स्मृति शेष: मंगलेश डबराल कहते थे कविता के भीतर रचा-बसा होता है जीवन का संगीत

कवि मंगलेश डबराल (Manglesh Dabral) का 9 दिसंबर को निधन हो गया. उनकी कविता में खालिस आम आदमी की आवाज सबसे ज्यादा मुखर होती है. वे अक्सर कहते थे कि कविता और संगीत एकदूसरे के लिए ही हैं. यह तो बस ऐसा है कि शब्द का लय-ताल में तब्दील हो जाना. बाकी तो सब एक ही है. 

Source: News18Hindi Last updated on: December 10, 2020, 5:56 PM IST
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स्मृति शेष: मंगलेश डबराल कहते थे कविता के भीतर रचा-बसा होता है जीवन का संगीत
कवि मंगलेश डबराल का 9 दिसंबर को निधन हो गया.
याद के दरीचे पर एक लम्हा अचानक दस्तक दे रहा है. ‘पहाड़ पर लालटेन’ की रोशनी में ज़िंदगी के सबक सीखकर कला और कविता की दुनिया में पूरे दमखम से दाखिल हुए मंगलेश डबराल, एक मुद्दत बाद दिल्ली से भोपाल आए थे. भोपाल से यूं उनका राब्ता पुराना था. वे मप्र. के संस्कृति महकमे की ओर से कला परिषद और बाद में भारत भवन की साहित्यिक पत्रिका ‘पूर्वग्रह’ के सहायक संपादक की हैसियत से एक मुद्दत तक जुड़े रहे. लिहाज़ा रिश्ता मैत्री का भी इस शहर से दूर तक बना रहा. इस दफा निमित्त बना था, कथाकार संतोष चैबे का भारतीय ज्ञान पीठ से छपकर आया उपन्यास ’जलतरंग’ का लोकार्पण. अलावा इसके आईसेक्ट स्टूडियो में लंबी वार्ता की और वनमाली सृजन पीठ के इसरार पर एक सुबह अध्ययन शोध केंद्र आए. उन्होंने जिज्ञासु युवा कलाकारों से दिलचस्प और ज्ञानवर्धक सांस्कृतिक संवाद किया. कुछ नई पुरानी कविताएं भी सुनाई. ‘जलतरंग’ संगीत और शोर के बीच जीवन के आरोह-अवरोह की दिलचस्प कहानी है, लिहाज़ा बातचीत में विचार का ताप भी वैसा ही तैयार हुआ. स्टूडियो में कविता, कला और संगीत के परस्पर रिश्तों के साथ ही इस दौर की सास्ंकृतिक और सामाजिक चिंताओं पर मैंने कुछ सवाल किए और मंगलेश अपने तजुर्बे के साथ मुखर होते चले गए. उन्हें बहुत मन से याद करते हुए हुए प्रस्तुत है यह संवाद.

विनय उपाध्याय: पहाड़ी गांव काफलपानी की आबो-हवा का असर आपकी कविता और कंठ में साफ झलकता है. लेकिन शुरूआती रूझान कब कैसा हुआ?
मंगलेश डबराल: मेरे पिता गढ़वाली के भी कवि थे. उन्होंने खण्डकाव्य भी लिखा था कन्या विक्रय की प्रथा पर, उसका नाम था- 'फ्यूंली और सत्यनारायण की कथा, जो कि हमारे यहां सब जगह प्रचलित है. उन्होंने गढ़वाली भाषा में छन्दबद्ध अनुवाद किया था और उन्हीं छन्दों में अनुवाद किया था जिन छन्दों में वो मूल कथा लिखी गई है. मेरे दादा भी साहित्य, ज्योतिष और वैद्यिकी माने आयुर्वेद के जानकार थे. उन्होंने भी गढ़वाली कहावतों का एक बड़ा संग्रह तैयार किया था. हमारे घर में बहुत-सी किताबें थीं, मुझे पढ़ने को मिलीं. संस्कृत का काफी बोलबाला था. बचपन में मैंने बहुत सारी चीज़ें संस्कृत की पढ़ ली थीं इस तरह की. ’मेघदूत’ या जयशंकर प्रसाद का ’आँसू’ मैंने काफी छोटी उम्र में ही पढ़ लिए थे और कण्ठस्थ कर लिए थे.

सवाल: हमारी श्रुति और स्मृति की जो परम्परा है वो बड़ी साझेदारी में शब्दों को लेकर चलती है. भक्ति संगीत तो हमारे पास आता ही ऐसा है. लेकिन हम आधुनिक कविता का संगीत से जो रिश्ता हुआ है- क्या आपको लगता है कि वो भी उतना ही सार्थक, शाश्वत और रंजक है?
जवाब: जो आपकी पुरानी कविता है, मसलन तुलसी, कबीर या सूरदास की, या भक्तिकाल की जितनी कविता है, बाकायदा संगीत में उनको ढाला गया है. यानी वो एक विधा का दूसरी विधा में जाना था. सूरदास का पद मान लीजिये किसी राग में, बिलावल राग में प्रस्तुत किया गया. कबीर के जो पद हैं, उनका गुरुवाणी, गुरुग्रन्थ साहिब में बाकायदा रागों के साथ उल्लेख है. राग और ताल उसमें मिलते हैं- राग केदार और ताल. यानी उनको गाया गया. यह कहा जाता है कि गुरुग्रन्थ साहिब के दौर में, गुरुनानक के दौर में उन पदों का बाकायदा गायन हुआ और उसी के बाद उनका राग निर्धारण भी हुआ. उससे पहले ये उल्लेख नहीं मिलता है कि कबीर अपने पदों को गाते थे या नहीं गाते थे. ऐसा कोई उल्लेख नहीं है या जितने हमारे छन्द हैं वो सब गाये जाते थे, कुछ वैदिक छन्दों को छोड़कर, जैसे अनुष्टुप वगैरह-वगैरह.

सवाल: क्या संगीत आरोपित सा लगता है आधुनिक कविता में?
जवाब: मेरा कहना यह है कि वो एक छन्दमुक्त कविता है. उसके लिए कौन-सा संगीत उपयुक्त होगा, मुझे लगता है कि अभी इसको लेकर हल्का-फुल्का काम हुआ है. लेकिन शायद बहुत ज्यादा काम किया जाना बाकी है. हमारे बड़े कवि रघुवीर सहाय ने काफी काम किया था. उसके बाद नरेश सक्सेना ने थोड़ा-बहुत काम किया. लेकिन कोई बड़ा, गहरा और स्थायी काम हुआ नहीं है. मेरे मन में आधुनिक कविता के संगीत की जो बात है, वो यही है कि उस कविता के भीतर से ही वो संगीत उपजेगा. मसलन, रघुवीर सहाय की एक कविता है- ’दे दिया जाता हूं’. बहुत सुन्दर कविता है. मुझे बहुत प्रिय है. उसके साथ मैं कल्पना करता हूँ कि एक हल्का-सा सरोद बज रहा हो और वो सरोद आपकी ओर नहीं आ रहा हो, बल्कि आपसे दूर जा रहा हो. इस तरह का संगीत अगर हो, तो मुझे लगता है कि वो उस कविता के साथ न्याय होगा. आधुनिक कविता का गायन कम से कम हो और उसका वाचन सबसे अधिक हो- संगीत के भीतर. ऐसी कौन-सी प्रविधि हो सकती है जो कविता के वाचन को सुरक्षित रख सके गायन में.
सवाल: शब्द और संगीत जब आसपास आते हैं तो रहस्य और रमणीयता का नया धरातल तैयार होता है. आप क्या सोचते हैं?
जवाब: शब्द और संगीत, इसके रिश्ते के बारे में शायद गहराई से सोचा जाना चाहिए. लेकिन मैं यहां पर एक बात ज़रूर कहना चाहता हूँ कि वो पद जो गेय हैं, जब उनका गायन होता है तो यह देखा गया है, मेरे ख्याल से अमीर ख़ां साहब और कुमार गन्धर्व, दो लोगों को छोड़कर बाकी जो गायन है, उसमें कभी भी शब्दों को, उनके अर्थों को प्रमुखता नहीं दी गई. होता यह है कि ’कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’ जब हम कुमार गन्धर्व जी से सुनते हैं तो उसका अर्थ हमारे सामने खुलता है, शब्द के अनेक स्तर हमारे सामने आते हैं और संगीत भी आता है. लेकिन जब कोई दूसरा गायक इसको गाता है तो वो अर्थ हमारी समझ में नहीं आता. क्योंकि वहां संगीत शब्दों पर हावी हो जाता है. तो ऐसा तरीका निकाला जाये कि संगीत शब्दों पर हावी न हो, तो शायद मुझे लगता है कि कविता के लिए उपयुक्त संगीत होगा.


सवाल: यहीं पर रंग संगीत अचानक कौंधता है. यहां कविता यानी शब्द भी दृश्य के साथ सटकर आता है और संगीत भी छाया की तरह आता है. तो उसका भी मज़ा है और शब्द का भी.
जवाब: हां, मराठी में नाट्य संगीत है जिसमें कि बहुत अच्छे-अच्छे पद गाए गए हैं.

सवाल:
साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रकारिता का एक लंबा अंतराल आपके साथ बीता है. इस वक्त परिदृश्य कैसा नज़र आता है?
जवाब: देखिए, जहां तक अखबारों का सवाल है, उसमें साहित्यिक पत्रकारिता तो रह नहीं गई है. अखबारों में वो सब तो लगभग ख़त्म ही हो गई है. बहुत कम, इक्का-दुक्का, जो कुछ समीक्षाएं देते हैं अखबार, उसमें भी पब्लिक रिलेशनिंग ज्यादा होती है. पब्लिक रिलेशनिंग जॉब ज्यादा हैं. उसमें तारीफें ही की जाती हैं. जबकि आलोचना का काम ये है और अच्छी साहित्यिक पत्रकारिता का काम ये है कि वो साहित्य की किसी कृति के बारे में यह बताए कि उसको हम कहां प्लेस कर रहे हैं? हमारी जो अपनी परम्परा है, उसमें इसकी जगह कहां पर बनती है, ये वो नहीं बताती हैं, तारीफ़ों से भरी हुई होती है और अगर समीक्षक आपसे नाराज़ हुआ तो निन्दा से भरी हुई होती है. लेकिन इस समय प्रतिमानों का संकट है. अखबारों में उसकी जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है. उसकी जगह कुछ आनुष्ठानिक जगह हो गई है, रिचुअलिस्टिक जगह हो गयी है. मसलन ’मदर्स डे’ पर आपको दिखाई देता है कि पांंच कविताएंं ’मांं’ पर छपी हुई हैं या ’फादर्स डे’ आता है तो दो-तीन कविताएं ’पिता’ पर छपी हुई होती हैं. इसी तरह ’चिल्ड्रन्स डे’ आता है तो उस पर एक-दो कविताएं ’बच्चों’ पर मिल जाती हैं. ये आनुष्ठानिक मामला है- एकदम रिचुअलिस्टिक है. सचमुच की कोई चिन्ता हमारे मीडिया को नहीं है. चाहे इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया हो. साहित्यिक पत्रकारिता लगभग समाप्त हो गई है. जब मैंने शुरू किया था, जब मैंने अखबारों में पत्रकारिता शुरू की, उन दिनों हम लोग कम से कम यही मानते थे कि लोगों को साहित्य की उतनी ही ज़रूरत है जितनी कि खेलकूद की ज़रूरत है. उसको हम लोग बहुत कवरेज देते थे. अब शायद सोशल मीडिया पर ब्लॉग या इन पर साहित्यिक गतिविधि बढ़ रही है और मुझे लगता है कि यह एक अच्छी बात है. इसके माध्यम से कुछ अच्छी चीज़ें सामने आएं, ये एक उम्मीद बनती है.

सवाल: और पत्रिकाओं को लेकर...?
जवाब: पत्रिकाएं इस समय हिन्दी में बहुत ज्यादा हैं. इस समय हिन्दी में इतनी ज्यादा पत्रिकाएं हैं जितनी शायद कभी भी नहीं रहीं. इतनी पत्रिकाएं उस समय भी नहीं रहीं, जब हिन्दी में लघु पत्रिका आन्दोलन चल रहा था- 71, 72, 73 के आसपास. पत्रिकाएं इसलिए बहुत ज्यादा हैं, क्योंकि विज्ञापन मिल जाते हैं. लेकिन उनमें कोई ऐसा पर्सपेक्टिव नहीं दे पा रही हैं ये सारी पत्रिकाएं साहित्य को और न उनके ज़रिये कोई नई रचना सामने आ रही है, क्योंकि उनमें सम्पादकीय विवेक नज़र नहीं आता.

सवाल:
उस सम्पादकीय विवेक की चर्चा कीजिये, जिसने कभी साधा था ऐसी पत्रिकाओं को?
जवाब: बहुत-सी पत्रिकाएं ऐसी रही हैं, जैसे ’कल्पना’ नाम की पत्रिका थी, ’आलोचना’ थी, ’पहल’ थी जिसमें छपना शायद एक बड़े गर्व की बात मानी जाती थी. उस समय यह माना जाता था कि ’कल्पना’ में आपकी कविता छप गई है तो आप कवि हो गए हैं. उस समय छपना मुश्किल काम था. आज तो छपना बहुत आसान हो गया. उनमें कोई सम्पादन नहीं मिलता है. मुझे लगता है कि पत्रिकाओं का यह काम है कि वो अच्छे साहित्य को रेखांकित करें.

सवाल: यहां मैं थोड़ा-सा विभाजन करके बात करना चाहूंगा कि वो पत्रिकाएं जो दिल्ली से सम्पादित होती हैं उनका चरित्र और जो कस्बों एवं छोटे शहरों से भी निकल रही हैं- क्या आपको लगता है कि कोई फर्क है उनके चरित्र में?
जवाब: देखिए, फर्क ज़रूर होगा. क्योंकि स्थानीय प्रतिभाओं को उसमें ज्यादा जगह मिलती होगी, लेकिन उनमें सम्पादन की कोई बड़ी दृष्टि मुझे नज़र नहीं आती है और लगता है कि ये सब असम्पादित हैं. मतलब ऐसा अब होता ही नहीं है कि मैं कहीं कविताएं भेजूं तो सम्पादक यह कहे कि आपकी कविताएं अच्छी नहीं हैं, और कविताएं भेजिये. आप जो भी भेजते हैं वो सब छप जाता है. ये सम्पादकीय विवेक नाम की चीज़ मुझे नज़र नहीं आती. कुछ पत्रिकाओं ने बीच में वैचारिक उद्वेलन पैदा किया था. मसलन ’हंस’ की बात करें.

सवाल: सोशल मीडिया के इस ज़माने में हिन्दी पाठकों को लेकर आपकी क्या राय है?
जवाब: दरअसल हिन्दी में कोई पाठक समाज नहीं है ठीक-ठीक, इतनी सारी किताबों के बावजूद और पचास करोड़ की आबादी के बारे में कहा जाता है कि वह हिन्दी पढ़ती है, बोलती है. हिन्दी एक बहुत बड़ी भाषा बन चुकी है, लेकिन उसकी साहित्यिक-सांस्कृतिक जो समृद्धि है वो बहुत कम है. मुझे लगता है कि दूसरी भाषाओं के लेखक अपने समाज से ज्यादा जुड़ा हुआ महसूस करते हैं अपने आपको, इसलिए कि वो लोगों को बिलांग करते हैं. जिसे ’सेंस ऑफ बिलाँगिंग’ कहते हैं, यहां हिन्दी में बहुत कम हैं.मेरी एक किताब छपी है तो मुझे नहीं मालूम कि उसका पाठक कौन है. हालांकि ये बात हर भाषा में है. ये तय करना मुश्किल है कि पाठक कौन हैं, लेकिन दूसरी भाषाओं में पाठक की एक अदृश्य उपस्थिति बनी रहती है, लेखक को ये एहसास बना रहता है कि दूसरा है जो मुझे पढ़ेगा या पढ़ रहा है- वो कौन है, उसको भले ही हम न जानते हों. हिन्दी में इस बात का कोई भरोसा नहीं है कि आपको कोई पढ़ेगा. इस तरह से. समकालीनता का अर्थ यही है कि आप उस काल में, जहांं कोई दूसरा भी आपको देख रहा है. हिन्दी में इस बात का कोई भरोसा नहीं है. एक बात तो ये है.  दूसरी बात यह कि इसकी बहुत-सी वजहें हमारे हिन्दी समाज की निरक्षरता और निर्धनता में छिपी हुई हैं और दूसरी बड़ी वजह यह है कि किताबें बहुत महँगी हैं. प्रकाशकों को ज़रा भी इस बात से सरोकार नहीं है कि पाठकों तक ये किताब पहुँचे. मैं बहुत पहले से, पिछले बीस साल से, जो परिचित प्रकाशक हैं- उनसे यह कहता आ रहा था कि आप पेपर-बैक एडीशन लाइए. अब जाकर लोगों ने पेपर-बैक एडीशन लाने शुरू किए हैं. अब उनको ये लगा है, थोड़ी एक्टिविटी बढ़ी है. पुस्तक मेले बहुत होते हैं, सरकारी खरीद बहुत कम हो गई है. तो जब तक किताबें जनसुलभ नहीं होंगी, तब तक किताबें सस्ती नहीं होंगी! अगर मेरी किताब का दाम तीन सौ रुपये है तो मैं खुद अपनी किताब नहीं खरीद पाऊंगा. मुझे विदेशी लेखकों से इस बात को करने का कुछ अनुभव है, वो लोग आश्चर्य करते हैं. उन लोगों को यकीन नहीं होता है कि मेरी किताब की पांच सौ प्रतियाँ चार साल में बिकती हैं. उनको लगता है कि आपका समाज कैसा है, वहां लोग पढ़ते नहीं हैं क्या?

सवाल:
पुस्तकालय सन्नाटे फांक रहे हैं इन दिनों. क्या बेचैनी है इस वक्त, जो पाठक को एकाग्र नहीं होने देना चाहती?
जवाब: देखिए, हमारे यहाँ लोगों में पुस्तक पढ़ने का संस्कार नहीं है. मूल चीज़ यह है कि संस्कार नहीं है. दूसरा, साहित्य में और आम आदमी की जो दुनिया है उसके बीच में गैप बहुत बड़ा है और ये गैप कल्चरल ही नहीं है, ये एक पॉलिटिकल गैप है. इसकी पूरी एक पॉलिटिक्स है. इसकी पूरी एक राजनीति-सी है. राजनीति ये है- जो ब्रेख्त कहते थे न कि- ’हंगरी मैन, गो टु द बुक, इट्स ए वीपन.’- भूखे आदमी, किताब की ओर जाओ, यह एक हथियार है.’ ये स्थिति है, लेकिन यहाँ कहा जाता है कि भूखे आदमी को क्या मतलब है किताब से, उसको पहले रोटी चाहिए. रोटी तो चाहिए ही चाहिए, लेकिन उसको रोटी के अलावा किताब भी चाहिए. ये जो पूरी पॉलिटिक्स है, हमारे देश की जो एक भेड़चाल पूरी जारी है, इसकी पूरी कोशिश राजनीति करती आ रही है. और नहीं, तो क्या वजह है? एक लेखक के संसार में आप जब प्रवेश करते हैं तो उसका संसार दूसरों के संसार से कुछ अलग होगा, उसकी अपनी कुछ शर्तें होंगी- मुझे लगता है कि उन शर्तों को मानकर ही आप प्रवेश करें तो शायद बेहतर होगा.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: December 10, 2020, 5:56 PM IST
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