ज़ाकिर से जलोटा तक... सारे फ़नकार उसकी जद में

एक व्यक्ति की आंख में उठा सपना जब कई आंखों में स्थानांतरित हो जाता है, तो हम उसे संस्था का सपना कहते हैं. अभिनव कला परिषद और मधुवन भी एक ऐसे शख़्स का ख़्वाब हैं, जिसने तमाम उठते-गिरते हालातों में इन संस्थाओं की परवरिश की और इनकी धड़कनों से सारे मुल्क के कलाकारों-कलमकारों का राब्ता टूटने न दिया.

Source: News18Hindi Last updated on: July 20, 2021, 11:00 AM IST
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ज़ाकिर से जलोटा तक... सारे फ़नकार उसकी जद में


हिन्दुस्तान के मौज़ूदा सांस्कृतिक परिदृश्य को देखें, तो मध्यप्रदेश संभवतः इकलौता ऐसा सूबा होगा, जहां की सरकार साहित्य और कलाओं के क्षेत्र में अद्वितीय रचनात्मक उपलब्धियों के लिए सर्वाधिक सम्मान और पुरस्कारों की प्रदाता है. दिलचस्प और महत्वपूर्ण यह है कि पिछले कुछ बरसों से एक राष्ट्रीय सम्मान कला-संस्कृति के संरक्षण के लिए सक्रिय किसी स्वयंसेवी संस्था को भी दिया जाने लगा है. इस फेहरिस्त में 'राजा मानसिंह तोमर संस्कृति सम्मान' के लिए अभिनव कला परिषद का नाम भी जुड़ा. सुखद संयोग कि इस सम्मान की घोषणा उस वर्ष हुई, जब अभिनव कला परिषद ने अपनी यशगामी यात्रा के पचास वर्ष पूरे किये.

ग़ौर करने की बात यह है कि संस्थाएँ कभी स्वप्न नहीं देखती. सपने तो व्यक्ति की आंख में जागते हैं. एक व्यक्ति की आंख में उठा सपना जब कई आंखों में स्थानांतरित हो जाता है, तो हम उसे संस्था का सपना कहते हैं. अभिनव कला परिषद और मधुवन भी एक ऐसे शख़्स का ख़्वाब हैं, जिसने तमाम उठते-गिरते हालातों में इन संस्थाओं की परवरिश की और इनकी धड़कनों से सारे मुल्क के कलाकारों-कलमकारों का राब्ता टूटने न दिया. 50 साल पहले 25 बरस के जिस नौजवान की उंगली थामकर इन दो जुड़वां संस्थाओं ने चलना शुरू किया, वह इस समय अपनी उम्र की 75वीं पादान तय कर रहा है.

बेशक यह उसकी यशगामी यात्रा का एक शुभ चरण है. भोपाल से संचालित इस संस्था की एक और सहयोगी इकाई है- 'मधुवन'. यह भी साहित्य, संस्कृति और कलाओं की मानक संस्था है जिसकी गति, गौरव और गरिमा से सारा देश वाकिफ़ है.
अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया...??
‘मुक्तिबोध की कविता में ठहरी इस प्रश्नाकुलता के आसपास पुरूषार्थ को पैमानों में नापने की बात की जाये, तो आदर्शों की अलहदा तस्‍वीरें नुमाया होती हैं. ज़रा ग़ौर से इन्हें निहारें तो मालूम होता है कि ये कि़स्मत की लकीरों से बनी छाया छवि नहीं, कर्म के पसीने में घुले संघर्ष और तप के रंगों से निखरे कि़रदारों के बोलते से दस्तावेज़ हैं. अपनी धुन के बांवरे बटोही ऐसे ही होते हैं. वे कबीर को जीते हैं- "हमन है इश्क मस्ताना". अपनी प्रेमिल पुकारों की महक बिखेरते वे जीवन और समय में दूर तक निकल जाते हैं.

मुसलसल गुज़रता हुआ कारवाँ एक दिन उम्र के एक ऐसे मुकाम पर जा ठिठकता है, जहां जि़ंदगी की डगर पर मिले, घुले, ठहरे और बिछुड़ गये अंतरंग संगी-साथियों को भुजाओं में समेटकर शुक्रिया कहने को जी चाहता है. सुरेश तांतेड़ के लिए यक़ीनन यह ऐसा ही भावुक क्षण है. दरअसल यह मंगल का मुहूर्त है. आधी सदी से भी ज़्यादा अपने सांस्कृतिक कर्मयोग की कीर्ति को कलात्मक जीवन का हासिल मानते हुए यह शख़्स जीवन के अमृत पर्व पर माथा झुकाए आभार की मुद्रा में है. उधर इस बेमिसाल शखि़्सयत की उमगती आत्मीयता में बिंधी बिरादरी बेशुमार गुलों की महक से उसका तन-मन भिगो देने को आतुर है.
सुरेश तांतेड़... एक जाना पहचाना नाम और चेहरा. साहित्य, संस्कृति और कला के परिसरों में गुजर-बसर करने वाली हर शखि़्सयत के लिए सगा. मस्जि़दों, मीनारों, मेहराबों, कलाओं के मरकज़, हिन्दी-उर्दू अदब के गहवारों और झील-पहाडि़यों से लिपटे दिलकश नज़ारों के शहर भोपाल के तारीख़ी इतिहास में दर्ज एक सदारोशन कि़रदार, जिसकी मुरादें फनकारों के लिए मंच और महफि़लों के आसपास धड़कती रही. 'मधुवन' और 'अभिनव कला परिषद' ने इन महफि़लों के बेशुमार मंज़र सजाये और सुरेश अपनी अंजुरि में हृदय सजाकर भावनाओं के गंधित पुष्पों का अभिषेक करते रहे.


50 से भी ज़्यादा बरस गुज़र गये, सांस्कृतिक निष्ठा का यह दीया निष्कंप जलता रहा. सैकड़ों समारोह, हज़ारों कलाकार. कई प्रतिभावान पीढि़यों के लिए उत्कर्ष के नए आसमान खोलता सुनहरा अवसर, तो आचार्य परंपरा को सुशोभित करते मनीषियों को प्रणाम. आपाधापी और बेचैनियों के बीहड़ में गाफिल शहरियों के लिए उत्सवी सौगातों की सुरम्य श्रृंखला. सौहार्द की संधि पर परंपराओं के पर्व और विरासत की हिफाज़त के लिए घरानों और गुरूकुलों से लेकर निजी प्रतिभा तथा कौशल से अपने कलात्मक अनुशासन में सृजनशील समाज को एकत्र करने का समारोही उपक्रम. ... और भी बहुत कुछ.

सुरेश तांतेड़ के व्यक्तित्व में तीन ख़ासियतें
सुरेश तांतेड़ सारा चैन किनारे कर इन गतिविधियों के लिए दिन-रात खटते रहे. दरअसल, यह सब करते रहना उन्हें मसर्रत से भरता रहा. हिन्दी के किसी कवि ने लिखा है- "जि़ंदगी ने कर लिया स्वीकार अब तो पथ यही है". सो, सुरेश तांतेड़ के पांवों ने भी अपने रास्ते ख़ुद ही तलाशे फिर फूल और शूल जो भी हिस्से में आया, कुबूल किया. यहीं महादेवी का स्मरण हो आता है- "अन्य होंगे चरण हारे/धन्य हैं जो लौटते दे, शूल को संकल्प सारे/दुखव्रती निर्माण उन्मत्त यह अमरता नापते पद". बहरहाल इन उद्धरणों से गुज़रते हुए सुरेश तांतेड़ के व्यक्तित्व में तीन ख़ासियतें दिखाई देती हैं- जीवंतता, जीवटता और जिजीविषा. इसी ऊर्जा से भरकर वे सांस्कृतिक नवोन्मेष के लिए सक्रिय रहे.

इन 50 सालों में मधुवन और अभिनव कला परिषद के मंच पर साहित्य-कला की उन तमाम वरेण्य विभूतियों की आमद हुई, जिन्हें ज़माना पंडित-उस्ताद और विदुषी कहकर आदर जताता रहा. ये वे तपस्वी-साधक हैं, जो भारत ही नहीं, समंदर पार के मुल्कों तक अपनी शोहरत और कामयाबी का सितारा बुलंद कर चुके हैं.

सुरेश तांतेड़ के पक्ष में यह शुभ है कि इन सितारों की चमक उनके लिए समय या अवसर के साथ स्याह पड़ जाने वाली रोशनी नहीं बल्कि, सदा के लिए मैत्री में बदल जाने वाला उजाला साबित हुई. आज भी वही ताप, वही सुगंध. चाहे उस्ताद अमज़द अली खाँ हों, ज़ाकिर हुसैन हों, पंडित विश्व मोहन भट्ट हों या अनूप जलोटा जैसी बेमिसाल हस्तियाँ हों, सुरेश तांतेड़ का जि़क्र छिड़ते ही उनके भीतर अपनापा उमड़ आता है.


मैं अपने सांस्कृतिक जीवन की यह उपलब्धि मानता हूं कि मुझे सुरेश तांतेड़, मधुवन और अभिनव कला परिषद ने पूरे राग-अनुराग से अपनाया. अनेक प्रतिष्ठा समारोहों में बतौर उद्घोषक आमंत्रित किया. अभिनव शब्द-शिल्पी सम्मान से विभूषित किया. सुरेश तांतेड़ हमेशा अग्रज का स्नेह समेटे मुझसे पेश आए. मेरे संघर्ष और उपलब्धियों के वे साक्षी हैं और मैं भी उनकी खरोचों-खुशियों का साक्षी हूं. विगत तीन दशकों का यह आत्मीय अंतराल मेरे रचनात्मक जीवन का हासिल है, जिसमें सुरेश तांतेड़ एक सांस्कृतिक आदर्श की प्रतिमा बनकर मेरे मानस भवन में प्रतिष्ठित हैं.

कभी-कभी सोचता हूँ कि इस शख़्स से अकेले में घंटों बात करुं. उन अफ़सानों को सुनूं- समेंटूं, जो उनकी स्मृतियों के अलबम में नज़ीर की तरह पैबस्त है. वे भी मुंतजि़र हैं, उस लम्हे के जब यह मुहूर्त मुकर्रर हो. मानों कहते हों- "आओ, थकते पैरों को सहलाएं, छाया बैठें, बीती यात्राएँ दोहराएं".

याद है, एक बार सुरेश तांतेड़ ने कहा था- "कला-संस्कृति की सेवा के लिये ही शायद मैंने जन्म लिया. मेरी श्वास-प्रश्वास में यह सब समा गया है. 50 साल की यात्रा में अब मैं कुछ थक गया हूं, लेकिन हारा नहीं हूं. सफलता का असल श्रेय भामाशाहों को है, जिन्होंने जरूरतों को देखते हुए हमेशा बाहैसियत आर्थिक मदद की. यही वजह है कि कई सरकारें आईं-गईं, लेकिन इस संस्था के नींव के पत्थर अब भी अडिग है. जो यश-कलश गढ़े हैं, अतीत के पन्नों पर उसकी सुनहरी इबारत लिखी जायेगी."
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: July 20, 2021, 11:00 AM IST
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