खजुराहो नृत्य समारोह: फिर चहकेंगे घुंघरू चंदेलों के गांव में

मध्यप्रदेश के छतरपुर जि़ले का यह रमणीक स्थल दुनिया भर में मशहूर है. पर्यटकों के लिए कौतूहल का किनारा. विन्ध्य के सघन अरण्य में खड़े पहाड़ों की तलहटी में बिखरी झीलें जहां एक ओर इस ऐतिहासिक स्थल को निसर्ग की आत्मीय सुंदरता से विभूषित करती हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: February 20, 2021, 12:10 PM IST
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खजुराहो नृत्य समारोह: फिर चहकेंगे घुंघरू चंदेलों के गांव में
खजुराहो आज से नृत्य समारोह लय-गतियों की सज-धज के साथ सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र होगा.

अलसाई सुबह और सन्नाटे फांकती शामें अगर उत्सव में बदल जाए तो भला कौन अभागा राग-अनुराग भरी सौगातों से अछूता रहना चाहेगा. चंदेलों का गांव एक मुद्दत बाद चहक-महक भरी ऐसी ही रौनक समेट लाया है. 20 फरवरी से शुरू हो रहा खजुराहो नृत्य समारोह लय-गतियों की सज-धज के साथ सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र होगा. अपनी समग्रता में भारतीय शास्त्रीय नृत्यों के सांस्कृतिक वैभव को समेटता यह जलसा सैतालीस बरस पूरे कर रहा है. सात दिनों का यह उत्सवी कारवां भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कथकली, कुचिपुड़ी, मोहिनी अट्टम, मणिपुरी और सात्रिय जैसी प्रमुख नृत्य शैलियों की पेशकश के ज़रिये विरासत और उत्तराधिकार के बीच प्रयोग तथा नवाचार की नई आहटों से वाबस्ता होने का बेमिसाल मौका बन रहा है.


यह सम्मोहन मध्‍य प्रदेश की धरती के उस उत्तरी छोर पर ले जाता है, जहां सौंदर्य से समाधि की यात्रा का एक अनोखा पड़ाव है. मध्यप्रदेश के छतरपुर जि़ले का यह रमणीक स्थल दुनिया भर में मशहूर है. पर्यटकों के लिए कौतूहल का किनारा. विन्ध्य के सघन अरण्य में खड़े पहाड़ों की तलहटी में बिखरी झीलें जहां एक ओर इस ऐतिहासिक स्थल को निसर्ग की आत्मीय सुंदरता से विभूषित करती हैं, वहीं पाषाण की जीवंत प्रतिमाओं से आच्छादित मंदिर चंदेलकालीन इतिहास के साक्षी बनकर सारे जहां को अपने करीब बुलाते हैं. हरियाले आंगनों में आसमान तक अपना मस्तक उठाए इन मंदिरों का वैभवशाली अतीत अपने हज़ार से भी ज़्यादा वर्ष पूरे कर चुका है. खजुराहो की धरती पर भले ही आज सितारा होटलों का जाल बिछ गया हो, मगर मंदिरों पर उभरा प्रेम प्रतिमाओं से सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् का आध्यात्मिक संदेश अब भी झर रहा है.


अतीत के इन्हीं पन्नों को बांचने की फिर तैयारी है. तमाम हलचलों के बीच प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला ‘खजुराहो नृत्य समारोह’ आगंतुकों की प्रतीक्षा कर रहा है. 47 वर्ष पूर्व नृत्य के इस सिलसिले की शुरूआत हुई थी. मंदिर की पृष्ठभूमि में नृत्य एक अनोखे कलात्मक आनंद की अनुभूति कराता है.

हालांकि शुरुआती कुछ बरस तक उत्कृष्टता के मानदण्ड और आयोजकीय स्वायत्तता कायम रही और इसी गुणकारी और बेहतर पहल की वजह से यह समारोह अपनी वैश्विक साख अर्जित कर सका. लेकिन बाद के वर्षों में इस उत्सव पर लगी सियासी नज़र और कई दफा अक्षम हाथों को सौंपी गयी कला प्रशासन की बागडोर ने इस सांस्कृतिक सपने की रौनक फीकी कर दी. फिर भी उम्मीदें पूरी तरह काफूर नहीं हुई हैं.


बहरहाल, समारोह की पहली सभा में वरिष्ठ नृत्यांगना गीता चन्द्रन अपने समूह के साथ भरतनाट्यम की प्रस्तुति देगी जबकि दीपक महाराज कथक की पारंपरिक बंदिशों का विन्यास रचेंगे. सिलसिला आगामी दिनों में ऐश्वर्या वारियर (मोहिनी अट्टम), मीरनन्दा बारठाकुर, उत्पला हुकड़ (सत्रिया कथक युगल) और अरूण मोहंती (ओडिसी) से गुजरता सौरव-गौरव, पियाल भट्टाचार्य, सुलाना बैनर्जी, राजदीप बैनर्जी, विनोद केविन, बच्चन, अनीता शर्मा, प्रिया श्रीवास्तव, पूर्णाश्री राउत, अविजीत दास, भारतीय शिवाजी, मैत्रेयी पहाड़ी, सत्यनारायण राजू, अयान मुखर्जी, आर्या नन्दे और पूर्णिमा अशोक तक विभिन्न शैलियों में हो रहे सृजन की नई कौंध जगायेगा. नृत्य पर संवाद और विमर्श का एक महत्वपूर्ण मंच भी बना है यह उत्सव. इसके अंतर्गत कलावार्ता, नेपथ्य, हुनर, चलचित्र जैसी कडि़यों में नृत्य की धरोहर, परंपरा, उसका मौजूदा सृजन, सौन्दर्यबोध, सुरूचि, आस्वाद तथा चुनौतियों को देखने-परखने का नया क्षितिज भी खुला है.


समारोह के समन्वयक यह मानते हैं कि नृत्यों का यह समारोह, ख़ासकर विदेशी कला प्रेमियों के लिए भारतीय संस्कृति को समझने का प्रवेश द्वार है. अगर कहीं इस उत्सव पर खरोंच आई भी हैं तो उसे दुरुस्त करने की कवायत भी की जाती रहेगी. दरअसल खजुराहो नृत्य समारोह को स्थापित करने के पीछे दो-तीन दृष्टियां काम कर रही थीं. एक तो यह वह समय था जब म.प्र. का सांस्कृतिक संसार बनाने की शुरुआत हो रही थी. योजनाएं गढ़ी जा रही थीं. भोपाल महोत्सव की परम्परा शुरू हुई और तानसेन समारोह को नया स्वरूप दिया गया. खजुराहो नृत्य के पीछे नज़रिया यह था कि म.प्र. की इस विश्व धरोहर को इसी अर्थ में बड़े प्रभाव के साथ लोक प्रचारित किया जाए. दूसरा यह कि खजुराहो व नृत्य का आत्मिक संबंध है, इसलिए वहां कुछ करना इतिहास को रूपाकार देने का प्रयास था. तीसरी बात यह कि इतनी बड़ी विश्व सम्पदा को देखने, और उसके संरक्षण-विस्तार आदि के लिए समाज में जागृति बढ़े तथा हिन्दुस्तान की नृत्य शैलियां देश-विदेश के कला प्रेमियों के सामने प्रकट हो सके. नृत्य समारोह अपने संकल्प में सफल हुआ. पहले यह मंदिर परिसर में होता था. बाद में यह महसूस किया कि वहां होने से, रोशनी आदि से मंदिर-क्षरण हो सकता है. मंदिर के संरक्षण की चिंता देश-विदेश में हुई. खजुराहो में मंदिर के ऊपर से वायुयान गुजरते थे तो कंपन मंदिरों के लिए नुकसानदेह था. शुरूआत के कुछ वर्षों में ही यह देश का सबसे प्रतिष्ठापूर्ण समारोह बन गया. यह एक ऐसा मंच है जहां कोई भी कलाकार प्रस्तुति देना कला जीवन की सार्थकता मानता है. फिर लम्बे समय तक विशेषज्ञों की चयन समिति का निर्णय लगभग निर्विवाद रहा. दुर्भाग्य से अब कलाकारों के चयन पर राजनैतिक और दीगर प्रशासनिक दबाव भी हावी हैं.


बहरहाल, यह देखा सच है कि खजुराहो के नृत्य परिसर में उमड़ने वाले अनेक देशी-विदेशी कला प्रेमी इस उत्सव के शिल्प और उसके कल्पनाशील संयोजन पर रीझते रहे हैं. मंदिरों की पृष्ठ भूमि उन्हें नृत्य प्रस्तुतियों के साथ रूहानी रिश्ता जोड़ने में मदद करती है, लेकिन मध्यप्रदेश के कई बड़े सांस्कृतिक समारोहों के मंच शिल्पी हरचंदन सिंह भट्टी अभी भी खजुराहो के इस मंच के स्थापत्य से पूरी तरह इत्तफाक नहीं रखते. कहते हैं- खजुराहो अगर दुनिया भर के लोगों को अपनी ओर खींचता है तो इसकी बुनियादी वजह वहां का स्थापत्य ही है. लिहाजा ये जरूरी है कि नृत्य समारोह का परिवेश भी प्रकट अर्थों में वहां के स्थापत्य को दृश्यमान करे. लेकिन तमाम किस्म की भव्यता और उच्च स्तरीय इंतजामों के बावजूद अभी नृत्य से स्थापत्य का तादात्म्य नहीं जुड़ पाया है. ढलती शाम के साथ घिरते अंधेरे में मंदिर ओझल हो जाते हैं और मंदिर के आश्रय में होकर भी नृत्य और मंदिर की निकटता का चाक्षुष आनंद दर्शक नहीं ले पाता. भट्टी जोड़ते हैं- सिर्फ खजुराहो की धरती, वहां का कोई प्रांगण चुन लेना ही पर्याप्त नहीं है, वहां के स्थापत्य और नृत्य से रसिकों की अंतर्क्रिया होना भी जरूरी है. नृत्य समारोह के शुरूआती सालों और बीच के बरसों में इस मुद्दे पर थोड़ी सुगबुगाहट शासन स्तर पर हुई थी. मसलन खजुराहो में भी नृत्य समारोह की स्थायी जगह सुनिश्चित करने और परम्परा का हिस्सा बनाते हुए उस स्थान को वास्तुशिल्प देने पर विचार हुआ था लेकिन यह निरी कलपना होकर ही रह गया. वे बताते हैं कि संयोग से मुझे भी शुरू-शुरू में खजुराहो के इस नृत्य परिसर का आकल्पन करने का मौका मिला. इस कस्बे के बहुत सीमित बाज़ार में हमें तब जो भी सामग्री उपलब्ध हो सकी हमने उसी के सहारे साज-सज्जा के प्रतीक चुने. सौभाग्य से तब कई आगंतुकों तथा कला समीक्षकों ने उस सादगी भरी सर्जना की प्रशंसा की थी.


तमाम राग-विराग के बावजूद खजुराहो आना किसी भी सैलानी के लिए बुझा और बोझिल अहसास नहीं है. मंदिरों की श्रृंखलाएं हर ओर से आंखों में समाती हैं. धरातल का सोच रखने वाले दर्शकों को 900 से 1400वीं सदी के काल में बनी इन मूर्तियों में देह-राग का संगीत सुनाई पड़ सकता है. पर भारतीय अध्यात्म का सिरा पकड़कर चलें तो ये प्रतिमाएं मोक्ष की ओर ले जाती हैं.

एक प्रचलित किंवदंती के अनुसार बरसों पहले खजुराहो की धरती पर शिव-पूजा के अनुष्ठान के लिए हज़ारों सुंदर नृत्यांगनाएं बुलाई गई थीं. बहरहाल, इस किंवदंती से भी जीवन के विपुल मर्म का बोध कराते सत्य, शिव और सुंदर, ये तीनों तत्व उभरकर प्रचलित अवधारणा को पुष्ट करते हैं. कवि और संस्कृतिकर्मी ध्रुव शुक्ल खजुराहो को लेकर दार्शनिक पुट देते हैं- “इन मंदिरों को देखकर लगता है कि जैसे देह ही मंदिर है और हमारा हृदय ही वह गर्भगृह है जिसमें हमारे ही आत्मबोध की एक प्रतिमा स्थापित है. प्रणति कहीं और नहीं है. खुद से खुद को प्रणाम करने की कला आना चाहिए. खजुराहो के मंदिरों की रतिमग्न प्रतिमाएं और मंदिर के भीतर विराजे देवता हमें प्रणय और प्रणाम एक साथ सिखाते हैं.


बहरहाल सात दिनों की सभाओं में विभिन्न नृत्य शैलियों में बंधी प्रस्तुतियों को उनकी पौराणिक, दार्शनिक और आधुनिक पृष्ठभूमि में नए सोच-विचार के साथ देखना, निश्चय ही प्रीतिकर संयोग होगा.


(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: February 20, 2021, 12:10 PM IST
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