अवसाद और उम्मीद के बीच जीवन को पुकारता कवि

शब्द की परंपरा में जीवन और मनुष्य की पवित्र गंध के पास ले जाते हिंदी के इस अग्रणी कवि को अगर समग्रता में देखना हो तो "पूर्वग्रह"के इस नए अंक में यह संभव है. भारत भवन (भोपाल) से प्रकाशित साहित्य और कलाओं की आलोचना त्रैमासिकी ने चार सौ पन्नों का यह गझिन विशेषांक तब शाया किया है जब आपदा और हताशा की मारी दुनिया में साहित्य का परिसर भी सन्नाटे फांक रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 30, 2021, 8:44 PM IST
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अवसाद और उम्मीद के बीच जीवन को पुकारता कवि
कोरोना-काल में भी अरुण कमल का कवि अपने जाग्रत और जिम्मेवार मानस का परिचय देता हुआ मानवीयता के पक्ष में जीवन का सम्बल संजोता रहा. प्रार्थना के शिल्प में रची उनकी एक कविता अनायास स्मृति में ठहरती है -
इधर हिंदी के परिसर में अलसाई -सी चेतना को थपकी देकर जगाता हुआ "पूर्वग्रह" का अंक नमूदार हुआ तो लिखने-पढ़ने वाली बिरादरी के लिए यह किसी सौगात से काम नहीं. वजह, इस अंक की उत्सव-मूर्ति के रूप में अरुण कमल की उपस्थिति. शब्द की परंपरा में  जीवन और मनुष्य की पवित्र गंध के पास ले जाते हिंदी के इस अग्रणी कवि  को अगर समग्रता में देखना हो तो "पूर्वग्रह"के इस नए अंक में यह संभव है. भारत भवन (भोपाल) से प्रकाशित साहित्य और कलाओं की आलोचना त्रैमासिकी ने चार सौ पन्नों का यह गझिन विशेषांक तब शाया किया है जब आपदा और हताशा की मारी दुनिया में साहित्य का परिसर भी सन्नाटे फांक रहा है.

अनचाही  खामोशियों के बीच यह सुसम्पादित अंक अरुणजी की कविता के खिलते हुए कमल की पांखुरियों से झरता जीवन का गहन विश्वास है. पैतीस से भी ज्यादा कवि -आलोचकों ने अरुण कमल के कृति-व्यक्तित्व को यहां  नज़र भर आंका है.  निश्चय ही सभ्यता की एक लम्बी अवधि में कविता की अहमियत रही है और अरुण कमल साहित्य की आकाशगंगा के वो सितारे रहे हैं जिन्होंने तमाम दुश्वारियों के बीहड़ से गुजरते जीवन के प्रति कामनाओं को हमेशा बचा कर रखा - "मैं जब उठूं तो भादों हो /पूरा चन्द्रमा उगा  हो ताड़ के फल सा /गंगा भरी हो धरती के बराबर/खेत धान  से धधाये /और हवा में तीज -त्योहारों की गमक /इतना भरा हो संसार कि जब मैं उठूँ /तो चींटी भर जगह भी खाली न हो."

सम्पादक प्रेमशंकर शुक्ल से अरुणजी का लंबा संवाद इस अंक की उपलब्धि है जहां सलीके से पूछे गए जिज्ञासा भरे  सवालों के जवाब एक लेखक के अध्ययन, आचरण, संस्कार और जीवन -दृष्टि से वाबस्ता होने का अवकाश देते हैं. यहां एक सिरे पर अरुण कमल खूबसूरत बात कहते हैं -"जिनके पास ताकत है, वे सुन्दर नहीं हो सकते.. न ही सौंदर्य की सृष्टि वे कर सकते हैं.  पूंजीवाद ताकत और हिंसा को महामंडित करता है जबकि   सारे साहित्य के नायक सबसे कमज़ोर लोग हुए जिनकी आत्मा पवित्र थी और मूल्य महान. निर्बल लोगों की आत्मा में मनुष्यता और अच्छाई बची है जो संसार बचाएगी." समाचार मृत्यु

साहित्य अकादेमी , दिल्ली के प्रतिष्ठा सम्मान और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार सहित अनेक सम्मानों और उपाधियों से विभूषित अरुण कमल सत्तर के बाद उभरे हिंदी के बहुचर्चित कवि हैं. बिहार उनकी में सरज़मीं है.. अपने जनपद की सरहदों से बहुत दूर तक उनके लिखे-कहे का मान रहा है. 'पूर्वग्रह" का यह अंक इस बात की तस्दीक भी करता है. दरअसल , किसी विचारधारा के कपाटों में कुंद होकर शब्द-क्रीड़ा न करते हुए कमल अर्थ की सघन छाया में जीवन से खुला संवाद करते हैं.
कोरोना-काल में भी अरुण कमल का कवि अपने जाग्रत और जिम्मेवार मानस का परिचय देता हुआ मानवीयता के पक्ष में जीवन का सम्बल संजोता रहा. प्रार्थना के शिल्प में रची उनकी एक कविता अनायास स्मृति में ठहरती है - "नहीं प्रभु, यूँ ही चला आया था पुराने मोहल्ले में /देखा तुम सोये थे/दतवन और बाल्टी  में जल चबूतरे पर रखकर/समाचार कुछ भी नहीं प्रभु/क्यूंकि कुछ भी नया नहीं /एक ही कर्ता ,एक ही नियंता /एक है ही किन्तु,एक ही परन्तु/एक ही समाचार मृत्यु. " अपने समय से जुड़ने की कोशिश करती अकारण महामारी के संकट में यह कविता एक निवेदन, एक प्रार्थना की तरह सम्बोधित होती है. अरुण क "मल की कविता के फैले पाट में वे तमाम आहटें हैं जो जीवन से होकर गुजरती हैं और जिनमें हम अपनी अंतर्ध्वनियाँ भी सुन सकते हैं.  यह भी कि एक सगा सा नाता इन कविताओं से अनायास बन जाता है.लेखिका चन्द्रकला त्रिपाठी इस अंक के लिए अरुण कमाल के काव्य मनोगत की पड़ताल करते हुए एक ऐसे काव्यांश को उद्घृत करती हैं जिसमें तमाम छल-बल के शिकार मनुष्य की आवाज़ कुछ इस तरह उभरती है- 'जब लोग बोलना बंद कर दें/तुम अपने आप से बोलो/जब लोग चुप हों घर में बंद/तब तुम चौक पर ज़ोर से बोलो /जब बंद हो रसद पानी/तब खोलो देह के अमरकोश ".

समकालीन हिंदी कविता के बहुमान्य कवि  राजेश जोशी का कहा  इस तारतम्य में मौजूँ है कि अरुण कमल अपनी कविता में काल का सृजन भी करते हैं. यह समय कवि ने हस्तक्षेप कर अपने लिए अर्जित किया है.उसे रचा है. यह उसका अपना समय है. तभी तो कमल कहते हैं--"मोक्ष की चाह नहीं / चौरासी लाख योनियों में भटकता फिरूंगा ...!  कविता के साथ ही आलोचना के क्षेत्र में अरुण कमल की स्थापना को भी "पूर्वग्रह' ने अनदेखा नहीं किया है. गौर करने की बात यह है कि इस पक्ष की चर्चा इस अंक में कवि-आलोचक ओम निष्चल ने बहुत विस्तार से की है.  यहां अरुण कमल आज साहित्य के परिसर में आलोचना के विस्तार को तो स्वीकारते हैं लेकिन उसके स्तर से वे पूरी तरह संतुष्ट दिखाई नहीं देते. अरुण कमल जोड़ते है कि बड़ी आलोचना बड़े कवियों के सानिध्य में  ही संभव है.इसलिए देखें कि निराला का कवि व्यक्तित्व इतना बड़ा था कि उन पर की गयी रामविलास शर्मा की आलोचना भी एक बड़ा आलोचक व्यक्तित्व निर्मित करती है.

सम्पादकीय में प्रेमशंकर उचित ही कहते हैं कि अरुण कमल का सृजन  अपनी इच्छा-आकांक्षा में जीवन ही जीवन चाहता है. जीवन से बाहर उसको कुछ भी स्वीकार या मंजूर नहीं है.  विराग, विचलन और विपदाओं के इस दौर में अरुण कमल की कविता जीवन का सविनय उद्घोष हैं. उन्हें फिर से पढ़ा जाना चाहिए. मुसलसल पढ़ा जाना चाहिए ताकि ज़िन्दगी के मानी और गहरे उतर सकें. वे फरमाते हैं -'अपना क्या है इस जीवन में /सब तो लिया उधार /सारा लोहा उनका /अपनी केवल धार".(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: May 30, 2021, 8:39 PM IST
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