हरिहरन की हसरत- ‘रूह में इबादत की तरह महकता रहूं’

आध्यात्मिक जाग्रति की सिद्ध पीठ करूणाधाम आश्रम के इस सांस्कृतिक अनुष्ठान में शब्द-संगीत का अभिषेक करने अनंत सुब्रमणियम हरिहरन का आना संगीत के कद्रदानों के लिए ख़ुशगवार ख़बर थी. लिहाज़ा गर्म लिहाफ़ों से ढंके नौजवान और प्रौढ़ ही नहीं, उम्रदराज़ श्रोता भी रवीन्द्र भवन के मुक्ताकाश में सजी इस महफि़ल में खिंचे चले आए.

Source: News18Hindi Last updated on: December 29, 2021, 1:59 pm IST
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हरिहरन की हसरत- ‘रूह में इबादत की तरह महकता रहूं’


 


च्चे सुरों की कसौटी यही है कि वे आत्मा के आसन पर देवता की तरह विराजें. कुछ आवाज़ें इसी अहोभाव के साथ कंठ में अपना बसेरा तलाशती हैं. फिर उनके सुर का हर क़तरा इबादत की तरह महकता हुआ फिज़ाओं में फैल जाता है. जाड़े की वो पुरनम गुलाबी शाम भी तो प्रार्थना के ऐसे ही भाव-स्वरों में डूबी थी. संध्या पूजा का मुहूर्त था. खरज का शुद्ध सुर लगाते हरिहरन ने विराट को पुकारा- ‘तुम्हीं मेरे रसना, तुम्हीं मेरे नैना, तुम्हीं मेरे श्रवणा…’. ताल-शिखरों, मंदिरों-मसजि़दों, मीनारों-मेहराबों और अदब-तहज़ीब की बेमिसाल रवायतों के शहर भोपाल में गायक-संगीतकार पद्मश्री हरिहरन की यह आमद एक मुद्दत बाद हुई. वज़ह बना- ‘नादस्वरम्’.


आध्यात्मिक जाग्रति की सिद्ध पीठ करूणाधाम आश्रम के इस सांस्कृतिक अनुष्ठान में शब्द-संगीत का अभिषेक करने अनंत सुब्रमणियम हरिहरन का आना संगीत के कद्रदानों के लिए ख़ुशगवार ख़बर थी. लिहाज़ा गर्म लिहाफ़ों से ढंके नौजवान और प्रौढ़ ही नहीं, उम्रदराज़ श्रोता भी रवीन्द्र भवन के मुक्ताकाश में सजी इस महफि़ल में खिंचे चले आए.


प्रसंगवश यह जानना ग़ैर ज़रूरी नहीं कि करूणाधाम आश्रम को सेवा, संवेदना, सहकार और साधना की अनमोल विरासत सौंपने वाले शक्ति के अनन्य साधक ब्रह्यलीन पंडित बालगोविंद शांडिल्य के जन्मदिवस की पूर्व संध्या हर बरस ऐसा ही सतरंगी उजियारा बिखरता है. यूँ एक अन्तर्लय जागती है. अनहद का आलोक भीतर कहीं धमनियों में उतरता है. यह भारतीय संस्कारों का ही तकाज़ा है कि करूणाधाम के वर्तमान पीठाधीश्वर पंडित सुदेश शांडिल्य ने अपने पिता की स्मृति का यह सुरीला दीपक रौशन रखा है.


हरिहरन ने इस आमंत्रण को सादर स्वीकार किया और मुंबई से भोपाल की उड़ान भरी. ताल-तलैयों का यह शहर हरिहरन की पसंदीदा जगह है. इस नगरी से उनका पुराना सांस्कृतिक रिश्ता है. मरहूम सारंगी नवाज़ उस्ताद अब्दुल लतीफ खाँ, संगीत सेवी श्याम मुंशी, शायर बशीर बद्र, संस्कृतिकर्मी सुरेश तांतेड़…. और भी कई नाम और चेहरे हरिहरन की याददाश्त में गहरे चस्पा है. वे इन शखि़्सयतों का जि़क्र करना नहीं भूले.


उन्हें बाक़ायदा याद है कि 1977 में एक संगीत स्पर्धा में गाते हुए उन्हें संगीतकार जयदेव ने सुना और मुज़फ्फर अली की फि़ल्म ‘गमन’ में पार्श्व गायन के लिए चुन लिया और इस घटना के ठीक बाद भोपाल की संस्था अभिनव कला परिषद ने हरिहरन को ‘कल के कलाकार’ कार्यक्रम में आमंत्रित किया था. ये वही रवीन्द्र भवन का परिसर था जहाँ एक नौजवान फ़नकार अपने सुनहरे कल की आहटों को संजोये करीब चालीस साल पहले शायरी और मौसिक़ी की महफि़ल में सामयिन के सामने नमूदार था.


तालीम, रियाज़ जि़द, जुनून और जज़्बा ही था कि हरिहरन के सुर निखरते गये. संगीत की समझ गहराती गयी और कामयाबी उन्हें गले लगाते रही. हरिहरन ने इस धारणा को ध्वस्त किया कि दक्षिण भारत की आबो-हवा में परवरिश पाने वाला फ़नकार हिन्दी-उर्दू की चौखट पर बमुश्किल ही ठहर पाता है. हरिहरन का हौसला और यक़ीन ही था कि वे मौसिक़ी के जिस इलाक़े में गये, फ़तह पायी. मलयालम, कन्नड़, बांग्ला, हिन्दी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी का गीत-संगीत गले में पनाह पाता रहा.


गीत, ग़ज़ल, भजन…. जिस जॉनर में दाखिल हुए गहरे तक डूबे-उतराए. राग-रागिनियों में बंधी बंदिशों की गमकदार तानों और उठते-गिरते सरगम से लेकर ग़ज़ल के पुरकशिश अहसास और गीतों में लहराती मीठी मादक तरंगों को हरिहरन अनायास ही अंजोर लेते हैं. वे पॉप और जॉर्ज के साथ इंडियन फ्यूज़न करते हुए सारी सरहदें सात सुरों में समेट लेते हैं. वे कहते हैं कि सुर व्यक्तित्व को निखारता है. हमारे इमोशंस को, भीतर के रस-भाव को जगाता है. नौ रस संगीत के सात सुरों में छलक उठते हैं.


हरिहरन अपना तजुरबा साझा करते हुए बताते हैं कि हिन्दुस्तान ही नहीं दुनिया के किसी भी मुल्क के इंसान को लें, नौ रस हर मनुष्य के भीतर मौजूद हैं. सुर की सोहबत में आकर ये रस जाग उठते हैं. बस, गायक या वादक के सुर में वो ताक़त होना ज़रूरी है. ये कुव्वत या कौशल लगातार रियाज़ और विनम्रता से हासिल होते हैं. शास्त्रीय संगीत की अहमियत यहाँ बढ़ जाती है जो हर सुर को बड़ी ही शिद्दत से बरतने का सलीका सिखाता है.


हरिहरन के फ़न की हैसियत उनके इन विचारों के आसपास तौली जा सकती है जो उनके गान-व्यक्तित्व में बहुत साफ़ झलकती. उन्होंने हर कि़स्म का संगीत सुना है, गुना है और अपनी तरह उसे हज़ारों बंदिशों में बरता है. वे नई नस्ल के कलाकारों को भी यही मशविरा देते हैं कि कुदरत ने अगर उन्हें सौभाग्य से अच्छी आवाज़ और सुर की समझ दी है तो अच्छे गुरू-उस्ताद के पास जाकर तालीम लें, रियाज़ करें. मंच, महफिल, तालियों, शाबाशियों और ईनाम पाकर कम उम्र में गुमराह न हो जाएँ.


हरिहरन का कहना है कि किसी भी मंच पर ईश्वर का अपमान कर टीआरपी बटोरना ठीक नहीं है. यदि कोई कलाकार ऐसा कर रहा है तो इस प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए. कुनाल कामरा और मुनव्वर फारूखी जैसे कामेडियन को एक बड़े नेता द्वारा मप्र आमंत्रित करने के सवाल पर उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि सकारात्मक ऊर्जा को स्वीकार करें और नकारात्मक ऊर्जा को रोकें. उन्होंने कहा कि संगीत के क्षेत्र में कई बदलाव आए हैं.


आज रियलिटी शोज़ के माध्यम से बच्चों को अच्छा एक्सपोज़र मिलता है लेकिन इन मंचों से निकले बच्चे हमेशा क़ामयाब गायक नहीं बनते हैं, जबकि वे खुद को गायक समझने लगते हैं और बदकि़स्मती से आगे सीखना छोड़ देते हैं. संगीत अनवरत सीखने की प्रक्रिया है. रियाज़ कभी न छोड़ें. उन्होंने कहा कि कुछ संगीत गुरू भी बच्चों को गुमराह कर रहे हैं. रिमिक्स के चलन को लेकर हरिहरन का कहना है कि इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन पुराने गानों को उनकी गरिमा के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए.


संगीत का बाज़ार, ग्लेमर, शोहरत, नए प्रयोग और सोशल मीडिया पर टीआरपी के फेर में पड़े नए कलाकारों को हरिहरन की सीख यही है कि लंबे समय तक अगर आपको जनता के बीच अपनी मौजूदगी बनाए रखना है तो लंबे समय तक रियाज़ और धीरज भी बनाए रखना होगा. मीठा, कर्णप्रिय और सुकून देने वाला संगीत समर्पण और तपस्या से आता है. एक संगीतकार का यह फजऱ् भी है कि वह समाज को सुरीला संस्कार दे. श्रोताओं को सुरों की अहमियत से वाकिफ़ कराए.


हरिहरन कहते हैं कि उन्होंने भी अपनी गायिकी में और प्रस्तुति में कई प्रयोग किए लेकिन सुरों की शुद्धता, उनकी पाकीज़गी से समझौता नहीं किया. उनके इस कहे की तस्दीक उनके गाये बेशुमार नग़मे हैं. अनगिनत महफि़लें हैं. कभी वे उस्ताद जा़किर हुसैन के साथ नुमाया होते हैं, कभी ए.आर. रहमान की संगत में तमिल फि़ल्मों का रूख भी कर लेते हैं. कभी आशा भोसले जैसी अग्रणी गायिका के साथ ग़ज़लों का सफ़र तय करते हैं. मणिरत्नम् की ‘रोज़ा’ से लेकर ‘बॉर्डर’ जैसी बहुचर्चित फि़ल्मों में पार्श्व गायन करते हुए राष्ट्रीय पुरस्कार के हक़दार बनते हैं.


हरिहरन ने अपनी शखि़्सयत को कुछ इस तरह गढ़ा है कि विवादों ने कभी उनकी चौखट पर दस्तक नहीं दी. भारतीयता उनके पोर-पोर में समायी है. ईश्वर के प्रति अनन्य आस्था और भारतीय जीवन मूल्यों का विश्वास लेकर वे नए ज़माने के साथ बड़ी शिद्दत से अपना राब्ता क़ायम कर लेते हैं. वे पहला गुरू अपनी माँ अलमेलु मणि को मानते हैं जिन्होंने अच्छी परवरिश के बीच हरिहरन को बड़ा किया. उनकी चाहत का भविष्य उन्हें सौंपा. यही वजह है कि हरिहरन ने भी अपने दो बेटों को उनके मनमाफि़क केरियर बनाने की आज़ादी दी. एक बेटा अक्षय म्यूजि़क प्रोड्यूसर है तो दूसरे बेटे करण को अभिनय की दुनिया रास आयी है.


 हरिहरन मितभाषी है लेकिन कम बोलकर भी वे अलहदा और उम्दा कहते हैं. उनकी ही गायी ग़ज़ल का ये शेर उनकी फि़तरत को बयां करता है- ‘जब कभी बोलना, वक़्त पर बोलना/मुद्दतों सोचना, मुख़्तसर बोलना’. हरिहरन की हसरत है कि वे इबादत की तरह रूह में महकते रहें!

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: December 29, 2021, 1:59 pm IST