नृत्य के परिसर में ‘अस्ताद’ के अक्स

आपका एक पुरूष होना नर्तक की पहचान बनाने में कहीं आड़े आया? देबू ने तत्काल प्रभाव से कहा- बिल्कुल. अस्ताद ने साफ लफ़्जों में कहा कि हम ग़ैर बराबरी का विरोध करते हैं मगर नज़दीक से मैं इस पाखंड का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं. मैंने कई राजनेताओं और अफसरों को नृत्यांगनाओं की सिफारिश करते देखा है. वे अपनी पसंदीदा कलाकारों के लिए विदेश यात्राओं और पुरस्कारों का प्रबंध करते हैं. देबू कहते हैं- ‘मुझे नियम से अलग हटकर मांगना या स्वाभिमान ताक में रख मंत्रियों अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाना उचित नहीं लगा. मैं अपनी ज़िद पर कायम हूं.’’

Source: News18Hindi Last updated on: December 12, 2020, 4:08 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
नृत्य के परिसर में ‘अस्ताद’ के अक्स
वे परंपरा और आधुनिकता के बीच अनेक रचनात्मक प्रयोगों के हिमायती रहे.
'हमारी रसिकता में स्त्री से जोड़कर ही नृत्य के सौन्दर्य बोध को स्वीकारा जाता रहा है. लेकिन यह बात ग़ौर करने की है कि नृत्य के देवता ही शिव हैं. बिरजू महाराज, केलुचरण महापात्र जैसे नृत्य गुरूओं ने शिष्यों की समृद्ध पीढ़ी तैयार की, लेकिन पुरूष नर्तकों के हिस्से पक्षपात ही अधिक आया.'

अस्ताद देबू अपनी इस रूहानी कसक के बावजूद नृत्य के आधुनिक रंगपटल पर अपना रचनात्मक साहस और धीरज समेटे एक नई इबादत उकेरने में क़ामयाब रहे. अस्ताद ने अब इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया है. अपनी लय-गतियों में समय को नाचती उनकी देह का भस्म हो जाना एक सांसारिक सच है लेकिन सदियों से चली आ रही परंपरा के बरअक्स अपनी समकालीनता में नई सोच-समझ का वितान रचने वाले इस विलक्षण कलाकार का दाय स्मृतियों में सदा जीवित रहेगा.

अस्ताद से दो दफा मिलना हुआ था. एक याद खजुराहो नृत्य समारोह की है जब वे बतौर नर्तक इस मंच पर आमंत्रित थे. उनकी साधना, सिद्धि और नए आग्रहों में रची-बसी नृत्य संरचनाओं को देखने का यह मेरे लिए पहला अवसर था. दूसरी मुलाकात भोपाल के कला घर भारत भवन में क़रीब दो दशक पहले हुई थी. संयोग कुछ ऐसा बना कि मुझे ही बतौर उद्घोषक अस्ताद को मंच पर पुकारने का दायित्व भारत भवन ने दिया. लीक से हटकर भारतीय नृत्य को कल्पना के नए रंगों से नई छवि में ढालने की ज़िद लिए अस्ताद भरी-पूरी उर्जा से पेश आए थे. याद आता है, उन दिनों ध्रुपद गायक ‘उमाकांत-रमाकांत गुंदेचा के संपर्क में भी देबू थे. उनके साथ मिलकर ध्रुपद शैली और नृत्य के संयोग पर एक प्रयोग करने का विचार भी उनके भीतर कौंध रहा था. बहरहाल अस्ताद से जितनी भी बातें हुई, वे शिकायत, तल्ख़ी और कुछ तुनकमिज़ाज़ी के बावजूद अपनी रचनात्मक स्वायत्ता में निराले दिखाई दिये.
देश-विदेश में अपने साहसिक नृत्य प्रयोगों के लिए मशहूर अस्ताद देबू का तजुर्बा कला के मौजूदा चाल-चलन को समझाने की निगाह देता रहा.
कथक और कथकली जैसी प्राचीन भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों की विधिवत तालीम के साथ ही, उन्होंने अमेरिका स्थित मरीलेविस डांस कंपनी से आधुनिक नृत्य का प्रशिक्षण लिया है. वे परंपरा और आधुनिकता के बीच अनेक रचनात्मक प्रयोगों के हिमायती रहे. कहते- ‘आज जो रिकग्नेशन मुझे दुनिया भर में मिल रही है, उस पर संतोष है लेकिन चढ़ती उम्र में थककर बैठ जाना मुझे गवारा नहीं. अपनी शर्तों पर जोखि़म उठाते हुए मैंने नृत्य को अपनाया है. अभी बहुत कुछ करना है... नया, अनोखा, लीक से हटकर.’

औरों से किस तरह अलग है? इस सवाल पर अस्ताद ने कहा- ‘‘मेरा काम धूम-धड़ाके के संगीत के साथ मिलकर बहुत चंचल गति की लय-ताल भरा नहीं है. मैं शांत भाव से अपनी कला में खुलता हूं. मेरी भाव-मुद्राएं शरीर और मन के साथ जुड़कर सदा कुछ नया सिरजने का जतन करती है. इस नवाचार को कला-आलोचक किस नज़रिए से देखते हैं? देबू ने इस सवाल पर कहा कि एक मुद्दत तक मेरी शैली को नर्तकों और विशेषज्ञों ने परंपरा ही नहीं माना लेकिन मैंने स्वयं को विरोध से बचाते हुए अपना क्रिएशन जारी रखा. आज समीक्षकों की राय मेरे पक्ष में है. अस्ताद का मानना रहा कि हम दर्शकों की समझ का ख़्याल रखते हुए सदा सतही और चली आ रही परंपराओं से अलग क़दम ही नहीं उठाना चाहते.

हिन्दुस्तान में तो दर्शक को सब कुछ चम्मच में रखकर सीधे मुंह में निवाला देने का चलन है. हमारा फ़र्ज़ बनता है कि अपने दर्शकों के सोच का दायरा बढ़ाएं, उन्हें नई रचनात्मकता के लिए कलाओं के प्रति अधिक जागृत और विवेकशील बनाएं. दुर्भाग्य से टीवी और इंटरनेट ने सूचना-मनोरंजन को इतना हल्का तथा आसान बना दिया है कि दर्शक का अटेंशन कम हो गया है. अस्ताद ने फरमाया कि व्यावसायिकता के नाम पर मैंने अपनी जटिल और अटपटी कही जाने वाली नृत्य शैली से पल्ला नहीं झाड़ा. धीरे-धीरे लोग उसकी ख़ासियत को पहचानने लगे.आपका एक पुरूष होना नर्तक की पहचान बनाने में कहीं आड़े आया? देबू ने तत्काल प्रभाव से कहा- बिल्कुल. अस्ताद ने साफ लफ़्जों में कहा कि हम ग़ैर बराबरी का विरोध करते हैं मगर नज़दीक से मैं इस पाखंड का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं. मैंने कई राजनेताओं और अफसरों को नृत्यांगनाओं की सिफारिश करते देखा है. वे अपनी पसंदीदा कलाकारों के लिए विदेश यात्राओं और पुरस्कारों का प्रबंध करते हैं. देबू कहते हैं- ‘मुझे नियम से अलग हटकर मांगना या स्वाभिमान ताक में रख मंत्रियों अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाना उचित नहीं लगा. मैं अपनी ज़िद पर कायम हूं.’’

ओंकारा, मीनाक्षी और अब्दुल्ला जैसी प्रसिद्ध फिल्मों का नृत्य निर्देशन कर चुके अस्ताद देबु के अनुसार बाॅलीवुड उनकी अभिव्यक्ति का मंच नहीं है लेकिन यह तजुर्बा भी बुरा नहीं. उन्होंने कहा कि फिल्मों के लिए कोरियाग्राफी करते हुए केमरे को लक्ष्य करना पड़ता है. लोकेशन और वेशभूषा के अलावा केमरे के एंगल भी ज़रूरत के मुताबिक बदल जाते हैं. जबकि रंगमंच पर प्रदर्शन की मर्यादाएँ अलग होती हैं. वहाँ नृत्य मोक्ष की अनुभूति बन जाता है. मुंबई में रहते हुए भी मैंने कभी फिल्म निर्माता-निर्देशकों से अपने लिए गुहार नहीं की.

अस्ताद से जुड़े संदर्भों को खंगालते हुए कई रोचक तथ्य खुलासा होते हैं. मालूम होता है कि वर्ष 1969 में जब उम्र 22 की होगी, यह पारसी नौजवान अमेरिका रहकर भारत आया. अमेरिकी मरे-लुई डांस कंपनी के नृत्य की अनेक छवियां उसकी आंखों में थी. मुंबई में पढ़ाई के दौरान ही उनकी मुलाकात न्यूयाॅर्क में नृत्य का शोध कर रही उत्तरा आशा कोइरावाला से हुई और एक नई नृत्य यात्रा पर चल पड़ने का ख़्वाब उनकी आंखों में बस गया. अस्ताद ने लंदन स्कूल ऑफ कंटेम्परेरी डांस की शरण ली और नृत्य विशेषज्ञ मार्था ग्राहम की ने आधुनिक नृत्य तकनीक की तालीम ली. देबू इंडोनेशिया की यात्राएं भी कीं. वे भारत में रहकर मार्था की तर्ज़ पर कुछ नया और अनूठा करना चाहते थे.

मार्था अपने समय के ऐसे क्रांतिकारी नर्तक रहे जिन्होंने नृत्य की दुनिया में नई कलात्मकता का साहस प्रदर्शित किया. अस्ताद भी अपने नृत्य संयोजन के माध्यम से परंपरा को नया भारतीय परिवेश देने की ज़िद लिए अपने समय से होड़ लेते रहे. ग़ौरतलब है कि अस्ताद ने बहुत छुटपन में इन्द्रकुमार मोहंती और प्रहलाद दास से कथक की तालीम ली थी. ई कृष्णा पणिक्कर से कथकली सीखा. मणिपुर के मार्शल आर्ट थंग ता और पुंग चोलम के कलाकारों की सोहबत में रहे.

संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार और भारत सरकार के पद्मश्री अलंकरण से विभूषित अस्ताद देबू को यायावरी रास आयी. वे अविवाहित थे. मुंबई में अकेला जीवन उन्होंने गुज़ारा. सत्तर का आंकड़ा छूती उम्र में अचानक पता चला कि उन्हें कैंसर है. बीमारी ने इस कदर घेरा कि देबू उसकी गिरफ्त से बाहर न निकल पाये. उन्होंने देह को त्याग दिया. बेशक अस्ताद भारतीय नृत्य के मौजूदा संसार में अपने मौलिक प्रयोगों की गहरी छापों और लीकगामी कला चिंतन से परे मनन के नए आयाम रचने वाले निर्भीक सर्जक के रूप में याद आते रहेंगे.  (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: December 12, 2020, 3:43 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर