रविशंकर जयंती: सितार की रोशनी से जगमग सितारे को सुरीला प्रणाम!

'रागमाला' नाम से उनकी आत्मकथा प्रकाशित हुई है. इसके पहले 'माई म्यूजि़क माई लाइफ' में उन्होंने विशेष रूप से अपने संगीत पर ही लिखा था. ये किताबें पंडित रविशंकर की जिंदगी का आईना है.

Source: News18Hindi Last updated on: April 7, 2021, 9:16 AM IST
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रविशंकर जयंती: सितार की रोशनी से जगमग सितारे को सुरीला प्रणाम!
ऑल इंडिया रेडियो के लिए पहला वाद्यवृन्द पंडितजी ने ही तैयार किया.
'सारे जहां से अच्छा' सुनकर प्रायः हमें इकबाल याद आते हैं, पर कम लोगों को पता होगा कि इसकी धुन पं. रविशंकर ने बनाई है. भारतीय स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती का पर्व जब मुंबई के एन.सी.पी.ए. (नेशनल सेण्टर फॉर परफॉर्मिंग आटर्स) में मनाया गया तो 14 अगस्त 97 की रात पं. रविशंकर का कार्यक्रम रखा गया था. आधी रात समारोह का सबसे रोमांचक क्षण था जब टाटा सभागार में अपना सितार वादन रोककर, स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती का स्वागत उन्होंने ख़ुद के बनाए 'शांतिमंत्र' से किया. सभागार की बत्तियां धूमिल हो चलीं और रविशंकर के स्वर संयोजन में 'ऊं शांति...' का सुरीला नाद फिज़ाओं में फैल गया. इसके तुरंत बाद उन्होंने सितार पर 'सारे जहां से अच्छा...' बजाया और फिर हज़ारों कण्ठों का समवेत स्वर गूंज उठा.

सच ही है, मन में सुगंध की तरह फैलती है याद की धूप. धुंधली सी जाने कितनी तस्वीरें रौशन होने लगती हैं. कोई पुराना संगीत भर देता है, नए रंग और किसी सुरीली बंदिश की तरह वक्त फिर गा उठता है. ...इस लुका-छिपी के बीच वक़्त के मुहाने पर उस शख्सियत की याद दस्तक दे रही है जिसने सारी क़ायनात में हिन्दुस्तानी मौसिक़ी का परचम फहराया.

अपने नाम के अनुरूप वो एक ऐसा रवि (सूर्य) साबित हुआ जिसने पूरब और पश्चिम की सरहदों के फासले मिटाए और सात सुरों की ज़मीन पर इंसानियत का पैग़ाम लिख दिया. महान सितार वादक पंडित रविशंकर को इस तरह फिर से याद करने का सबब फिलहाल इसलिए कि यह उनके पैदाईश का सौवां साल है. सात अप्रेल 1920 को बनारस में संस्कृत के मूर्धन्य और नामी वकील के घर में जन्में रविशंकर 'भारत रत्न' से सम्मानित एक ऐसे विलक्षण संगीतकार के रूप में प्रकट हुए जिसने मैहर के शारदा देवी धाम में बाबा उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के साये में रहकर संगीत के सबक सीखे. एक दिन गुरू के ऋण को सिर माथे रख दुनिया की सैर पर निकल पड़ा उनका यह शार्गिर्द.

'रागमाला' नाम से उनकी आत्मकथा प्रकाशित हुई है. इसके पहले 'माई म्यूजि़क माई लाइफ' में उन्होंने विशेष रूप से अपने संगीत पर ही लिखा था. ये किताबें पंडित रविशंकर की जि़ंदगी का आईना है. इन पन्नों पर हम एक ऐसे फ़नकार की शखि़्सयत से वाबस्ता होते हैं जो तमाम असहमतियों-वर्जनाओं और विरोधाभासों का सामना करते हुए संगीत का क्रांतिकारी इतिहास रच रहा था.
यहूदी मेनहुईन, जॉर्ज हेरिसन, जुबीन मेहता, फिलिप ग्लास और जॉन पियरे जैसे पश्चिमी मुल्कों के संगीतकार रविशंकर की प्रतिभा, प्रयोग और प्रसिद्धि पर मुग्ध थे. ये वे परदेसी कलाकार थे जिनके साज़ों पर भारत के गोमुख से फूटी स्वर-गंगा का नाद गूंजा. रविशंकर के दार्शनिक चिंतन से बैरागी भैरव, अहेरी ललित, तिलक श्याम और चारू कौंस जैसी लगभग बीस रागों की रचना हुई.

सिनेमा के संगीत को भी उन्होंने नया संस्कार दिया. वाद्यवृन्द को नयी तासीर दी. स्वीडन के पोलर संगीत पुरस्कार से लेकर ग्रामी, ऑस्कर, पद्मविभूषण और कालिदास सम्मानों ने रविशंकर के अद्वितीय योगदान पर स्वीकृति की मोहर लगायी. बेशक सितार की सुरम्य राग-परंपरा में नया अध्याय जोड़ा रविशंकर ने. उनका सितार गाता था. उनका सोच वैश्विक था. वे सच्चे अर्थों में भारत के सांस्कृतिक राजदूत थे.

पंडित रविशंकर की सोहबत जिन्हें भी मिली, वो इन क्षणों को जीवन का सौभाग्य ही मानता रहा. उनके व्यक्तित्व का जादुई करिश्मा ही था कि संग-साथ के संगीतकार और शागिर्द इस संयोग को सबक की तरह स्वीकार करते रहे. मूर्धन्य संतूर वादक और संगीतकार पंडित भजन सोपोरी उस लम्हे को कभी नहीं भूलते जब छः-सात बरस की उम्र में उन्होंने रविशंकरजी को पहली बार श्रीनगर में देखा था.वे बताते हैं कि- सत्तर साल पुरानी बात है. पंडित रविशंकर श्रीनगर आए थे. उन दिनों राजनेता डॉ. कर्णसिंह जो, ख़ुद संगीत और अन्य कलाओं में गहरी रूचि रखते थे, उनकी पहल पर श्रीनगर के ही एक महल में पंडितजी की एक सभा आयोजित की गई थी. मेरे पिता तब श्रीनगर के एक स्कूल में अध्यापक थे और पंडित रविशंकर से उनका अच्छा परिचय हो गया था. पिताजी के आग्रह पर पंडितजी उनके स्कूल भी गये थे. वो पहला लम्हा था जब मैंने उनके दर्शन किये थे. यही वो मौक़ा भी था जब पिताजी ने उन्हें मेरी प्रतिभा से अवगत कराया था.

निश्चय ही उनके अलौकिक, भव्य व्यक्तित्व ने पंडित भजन सोपोरी को बहुत गहरे तक प्रभावित किया था. भजन जी बताते हैं कि इस परिचय के बाद पंडित रविशंकर को मेरे सांगीतिक रूझान की बहुत सी जानकारियां मिल गयीं थी. वे स्वयं भी बड़ी पारखी नज़र रखते थे. जब युवा होता गया और संगीत में मेरी दखल बढ़ने लगी तो उन्हें यह भी पता चला कि मैं संतूर बजाने के साथ ही म्यूजि़क कंपोज़र के रूप में भी सक्रिय हूं. वे बहुत खु़श होते यह जानकर कि मैं मल्टी डायमेंशनल हूं. मेरी उनसे बहुत प्रोफेशनल बात होती. मैं उनकी शखि़्सयत से इसलिए भी बहुत मुतासिर रहा कि वे हमेशा नया सोचते और दूसरे संगीतकारों की बात को भी रूचि लेकर सुनते थे. उनसे हुआ संवाद सदा ही रचनात्मक और रोचक होता. उनका सोच खुला और पारदर्शी था.

इस प्रवाह में सोपोरी जोड़ते हैं कि यूं तो उनकी महानता के अनेक रूप हैं. मेरा स्पष्ट रूप से मानना है कि दुनिया में उनसे बड़ा कोई तंत्रकारी संगीतकार नहीं हुआ. मैं उन्हें नंबर वन मानता हूं. शास्त्रीय संगीत की जिस ज़मीन पर पांव रखकर उन्होंने चलना शुरू किया उसे सर्वोच्च शिखर तक तो जाना ही था. वे सारे संसार में स्वीकार किये गये तो इसलिए कि वे डायमेंशनल पर्सनालिटी थे. वे जहां भी गये, उनका अलग से नोटिस किया गया. मैं उनके फिल्म संगीत पर भी हमेशा मुग्ध रहा. उनकी धुनें और उनमें बरता गया वाद्य संगीत चलन में रहे सिने संगीत से निहायत अलहदा था. मेरी बातें सुनकर, मेरी प्रतिभा देखकर वे अक्सर मुझे कहते कि आकाशवाणी की नौकरी छोड़ दो. आसमान खुला है, नई उड़ान भरो. फिर हंस देते.

मैंने बहुत बारीकी से ग़ौर किया कि पंडित रविशंकर ने कभी किसी एक शैली पर ख़ुद को फोकस नहीं किया. उनके प्रेज़ेंटेशन का मूड भी कभी एक-सा नहीं दिखा मुझे. हमेशा एक विचार प्रक्रिया में निखरता उनका संगीत, कल्पना की मौलिक उड़ान भरता रहा. उनमें गहरा चिंतन था. विविधता थी. रविशंकरजी के वाद्यवृन्द को लेकर अनूठे-प्रयोगों का जि़क्र करते हुए भजनजी ने बताया कि मैहर में अपने उस्ताद बाबा अलाउद्दीन खां के साए में रहकर उन्होंने कई सारे वाद्य बनते देखे, बजते देखे और ख़ुद भी उन्हें बजाना सीखा. यहीं से साज़ों के संगीत के प्रति उनका आकर्षण परवान चढ़ा.

ऑल इंडिया रेडियो के लिए पहला वाद्यवृन्द पंडितजी ने ही तैयार किया. इस वाद्यवृन्द ने कई धुनें बजायी. वे बहुत पापुलर हुई. श्रोताओं के ज़ेहन में उन्होंने गहरा असर किया. इस वाद्यवृन्द की तारीफ यह थी कि यह सच्चे अर्थों में 'अनेकता में एकता' का मंत्र बन गया. पंडितजी ने यहां नार्थ और साउथ को एक किया. दोनों राज्यों और वहां की परंपरा में परवरिश पाने वाले साज़ अपनी मौलिकता के साथ इस वृन्द में शामिल किये गये.

ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि रविशंकरजी हर वाद्य की सांगीतिक तासीर और उसकी संभावना को समझते थे. इसलिए वाद्यवृन्द में एक अद्वितीय मधुरता निखर आती. इस हारमोनी ने जैसे संगीत जगत में नई हलचल पैदा कर दी. यहां मैं ताल वाद्य कचहरी को भी याद करना चाहूंगा जो हर रेंज को फॉलो करती. देखिए, यह सब बड़ी जिज्ञासा, उदारता, समझ और स्किल से आता है. इन्हीं के दम पर पंडितजी ने न्यूयॉर्क, रशिया आदि देशों में जाकर भी यूनिक आर्केस्ट्रा तैयार किये.

इधर शताब्दी वर्ष के निमित्त केन्द्रीय संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली की पत्रिका 'संगना' का आगामी अंक पंडित रविशंकर के समग्र योगदान पर केन्द्रित होगा. बेसुरे होते जा रहे इस समय में रविशंकर को यह सुरीला प्रणाम होगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: April 7, 2021, 9:16 AM IST
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