खजुराहो की रंगभूमि पर फिर खिलेगा कला का वसंत

आगामी 20 से 26 फरवरी तक खजुराहो लय-ताल के आगोश में खो जाने को तैयार है. भरतनाट्यम, कथक, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, कुचिपुड़ी और जैसी प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियां इस रंग पटल पर अपने रूपक रचेंगी. ये वे शैलियां हैं, जिन्हें बरसों की साधना में विरासत ने गढ़ा. सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बनाया. आती हुई नस्लों को तालीम और अभ्यास के बीच गढ़ा. प्रयोग और नवाचार के लिए कल्पना के नए पंख दिए.

Source: News18Hindi Last updated on: February 20, 2022, 7:45 pm IST
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खजुराहो की रंगभूमि पर फिर खिलेगा कला का वसंत


झील के गाल पर गुलाल मलता सूरज पलक झपकते ही पश्चिम में ओझल हो गया, लेकिन आसमान से उतरती सलोनी शाम ने तिरछी आंखों से इस फागुनी अठखेली को निहार लिया. वह भी पूरी सज-धज के साथ उत्सव मनाना चाहती है. वसंत की इस गोधुली को वह विंध्यप्रदेश की उस घाटी में जीना चाहती है, जहां धुंघरूओं की रूनझुन देह गतियों के सुंदर छंद रच रही है.


मंदिर का किनारा, मुक्ताकाशी मंच, हवा की हौली-हौली हिलोरें, फलक पर खिलखिलाता चांद … सहसा दूर ठिठके अंधेरे को चीरकर मंच पर प्रकट होती है नर्तकी. मानों सांझ एक सुंदर परी बनकर धरती पर उतर आई हो. प्रेम प्रतिमाओं की प्रसिद्ध नगरी खजुराहो की वादियों में हर साल वसंत ऐसा ही दिलकश रंग उड़ेलता है.


पत्थरों के खुरदुरे दामन पर लिखी जीवन की वासंती कविता पढ़ने आए हज़ारों सैलानियों को दावत देती शामें लय-ताल की अनूठी खुमारी में बदल जाती है. भारत की संस्कृति के गौरवशाली अतीत की रोमांचक स्मृतियों का झरना फूट पड़ता है. आगामी 20 से 26 फरवरी तक खजुराहो लय-ताल की इसी आगोश में खो जाने को तैयार है.


भरतनाट्यम, कथक, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, कुचिपुड़ी और जैसी प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियां इस रंग पटल पर अपने रूपक रचेंगी. ये वे शैलियां हैं, जिन्हें बरसों की साधना में विरासत ने गढ़ा. सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बनाया. आती हुई नस्लों को तालीम और अभ्यास के बीच गढ़ा. प्रयोग और नवाचार के लिए कल्पना के नए पंख दिए.


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मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल करेंगे उत्सव का शुभारंभ.



कला के कद्रदानों को यूं रूचि, जिज्ञासा और आस्वाद की नई ज़मीन मिली. खजुराहो का मंदिर परिसर हर बरस इन तमाम संदर्भों के आसपास नई कौंध जगाता है. यह उत्सव दो बरस बाद अपने सफ़र की आधी सदी पूरी कर लेगा. यानि इस दफ़ा यह 48 क्रम होगा. मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल उत्सव का शुभारंभ करते हुए राष्ट्रीय कालिदास सम्मान से नृत्य विभूतियों सुनयना हजारिका और शांता धनंजय को अलंकृत करेंगे. रूपंकर कलाकार भी सम्मानित होंगे.


समारोह की पहली सभा हाल ही दिवंगत नृत्य गुरू पंडित बिरजू महाराज की स्मृति को समर्पित होगी. महाराज के शिष्यों द्वारा कलाश्रम दिल्ली की ओर से अपने गुरू की बंदिशों को खजुराहों के मंच पर प्रस्तुत करना निश्चय ही प्रार्थना की अनुभूति होगा. इस सभा को शांता वी.पी. धनंजय और साथी भरत नाट्यम की प्रस्तुति से उत्कर्ष प्रदान करेंगे.


दूसरे दिन, सुजाता महापात्रा भुवनेश्वर द्वारा ओडीसी, निरुपमा राजेंद्र बेंगलुरु द्वारा भरतनाट्यम-कथक समागम और जयरामा राव एवं साथी दिल्ली द्वारा कुचिपुड़ी समूह नृत्य की प्रस्तुति दी जाएगी. समारोह के तीसरे दिन 22 फरवरी को नीना प्रसाद त्रिवेंद्रम द्वारा मोहिनीअट्टम, पार्श्वनाथ उपाध्याय बेंगलुरु द्वारा भरतनाट्यम समूह और टीना तांबे मुंबई द्वारा कथक नृत्य की प्रस्तुति दी जाएगी.


चौथे दिन सोनिया परचुरे मुंबई द्वारा कत्थक, कलामंडलम सुनील एवं पेरिस लक्ष्मी कोट्टायम केरल द्वारा कथकली-भरतनाट्यम, रागिनी नगर नई दिल्ली द्वारा कथक और दानुका अर्यावंसा श्रीलंका द्वारा उदारता नेतुमा नृत्य की प्रस्तुति दी जाएगी. पांचवे दिन वसंत किरण एवं साथी कादिरी आंध्र प्रदेश द्वारा कुचिपुड़ी समूह नृत्य, शर्वरी जमेनिस और साथी पुणे द्वारा कथक और संध्या पूरेचा एवं साथी मुंबई द्वारा भरतनाट्यम समूह नृत्य पेश करेंगे.


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समारोह में सुनयना हजारिका और शांता धनंजय को राष्ट्रीय कालिदास सम्मान से अलंकृत किया जाएगा.



25 फरवरी को देविका देवेंद्र एस मंगलामुखी जयपुर द्वारा कथक, रुद्राक्ष फाउंडेशन भुवनेश्वर द्वारा ओडिसी समूह और नयनिका घोष एवं साथी दिल्ली द्वारा कथक समूह नृत्य होगा. समारोह का समापन 26 फरवरी को श्वेता देवेंद्र एवं क्षमा मालवीय भोपाल द्वारा भरतनाट्यम-कथक, तपस्या इंफाल द्वारा मणिपुरी और शमा भाटे एवं साथी पुणे द्वारा कथक प्रदर्शन से होगा.


परिकल्पना, संयोजन और विस्तार के अनूठे आयाम रचते हुए इस समारोह के शिल्पियों ने नृत्य की परंपरा में उसके सांस्कृतिक सरोकारों को समग्रता में देखने-परखने की नई ज़मीन तैयार की है. संवाद और विमर्श के नए सिलसिलों के चलते भारतीय नृत्य की विरासत, उसकी बदलती, नया रूप, गढ़ती शैलियों, भारतीय कला का मानस, तकनीक की सुविधा-दुविधा, गुरू-परंपरा के अस्तित्व और उसकी अहमियत आदि सामयिक विषयों पर वैचारिकी का खुला मंच “कलावार्ता” के रूप में तैयार हुआ है.


‘नेपथ्य’ के अंतर्गत कथक की प्रस्तुति सह प्रदर्शन के ज़रिये उसके स्वरूप और विन्यास का उद्घाटन होगा. कला परंपरा पर केन्द्रित फिल्मों का प्रदर्शन होगा. इधर बीते कुछ बरसों में चित्रकला की विधा को नृत्य से संयोग करते हुए ‘आर्ट मार्ट’ और ‘प्रणति’ जैसी गतिविधियों ने भी कलाप्रेमी पर्यटकों को आकर्षित किया है. ख़बर है कि इस बार ‘आर्ट मार्ट’ में देश-विदेश की एक हज़ार से भी ज़्यादा कलाकृतियां नुमाया होगी. जबकि ‘हुनर’ नाम से देशज ज्ञान परंपरा और कला का मेला नई रौनक समेटेगा.


‘प्रणति’ के अंतर्गत वरिष्ठ चित्रकार डा. लक्ष्मीनारायण भावसार के जीवन व्यापी कलात्मक अवदान को देखना दिलचस्प होगा. स्मृतियों को टटोलें तो खजुराहो नृत्य समारोह को स्थापित करने के पीछे दो-तीन दृष्टियाँ काम कर रही थीं. एक तो यह वह समय था, जब म.प्र. का सांस्कृतिक संसार बनाने की शुरूआत हो रही थी. नज़रिया यह था कि इस विश्व धरोहर को इसी अर्थ में बड़े प्रभाव के साथ लोक प्रचारित किया जाए.


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मंदिरों की पृष्ठ भूमि और नृत्य प्रस्तुतियों का होगा रूहानी रिश्ता.



दूसरा यह कि खजुराहो व नृत्य का आत्मिक संबंध है, इसलिए वहां कुछ करना इतिहास को रूपाकार देने का प्रयास था. तीसरी बात यह कि इतनी बड़ी विश्व सम्पदा को देखने, और उसके संरक्षण-विस्तार आदि के लिए समाज में जागृति बढ़े तथा हिन्दुस्तान की नृत्य शैलियां देश-विदेश के कला प्रेमियों के सामने प्रकट हो सके. नृत्य समारोह अपने संकल्प में सफल हुआ. पहले यह मंदिर परिसर में होता था.


बाद में यह महसूस किया कि वहां होने से, रौशनी आदि से मंदिर-क्षरण हो सकता है. मंदिर परिसर से विस्थापित होने के कुछ बरसों बाद पुनः यह उत्सव अपने मूल स्थान पर पहुँच गया. कोई भी कलाकार यहाँ प्रस्तुति देना कला जीवन की सार्थकता मानता है. लम्बे समय तक विशेषज्ञों की चयन समिति का निर्णय लगभग निर्विवाद रहा.


दुर्भाग्य से कलाकारों के चयन पर राजनैतिक और प्रशासनिक दबाव भी बीच में हावी होते रहे और समारोह की गुणवत्ता और गरिमा पर खरोंच भी पड़ी लेकिन इसकी लोकप्रियता ज्यों की त्यों बनी रही. सच है कि खजुराहो के नृत्य परिसर में उमड़ने वाले अनेक देशी-विदेशी कला प्रेमी इस उत्सव के शिल्प और उसके कल्पनाशील संयोजन पर रीझते रहे हैं.


मंदिरों की पृष्ठ भूमि उन्हें नृत्य प्रस्तुतियों के साथ रूहानी रिश्ता जोड़ने में मदद करती है. बहरहाल, तमाम राग-विराग के बावजूद खजुराहो आना किसी भी सैलानी के लिए बुझा और बोझिल अहसास नहीं है. धरातल का सोच रखने वाले दर्शकों को 900 से 1400वीं सदी के काल में बनी इन मूर्तियों में देह-राग का संगीत सुनाई पड़ सकता है, पर अध्यात्म का सिरा पकड़कर चलें तो ये प्रतिमाएँ मोक्ष की ओर ले जाती हैं.


मूर्धन्य नृत्य गुरू पंडित बिरजू महाराज कहते थे- “खजुराहो में मंदिर और मन की साधना के मंदिर का मिलन होता है.” …तो चंदेलों का गाँव आपकी बाट जोह रहा है.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: February 20, 2022, 7:45 pm IST