लीला के रंग पटल पर भये प्रकट कृपाला

भोपाल में राम की कथा एक बार फिर अपनी रूप-छटाओं में खिल उठी. रामलीलाओं की मनोहारी सौगातों को एक ही मंच पर उतार लाने की पहल मध्यप्रदेश के संस्कृति महकमे ने की. एक ही मंच पर भारत की जनपदीय परंपरा में रची-बसी लीलाएं तो दूसरी ओर श्रीलंका और थाईलैंड जैसे सुदूर देशों के कलात्मक वैभव में श्रीराम कथा के प्रसंगों को देखना अनूठा अनुभव रहा.

Source: News18Hindi Last updated on: October 21, 2022, 8:15 pm IST
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लीला के रंग पटल पर भये प्रकट कृपाला
भोपाल के मंच पर रूपांतरित हुई गौरवशाली परंपरा

इधर कार्तिक मास की दस्तक के साथ जब शैल-शिखरों की नगरी भोपाल की वादियों में जाड़े की गुलाबी दस्तक हुई तो कलाओं की रंगभूमि भी यकायक गुलज़ार हुई. इससे पहले कि घर-द्वार-देहरी दीये की मुस्कुराती लौ से रोशन हों, रवींद्र भवन का मुक्ताकाश लीलाओं की लालिमा से दिपदिपा उठा! राम की कथा फिर अपनी रूप-छटाओं में खिल उठी. परंपराओं में बंधी शैलियों के अलग-अलग रंगों से तारी रामलीलाओं की इन मनोहारी सौगातों को एक ही मंच पर उतार लाने की पहल मध्यप्रदेश के संस्कृति महकमे ने की.


करीब हफ्ता भर चलने वाले इस अंतरराष्ट्रीय रामलीला उत्सव में गांव-कस्बों की तरह दर्शकों का रेला तो नहीं उमड़ा लेकिन हृदय प्रदेश की राजधानी के रंगमंच पर उत्सवों के मौसम में आध्यात्मिक रंजकता का जो उजाला बिखरा उसका सांस्कृतिक महत्व कम नहीं. एक ही मंच पर भारत की जनपदीय परंपरा में रची-बसी लीलाएं तो दूसरी ओर श्रीलंका और थाईलैंड जैसे सुदूर देशों के कलात्मक वैभव में श्रीराम कथा के प्रसंगों को देखना कौतुहल में तैरने की तरह था. इस उत्सव का एक महत्वपूर्ण आयाम हनुमान कथा पर केंद्रित बयालीस चित्रों की प्रदर्शनी ‘संकट मोचन’ थी जिसे वाराणसी के सुनील विश्वकर्मा ने पूरी रचनात्मक आस्था और भक्ति में लीन होकर उकेरा है.


दिलचस्प यह कि शताब्दियों से राम की कथा गीत-संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्र, चित्रपट सहित अभिव्यक्ति के अनेक माध्यमों से लोक और नागर समाज तक पहुंचती रही है लेकिन इसका अद्भुत रसायन ही है कि बार-बार दोहराए जाने के बावजूद नीरसता नहीं होती. शताब्दियों के कालक्रम में मंडलियों के कलाकार बदलते रहे पर लीलाओं के मंचन का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा. भोपाल के मंच पर भी लीलाओं की एक बहुरूपी दुनिया खुली. रामजन्म से लेकर गुरूदीक्षा, सीता स्वयंवर, वनगमन, पंचवटी, शूर्पणखा, शबरी, केवट, निषाद, सीताहरण, हनुमान मिलन, सुग्रीव, गरूड़, बाली, सेतुबंध, लक्ष्मण शक्ति राम-रावण युद्ध, लंकादहन, रावणवध और राम की अयोध्या वापसी तक अनेक प्रसंग कुछ नए कथा-संदर्भों के साथ उद्घाटित हुए.


इन प्रसंगों से गुजरते हुए राम की महिमा से जुड़े सूत्र पुनः विचार की कौंध जगाते हैं.लोक आस्था आज भी यह मानती है कि राम हमारे गौरव के प्रतिमान हैं. राम हमारे अंतरमन के प्राण हैं. राम हमारी पूजा, हमारे अरमान हैं. राम हमारी आस्थाओं का आसमान हैं. राम समय की देहरी पर सदैव प्रकाशमान एक ऐसा दीपक हैं जो युग-युगांतर से हमारे तमाम संशयों, प्रश्नों, रहस्यों और चुनौतियों के अंधेरों में समाधान का उजाला बनकर प्रकट हुए हैं. राम हमारी सभ्यता के मुकुट हैं. हमारी अस्मिता, हमारे गौरव हैं.


राम की कथा अनंत है… अपार है. वह आत्म दर्शन का उजाला है. जीवन की धन्यता का गान है. मनुष्यता बखान है. आदर्शों का आसमान है. सरलता शिखरों पर पहुंचकर महानता का प्रतिमान है. अध्यात्म के आकाश खिलते इंद्रधनुष की आभा है. सौंदर्य के सितार पर झरता प्रेम और सद्भाव संगीत है. शताब्दियां बीत गईं लेकिन राम इस धरती के रोम-रोम में रचा-बसा ऐसा दिव्य रसायन है जो अमरता का आश्वासन है. ज्ञानियों की पोथियों और प्रवचनों से लेकर अपनी अलमस्ती में डूबे गांव के पीर-फकीरों के कंठ से झरती रही है राम की कथा. शास्त्र कहता है-


यावत् स्थास्यंति गिरियः सरितश्य महीतले

यावत रामायण कथा लोकेषु प्रचरिस्यति.


यानि जब तक धरती पर पर्वत-नदियों का अस्तित्व रहेगा तब तक रामकथा प्रवाहित होती रहेगी. देश काल की सारी सीमाओं को लांघकर रामकथा जन-जन के अंतःकरण में व्याप्त है. उसके इस चमत्कारी विस्तार और प्रभाव को जब हम गौर से देखते हैं तो सांस्कृतिक परंपराओं में विन्यस्त कलाओं की एक बहुरंगी दुनिया से हमारा सामना होता है. शब्द में, गान में, रंग में, नृत्य और अभिनय में, सृजन की हर विधा में राम की कथा अभिव्यक्ति के ओर-छोर तक फैली है. लीला की रंगभूमि पर राम का अवतरण भी इसी कलात्मक सिलसिले का अमर इतिहास है. विशेषकर भारत के जन मानस में रामलीलाओं के प्रति गहरा और अटूट आकर्षण रहा है. यह अत्युक्ति नहीं कि भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण में रामलीलाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है.


महर्षि वाल्मिकी और संत शिरोमणि तुलसीदास तथा नव-प्रवर्तित राधेश्याम रामायण को आधार बनाकर भारत के हर राज्य की आंचलिक बोली तथा कलाओं के संयोग से नई-नई शैलियां विकसित होती गईऔर इस तरह रामलीला मंचन की परंपरा समृद्ध होती गयी.लोक जीवन का सारा आध्यात्मिक आनंद जैसे रामलीला में उमड़ पडता है. अनुराग और राग की ललित छवियों में लोक समुदाय अपने ही सुख-दुख की तस्‍वीरें निहारता है. राम की गाथा जैसे जीवन की धन्यता समेट लाती है. इसी गौरवशाली परंपरा को बरकरार रखते हुए म.प्र. शासन संस्कृति विभाग ने श्रीरामलीला उत्सव की शुरुआत लगभग चार दशक पहले की. भोपाल और इंदौर सहित ओरछा, रीवा और चित्रकूट में अयोध्या, बनारस, उडीसा, वृन्दावन और मधुबनी की आंचलिक शैलियों में इसके अनेक प्रदर्शन हुए हैं.


थाईलैंड में एक साहित्यिक कृति और प्रेम कथा है रामायण


थाई लोगों के लिए श्रीराम कोई भगवान नहीं है और न ही रामायण एक धार्मिक ग्रंथ है. उनके लिए राम की कहानी एक साहित्यिक कृति है, जिसका मंचन मनोरंजन के लिए एक नाटकीय रूपांतर में किया जाता है. यह कहना है पाविनी बूंसर का, जो फाइन एंड अप्लाइट आर्ट्स डिपार्टमेंट थम्मासैट विश्वविद्यालय, थाईलैंड में प्राध्यापक हैं. पावनी विश्वविद्यालय की एक अन्य महिला प्रोफेसर और चार छात्रों के साथ अंतरराष्ट्रीय श्रीरामलीला महोत्सव में नृत्य नाटिका ‘द एडवांस आफ समनक्खा, श्रीरामकथा’ का मंचन के लिए आई.


प्रस्तुति की निर्देशक पाविनी ने बताया कि श्रीराम के जीवन और कार्यों की कहानी को थाईलैंड में रामाकीन (जिसका अर्थ है राम की महिमा) कहा जाता है. यह बौद्ध दशरथ जातक पर आधारित एक प्राचीन ग्रंथ है. इसे रामायण का थाई संस्करण कह सकते हैं. उन्होंने बताया कि रामकियन में श्रीराम द्वारा रावण का वध किया जाता है, कहानी का सुखद अंत होता है. यह एक प्रेम कहानी है, श्रीराम और माता सीता की. पात्रों के नाम भी भिन्न हैं. इस प्रकार रावण को थोस्कन, राम को फाराम, लक्ष्मण को फाला और सीता को सीदा कहा जाता है. रामकियन लगभग पांच सौ वर्ष पुराना है और प्राचीन काल से जीवित है, जब थाईलैंड के शासक हिंदू धर्म से प्रभावित थे. अब थाईलैंड एक बौद्ध बाहुल्य देश है, जहां हिंदुओं की आबादी कुल आबादी का एक छोटा हिस्सा है.


मंडली की अन्य सदस्य, पनरीता, जो नृत्य नाटिका में श्रीराम की भूमिका निभाती हैं ने रामायण में श्रीराम की रचनात्मक भूमिका पर पीएचडी की है और थम्मसैट विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं. उन्होंने कहा कि मैंने रामायण पढ़ी है और भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी और कथककली सहित भारतीय शास्त्रीय नृत्यों को पसंद करती हूं. वह हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायिका गंगूबाई हंगल की भी प्रशंसक है. दोनों महिला प्रोफेसर थाईलैंड की शास्त्रीय नृत्य नाट्य शैली खान की कुशल कलाकार है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: October 21, 2022, 8:15 pm IST
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