मन भीगे मौसम के मनछूते रूपक

वर्षा सृजन है, दर्शन है, जीवन की पूर्णता का घना और गाढ़ा अहसास है. तभी तो महाप्राण निराला की कविता में भी बह निकला बादल राग. लेकिन क्या बारिश की रंगत हमारी आपाधापी भरी फितरत पर कोई असर डालती है? प्रकृति से हमारा प्रेम क्या अब भी उतना ही प्रगाढ़ और पवित्र रह गया है?

Source: News18Hindi Last updated on: June 14, 2021, 2:12 PM IST
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मन भीगे मौसम के मनछूते रूपक
मॉनसून आ गया है औश्र भारत के अधिकतर हिस्से में बारिश शुरू हो गई है. (AP)
मौसम फिर बादल, बयार और बौछारों का है. भीगने का है. यादों की झरती बूंदों की जुगलबंदी में ख़ुद को गुनगुनाने का है. हरे सुरों में सपनों के इन्द्रधनुष को खिलते-देखने का है. मेहंदी के रंग, झूलों की कहानी और गीतों की रवानी में यूं एक मौसम रूहानी दस्तक दे रहा है.

शब्द की परंपरा कहती है कि वर्षा सृजन है, दर्शन है, जीवन की पूर्णता का घना और गाढ़ा अहसास है. तभी तो महाप्राण निराला की कविता में भी बह निकला बादल राग- "झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर, राग अमर अंबर में भर निज रोर". याद आता है, आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने कभी कहा था- "जिस तरह पावस के बादल धरती का मैल धोकर उसे उजला कर देते हैं, हमारे मन की परतों पर ठहरा आपाधापी, अशांति और बेचैनी का गुबार भी झरते बादलों की बौछार से धुल कर सुकून का पैगाम बन जाये"! लेकिन दौड़ और होड़ से भरे आज के जीवन पर निगाह जाती है तो सवाल कौंधते हैं. प्रकृति से हमारा प्रेम क्या अब भी उतना ही प्रगाढ़ और पवित्र रह गया है? क्या बारिश की रंगत हमारी आपाधापी भरी फितरत पर कोई असर डालती है? क्या कोई कागज़ की कश्ती और बारिश का पानी आज के नौनिहालों की याददाश्त में हरे पन्ने की तरह पैबस्त होगा?

इन्हीं कसकों के बीच जब शब्दों के आसमान से कुछ कविताएँ झरती हैं तो जीवन, प्रकृति और संस्कृति की आपसदारी के अर्थ उजले होने लगते हैं. हम अपने को जैसे क्षण भर में तर-बतर महसूस करने लगते हैं. कवि ठाकुर, पद्माकर, माखनलाल चतुर्वेदी, निराला, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', नागार्जुन जैसे हिन्दी के अग्रणी कवियों के पद अलौकिक अनुभव बन जाते हैं.

मनुष्य की अनुभूतियां तो माटीगंधी होती हैं. अवस्था और परिस्थितियों के ज़रिए वह हर मौसम को अपने भीतर महसूसता है. मौसम के साथ कुलांचें भरता उसका मन स्वयं को प्रकृति और उसके परिवेश में खो देता है. कविता में जीवन की तमाम धड़कनों की हिफाज़त करने वाले कवि का भावाकुल मन हो तो फिर वर्षा जैसी सतरंगी छटाओं का मौसम रूपकों और उपमाओं की आलंकारिक भाषा में अपना अक्स निहारने लगता है.
कवि ठाकुर की आंखों में आषाढ़ के बादलों का चित्र और अलबेली बुंदनियों की प्रकृति कितनी सुहानी हो उठी हैं! उनकी कविता में एक बावरी सखि के भीतर बैठा मन का मयूर नाच उठा है. धरती और आकाश की रंगत उसे किसी उत्सव की तरह जान पड़ती है. उधर एक सखि और है जिसके प्राण वन-वन गरज रहे बादलों की ध्वनि से उतावले हो रहे हैं. उसका उदास मन मगन हो रहा है. इस तरूणी को आभास हो रहा है- 'परम अगम प्रियतमा गगन की शंखध्वनि आई...' यह हिन्दी कविता के यशस्वी हस्ताक्षर बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' की रचना है. और एक भारतीय आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी के मन आंगन में पावसिया बूंदे कुछ ऐसे छंद बना रही हैं- 'नभ की छवियां तारों वाली...... बिंदु-बिंदुके वृत्त........ अनदेखा सूरज...... और अपने उर में छिपा सलोना श्याम...... कैसा छंद बना देती हैं, बरसातें बौछारों वाली.....'.

बूंदों का यह छंद जब गति पाता है तो पर्वतों और सागरों में बहकर एक नई हलचल मचाता है. इसी बीच संवेदना में डूबा एक मन पावस की सुंदरता को समेट लेना चाहता है. उसके कानों में बादलों का बजना 'धिं-धिं धा धमक-धमक' है. दादुर के कंठ खुलने और धरती के ह्दय धुलने की पवित्रता को उसका मन एक साथ महसूसता है. कीचड़ से लथपथ धरती की माटी को उसकी आत्मा हरिचंदन मान रही है. यह जन-कवि नागार्जुन का उद्गार है जहां मेघबजे, तो जैसे एक पवित्र अवतार प्रकट हुआ! लगता है, जैसे आत्मा की धरती पर बादलों से झरती बूंदे कविताएं रच रही हों.

कविता ही क्यों, कलाओं के रूप-रंग भी ऋतुओं के साथ जुड़े जीवन-अनुभव से आच्छादित रहे हैं. हर्ष की हिलोरें और आंसुओं का सैलाब कभी राग के सप्तक में, साज़ों से उठती गमक में, घुंघरूओं की झंकार और नृत्य की देहगतियों में, चित्रों की चौखट में तो कभी मूर्तियों को तराशती भावमय लगन में समाकर जिंदगी के असल स्वाद को हमारी संवेदना में बार-बार लौटाने का जतन करते रहे हैं.
याद आता है, प्रख्यात कथक नृत्यांगना कुमुदिनी लाखिया का रूपक 'सीज़न्स', जिसमें ऋतुचक्र के साथ गतिमान जीवन की उत्सवधर्मिता का दिलकश कलात्मक ताना-बाना था. ख़ास पहलू यह कि कथक जैसे शास्त्र सम्मत नृत्य में इस्तेमाल होने वाले कवित्त और रागबद्ध संगीत से हटकर यहाँ लंगा और मांगणिहार गायकों की उँची-मीठी तानों में घुला राजस्थान का लोक संगीत था. यानी शास्त्र और लोक के संयोग से तैयार हुआ रसायन. वर्षा के मंगल को अभिव्यक्त करने के लिए कुमुदिनीजी ने भावाभिनय के साथ ही रंग-बिरंगी छतरियों का प्रयोग किया था. दिल्ली, भोपाल और उज्जैन में इस 'सीज़न्स' के भव्य प्रदर्शन हुए थे. इस पारंपरिक फ्यूज़न का आलेख कुमुदिनीजी के प्रस्ताव पर मैंने (इस लेखक ने) तैयार किया था. नृत्य विदूषी रोहिणी भाटे का 'वर्षा मंगल' भी धरती और आसमान के उस रिश्ते को उद्घाटित करता है जहाँ बरखा एक सेतु की भूमिका का निर्वाह करती है. वह शुभ और मंगल का संदेश लिए इंसानी जीवन में ही नहीं, समूची सृष्टि के रोम-रोम में उतर जाती है. भावनाओं का ज्वार उमड़ता है तो संयोग और वियोग की मीठी-कसैली यादें चहक उठती हैं. पंडित छन्नूलाल मिश्र का कंठ राग मेघ में गा उठता है... "सखि, बदरवा आए, कंत नहीं आए". वहीं माटी गंधी अनुभूतियाँ 'कजरी' में सजीव हो उठती हैं- "रिमझिम-रिमझिम मेहुओ बरसे, सावन महीनो आयो जी". शबनम शाह सूने केनवास पर रंगों के छींटे कुछ इस तरह लगाती हैं कि 'मूड्स ऑफ मानसून' के रूपहले चित्र उभर आते हैं.

'बरसात का बादल तो दीवाना है, क्या जानें/किस राह से बचना है, किस छत को भिगोना. उर्दू अदब के मक़बूल शायर मरहूम निदा फाज़ली के शेर में अंगड़ाई लेता यह बादल बिलाशक इन दिनों हम सबकी आँखों से होकर गुज़र रहा है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: June 14, 2021, 2:12 PM IST
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