पुष्प की अभिलाषा; आजादी के अमृत पर्व पर एक कविता का पुनर्पाठ

शब्द और संगीत का संयोग हमारे भीतरी सांवेगों को बहुत प्रामाणिकता से उजागर करता है. एक अन्तर्लय जागती है. रहस्य और रमणीयता का नया लोक खुलता है. एक कविता अपने होने का अहसास इस तरह फिर कराए, यह ग़ैरवाज़िब तो नहीं.

Source: News18Hindi Last updated on: April 13, 2021, 11:31 AM IST
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पुष्प की अभिलाषा; आजादी के अमृत पर्व पर एक कविता का पुनर्पाठ
लाल किला
पुष्प की अभिलाषा.... छः पंक्तियों के छंद में बंधी यह कविता एक बार फिर सुर्खियों में हैं. आज़ादी की पचहत्तरवीं वर्षगांठ पर अमृत पर्व के निमित्त सौ बरस पुरानी इस रचना को याद करना प्रासंगिक बन पड़ा है. स्वाधीनता के संग्रामी अतीत की स्मृतियों के कपाट खुलते हैं तो वतन परस्ती के नाम कविता की तान पूरे स्वाभिमान से गुंजायमान हो उठती है. इन कविताओं को सिरजने वाले शब्द शिल्पियों के प्रति श्रद्धा से सिर झुकाने को मन करता है. कलम के इन सिपाहियों ने साबित किया कि अपने हक़ की लड़ाई बारूद उगलने वाले शस्त्रों से नहीं, मन को बेधने वाले शब्द-अस्त्र से भी लड़ी जा सकती है. माखनलाल चतुर्वेदी की यह कविता समय की अछोर सीमाओं तक देश राग का सुरीला आंचल पसारती है.

तकनीकी संजाल के इस दौर में जब अभिव्यक्ति की आज़ादी के मन माने मंच पर कविता भी उफान पर है, तब सौ बरस से स्मृति में ठहरी किसी कविता के संदर्भ मानीखेज़ हो जाते हैं। देश के मानस पटल पर एक बार फिर उभर रही है- ‘पुष्प की अभिलाषा’.

एक भारतीय आत्मा के नाम से साहित्य के संसार में उदित हुए पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने 1922 में इसे लिखा था. गुलामी के उन दिनों फिरंगियों के खि़लाफ देश को लामबंद करने और उदात्त राष्ट्रीय मूल्यों का जज़्बा जगाने माखनलालजी की कविता अग्नि शिखा की तरह काम कर रही थी. वे बिलासपुर कारावास में कै़द कर दिये गये थे लेकिन कविता का अस्त्र उनके पास था. उन्हीं दिनों उनके मन के गोमुख से मंत्र की तरह इस कविता की रसधारा बही. ‘प्रताप’ के संपादक गणेशशंकर विद्यार्थी ने अपने अख़बार के मुखपृष्ठ पर इस कविता को प्रकाशित किया. विषय, भाव और शिल्प में सुगठित इस कविता ने भारत की आत्मा पर कुछ ऐसा असर किया कि किसी वैदिक ऋचा की तरह वह ओंठ और स्मृति में ठहर गयी.

दरअसल यह कविता एक फूल को प्रतीक बनाकर रची गयी राष्ट्रभक्ति की रंगोमहक का वह सुन्दर ताना-बाना है, जिसमें उत्सर्ग का अहोभाव है. कविता में पुष्प की अभिलाषा जिस जगह जीवन का मोक्ष तलाशती है उसे फिर से बांच लेना ज़रूरी लगता है- ‘‘मुझे तोड़ लेना वनमाली/उस पथ पर तुम देना फेंक/मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक’’.
ग़ौर करने की बात यह कि इस पूरी कविता में किसी भी देश का उल्लेख नहीं है. यह सरहदों तक फैली भूमि के लिए फर्ज़ अदायगी का पवित्र संदेश है. भारतीय सांस्कृतिक संदर्भों में फूल पूजा-प्रार्थना, प्रेम, निवेदन, श्रृंगार और आरोग्य जैसे अनेक प्रयोजनों से जुड़ता है, लेकिन माखनलालजी की कविता में खिलखिलाता पुष्प जीवन का प्रतीक है. वनमाली से उसकी गुहार उस पथ पर बिखेर दिये जाने की है जहां से मादरे वतन के बांवरे वीरों का काफ़िला गुज़र रहा है.


बहरहाल, अपने अर्थ और आशय में समय के होने तक वजूद में बने रहने की ताक़त से भरी इस कविता का पुनर्पाठ इसलिए भी मौजूं है कि भारत आज़ादी का अमृत उत्सव मना रहा है. साहित्यकार सतीश जायसवाल बताते हैं कि बिलासपुर जेल का वह कमरा जहां दादा ने इस कविता को लिखा था. क़रीब तीन दशक पहले स्मारक घोषित किया गया था. जेल परिसर में एक स्तंभ पर इस कविता का उल्लेख भी है. अविभाजित मध्यप्रदेश में तब पंडित श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री थे। उन्हीं की पहल पर यह घोषणा हुईं थी. आज यह स्मारक किस गति में है, यह जिज्ञासा एक बार फिर साहित्यकारों के मन में जागी है. अलबत्ता माखनलालजी की कर्मभूमि रहे खंडवा में ‘दादा‘ की इस कविता की शिनाख्त उनके नाम से बने कन्या महाविद्यालय की दीवार और एक चैराहे पर खड़ी उनकी मूर्ति के पास की जा सकती है.

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद ज़िले का गांव बाबई माखनलालजी की जन्मभूमि है. वो पीढ़ी अब वहां नहीं जिसकी स्मृति और कंठ में कभी यह कविता धड़कती थी. लेकिन हाल ही दादा के जन्मदिन पर भोपाल स्थित दुष्यंत कुमार स्मृति पाण्डुलिपि संग्रहालय में स्वयं माखनलालजी की आवाज़ में ‘पुष्प की अभिलाषा’ का पाठ सुनना रोमांचक अनुभव था. इस तारतम्य में याद आते हैं स्मृति शेष संगीतकार संतूर वादक पंडित ओमप्रकाश चैरसिया जिन्होंने इस कविता को एक मुकम्मल सी धुन में ढालकर वृन्दगान के लिए इसका प्रयोग किया था. उन्हीं की संगीत संस्था मधुकली के युवा कलाकारों ने इसकी दर्जनों प्रस्तुतियां दी थीं. यह 90 का दशक था. दादा की कर्मभूमि खंडवा में आयोजित एक स्मृति समारोह में हिन्दी के अग्रणी कवि शिवमंगल सिंह सुमन ख़ासतौर पर उपस्थित थे. समारोह का आरंभ माखनलालजी की कविताओं के वृन्दगान से हुआ था. इन कविताओं को चैरसियाजी ने ही अलहदा सी धुनों में ढाला था.
कविताओं के इस सुरीले कोलाज में दादा द्वारा रचित ‘प्राण अंतर में लिए पागल जवानी’, ‘आओ अब आरती उतारें’, ‘पत्थर के फर्श कगारों में’ और ‘बदरिया थम-थम कर झर री’ के साथ ही ‘पुष्प की अभिलाषा’ विशेष रूप से शामिल थी. राजीव गांधी जब बतौर प्रधानमंत्री खंडवा के दौरे पर आये तो उनकी उपस्थिति में ‘मधुकली वृन्द’ इस कविता-गान के लिए आमंत्रित किया गया था. बाबई में भी इस कविता का अमृत मधुकली ने छलकाया था. राष्ट्रीय कविताओं के वृन्दगान अलबम ‘भारत प्यारा देश हमारा’ में भी इस कविता को सुना जा सकता है.


पंडित चौरसिया ने राग भूपाली का आधार बनाकर ‘पुष्प की अभिलाषा’ की बंदिश तैयार की. स्वर संयोजन कविता के भाव के अनुरूप इतना गहरा, उदात्त, मर्मस्पर्शी और प्रभावी कि वृन्द के अनेक स्वरों में इसे सुनना अलौकिक अनुभव बन गया. सौभाग्य से मधुकली वृन्दगान के कलाकारों में एक स्वर मेरा भी रहा. मुझे याद है कि जिन-जिन शहरों या क़स्बों में इस कविता की गान प्रस्तुतियां हुई वहां उपस्थित हर श्रोता के मानस में शब्द और संगीत ठहर से गये. आज भी तब के श्रोताओं के ज़हन में यह कविता धुन के साथ ही कौंधती है.

क्या ही अच्छा हो, अगर आज़ादी के अमृत पर्व के निमित्त यह कविता भारत के सभी विद्यालय और महाविद्यालयों से लेकर आकाशवाणी-दूरदर्शन और सार्वजनिक मंचों पर वृन्दगान की शैली में प्रस्तुत की जाए. शब्द और संगीत का संयोग हमारे भीतरी सांवेगों को बहुत प्रामाणिकता से उजागर करता है. एक अन्तर्लय जागती है. रहस्य और रमणीयता का नया लोक खुलता है. एक कविता अपने होने का अहसास इस तरह फिर कराए, यह ग़ैरवाज़िब तो नहीं. (डिस्क्लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: April 13, 2021, 11:31 AM IST
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