कामायनी का पुनर्पाठ

Kamayani Epic Poem: हिंदी के आखर जगत में 'कामायनी' एक ऐसे महाकाव्य का सृजन था जिसमें भारतीय संस्कृति और मनुष्यता का गौरवगान है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 16, 2021, 1:09 PM IST
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कामायनी का पुनर्पाठ
जयशंकर प्रसाद.

इतिहास गवाह है कि जब-जब भी जीवन और प्रकृति की लय टूटी , हाहाकार मचा, लेकिन महाविनाश के बाद नवनिर्माण की कहानियां भी मनुष्य के महाविजय की तस्दीक करती हैं. इस दौरान प्रसाद की 'कामायनी' पढ़ते हुए दो समयों की समान्तर यात्रा से गुजरने का अनुभव हुआ. घटनाओं के रूप-स्वरूप भले ही जुदा हों ,पर त्रासदी का दंश और उससे जुड़े कई सवाल मिलते-जुलते हैं. प्रसंगवश यह जानना गैरज़रूरी नहीं कि कामायनी की रचना करीब पिच्यासी बरस पहले अप्रतिम कवि जयशंकर प्रसाद ने की थी. हिंदी के आखर जगत में यह एक ऐसे महाकाव्य का सृजन था जिसमें भारतीय संस्कृति और मनुष्यता का गौरवगान है. एक ऐसी वैश्विक आवाज़ , जो समरसता, शांति और सौहार्द की सुगंध बिखेरती उम्मीद के नये पंख पसारती है. साहित्य प्रेमी जानते ही हैं कि कामायनी की आत्मा में मनुष्यता की चिंता है. एक ओर मूल्यों का पतन, जीवन में पसरती निराशा, तो इसी गुबार के बीच चमकती उम्मीद फिर नए नीड़ के निर्माण की प्रेरणा बन जाती है. यहां महाजलप्लावन यानि प्रलय की विकराल पृष्ठभूमि है.


देव संस्कृति के वैभव और विलासिता ने जब मर्यादा की तमाम सीमाएं लांघ दी, तो परमशक्ति का क्रोध प्रलय बनकर प्रकट हुआ. देवों का नाश हुआ. एक ही प्रतिनिधि बचे मनुष्यता के प्रथम पिता - मनु , जो कामायनी यानि स्त्री पात्र श्रद्धा के सहचर बनकर तमाम संशयों, उलझनों और सवालों के समाधान तलाशते हुए फिर नए जीवन का सपना देखते हैं. पंद्रह सर्गों में फैला कामायनी का कथानक ज्ञान ,कर्म और इच्छा के बीच समरसता की स्थापना है. जब प्रसाद कहते हैं कि "प्रकृति के यौवन का शृंगार, कभी न करेंगे बासी फूल" तो आशय स्पष्ट है कि नई सोच, नई संकल्पना से ही जीवन की मूरत गढ़ी जा सकती है. यहां आत्ममंथन जीवन का नया उजाला देता है. अद्वैत का दर्शन सारी दुनिया से सहकार और समन्वयवादी संस्कृति का शंखनाद करता है.


दस्तावेज़ बताते हैं कि प्रसाद ने अस्थमा से जूझते हुए कामायनी को अंजाम दिया था. पुस्तकाकार उसे प्रकाशित होता देख उन्हें परम संतोष मिला था. साहित्य के संसार में इस महाकाव्य का व्यापक स्वागत हुआ था. आलंकारिक भाषा और गहरे भाव बिम्बों में बिंधे इस ग्रन्थ का अंग्रेज़ी में बड़े ही परिश्रम और रचनात्मक कौशल से अनुवाद किया है रतलाम , मध्यप्रदेश के रहवासी कवि-अध्येता रतन चौहान ने. इस अनुवाद को हिंदी के मूल टीका के साथ बोधि प्रकाशन ने 620 पृष्ठों में छापा है. भारत ही नहीं, दुनिया के दीगर मुल्कों के साहित्य प्रेमियों के लिए कामायनी इस दारुण दौर में विचार का सम्बल देने वाली पुस्तक साबित हो सकती है. निश्चय ही कामायनी का पुनर्पाठ मन की अनेक बेचैनियों को शांत करता है. उसका छंद यकीन देता है -'दुःख की पिछली रजनी बीच, विकसता सुख का नवल प्रभात.'


रतन चौहान की अकादमिक शिक्षा अंग्रेजी की रही. अंग्रेजी के विश्व साहित्य के साथ ही उन्होंने हिंदी के लगभग सभी महत्वपूर्ण ग्रंथों को रुचि और जिज्ञासा के साथ पढ़ा है. अनुवाद में उनकी गहरी दिलचस्पी रही है. विश्व के अनेक कवियों की रचनाओं का उन्होंने हिंदी और अंगेज़ी में तर्जुमा किया है, लेकिन कामायनी का अनुवाद उनके लिए सम्प्रेषण की चुनौती बना. लिहाज़ा मेहनत सिर्फ शब्द और भाषा के स्तर पर ही नहीं , कविता में निहित भाव और संवेग की दृष्टि से भी सहज करने की रही, लेकिन विश्व साहित्य की कोटि में खड़ी हिंदी की मानक पुस्तक का अनुवाद उन्हें ज़रूरी लगा. चूंकि प्रसाद छायावादी कवि रहे इसलिए बिम्ब, प्रतीक, उपमा, रूपक और अलंकारों के बहुतायत में प्रयोग उन्होंने किये. मूल भाषा से परे अनुवाद के लिए इस्तेमाल की जा रही भाषा में उन्हें हासिल करना या रचना नामुमकिन नहीं तो कठिन ज़रूर है. चौहान इस तारतम्य में बताते हैं कि लगभग 50 साल पहले उनके भीतर कामायनी के अंग्रेजी अनुवाद का ख़याल जागा था. तब वे छात्र थे और छायावादी काव्य सौंदर्य से बेहद प्रभावित थे. उस उम्र में भी यह काम किया तो था, लेकिन गहरी दृष्टि का अभाव था. बाद के सालों में प्रसाद के साहित्य पर बड़े लेखकों कि व्याख्याएं पढ़ीं, तो लगा कि कामायनी के अनुवाद पर फिर से काम करना चाहिए.

रतन चौहान ने अपनी इस महत्वाकांक्षी परियोजना के पूरे होने के बाद रंगकर्मी विक्रांत भट्ट से हुए विस्तृत संवाद में बताया कि कामायनी में वेद और शास्त्र की छाया है. भारत की संस्कृति के मूल्यों की चर्चा है. माइथोलॉजिकल वर्णन भी बीच में आते हैं. इन सबको कथानक के सन्दर्भ में समझने की दृष्टि रखकर सटीक भाषा में रूपायित करना मेरे लिए कसौटी था. फिर प्रसाद ने छंद अन्तर्निहित विधान में यह सब तुक के निर्वाह के साथ अन्तर्निहित है. यानी एक अन्तः संगीत है, लय है उसमें. ऐसे अनेक आयामों पर अनुवाद में काम करना मेरे लिए रोचक अनुभव रहा. चौहान कहते हैं कि अनुवाद प्रामाणिक हो इसलिए मैंने हिंदी शब्दों के लिए नालंदा हिंदी कोष और अंग्रेजी के लिए हार्न बी, ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी कि सहायता ली. मेरा मानना रहा कि सार्थक शब्द का अनुवाद के लिए मिल जाना ही उसे सार्थक अभिव्यक्ति के नज़दीक ले जाता है. गौरतलब है कि यह अनुवाद 2016 में किताबी शक्ल ले सका.


चौहान का मानना है कि कामायनी जैसी किताबों का अंग्रेजी में अनुवाद दुनिया में भारतीय साहित्य के प्रति जिज्ञासा और आदर का नया क्षितिज खोलता है. हमारे तमाम क्लासिक्स अनुवाद के जरिये ही विश्वजनीन लोकप्रियता हासिल कर पाए. रवीन्द्रनाथ टैगोर की बांग्ला में लिखी "गीतांजलि" का अंग्रेज़ी में अनुवाद न हुआ होता, तो शायद उसे नोबल पुरस्कार से वंचित होना पड़ता. बहरहाल, कामायनी के सन्देश को आज सरल व्याख्याओं के साथ जनमानस में पहुंचाये जाने की दरकार है. हमारी अनेक ऐसी कृतियाँ हैं जिनके साथ लोक सम्प्रेषण के प्रयोग हुए. वाल्मीकि की संस्कृत में लिखी रामायण से प्रेरणा लेकर तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की और फिर यह लोक की ज्ञान परम्परा और आख्यान के जरिये सदियाँ पार करता रहा. महाभारत की मिसाल भी ली जा सकती है. कामायनी की साहित्यिक जटिलता को भी इसी तरह अनेक कलात्मक प्रयोगों से आसान बनाया जा सकता है.


(यह लेखक के निजी विचार हैं)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: May 16, 2021, 1:06 PM IST
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