लोक संचार का सांस्कृतिक पक्ष

भारत सरकार की नई शिक्षा नीति ने देश की सांस्कृतिक संपदा की पड़ताल करते हुए उसे ज्ञान, कर्म, संस्कार और कौशल से परिपूर्ण नई पीढ़ी के व्यक्तित्व निर्माण की परिकल्पना की है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 15, 2021, 9:08 PM IST
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लोक संचार का सांस्कृतिक पक्ष


ह संचार क्रांति का दौर है. मीडिया की आधुनिक सत्ता, उसके प्रयोजन, उसकी पहुंच और उसके परिणामों की तथा-कथा से सारी दुनिया परिचित है. लेकिन इस नए वाचाल विश्व के समानांतर देशज परंपराओं की डोर थामकर शताब्दियाँ पार करते उस मानवीय कौशल को याद करना समीचीन है जहां मूल्य आधारित दृष्टिकोण से प्रेरित होकर जनसंचार की विधियों ने जन्म लिया. सुखद संयोग है कि भारत सरकार की नई शिक्षा नीति ने देश की सांस्कृतिक संपदा की पड़ताल करते हुए उसे ज्ञान, कर्म, संस्कार और कौशल से परिपूर्ण नई पीढ़ी के व्यक्तित्व निर्माण की परिकल्पना की है.

प्रयोग, प्रगति और प्रसिद्धि के तमाम नए ज़मीन-आसमान नापते हुए लगातार ये गरज बनी हुई है कि हम उन सांस्कृतिक मूलाधारों को अनदेखा न करें जो महान मूल्यों की विरासत समेटे परंपरा में विन्यस्त होते रहे हैं. दरअसल हाल की विपदाओं का दंश झेलने के बाद एक बार फिर औपनिवेशिक दासता से मुक्ति का मार्ग खुल गया है. भारतीय मानस और व्यवहार फिर उन सिरों को थामने की कवायद कर रहा है जो हज़ारों बरसों की मानवीय सभ्यता से चलकर उसके जीवन में शामिल हुए थे. दिलचस्प यह कि जब-जब इस समृद्ध विरासत के पृष्ठ पलटे जाते हैं, मानवीय उत्कर्ष के अनमोल पाठ उजले होने लगते हैं.

इस सामयिक चिंतन-मनन को साझा करते साहित्य, संस्कृति और कलाओं के अध्येता, शिक्षाविद् और शोधार्थी एक ही मंच पर नमूदार हुए. रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के मानविकी, भाषा एवं कला संकाय का वैचारिक संयोजन "भारतीय सांस्कृतिक एवं संचार परंपराएँ" विषय पर एकाग्र था. तीन दिनों के विभिन्न सत्रों में विमर्श की कई दिशाएँ खुलीं. सहमति और असहमतियों के बीच यह जिज्ञासा और ज़रूरत रेखांकित हुई कि सदियों के अंतराल में अनुभव, ज्ञान, समझ, कौशल और व्यवहार की विरासत का हमारे पास पहुंचने का जो ज़रिया हमें पूर्वजों ने दिया, उसकी ताक़त को एक बार पुनः ठीक से समझना होगा.
यहांं यह धारणा साफ़ हो जानी चाहिए कि संस्कृति को लोक पैदा करता हैं, लोक ही उसकी हिफाज़त करता है और आने वाली पीढि़यों को विरासत की तरह सौंप दिया करता है. इस तारतम्य में यह जानना ग़ैरज़रूरी नहीं कि भारत की सांस्कृतिक चेतना अपने लोक व्यापी विस्तार और सघनता में मानवीय मूल्यों की हिमायती रही है.


यही वजह है कि संस्कृति के गर्भ से निकलने वाली तमाम परंपराओं ने जन-मन में इसका संचार किया. भारतीय समाज सदियों से चली आ रही इन परंपराओं में गहरा रच-बस कर उत्कर्ष की राहें तलाशता रहा है. साहित्य और कला की तमाम विधाएँ वाचिक परंपरा का दामन थामकर ही जनता को संबोधित होती रही है. एक सुसभ्य और संस्कारशील समाज की रचना सांस्कृतिक संवाद से ही संभव है. हमें बार-बार जीवन, प्रकृति और संस्कृति की परस्परता में लौटना होगा.

टैगोर विश्वविद्यालय की संगोष्ठी के बीच वक्तव्यों में भारतीय संस्कृति के आदर्श का बखान करते हुए कुलाधिपति संतोष चौबे, शिक्षाविद् सौरभ कुमार मिश्र, भरत शरण सिंह, अमिताभ सक्सेना, नृत्य विदुषी कनक रेले, युवा उद्यमी सिद्धार्थ चतुर्वेदी और आलोचक अरूणेश ने यह दोहराया कि लोक प्रबोधन (यानि मास कम्यूनिकेशन) का सबसे सशक्त माध्यम हमारी वाचिक परंपरा रही है. हम श्रुति और स्मृति के देश के वासी हैं. सुंदर भूगोल ही नहीं, ऋषि-साधकों के महान तप और जनजातीय तथा लोक समुदाय के नैसर्गिक और सहज अनुभव सिद्ध निष्कर्षों से समृद्ध सभ्यता को चरितार्थ करता भारत यहाँ युगों तक आलोकित होता दिखाई देता है.बोले हुए शब्द की सांस्कृतिक यात्रा में अनेक ऐसी लोक शैलियाँ परंपरा का परचम थामे जन जागृति का पैग़ाम बन जाती हैं. वेद हमारे आदिग्रंथ हैं तो उनके मंत्र लगभग दो हज़ार वर्षों तक हमारी मानवीय सभ्यता के पास मौखिक परंपरा में ही रहे. स्मृति और कंठ ने इन्हें कई पीढि़यों तक जीवित रखा. जब लिपि का आविष्कार हुआ तब वे ग्रंथ में यानि पृष्ठों पर अंकित हुए. सामवेद से जन्में संगीत का ही कमाल है कि आज भी वे स्वर और लय की निश्चित गतियों और आरोह-अवरोह में गाये जाते हैं. थोड़ा आगे बढ़ें तो रामायण और महाभारत की कथाएँ आख्यान की रोचक-रम्य शैली में आज तक जन मानस को आन्दोलित करती हैं.

संतों के प्रवचन इसी महान वाचिक परंपरा की लोकप्रिय पद्धति है. भारत के लगभग सभी अंचलों में नृत्य संगीत के हज़ारों रूप-स्वरूपों में पौराणिक प्रसंगों से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक विषय या कथावस्तु भाव-रस में भीगकर जनरंजन का मनोहारी वितान रचते हैं. लोक मंचों पर माच, नौटंकी, गम्मत, स्वांग, जात्रा, अंकिया, नाचा और भांड जैसी अनगिनत आंचलिक शैलियाँ शिक्षा, सूचना और मनोरंजन का सशक्त माध्यम रही हैं.


ये शैलियाँ आज भी सांस्कृतिक हस्तक्षेप और जन आंदोलन की पैरोकार हैं. यहाँ रामलीलाओं की याद की जा सकती है जो भारत ही नहीं, सरहद पार के अनेक देशों में प्रदर्शन के अलहदा से रंग-ढंग लिए प्रवहमान है. छत्तीसगढ़ की तीजनबाई अपने संवाद और देह-मुद्राओं के बेमिसाल ताने-बाने में पंडवानी गाकर महाभारत की कथा का दिव्य-दिग्दर्शन करती हैं. गुजरात में भील आदिवासी भी महाभारत का नाट्यगान करते हैं. वे ख़ुद को भीम का वंशज मानते हैं.

जनजातीय और लोक चित्रांकन भी वाचिक परंपरा से गहरा ताल्लुक रखती है. हर चित्र किसी कथा या स्मृति का ही रूपांकन होता है. गोंड या भील जनजातीय समुदाय ने अपने सभी चित्रावणों में अपने आराध्य देव, प्रकृति और जातीय स्मृतियों को ही सिरजा है. गोंड चित्रकार अपने इष्ट बड़ादेव की महिमा का बखान करते हैं तो भीली कलमकारों ने अपनी दीवारों पर जल के देवता पिठौरा की प्रतिष्ठा की है. दूसरी ओर भारत के सभी लघु चित्र शैलियों में कथा सूत्र ही उद्घाटित हुए हैं. विचार या भाव का ही रंग-रेखाओं में संचार होता आया है. बिंब, प्रतीक या रूपकों में किसी मनोगत को कह देने की यह कला ही चमत्कार उत्पन्न कर देती है. राजा रवि वर्मा से लेकर टैगोर और हुसैन-रज़ा से लेकर सीमा घुरैया तक यह कौशल क़ायम है.

मनरंगी स्मृतियों की सुन्दर दुनिया केनवास पर चहक उठी. कलाओं के लालित्य और सौन्दर्यबोध को जागृत मन और संवेदनशील निगाह से देखें तो सांस्कृतिक और संचार परंपराएँ हमारी लोक प्रवक्ता हैं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: July 15, 2021, 9:08 PM IST
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