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पद्मश्री सम्मानः परंपरा के आदिम रंगों का मान

जनतांत्रिक मूल्यों और उनके आसपास सृजन और विचार का नया परिवेश तैयार करने और भारत की सांस्कृतिक विरासत के उत्तराधिकार में ज्ञान-विज्ञान के नए कीर्तिमान गढ़ने वाली विभूतियों को पद्म अलंकरण देने की सालाना रस्म एक बार फिर पूरी हुई. केन्द्र सरकार की ओर से जारी इन सम्मानों की सूची में इस बार भारत के हृदय राज्य मध्य प्रदेश की दो ऐसी शख्सियतें शामिल हैं जो जनजातीय और लोक कलाओं के परिदृश्य में अलहदा सी हैसियत रखती हैं. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या सुर्खी में आए ये दो नाम हैं श्रीमती भूरी बाई और डॉ. कपिल तिवारी. भूरी का योगदान अपनी जनजातीय भीली चित्र परंपरा को जगत व्यापी प्रतिष्ठा देने के अथक प्रयत्नों से जुड़ा है तो कपिल तिवारी जनजातीय और लोक संस्कृति की ज्ञान परंपरा के अद्वितीय अध्येता और प्रवक्ता के रूप में बहुमान्य हैं. भूरी बाई के संघर्ष और सृजन तथा कपिल तिवारी के सम-सामयिक चिंतन को साझा करते हुए उन्हें पद्मश्री मिलने की मुबारक और शुभकामनाएं.

Source: News18Hindi Last updated on: January 28, 2021, 4:57 PM IST
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पद्मश्री सम्मानः परंपरा के आदिम रंगों का मान
भीली चित्र परंपरा को प्रतिष्ठा देने वाली भूरी बाई को इस साल पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया है. (फोटो साभारः संस्कृति मंत्रालय टि्वटर)
झाबुआ यानि मध्य प्रदेश के पश्चिमी छोर पर सघन जंगलों और पहाड़ियों से घिरा वो इलाका जहां भील आदिवासियों के पुरखों ने कभी अपने बसेरे की तलाश की थी. कुदरत को ही अपना आराध्या माना और उसमें लय होते पुरुषार्थ में ही पूजा के अर्थ तलाशे. भूरी इसी महान विरासत का सुनहरा भविष्य बनकर अपने समय की किंवदंति बन जाएगी, यह सोचते हुए जरा आश्चर्य ही होता है. बहरहाल, भूरी बाई की कहानी, कि़स्मत की कहानी नहीं है. वह कर्म के पसीने की कहानी है.

स्त्री के नाम पर अपने शिविरों में आधुनिक विमर्श की आंच सेक रही बुद्धिजीवियों की बिरादरी के लिए यह कितना कौतूहल, जिज्ञासा और गर्वोचित प्रसन्नता का विषय है, नहीं मालूम, लेकिन 72वें गणतंत्र दिवस पर अचानक सुर्खी में आयी देश की पहली भील चित्रकार भूरी बाई के नाम पद्मश्री की घोषणा ने आदिम रंग और रेखाओं को फिर महका दिया है. यह सम्मान सृजन की उस सनातन कामना से परवान चढ़ती परंपरा का है, जो एक जनजातीय समुदाय की स्त्री के भीतर हिलोरे भरती आस्थाओं का इन्द्रधनुष रचती है. और इस तरह जनजातीय कला में नई चित्र भाषा विचार को नए पंख देती है. भूरी बाई के हाथों आकार ले रहे बेशुमार चित्र इसी सच की गवाही हैं.

.....यह अस्सी का दशक था. रोज़ी की तलाश में भटकते-भटकते अपने पति के संग वे भोपाल आयीं. घर-गांव-देहरी सब पीछे छूट गये, लेकिन स्मृतियों की रंग-रूपहली छवियां साथ चली आयीं. मजदूरी के लिए हाथ आगे बढ़ते तभी भूरी को बीमारी ने घेर लिया. देह पर फफोले उग आये. तभी हाथों ने कूची थामी और रंगों की सोहबत में सृजन का एक नया अध्याय रचना शुरू हुआ. एक स्त्री के भीतर मौजूद लालित्य और सौन्दर्यबोध का नैसर्गिक प्रवाह फूट पड़ा. जैसे यह एक नई यात्रा पर चल पड़ने की भीतरी पुकार थी. डगर भी नई, रफ्तार भी नई और मंजि़ल भी नई. इस नए आग्रह की ज़मीन उस बेचैनी और कसौटी से तैयार हुई जहां भीली चित्रांकन की परंपरा में स्त्रियों का प्रवेश निषेध था. वहां अपने लोक देवता पिथौरा को रचने की अनुमति पुरुषों को ही थी. अपने लिए वर्जित इस भूमि को हासिल करने के लिए भूरी ने पिथौरा कला के आसपास सिमट आए रंगों, मिथकों, प्रतीकों, बिंबों और आशयों को मन की आंखों से देखा और एक दिन सूने फलक पर वे सब नई शक्ल में ढलकर एक स्त्री की महान सर्जना में बदल गये. यूं पिथौरा ही भूरी की प्रेरणा बना. निश्चय ही यह एक जनजातीय स्त्री की स्वाधीन चेतना, उसकी मौलिक सूझ-बूझ, उसके कौशल और रचनात्मक जि़द की विजय थी. भूरी के केनवास पर खिलखिलाते रंग उन स्मृतियों, गाथाओं और आध्यात्मिक प्रसंगों को उकेरते हैं जो उसने पूर्वजों से सुने और धरती-दीवार पर आकार लेते चित्रों में देखे थे.

महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पिथौरा के नाम से जो परंपरा सदियों से भील समाज में दीवार पर उभर आए चित्रों के ज़रिये पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हो रही थी, भूरी ने उन्हीं रंग प्रतीकों से अलंकरण की नई शैली ईज़ाद की. पिथौरा में स्थापित लोक देवता को हू-ब-हू न रच पाने की विवशता ने इस तरह नई करवट ली और भीली चित्रों की एक सुन्दर दुनिया ने आकार लेना शुरू किया. यह मानना ग़ैर वाजिब नहीं कि भूरी बाई भीली चित्र परंपरा को नया उन्मेष प्रदान करने वाली हमारे देश की पहली महिला जनजातीय कलाकार है. भूरी ने साहस के साथ यह क़दम बढ़ाया तो भील समुदाय का एक बड़ा कलाकार कुनबा उनके साथ हो लिया. यह लगभग वैसा ही हुआ जैसा गोंड परधान चित्र परंपरा के साथ जनगण सिंह श्याम के रहते हुआ था. देशज गंध की गमक भरे भूरी के इस अद्भुत काम पर मूर्धन्य चित्रकार जे. स्वामीनाथन की निगाह गयी, जो बीती सदी के अस्सी के दशक में कलाओं के मरकज़ भारत भवन में आदिवासी कला दीर्घा का आकल्पन कर रहे थे. भूरी बाई के रंगों ने यशगामी यात्रा के शुभ चरण नापना शुरू किया. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने उन्हें आग्रहपूर्वक बुलाया. उन्हीं दिनों जनजातीय और लोक कलाओं के संरक्षण और दस्तावेज़ीकरण के लिए मप्र की सरकार ने 'सुपर न्यू मेरेरी' श्रेणी के तहत नए पद का सृजन किया. भूरी बाई चयनित हुई. राष्ट्रीय अहिल्याबाई और राज्य स्तरीय शिखर सम्मानों से भी वे विभूषित की गयीं.
भूरी बाई को भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय के परकोटे में तल्लीनता से सृजनरत देखना आगन्तुकों के लिए सदा एक सुखद अनुभव होता है. देस-परदेस के अनेक संग्रहालयों की दीवारों पर भूरी के चित्र चस्पा हैं. उनका सृजन एक स्त्री के हाथों प्रकृति की महान प्रार्थना हैं. लोक देवता पिथौरा का आशीर्वाद बरसा है भूरी पर.

प्रकृति से हमारी लय टूट गयी; कपिल तिवारी से संवाद


विनय उपाध्यायः जब प्रकृति अपने आपमें ईश्वर का महान सृजन है, तब कलारूपों में मनुष्य द्वारा उसकी पुनर्रचना की क्या जरूरत है? प्रकृति तो अपने मौलिक राग-रंग में भी आनंद की पर्याय है.कपिल तिवारीः कुछ बातें हम लोगों ने सुन ली हैं. कुछ आप्त वचन हमने पढ़ लिये हैं. हमें बताया जाता रहा है कि सृष्टि को ईश्वर ने बनाया. हमें ईश्वर ने पैदा किया. क्या हमने कभी खोजा है? कभी जानने की कोशिश की है? यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि मुझे इस सुने हुए और लिखे हुए पर संदेह है. मैं इसमें कुछ परिवर्तन करना चाहूंगा. ईश्वर ने प्रकृति नहीं बनाई, प्रकृति 'ईश्वर का ही विस्तार' है. जब हम कहते हैं कि ईश्वर ने प्रकृति को बनाया, सृष्टि को बनाया, हमें पैदा किया तो ऐसा लगता है कि सृष्टि और ईश्वर दो अलग-अलग सत्ताएं हैं. प्रकृति और मनुष्य अलग-अलग हैं. वास्तव में सब कुछ जो अस्तित्ववान है एक ही परम सत्ता विस्तार है. भेद दृष्टि के कारण वह पृथक-पृथक और भिन्न प्रतीत होता है. समस्त सृष्टि, प्रकृति जिसका भाग है एक ही सत्ता के आनन्द की लीला है. कलारूपों में मनुष्य 'प्रकृति की पुनर्रचना' नहीं करता जैसा कि प्रायः कहा जाता है वास्तव में वह 'अपनी खोज' और 'अपने अस्तित्व का विस्तार' करता है. संवेदना और विचार किसी भी रचना में मनुष्य का विस्तीर्ण होना है, इस अर्थ में अकेले परम सत्ता ही नहीं, मनुष्य भी सृष्टि का विस्तार करता है. वह और किसी तरह से जीवन की धन्यता का अनुभव नहीं कर सकता.
'प्रकृति आनन्द का पर्याय' नहीं 'आनन्द' ही है- पर्याय क्या? आनन्द का कोई पर्याय नहीं होता, वह अस्तित्व का मूल स्वभाव है. हमारी कठिनाई यह है कि हम 'द्वैत' के बिना 'पर्याय' के बिना और 'प्रयोजन' के वगैर कुछ भी सोचने में असमर्थ हैं. ज्ञान की भारतीय परम्परा में कुछ शब्द हैं जिनका विशिष्ट पारिभाषिक अर्थ है जैसे ही हम उन्हें संज्ञान की पारिभाषित के बाहर बरतना शुरू करते हैं वे अपना अर्थ खो देते हैं.

सर्जना की बीज भूमि आप किसे मानते हैं?

इस प्रश्न के उत्तर में अक्सर बताये जाने वाले सरलीकृत कारणों या प्रेरकों के नाम गिना देने के उपायों से मैं बचना चाहूंगा. अपने 'अस्तित्व का विस्तार' करने का सहज गुण ही अस्तित्व में स्वयं अन्तर्निहित है. वह बीज भी है और वृक्ष भी, वह धरती भी जिसमें वृक्ष की जड़ें होती हैं और वह आकाश भी जिसमें वृक्ष फैलता है. वृक्ष बनकर एक 'बीज' धन्य होता है, वह अपनी सम्भावना को 'विस्तीर्ण होने की प्रत्येक सीमा' तक फैला देता है. इसके बिना, वह रुक नहीं सकता उसे ऐसा करना ही होगा, जीवन की उससे यही मांग है. चेतना के ऊर्ध्वगमन के लिए अनेकों विधियों में से किसी में, कुछ प्रयास, कुछ उद्यम, कुछ पुरुषार्थ करना ही होता है तब अभिव्यक्ति के किसी माध्यम में कोई व्यक्ति कुछ कह सकता है, कुछ रच सकता है, वह 'रचना में सृष्टि का विस्तार' है, यह विशेष मानवीय गुण और क्षमता है. संस्कृति की निर्मिति का यह मानवीय उद्यम, महनीय, मूल्यपरक, कालबिद्ध और कालातीत, सूक्ष्म, मूर्त्त और अमूर्त्त संस्कार समष्टि का एक जाति में निर्माण कर देता है. सभ्यता एक जाति का सामूहिक प्रयत्न है, संस्कृति की रचना सृष्टि बहुत हद तक सर्जकों का व्यक्तिगत उद्यम जो कालान्तर में अन्ततः एक सांस्कृतिक परम्परा का भाग हो जाता है. चेतना को विकसित करने यदि कुछ भी नहीं किया जाता तो अन्ततः प्रकृति, अपने विस्तार के लिए मनुष्य को 'जैविक विस्तार के उद्यम' में उपयोग कर लेती है, लेकिन अपने को विर्स्तीण करने के यत्न में ही व्यक्ति को सक्रिय होना पड़ता है. जब हम कहते हैं कि यह संसार बढ़ता ही जाता है, तो इसका क्या अर्थ होता है? इसे कौन बढ़ा रहा है?

प्रकृति ही प्रकृति को विस्तारित करती जाती है, मनुष्य मनुष्यों को. अस्तित्व में विस्तार का गुण बीज भी है और वह भूमि भी जहां वह अंकुरित होगा, वह जल भी जो उसमें प्रवाहित हो उसे जीवन देगा, वह सूर्य जो उष्मा से उसे भर देगा और वह आकाश भी जहां वृक्ष फैलेगा. वह परम चेतनापूर्ण प्राणमय ऊर्जा, परा और अपरा प्रकृति, मनुष्य और विराट मनुष्येत्तर सृष्टि के कल्पनातीत विस्तार में एक ही है. जीवन ही जीवन को रच रहा है, जीवन ही जीवन का विस्तार कर रहा है. विस्तार का गुण ही बीज है और बीज को वृक्ष बनना होता है. मनुष्य में विमर्श और कल्पना की शक्ति है. वह स्वप्न देखता है, विचार करता है. उसे जीवन मिला हुआ है, वह जीवन से प्रतिकृत होता है और जीवन का विस्तार करता है. मनुष्य के रचे हुए को मैं 'प्रतिसृष्टि' नहीं मानता, वह एक अर्थ में सृष्टि का ही विस्तार है.

आदि आचार्यों ने सृजनकर्म के मूल में रस की भूमिका को सर्वमान्य स्वीकार किया है तो इस रसभूमि से आप प्रकृति संसार को किस तरह जोड़ते हैं?

भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की मूल अवधारणाओं को पारम्परिक भारतीय जीवन दृष्टि से जोड़कर देखा जाना चाहिये. सौन्दर्य की रस दृष्टि, आनंद की लीला की भारतीय जीवन दृष्टि का सहज परिणाम है. जैसे सृष्टि और जगत विस्तार एक परम सत्ता के आनंद की लीला, समझे और कहे गये हैं, उसी क्रम में मनुष्य के विमर्श और कल्पना की विधायी शक्ति, रचना सृष्टि में 'रस' निष्पत्ति करती है. अलौकिक और मानवीय सृष्टि अलग-अलग नहीं है. यही भी ध्यान देने योग्य है कि अलंकार, वक्रोति और ध्वनि सम्प्रदाय और इनकी सौन्दर्यशास्त्रीय मान्यताएं रस सिद्धान्त का खण्डन करके स्थापित नहीं हुई हैं. वे रस सिद्धान्त की मूल भिति पर विकसित पूरक सौन्दर्य दृष्टियां हैं. भरत मुनि से लगाकर पंडितराज जगन्नाथ तक लगभग एक हजार वर्षों तक भारत में सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि का विकास हुआ है. ऐसा दुनिया के इतिहास में और कहीं नहीं हुआ. भारतीय सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि, हमारी पारम्परिक जीवन दृष्टि का विस्तार है, उसे भारतीय जीवन दर्शन और परम्परा के परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिये. जब हम पश्चिम की विभिन्न साहित्य दृष्टियों और जीवन परम्परा के परिप्रेक्ष्य में उसे देखना और उनसे तुलना करना शुरू करते हैं, तो अपने पारम्परिक सौन्दर्यशास्त्र के साथ न्याय नहीं कर पाते.

जहां तक रसभूमि से प्रकृति संसार को जोड़ने का प्रश्न है, मैं लगातार इस बात को दोहरा रहा हूं कि मनुष्य और प्रकृति, प्रकृति और सृष्टि अलग-अलग नहीं है, वह एक ही सत्ता का विस्तार हैं. जब हम द्वैत दृष्टि से देखते हैं तो प्रकृति अलग प्रतीत होती है और हम पृथक, प्रकृति को देखने वाले बन जाते हैं, तब हमें लगने लगता है जैसे मनुष्य को आनंदित करने उसे प्रेरणा देने के प्रयोजन से प्रकृति अस्तित्व में अपना कार्य कर रही है. प्रकृति का जरा भी कोई प्रयोजन नहीं है वह परम निःप्रयोजन हैं. प्रयोजन हम आरोपित कर देते हैं, वह तो अपने गुण-धर्म में स्थित अपना कार्य कर रही होती है. इस द्वैत दृष्टि और प्रयोजन मूलकता को हटाकर देखिये- मनुष्य प्रकृति का विस्तार ही है. रचना में मनुष्य कोई 'प्रतिसृष्टि' नहीं कर रहा है वह प्रकृति को विस्तारित कर एक सृष्टि ही रच रहा है. 'आनंद' की जीवन दृष्टि ही सौन्दर्य की रस दृष्टि है.

सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में प्रकृति के भीतर एक दैवशक्ति की अनुभूति ऋषि करता है, तो क्या सर्जना, प्रकृति के माध्यम से सर्वात्म की खोज ही है? उसमें रचनाकार की भूमिका सर्जक की होती है या निमित्त की?

जब हम 'वैदिक साहित्य' शब्द इस्तेमाल करते हैं तो हम ऐसा मानते हैं कि वैदिक रचना सिर्फ साहित्य है. मैं आपसे कहना चाहता हूं वह सिर्फ साहित्य नहीं है. वह एक ऋषि के समक्ष प्रकाशित सर्वात्म का ज्ञान है जिसके एक छोटे से भाग को भाषा में भी कहा गया है. हमारी परम्परा ऋषि को 'दृष्टा' कहती है, इसका अर्थ है जिसने 'देखा'. वह ज्ञान को देखने वाला है. ज्ञान का विमर्श नहीं कर रहा है, ज्ञान को लिख नहीं रहा है. ज्ञान की यह स्थिति 'पश्यन्ती' कही गई है जिसमें 'सत्य' ज्ञान में प्रकाशित होता है. कभी भी और किसी भी अभिव्यक्ति में 'सम्रग के ज्ञान' को अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता. वह अभिव्यक्ति के लिए नहीं होता. कुछ संकेत, कुछ इशारे, कुछ प्रतीक और कुछ प्रतीतियां हैं वे. साहित्य की तरह 'रस प्रतीति' के उद्देश्य से उसे, नहीं कहा या रचा गया है. ऋषि किस प्रकृति के भीतर दैवशक्ति की अनुभूति करता है? क्या वह प्रकृति वही है जिसे हम जानते हैं या वह कुछ और है? उस प्रकृति में द्वैत नहीं है, वह दिव्य प्रकृति है उसमें सूक्ष्म और स्थूल प्रकृति दोनों शामिल है वह समष्टि है और ऋषि जानता है कि वह, इस सम्पूर्ण प्रकृति सत्ता से अभिन्न है. सर्वात्म की खोज अपने आप से भी हो सकती है और प्रकृति से भी. अपने को सम्पूर्णता में जो जान लेता है वह सर्वात्म भी जान लेता है, जो प्रकृति को सम्पूर्णता में जान लेता है वह भी एक अर्थ में सर्वात्म को जान लेता है. जिस सर्जना को हम जानते वह सर्वात्म की खोज नहीं है, वह मनुष्य का विस्तार है. मनुष्य अपने को बहुत विस्तृत कर सकता है लेकिन तब भी वह सर्वात्म का ज्ञान प्राप्त नहीं सकता, क्योंकि उसके लिए किसी रचना के सृजन के बजाय 'अपने आपको' ही 'रचना' होता है. 'अपने को ही'‘'खोजना' पड़ता है और अन्ततः अपने को ही 'पाना' होता है. सर्वात्म से अपने को भिन्न समझने वाली द्वैत दृष्टि, समाप्त हो जाती है. एक और बात सर्वात्म नहीं अपने आपको खोजा जाता है, अपने को समझा जाता है. सर्वात्म को कहाँ खोजेंगे? भेद दृष्टि गिरा दो, हम सर्वात्म ही हैं. हम ही 'निमित्त' भी हैं और 'सर्जक' भी.

अनुभूति की व्यापकता में रचनाकार की सर्जना उसका आत्म विस्तार ही करती है उस विस्तार में प्रकृति की भूमिका का कहां तक संस्पर्श होता है और किस रूप में?

सर्जना मानव अस्तित्व का ही विस्तार है, आत्म विस्तार नहीं. मनुष्य प्रकृति भी है और गुणातीत, तत्वातीत 'आत्म' भी. प्रकृति का विस्तार मानवीय अस्तित्व में शरीर से मन तक है. मन भी स्थूल सत्ता का अमूर्त्त सूक्ष्मतम रूप है. स्वप्न और कल्पना, विचार आदि उसकी विशेष शक्तियां हैं. विचार और स्वप्न के परे, शुद्ध चेतना का जगत है. वहां हम किसी सत्य पर अपने विचार और स्वप्न प्रक्षेपित नहीं कर सकते. मनस की सत्ता में विचार और स्वप्न प्रक्षेपित कर ही मनुष्य किसी भी अनुभव और अनुभूति को रचना में व्यक्त कर सकता है. इसीलिए मैं बार-बार दोहरा रहा हूं वह स्वयं प्रकृति का विस्तार है इस अर्थ में मनुष्य जब प्रकृति को प्रेरक की तरह देखता है तो इसे ऐसे समझना चाहिये जैसे प्रकृति, प्रकृति को ही देख रही है, प्रकृति, प्रकृति पर ही मुग्ध हो रही है. वह अपने से ही प्रेरित भी है और अपने को ही रच भी रही है.
जहां तक मनुष्य में प्रकृति का विस्तार है वहां तक मनुष्य अपनी शुद्धता चेतना या आत्म को नहीं देख सकता. वह मनस और अहं की चेतना के साथ अपने प्राकृतिक विस्तार और प्रकृति के जगत विस्तार के यथार्थ को ही देख सकता है. रचना में जो प्रकृति चित्रित होती है अथवा प्रकृति की प्रेरणा से मनुष्य जो रचता है वह मनस, प्रकृति तक का जीवन और उसका विस्तार है. प्रकृति की भूमिका वहीं तक हो सकती है जहां तक प्रकृति का अस्तित्व है. विचार और स्वप्न, अहंता भाव या चेतना के साथ मानस तत्व की विशेष शक्तियों का कार्य क्षेत्र है, इसके आगे प्रकृति कुछ नहीं करती, क्योंकि एक अर्थ में इस बिन्दु पर मानव अस्तित्व में प्रकृति समाप्त हो जाती है.

यांत्रिकता के युग में सर्जना की भूमिका यदि प्रकृति सम्पर्क की है तो वह अपने सम्प्रेषण में पाठकों पर क्या अपना प्रभाव छोड़ेगी? जबकि पाठक या सहृदय का अधिकांश जीवन प्रकृति से दूर होता जा रहा है?

यह युग यांत्रिकता का है- मनुष्य भी यांत्रिक है, वह मनुष्य की तरह कम है. प्रकृति और मनुष्य का संबंध टूट गया है अथवा इस संबंध में मनुष्य की ओर से विकृति आ गई है. सर्जना में विराट जीवन और प्रकृति से संबंध विछिन्न और टूटा हुआ लगता है, खुद सर्जना के साथ लोगों का क्या संबंध बचा है इस पर विचार करिये, आपको मनुष्य, प्रकृति और सर्जना के संबंधों का यथार्थ पता लग जायेगा. मनुष्य प्रकृति के साथ दुष्टता कर रहा है, उसका प्रकृति के साथ संबंध प्रकृति के दोहन करने का है. सारा प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है और चिंताजनक रूप से प्रकृति जीवन और मनुष्य की लय टूट गई है. मनुष्य का जीवन बचना चाहिये, इसलिए प्रकृति को बचाना जरूरी है. यह प्रकृति के अपने जीवन की स्वतंत्रता का अपमान करने वाली दृष्टि है. मनुष्य विकास के लिए, जीवन का ही शत्रु बन गया है. हमें विकास के ही रूप और धारण पर पुनर्विचार करना चाहिये. कैसा विकास, किसका विकास? क्या हम जीवन के पर्यावरण को नष्ट करके विकसित हो रहे हैं? क्या मनुष्य ने अपने जीवन की तरह, प्रकृति को भी जीवन का अधिकार हम देते हैं? या जीवन के अधिकार का सम्मान करते हैं? जीवन मनुष्य, मनुष्येत्तर प्राणि जगत और प्रकृति की परस्परता का छंद है, वे एक दूसरे के जीवन से जुड़े हैं.
मनुष्य के अथाह लालच ने प्रकृति के साथ अपराधपूर्ण और अक्षम्य व्यवहार किया है. सर्जना में भी प्रकृति के साथ मनुष्य का कोई मानवीय संबंध तब प्रकट होता है जब हम प्रकृति के प्रति मानवीय हों, उससे संवेदित हों. मैंने पहिले किसी प्रश्न में रेखांकित किया है कि अब रचना में प्रकृति एक और ही रूप में है, मानव प्रकृति के विस्तार में और अपने से ही लड़ती-संघर्ष करती मानव प्रकृति.

बिगड़ते वैश्विक पर्यावरण में सर्जना, प्रकृति के संबंध में किस तरह की भूमिका का निर्वाह करती है?

उस अर्थ में सर्जना की प्रकृति प्रेरणा समाप्त हो गयी है जैसा कुछ दशकों पहिले तक वह रचना की परम्परा में थी. अब सर्जना, प्रकृति से टूटे हुए और विछिन्न संबंध का यथार्थ है. सर्जना का संबंध यथार्थ जीवन से है और अपने आपकी मानव प्रकृति से. रचना, बहुत सारे प्रयोजनों के लिए संघर्ष करती चीज है. शोषण से, गैर बराबरी से, साम्राज्यवादी शक्तियों से, उत्तर आधुनिक और वैश्विक षड्यंत्रों से, बाजार से, उपभोक्तावाद आदि से लड़ने वह रचनाकार का माध्यम, बल्कि औजार है.
केवल प्रकृति का पर्यावरण असंतुलित नहीं हुआ है, मानव प्रकृति में भी पर्यावरण गड़बड़ा गया है. मैं पीछे यह संकेत कर चुका हूं कि अब सर्जना और प्रकृति के संबंध में चले आते संबंध, अर्थात् प्रकृति की प्रेरणा से रचना का संबंध टूट गया है, क्योंकि मनुष्य प्रकृति के साथ परस्परता, साहचर्य और सम्मान के भाव और संबंध के बजाय प्रकृति से लड़ने और प्रकृति को जीतने के उन्माद से भर गया है. ऐसी स्थिति में प्रकृति देने वाली शक्ति के बजाय अपने स्वार्थ के लिए दोहन करने की चीज़ में बदल जाती है. मनुष्य ने ऐसा किया है और इसलिए अब सर्जना में भी प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध बदल गया है.

यांत्रिक होते जीवन में क्या सर्जना प्रकृति को फिर से जीवन में रोपित कर पायेगी?

मनुष्य के जीवन में प्रकृति का पुर्नवास रचना नहीं, स्वयं मनुष्य ही कर सकता है. मनुष्य को नये सिरे से प्रकृति के साथ अपने संबंध की कसौटी तय करना होगी. प्रकृति आज स्वयं मनुष्य के हाथों शोषण की शिकार है. यह संबंध बदलना होगा, तभी जीवन और रचना में प्रकृति का नया संबंध बन सकता है. यह संभव नहीं है कि मनुष्य प्रकृति को नष्ट करता रहे और उसी मनुष्य की रचना में प्रकृति प्रेरक भी बनी रहे. मनुष्य के जीवन में प्रकृति के जीवन का सम्मान और रक्षा जरूरी है तभी मनुष्य के सृजन में भी प्रकृति अपना कार्य कर सकती है.

लोक तो प्रकृति का पर्याय रहा है, उसमें प्रकृति की अन्तरंगता बोलती है. इधर आधुनिकता ने भी लोक जीवन और वहां की कलाओं को प्रभावित किया है- जब खेतों में हल और पशुओं की जगह मशीन आ जायेगी तो कालान्तर में लोक का नैसर्गिक आश्रय भी गायब हो जायेगा?

कई तरह के प्रश्न हैं ये. इसमें लोक और प्रकृति के संबंध, लोक की परम्परा और आधुनिक विकास के टकराव और बदलाव की चिंता एक साथ है. सबसे पहिले हम लोक, लोकजीवन और संस्कृति के साथ प्रकृति के संबंध की बात करें. लोक और प्रकृति दो चीज़े नहीं है. जो प्रकृति बाहर फैली है उसमें प्रकृति का समय, प्रकृति का जीवन, प्रकृति के रूप सभी शामिल हैं. जब लोक परम्परा में बारहमासा रचा जाता है, तो उसका अर्थ क्या है? वह प्रकृति का समय है निरन्तर बदलती ऋतुओं में अभिव्यक्त होता, जिसमें लोकजन अपनी कालचेतना को समायोजित करते हैं. प्रकृति के काल के साथ मनुष्य ने लोक में रचना की जो परम्परा सृजित की वह है बारहमासा काव्य गीत परम्परा. फिर उसने विभिन्न ऋतुओं के पर्व-त्यौहारों, अवसर-अनुष्ठानों की एक सांस्कृतिक परम्परा निर्मित की. उसने अपने चरित नायक और लोकदेवता बनाये, यह उसकी आस्था का संसार है. वह खेती-किसानी, दस्तकारी और विभिन्न हस्तकौशलों में निपुण हुआ. उसने अपने ज्ञान को व्यावहारिक और प्रयोग के विश्व में बदला. उसे मौसम, बीज और धरती तथा आकाश के गुण पता चले, उसने इनकी महिमा के गीत गाये. धरती ने उसे इतना दिया, वह उल्लास से भर उठा, उसकी आस्था के लिए आकाश को फैलाना पड़ा. यह जीवन की धन्यता का गीत है. उसे जीवन ने जो दिया, उसके उल्लास का नृत्य है, वह प्रकृति के संगीत में समरस हो गया और स्तरी प्रकृति को उसने कृतज्ञता के स्वरों से भर दिया. लोक में 'दिव्य' भी लौकिक है. अभी तक हम 'दिव्य' को एक अलौकिक अनुभव समझते हैं. वहां 'दिव्य प्रकृति' और 'लौकिक प्रकृति' एक ही है. लोक की रचना में प्रकृति केवल एक प्रेरक उद्दीपक नहीं है बल्कि पूरे लोक जीवन में रचना प्रकृति की धन्यता का उत्सव है. जब भी हम लोक, लोकजीवन, लोकरचना और लोक संस्कृति के साथ प्रकृति की बात करें, यह हमारे ध्यान में होना चाहिये. जहां तक आधुनिकता के लोक जीवन पर प्रभाव का प्रश्न है उसे समग्रता में समझने की जरूरत है क्योंकि इस प्रश्न पर बड़े रोमान्टिक तरीके से विचार किया जाता है अथवा परिवर्तन के यथार्थ का सरलीकरण किया जाता है.

क्या भारतीय गांवों का आधुनिकीकरण हुआ है?

विकास की आधुनिक पश्चिमी परिकल्पना और क्षेत्र में गांव हैं कहां? वे उससे छूटे हुए और बाहर हैं. शहरी विकास के प्रभाव पड़े हैं, गांव पर. उपभोक्ता बाज़ार का विस्तार किया है हमने गांव में, आधुनिकीकरण नहीं. चीजें पहुंच रही हैं वहां, जो समर्थ हैं वे खरीद रहे हैं, उपयोग कर रहे हैं. मैं इसे आधुनिकीकरण के क्षेत्र से बाहर रखा गया समाज कहता हूं, आप कहते हैं आधुनिकता का असर पड़ रहा है. समय और जीवन, जीवन की परम्परा कोई ठहरी हुई स्थिर चीज़ नहीं है. ग्रामीण क्षेत्रों में भी जीवन बदलता है, समय बदलता है, ढंग बदलते हैं. भारतीय लोक अपनी प्रकृति और विरासत को हर परिवर्तन के साथ ढाल लेता है और उसे गतिशील रखता है. उसकी जिजीविषा और रचने की क्षमता अकूत है. वह जीवन से शिकायत नहीं करता.
आधुनिक फैशन के कपड़े पहनने से कोई आधुनिक हो जाता है? आधुनिक होना चेतना और विचार से होता है फिर उसके आचरण से भी. मैं आधुनिक कपड़े पहने हजारों पिछड़े दिमाग, सामंती और मध्यकाल में रहने वाले लोगों को देखता हूं. कपड़े बदले चेतना नहीं, भाषा बदली विचार नहीं, समय बदला मानस नहीं, जीवन बदला समझ नहीं. इस आधुनिकता पर आपने कभी सोचा है? अपनी परम्परा और सांस्कृतिक मूलाधारों से कटा हुआ, विछिन्न व्यक्ति आधुनिक नहीं है. मुझे भारतीय जीवन और समाज में सच्चे आधुनिक और भारतीय आधुनिकता की प्रतीक्षा है. हमें आधुनिकता चाहिये नकलचीपन नहीं, हमें आधुनिक चाहिये पश्चिम का गुलाम नहीं जो आज गुलामी को अभिजन भद्र गर्व से जीता है.

भारत ने अपने लोक की आधुनिकता पर विचार ही कहां किया है.

हम तो मान लेते हैं जो ग्रामीण है वह भदेस है, पिछड़ा है, पारम्परिक है, अंधविश्वासी है, सामंती है, मूढ़ धार्मिक है, अशिक्षित है, अवैज्ञानिक है, रूढि़यों से चिपटा है और मध्यकालीन अंधकार युग में है. हमें उसे शिक्षा और आधुनिक वैज्ञानिक समझ देना है. क्या अपने जनजातीय और ग्रामीण लोक समाजों के साथ यही व्यवहार नहीं हो रहा है? क्या हम इन सभी लोगों के प्रति दूसरी श्रेणी के नागरिक का व्यवहार नहीं करते हैं? उधार के आधुनिक, लोक समाजों को भी अपनी ही तरह का आधुनिक बनाना चाहते है. भारतीय अभिजन और शिक्षित मध्यवर्ग इनके विकास की योजनाएं बनाता है- उधम करता रहता है कि ये सभी लोग किसी प्रकार देश की मुख्यधारा में आ जायें. मुख्यधारा वह है जिसमें ये हैं. दूसरों को उसमें आना चाहिये. विकास यह है जो इन्होंने पश्चिम से सीख लिया है जो पश्चिम के लिए ठीक है, हमारे लिये वही पर्याप्त है. ये एक जनजातीय और ग्रामीण व्यक्ति से पूछना तक जरूरी नहीं समझते कि उसकी दृष्टि में विकास क्या है? विकास की उसकी प्राथमिकताएं क्या है? ये भारतीय समाज का विकास तय करते हैं, जीवन की मुख्यधारा तय करते हैं और इनकी मुख्यधारा को पश्चिम यूरोपीय देश और अमेरिका तय करते हैं. अब भारत दुनिया की मुख्यधारा में आ गया है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: January 28, 2021, 4:54 PM IST
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