न तो शिष्य की 'पात्रता' और नही गुरू की 'क्षमता' का कोई पता चलता. यह संबंध बड़ा अद्भुत है. वह शिष्य नहीं हो सकता जिसे 'जानने' का अहंकार है और वह गुरू नहीं हो सकता जिसने जान लिया है लेकिन किसी को अपना ज्ञान देना नहीं चाहता. बिना एक सानिध्य के यह घटना नहीं हो सकती. सानिध्य के बिना तो यह परम्परा चल ही नहीं सकती थी.

गुरू के रूप में हमें पुरूष समाज का ही वर्चस्व
गुरू के रूप में हमें पुरूष समाज का ही वर्चस्व देखने मिलता है. महिलाओं के उदाहरण नगण्य हैं. इसके क्या प्राकृतिक और सामाजिक कारण हैं? डॉ. कपिल बताते हैं कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण और दिलचस्प प्रश्न है. सबसे पहिले कुछ लक्षणों को देखना होगा. वे प्राकृतिक लक्षण हैं. स्त्री, प्रकृति का विस्तार है. प्रकृति परिणाम धर्मा है. पुरूष प्रकृति के विस्तार का 'निमित्त' है. स्त्री 'अस्तित्व की पूर्णता में लीन' और 'आत्मतृप्त' है, उसे 'आप्तकाम' होने 'ज्ञान' के आयाम की आवश्यकता नहीं.

सब कुछ रचने वाले 'पुरूष' की रचना कर, उसे अपने अस्तित्व की धन्यता के लिये कोई और आयाम नहीं चाहिये. आत्मतत्व के साक्षात्कार का जो अनुभव एक पुरूष को परिपूर्णता के धन्यभाव में ले जाता है, वह स्त्री के लिये प्रकृति ने सहज ही दिया है. किसी को सिखाने और समर्थ बनाने की एक पुरूष को जो थोड़ा-बहुत अहंकार चाहिये, वह भी स्त्रैण में नहीं होता, इसलिये वह अपने स्वभाव से भी किसी का गुरू नहीं होना चाहती. और सबसे बड़ी बात 'स्त्रैणता' एक संरक्षण में, एक परम्परा में विकसित होती है, स्वयं स्त्रियाँ उसे सम्भव करती हैं.

प्रत्येक सामाजिक परम्परा में यह अन्तनिर्हित है. आप चाहें तो उसे गुरू-शिष्य परम्परा जैसा कुछ कह लें. मेरे विचार में यह उससे बड़ी बात है. सारी पारिवारिक और सामाजिक परम्परा ही स्त्री 'ग्राहक चित्त' है. वह सीखना और ग्रहण करना चाहती है, सिखाना उसे अपने स्वभाव के अनुकूल नहीं लगता. स्त्री के व्यक्तित्व के विकास में एक गुरू-शिष्य परम्परा हैं आपने गौर किया होगा आध्यात्म में, लालित्य में स्त्रियों को लेकर कोई सम्प्रदाय नहीं स्थापित हुये.

मीराबाई, सहजो, दयाबाई और राबिया जैसे आत्मोपलब्ध महान् संत हैं, उनकी कोई शिष्य परम्परा नहीं. मीरा भावोल्लास के जिस अतल समुद्र में है उसे, किसी और को समझना कठिन है. आखिर वह कौन-सी भाषा होगी जिसमें वे अपनी दशा को व्यक्त कर पायेंगी? अथाह प्रेम और सम्वेदना का वह समुद्र कैसे किसी को बताया जा सकेगा? वे तो जगत नियन्ता कृष्ण पर अपना एकछत्र दावा करती हैं, वे उनके प्रेमी हैं. हम जो कुछ सोच सकते हैं वह विचार के तल पर होता हैं उसी को हम मानवीय अस्तित्व की एक समग्रता मान लेते हैं.


स्त्रियाँ होती है भाव के तल पर. भाव की शक्ति, विचार की सीमित मानसिक-बौद्धिक शक्ति से बहुत बड़ी है. उनका सोचना भी भाव शक्ति से होता है. वे विचार भी भाव के तल पर करती हैं. प्रकृति ने उन्हीं इसकी विशेष क्षमता दी है. मैं आपसे चर्चा कर रहा था, उन प्राकृतिक कारणों की जिनके चलते एक विशेष प्रवृत्ति, विशेष स्वभाव और विशेष क्षमता स्त्री में होती है. थोड़ी चर्चा उन सामाजिक कारणों की भी करना चाहिये, जिनके कारण यह स्थिति बनी है.

समाज में वर्चस्व है पुरूषों का. सामाजिक व्यवस्था के सूत्र उनके हाथ में हैं. सदियों तक, स्त्रियों की सामाजिक भूमिका नगग्ण् रही. स्वतंत्रता के बाद एक बदलाव धीरे-धीरे आ रहा है-शिक्षा, सामाजिक क्षेत्र, राजनीति, व्यवसाय प्रबंध, प्रशासन जैसे अनेक क्षेत्रों में स्त्रियों की भूमिका का विस्तार हो रहा है. अनेक स्त्रियों ने आध्यात्मिक और कला क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान बनाया है, उनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है और यह अच्छा लक्षण है.

मैं आपसे कहना चाहता हूं कि स्त्री से बड़ा 'गुरू' कोई नहीं हो सकता. मातृत्व की गुरूता सबसे बड़ी है. जिन महासिद्धों और कालजयी कलाकारों को हम जानते हैं वे भी अपनी माताओं के अनन्य भक्त हैं. इससे अधिक मैं आपसे कुछ नहीं कह सकता क्योंकि इस विषय में, बहुत भावुक हो जाता हूं.


एक सुभाषित है- "गुरू एक अक्षर का ज्ञान भी शिष्य को दे दे, तो पृथ्वी पर ऐसा कोई द्रव्य नहीं जिसे देकर शिष्य ऋण मुक्त हो जाए." किसी द्रव्य के बिना ऐसी क्या चीज है जो गुरू के प्रति ऋण-भाव से शिष्य को मुक्त कर सकती है या यह भाव ही उचित नहीं. हां, यह सच है कि एक शिष्य किसी भी द्रव्य की दक्षिणा देकर गुरू के ऋण से मुक्त नहीं हो सकता. मां हमें जन्म देती है आखिर वह कौन सी चीज है जिसे देकर हम मातृऋण से मुक्त हो सकते हैं?

मां हमें गर्भ में धारण करती है, जन्म देती है, पालती-पोसती है. इस ऋण से मुक्त होना संभव नहीं, कुछ भी करके, कुछ भी देकर यह संभव नहीं. गुरू हमारे भीतर ही हमें एक और जन्म देते हैं. वे 'आत्मगर्भा' बना कर हमसे ही हमें एक और जन्म देते हैं. यहां जन्म का चक्र ही समाप्त हो जाता है, मृत्यु का चक्र भी समाप्त हो जाता है.

आपने बिल्कुल ठीक कहा- कभी-कभी तो मन्त्र के रूप में सिर्फ एक शब्द देकर ही गुरू अपनी महान् अहेतुक कृपा की वर्षा करते हैं. सिर्फ एक शब्द काफी है- लेकिन वही जानते हैं सिर्फ कि शब्द कौन सा? एक शिष्य की क्षमता और पात्रता को, उसके स्वभाव को, शिष्य के अन्तर्तम में प्रवेश कर गुरू जानते हैं, तभी कोई विधि, कोई अभ्यास, कोई मन्त्र, कोई शब्द दिया जाता हैं सवाल एक मन्त्र और शब्द का नहीं है शिष्य के लिए उसकी पात्रता के अनुकूल क्या उपयुक्त है, इसका है.

केवल एक शब्द आपका जीवन बदल सकता है आप कुछ और हो सकते हैं. इस संसार में हम एक संभावना की तरह आते हैं. ‘आत्मज्ञान’ परम सम्भावना है और प्रत्येक व्यक्ति में यह सम्भावना मौजूद है. इसे यथार्थ में बदल देते हैं, इसलिए ऋण इतना बड़ा है. जन्म की सम्भावना को यथार्थ में बदलती है हमारी मां, उनका ऋण चुकाना सम्भव नहीं है, जन्म को सार्थक कर देते हैं गुरू, उनकी इस कृपा के लिए कृतज्ञता होती है. एक ही तरह से थोड़ा कर्तव्य पूरा कर सकते हैं. जिसने अपने को खोजने की अभीप्सा पाली है, जो यत्न कर रहा है उसे सहारा देना, उसे मार्ग बताना.


गुरू ने जो ज्ञान दिया उसे बांटना. ज्ञान पर भी लोग कब्जा करके बैठ जाते हैं, वे किसी को ज्ञान देना नहीं चाहते. ऐसे ही लोग ‘ब्रह्म राक्षस’ बन जाते होंगे. ज्ञान की प्रकृति में ही ऐसा कुछ नहीं निहित है कि उस पर ‘स्वामित्व’ सम्भव नहीं. वह बहुमूल्य सम्पदा है लेकिन सम्पत्ति नहीं कि उसकी वसीयत की जा सके. जो अपने गुरू की कृपा से कृतज्ञ महसूस करते हैं ऐसे शिष्य एक दिन स्वयं अपना अर्जित ज्ञान, दूसरों को देते हैं, एक हद तक यही दान गुरू के ऋण से मुक्त करता है. यही वास्तविक गुरू दक्षिणा है, ज्ञान की परम्परा ऐसे ही आगे बढ़ती है.

बदलते सांस्कृतिक संदर्भों में गुरू-शिष्य परंपरा
बदलते सांस्कृतिक संदर्भों में गुरू-शिष्य परंपरा की ऐतिहासिक गरिमा निश्चय ही आहत हुई है. इसके भावी संकेत को लेकर डॉ. कपिल कहते हैं कि देश-काल के प्रभाव से प्रश्न बदल जाते हैं, स्थितियाँ बदलती हैं, परम्परा में भी परिवर्तन होते हैं. गुरू-शिष्य परम्परा के तीन क्षेत्र मैंने लक्ष्य किये थे. उनकी चर्चा पहिले कर चुका हूं. आध्यात्मिक क्षेत्र में आज स्थिति बड़ी विचित्र हैं. अधिकांश लोग स्वानुभव के बिना ही धार्मिक नेता बन बैठे हैं. उन्हें स्वयं अपनी आत्मा और सत्य का कोई अता-पता नहीं है.

कुछ हैं जो धार्मिक राजनीति कर रहे हैं, कुछ हैं जिन्होंने जीविका के लिए धार्मिक आख्यानों पर प्रवचन का काम लगभग व्यावसायिक स्तर पर शुरू किया है. कुछ साधारण नैतिक सदाचरण को ही एक धार्मिक आचरण के विकल्प में प्रस्तुत करते हैं और ऐसा मानते हैं कि समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है, यदि नैतिक आचरण में सुधार आ जाये तो धार्मिक जीवन का विकास होगा.

पौराणिक आख्यानों के प्रवचन अच्छे हैं, नैतिक उपदेश भी ठीक हैं लेकिन कठिनाई यह है कि अधिकांश लोगों ने ऐसे प्रवचनकारों और नैतिक सदुपदेशकों को गुरू की महिमा दे दी है और साधारण नैतिक उपदेशों और प्रवचनों अथवा पौराणिक कथाओं पर व्याख्या करने और सुनने को ही धार्मिकता का विकल्प बना रखा है. वास्तविक धार्मिक जीवन है चेतना का विकास, चेतना का ऊर्ध्वगमन. यह व्यावहारिक है, प्रयोगात्मक है, इसलिए विज्ञान है. चेतना के विकास का विज्ञान, भारत में विकसित नहीं होने दिया जाता.

धर्म के नाम पर मंदिर, देवता, पूजा, पुरानी प्रार्थनाएँ, धर्मग्रंथ, नीति उपदेश, मिथकीयता और पौराणिकता को ही धर्माचरण और धार्मिकता बताकर, आध्यात्मिक विकास अवरूद्ध कर दिया जाता है. वह होता है योग से, तंत्र से, ध्यान से. अपने को ही खोजना है, ईश्वर क्या खोजा जायेगा? अपनी खोज पूरा होते ही बाहर के सभी भगवानों की खोज समाप्त हो जाती है. एक सर्वव्याप्त चेतना की अखंडता ही सारी सृष्टि में व्याप्त है- यह पता चलता है.


यह भगवत्ता है. अपने से बाहर, जो कुछ भी धर्म और ईश्वर की खोज में बताया-समझाया जाता है, सारे विवाद और झगड़े उसके हैं. आध्यात्मिक दीप्ति के बिना धर्म इसी अर्थ में साराहीन और कर्मकांड हैं, वह पुरोहितवाद है और उसके यत्न राजनीति और सत्ता के लिए समर्पित हो जाते हैं.

यहां गुरू की क्या जरूरत है? गुरू की जरूरत है जहां प्रयोग करना है, जहां विधियों पर काम होता है. जहां चेतना को विकसित करने एक शिष्य को मार्गदर्शन की जरूरत है. जहां ‘आत्मज्ञान’ का बोध ही धर्म है. वहां शिष्य को चाहिये एक गुरू. एक गुरू को चाहिये सच्चा जिज्ञासु जो अनुभव में उतरने राजी हो, जो अपना मन और अहंकार खोने राजी हो. जो अपनी पुरानी पहचान और स्थापित छवियाँ मिटाने का साहस करे, जो जीवन के जैसा ही मृत्यु के लिए भी स्वागतपूर्ण हो, क्योंकि वे अलग-अलग नहीं है.

यदि आत्मा शाश्वत है तो ‘मृत्यु’ अंतिम नहीं हो सकती. वहां हम भयपूर्ण मृत्युबोध के कारण धर्म में उत्सुक नहीं होते. आत्मा की अनंतता और अनश्वता के अनुभव के आनन्द से धर्म में उत्सुक होते हैं. हम इसलिए धर्म के पास नहीं जाते कि मरने के बाद कोई स्वर्ग मिलने वाला है, और यदि धर्म के पास नहीं गये, धर्म नहीं किया तो कोई नर्क हमारी प्रतीक्षा में बैठा है. जिसने अपनी आत्मा के दर्शन किये, उसने समग्रता की तरह सृष्टि को जाना उसका स्वर्ग तो यही है, अभी है.

जो शरीर और मन की तरह ही अपने को जानता है और संसार से बंधा है उसे क्या नर्क के लिए, मृत्यु की प्रतीक्षा करने की जरूरत है? जब तक हम ईश्वर को बाहर खोजते रहेंगे, गुरू की कोई जरूरत नहीं होगी बहुत सारे मंदिर है, बहुत से देवता हैं, बहुत से धर्म ग्रंथ और शास्त्र हैं, बचपन से कंठस्थ करा दी गई प्रार्थनाएँ और संस्कार हैं, प्रवचन और उपदेश हैं. जब प्रश्न अपने को खोजने का होगा, गुरू जरूरी होंगे.


अब लालित्य में-आज संगीत, नृत्य, चित्र, स्थापत्य, नाट्य और काव्य के लिए कौन अपने वरिष्ठों से कुछ सीखना चाहता है? कौन संगीतकार है जिसे यह प्रतीति है कि संगीत अपने में पर्याप्त है और कुछ खोजने की जरूरत नहीं. ऐसा नृत्य, जो अपनी प्रतीति ही भुला दे और सृष्टि की मूल ऊर्जा में हमारी वृत्ति को लय कर दे-अपने लिये नृत्य- किसी के देखने के लिए नहीं, ‘नृत्य प्रवीणता’ के लिए नहीं.

सभी के लिए एक शिक्षक चाहिये जो संगीत या नृत्य का व्याकरण सिखा दे ताकि हम एक सफल संगीतकार या नर्तक की तरह मंच पर लोगों के देखने और पैसा या प्रसिद्धि के लिए प्रदर्शन करने लेंगे. वह एक कला माध्यम में, व्याकरण सीखकर जीविका का जरिया बन जाये. बस इतना काफी है. किसके लिये संगीत अपनी खोज का माध्यम है? किसके लिए नृत्य सृष्टि की पूर्णता को अनुभव कर लेने का दर्शन है? किसी के लिए जब होगा तब, एक गुरू की जरूरत होगी, तब एक शिक्षक से काम नहीं चलेगा.

विद्या का क्षेत्र हमने नष्ट कर लिया है. सारी शिक्षा अपने से बाहर जो ‘संसार’ है उसे जानने और उसमें एक विशेषज्ञता प्राप्त करने की है. अपने को जानने की विद्या के लिए फिर एक सच्चा गुरू चाहिये, जो बाहर की दुनिया को जानने की हमारी यात्रा को हमारी ही तरफ मोड़ दे. अपने को जान लो, दुनियां भी जान लोगे. अपन को भूलकर जो संसार जाना जाता है संदिग्ध है तथाकथित है, अविश्वसनीय है.


इसलिए कह रहा हूं जिसे संसार जानना है अपने को भूलकर वो शिक्षक-अध्यापक से तृप्त हो सकता है. जो अपने को जानना चाहता है और संसार भी, उसे गुरू ही चाहिये.

एक सच्चा गुरू सदा चाहता है- ‘शिष्य से पराजय’
एक वास्तविक गुरू के लिए जय-पराजय का कोई अर्थ नहीं होता. वह जीतना ही नहीं चाहता, तो उसकी पराजय असंभव है. जय-पराजय का बोध होता है अहंकार को. यदि मनुष्य अहंकार के परे चला जाये तो जय-पराजय की तरह जीवन भासता ही नहीं. अपने से ही पराजित एक आदमी संसार में सबको जीतना चाहता है. जिसने अपने पर विजय पा ली, वह और किसी को क्यों जीतना चाहेगा? हां सार्थकता का बोध जरूर होता है.

एक गुरू किसी शिष्य को कुछ सिखायें, वह सत्य में, प्रेम में, करूणा में, सम्वेदना में सिद्ध हो तो गुरू के लिए क्या चाहिये? प्रतीति होती है कि समय और श्रम, ज्ञान और उसे किसी शिष्य को देने के प्रयास सार्थक हुए. एक सच्चा गुरू सदा अपने शिष्यों में जीवित होता है. जैसे ज्ञान में वैसे ही शिष्यों की एक परम्परा में भी गुरू अमर होते हैं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: July 24, 2021, 7:00 AM IST
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