माच के मंच से उठती महक

ये है माच का मंच. मालवा (Malwa) की रंगभूमि (Amphitheater) का वो नज़ारा जहां खेल-तमाशे के बीच उभरती आवाज़ों और क़िरदारों की बोलती छवियों (Speaking images) में अपने वक्त की धड़कनों से वाबस्ता हुआ जा सकता है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 21, 2020, 6:52 PM IST
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माच के मंच से उठती महक
माच, मध्यप्रदेश की प्रतिनिधि रंगमंचीय लोक शैली है (माच के मंचन के दौरान एक दृश्य)
आत्मनिर्भरता की लौटती आवाज़ों के बीच जब सारा मुल्क (Country) जड़ों की अहमियत के आसपास अपना यकीन टटोल रहा है, तब यकायक विरासत (heritage) में मिली तहज़ीब (culture) के रंग रौशन होने लगते हैं. ये वे रंग हैं जिनमें मटियारे संस्कारों की इंसानी महक घुली है. कला के मंच (Stage of Art) पर अपना देसी ताना-बाना लिए हिन्दुस्तान की लोक संस्कृति (Folk Culture) इसी रंग-ओ-महक का दिलकश नज़ारा बनती रही है. दिलचस्प यह कि सुविधा और संसाधनों के अतिरिक्त आग्रहों से दूर यहां आत्मनिर्भरता (Self reliance) का मंत्र ही रचनात्मक उर्जा और गति को बल प्रदान करता रहा है. माच (Mach) की यात्रा भी आत्मनिर्भर सांस्कृतिक परंपरा के ऐसे पड़ाव नापती रही है.

ये है माच का मंच. मालवा (Malwa) की रंगभूमि (Amphitheater) का वो नज़ारा जहां खेल-तमाशे के बीच उभरती आवाज़ों और क़िरदारों की बोलती छवियों (Speaking images) में अपने वक्त की धड़कनों से वाबस्ता हुआ जा सकता है. इन धड़कनों में एक आंचलिक जीवन स्मृतियों से अठखेलियां करता गीत, संगीत, नृत्य (Dance), अभिनय और संवाद का दिलचस्प सिलसिला बन जाता है.

सदियों पुरानी कहानियों का कारवां नए रूप-रंग में ढलकर कुछ इस तरह पेश आता है जैसे हमारे ही भूले-बिसरे अफ़साने और तज़ुर्बे अक़्स बनकर यहां उभर आए हों. मालवा की तहज़ीब, वहां की रवायत और मटियारे संस्कारों ने मिलकर माच को ऐसी ही सुन्दर मूरत में ढाला है.
माच, मध्यप्रदेश की प्रतिनिधि रंगमंचीय लोक शैली है. महाकवि कालिदास की प्रसिद्ध नगरी उज्जयिनी में इसने आकार ग्रहण किया और देखते ही देखते पूरे मालवा क्षेत्र में इसने अपने पांव पसार लिये. मध्यप्रदेश के पश्चिम-उत्तर में चम्बल, पूर्व में बेतवा और दक्षिण में नर्मदा नदियों के बीच का पठारी मैदान मालवा कहलाता है.
माच, मालवा के खुले रंगमंच का वह उदात्त और रंजनकारी रूप है जिसमें मंच विधान का रूढ़िगत आग्रह और प्रस्तुति के रंग-ढंग की पारंपरिक सीमाएं सदियों बाद भी ज्यों की त्यों हैं. यही है इसकी ख़ासियत. 18वीं सदी के प्रारंभ में बैठक वाली ख्याल गायकी जब मंच की विषय-वस्तु बनी तब माच की लोकरंग शैली अस्तित्व में आई. उज्जैन के जो लोक कलाकार बैठक वाली ख्याल गायकी, गम्मत, तुर्राकलंगी, ढाराढारी के खेल, नकल-स्वांग जैसे प्रदर्शनकारी कला रूपों में सक्रिय थे, उन्होंने अपनी-अपनी मंडलियाँ बना लीं. यहां एक क़िस्म की होड़ थी. लिहाज़ा कुछ कलाकारों ने अपने दल को अखाड़ा का नाम दिया. इन रंग मंडलियों के मुखियाओं को गुरू अथवा उस्ताद की पदवी से सुशोभित किया गया. इन्हीं कला गुरुओं ने उस समय चलन में आई मनोरंजक शैलियों से रंग-तत्वों को ग्रहण कर मंच प्रदर्शन हेतु विभिन्न खेलों या कहें नाट्य प्रस्तुतियों का बढ़-चढ़कर उत्साह दिखाया. ये खेल ज़मीन से आठ-दस फुट ऊंचा मंच बनाकर प्रस्तुत किए जाते थे. इन्हें नाम मिला-‘माचा’. समय के साथ इन मंचों की ऊंचाई घटती गई और यह शब्द भी ‘माचा’ से ‘माच’ में बदल गया. खुले आसमान के नीचे धरती का कोई आंगन या चबूतरा माच का मंच बन जाता है, लिहाजा गर्मी के चैत्र और वैशाख के महीने इसके प्रदर्शन का सबसे उपयुक्त समय माना जाता है.

मालवा की अनेक ग़ैर पेशेवर मंडलियाँ इन महीनों में गांव-शहर की सैर करते हुए माच का खेल करती हैं. जैसे ही माच का ढोल बजता है, उसकी आवाज़ सुनकर बड़ी तादाद में लोग इन मंचों के आस-पास सिमट आते हैं.
माच की ख़ासियत है सामुदायिकता. गांव के लोग ही चंदा करते हैं, मंच बनाते हैं, वेशभूषा और आभूषण आदि सामग्री जुटाते हैं. ऊंचे धरातल, मंदिर के चबूतरे अथवा लकड़ी के खंभों, पाटों और बल्लियों से मंच बन जाता है. सफेद चादर की छत ‘चंदोबा’ को तानकर मंच की शोभा बढ़ा दी जाती है. मंच तीन ओर से खुला होता है. पीछे कलाकारों के श्रृंगार का कक्ष यानि ग्रीन रूम होता है. मंच की बाईं ओर अपने पारंपरिक साज़ लिए संगीत मंडली बैठती है.
रात के पहले प्रहर से माच का खेल शुरू होता है और आखिरी प्रहर तक चलता है. पूर्वरंग के रूपों में भिश्ती बनकर कोई कलाकार मंच पर आकर पानी का छिड़काव करने और फिर ‘फर्दासन’बनकर कोई कलाकार ‘जाजम बिछाने’का अभिनय करता है. यहां दोनों के बीच गीत-संगीतबद्ध सवाल-जवाब होते हैं. माच की रंगमंडली के कलाकारों को बोल कंठस्थ हो जाते हैं.

madhya pradesh theater mach fest
महाकवि कालिदास की प्रसिद्ध नगरी उज्जयिनी में माच ने आकार ग्रहण किया (माच के मंचन का एक दृश्य)


प्रेम के आख्यानों के अलावा माच के खेल धार्मिक-पौराणिक, ऐतिहासिक और सामाजिक कथानकों पर आधारित होते हैं. ढोला-मारूणी, हीर-रांझा, मधुमालती, निहालदे-सुल्तान, सुदबुद-सालंदा, नल-दमयंती, सत्यवादी राजा हरिशचंद्र, राजयोगी भरथरी, भक्त प्रहलाद, प्रणवीर तेजाजी, बंदीछोड़ कोदरसिंह, राजा विक्रमादित्य, बाबा रामदेवजी और मैना सुन्दरी ये वे चरित्र है जो आख्यान की तरह जीवन मूल्यों और आदर्श परंपराओं का बखान करते हैं. इन खेलों-प्रसंगों में दर्शकों को वीर, श्रृंगार और शांत रस का आनंद मिलता है. समय के साथ बदलती दर्शकों की रुचियों और फरमाइश का भी माचकार हमेशा ख्याल रखते हैं. इसीलिए माच के रंग कभी बासी नहीं होते. माच के कलाकार अपने समय की प्रवृत्तियों और विसंगतियों पर हास्य व्यंग्य भरी शैली में कटाक्ष करते हैं तथा अपनी प्रस्तुतियों के तार मौजूदा दौर से जोड़ लेते हैं.
माच के खेलों में महिला पात्रों की भूमिकाएं अक्सर पुरुष कलाकार ही निभाते रहे हैं. सुरीले कंठ और लोचदार अंग वाले पुरुष कलाकार सात कली का रंग-बिरंगा घाघरा, रेशमी लुगड़ा यानी साड़ी और साटन की कांचली यानी किंचुकी पहनकर और सिर से पांव तक सोने-चाँदी के मालवी आभूषण धारणकर जब मंच पर आते हैं तो दर्शक इस रूप पर मोहित हो जाते हैं. महिला कलाकारों का मुंह घूंघट की ओट में रहता है.

माच का प्रारंभिक स्वरूप गीत-नाट्य का रहा है, आधुनिक भाषा में जिसे आपेरा कहा जाता सकता है. प्रमुख रूप से दोहा छंद में रचे माच के बोल माच की ख़ास सांगीतिक शैली में प्रस्तुत किए जाते हैं. ये ‘रंगतें’कहलाती हैं. मालवी लोक गीत-नृत्य तथा संगीत में बांधी गई इन बंदिशों यानी रंगतों का सौन्दर्य निराला है. यहां शब्द स्वर और संगीत के मेल-जोल की अनूठी भंगिमा हैं. ये रंगतें सुगम-सरल और सरस होती हैं. स्थान और समय के अनुकूल इनका उपयोग किया जाता है. शास्त्रीय संगीत की तरह इसमें आलाप तो होता है पर मुरकियाँ नहीं. ‘जै’के साथ जो पहला स्वर तय होता है वही स्वर आखिर तक नियंत्रित रहता है. माच के संगीतपक्ष को पारंपरिक दृष्टि से समृद्ध करने में संगीत मनीषी स्व. पं. कुमार गंधर्व, उस्ताद कालूरामजी के सुपुत्र शालिग्राम मास्टर, पं. रामदास मूंगरे और पं. प्यारेलाल श्रीमाल का अनन्य योगदान रहा है. माच को आधुनिक समय में जीवित रखने वाली यूं तो अनेक मंडलियां हैं लेकिन स्व. सिद्धेश्वर सेन जैसे माचकार ने अपने समूचे परिवार के साथ इस लोकमंच की पारंपरिकता और उसके प्रचार-प्रसार तथा लोकप्रियता के लिए अविस्मरणीय योगदान किया है. उनकी मृत्यु के उपरांत अब उनके पुत्र प्रेमकुमार सेन ने इस विरासत को थाम रखा है.

वरिष्ठ लोक कलाकार ओमप्रकाश शर्मा, उनके शिष्य राजेन्द्र अवस्थी, लोकेन्द्र त्रिवेदी, सिद्धेश्वरजी की बेटी कृष्णा वर्मा, पोती स्वाती सेन उखले इन दिनों माच के प्रयोगों को लेकर लगातार सक्रिय हैं. सन् 2020 स्व. सिद्धेश्वर सेन का जन्म शताब्दी वर्ष भी है. माच शैली और सिद्धेश्वरजी के कलात्मक योगदान को लेकर विमर्श का सिलसिला नए परिदृश्य के लिए बेहद कीमती साबित होगा.
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: September 21, 2020, 6:52 PM IST
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