स्मृति शेषः सुनील कोठारी भारतीय नृत्यों का प्रामाणिक प्रवक्ता

भारत की सात मान्य शास्त्रीय नृत्य शैलियों भरतनाट्यम, ओडीसी, कथक, कुची पुड़ी, कथकली, मोहिनीअट्टम और मणिपुरी की फेहरिस्त में आठवां नाम अब सात्रिय का भी जुड़ गया है. कोठारी ने प्रतिपादित किया कि नाट्य शास्त्र के सभी सिद्धांतों पर सात्रिय नृत्य खरा है. नृत्य प्रेमी दर्शक जानते ही हैं कि भारत के सभी स्थापित ओर प्रसिद्ध नाट्य समारोहों में अन्य नृत्य शैलियों के साथ आसाम के सात्रिय नृत्य के प्रदर्शन को भी समान वरीयता से शामिल किया जाता है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 6, 2021, 4:31 PM IST
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स्मृति शेषः सुनील कोठारी भारतीय नृत्यों का प्रामाणिक प्रवक्ता
गंभीर बौद्धिक छवि के समानांतर सुनील कोठारी की सहज विनोदी मुद्राएं भी उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण आयाम थीं.
सांस्कृतिक क्षतियों की दुखद स्मृतियों के नाम जब गुजि़श्ता साल 2020 का लेखा-जोखा सामने हैं, तब दिसंबर की 27 तारीख़ पर जाकर मन बरबस अटक जाता है. मृत्यु फिर सुर्खी बनी. सुनील कोठारी नहीं रहे. सत्यासी की उम्र में उन का निधन हो गया. यह कोविड काल में कला जगत की एक और वरेण्य विभूति के महाप्रयाण की आहत कर देने वाली सूचना थी.

भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों के प्रति बेइंतहा लगाव, जिज्ञासा और अध्ययन-अन्वेषण की गहरी दृष्टि रखने वाले कोठारी का जाना इस मायने में बड़ी सांस्कृतिक रिक्तता है कि वे अनेक स्थापित और नवोदित नृत्य प्रतिभाओं तथा कला रसिकों के बीच रचनात्मक संवाद, प्रशिक्षण, सौहार्द और समन्वय के सेतु रहे. यह भी कि सदियों से चली आ रही नृत्य परंपरा को सैद्धांतिक, दार्शनिक और लोक व्यवहार की कोटियों में देखकर नए संदर्भों में उनकी व्याख्या करने की अकूत बौद्धिक क्षमता उनके पास थी. भारतीय जीवन, संस्कृति, कला और उसके लालित्य के संसार की पारख-परख प्रतिभा से मंडित एक विलक्षण शख्सियत को हमने खो दिया.

नृत्य की लय-ताल, उसका भाव सम्मोहन और मुद्राओं की मोहक छापों को कोठारी की रग-रग में देखा-महसूसा जा सकता था. नृत्य के परिसर में उनकी अपरिहार्य उपस्थिति अलग से ध्यान खींचती थी. मृत्यु से सात दिन पहले उन्होंने अपने जीवन के सत्यासी वर्ष पूरे किये. जन्म दिन दिल्ली के अस्पताल की चार दीवारी में बीता. लगभग ख़ामोश. लेकिन सत्तर सालों के पुरूषार्थी जीवन में उन्होंने जिस बेमिसाल दस्तावेज़ी काम को अंज़ाम दिया, वह भारतीय नृत्य-जगत के लिए मानक की तरह स्वीकारा और सराहा जाता रहेगा. प्रसंगवश यह जानना ज़रूरी है कि सुनील कोठारी ने एक दर्जन से भी अधिक ग्रंथों की रचना की. भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री अलंकरण से विभूषित किया और संगीत नाटक अकादेमी नई दिल्ली ने उन्हें अपने सालाना राष्ट्रीय सम्मान के लिए चुना. जबकि डांस क्रिटिक एसोसिएशन न्यूयॉर्क (यू.एस.ए.) ने लाइफ टाईम अचीवमेंट अवॉर्ड देकर कोठारी की वैश्विक स्वीकृति पर मोहर लगायी.

नृत्य के प्रामाणिक इतिहासवेत्ता और आलोचक के रूप में सुनील कोठारी को देखने वालों के लिए यह विस्मय से जुड़ा पक्ष हो सकता है कि यह कला चिंतक पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट था. नियति ने अपना काम किया. कोठारी को अंक गणित की नीरस हिसाबी दुनिया रास नहीं आयी. भीतर की कोमल, संवेदनशील रूह की परतों पर ठहरा भावुक कला रसिक उस परिसर में दाखिल हुआ जहां भारतीय जीवन मूल्यों और गौरवशाली सांस्कृतिक परंपराओं की विरासत एक नए अध्याय के रचे जाने की प्रतीक्षा कर रही थी. यक़ीनन, विरासत के नए बखान के लिए समय को एक सुपात्र मिल गया.
इस तारतम्य में सबसे महत्वपूर्ण कार्य कोठारी द्वारा असम की सात्रिय नृत्य शैली पर किया गया गहन शोध है जो 2013 में किताब की शक्ल में शाया हुआ. ग़ौरतलब है कि सोलहवीं शताब्दी में आसाम राज्य के वैष्णवी संत शंकर महादेव ने भक्ति आंदोलन को जन जागृति से जोड़ने के लिए गीत-संगीत और नृत्य की मिली-जुली शैली का आविष्कार किया. यह शैली सात्रिय कहलायी. यह आसाम के सत्रास अंचल से परवान चढ़ी. दिलचस्प यह कि सुनील कोठारी ने जब इस शैली को देखा तो उसके सुघड़-सात्विक स्वरूप पर वे सम्मोहित हुए. जिज्ञासा इतने गहरे तक उतरी कि कोठारी सात्रिय की नई यात्रा पर निकल पड़े.

बरसों तक उन्होंने सत्रास की खाक छानी. वहां के नर्तकों-कलाकारों से सात्रिय के सांस्कृतिक इतिहास को जाना. दस्तावेज़ इकट्ठा किये. प्रामाणिकता को जांचा और बाद में उन्हें लिपिबद्ध किया. मार्ग फाउण्डेशन ने इसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया. यहां यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि भारत की सात मान्य शास्त्रीय नृत्य शैलियों भरतनाट्यम, ओडीसी, कथक, कुची पुड़ी, कथकली, मोहिनीअट्टम और मणिपुरी की फेहरिस्त में आठवां नाम अब सात्रिय का भी जुड़ गया है. कोठारी ने प्रतिपादित किया कि नाट्य शास्त्र के सभी सिद्धांतों पर सात्रिय नृत्य खरा है. नृत्य प्रेमी दर्शक जानते ही हैं कि भारत के सभी स्थापित ओर प्रसिद्ध नाट्य समारोहों में अन्य नृत्य शैलियों के साथ आसाम के सात्रिय नृत्य के प्रदर्शन को भी समान वरीयता से शामिल किया जाता है. बहरहाल, सुनील कोठारी के पक्ष में यह भी विशेष महत्व की उपलब्धि है कि उन्होंने महान नर्तक बैले कलाकार पंडित उदयशंकर और भरतनाट्यम की महान नृत्यांगना गुरू रूकमणि देवी अरवडेल की सचित्र जीवन गाथा तैयार की. भारतीय नृत्य की नई दिशाओं की मीमांसा की और भरतनाट्यम, ओडीसी, छाऊ, कथक तथा कुचीपुड़ी आदि पर आलोचनात्मक ग्रंथ लिखे.

गंभीर बौद्धिक छवि के समानांतर सुनील कोठारी की सहज विनोदी मुद्राएं भी उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण आयाम थीं. बेशुमार अफ़साने और किस्से! एक रोचक वाक़या ध्रुपद गायक उमाकांत गुंदेचा सुनाते हैं. शिकागो में एक अंतरराष्ट्रीय नृत्योत्सव व सेमिनार आयोजित था. यह आयोजन अमेरिका की घटना 9/11 से दो दिन पूर्व आयोजित था. आयोजन में चंद्रलेखा के द्वारा कोरियोग्राफ 'शरीरा' को भी आमंत्रित किया गया. कार्यक्रम का समापन 'शरीरा' से हुआ. इस समारोह में सुनील कोठारी, विदूषी सोनल मानसिंह भी आमंत्रित थे. 'शरीरा' के समापन के बाद डिनर हुआ लेकिन जेटलेग चल रहा था. अतः रात को किसी को भी नींद नहीं आ रही थी. सब बात करने के मूड में थे.हमने खाने के बाद सबके मूड को देखते हुए कहा कि आप सब लोग हमारे कमरे में चलिए. और सभी होटल के डिनर हॉल से उठकर हमारे कमरे में आए गए. उस समय चन्द्रलेखा, सोनल मानसिंह, सुनील कोठारी और हम तीनों भाई तथा कुछ अन्य लोग भी जो भारत से गये थे, कमरे में यहां-वहां सेट हो गए. सुनील जी पूरे मूड में थे. वे नृत्य की सभी विधाओं के शीर्षस्थ कलाकारों की नकल स्वयं खड़े होकर कर रहे थे. साथ ही वे उन कलाकारों के अपने बुढ़ापे में कैसे आई-आउच करते हुए नृत्य करेंगे, उसका भी नमूना दिखाते जाते थे. हम सब हंस-हंस के लोटपोट हो रहे थे. भाई अखिलेश ने अपना वीडियो कैमरा ऑन कर रखा था. उस वातावरण में हमें ध्यान ही नहीं रहा कि हम होटल के कमरे में है और पास के कमरे में ठहरे लोगों को नींद में हमारी हंसी-ठिठोली दखल दे रही थी. रात के लगभग दो बज रहे थे. तभी होटल के मैनेजर ने आकर दरवाज़ा खटखटाया और हमें बताया कि पास के कमरे के लोग आपकी बातचीत से परेशान हो रहे हैं. तभी हम सब को इस बात का भान हुआ और हमने अपनी बातें मद्धम आवाज़ में करनी शुरू की. चर्चा लगभग एक घंटे और चली और फिर सब अपने-अपने कमरे की ओर रवाना हुए.

खजुराहो नृत्य समारोह में उनका बरसों-बरस आना होता रहा. मेरा (इस लेखक का) वहीं उनसे परिचय हुआ जो समय के साथ गहराता गया. वे अनेक बार नृत्य से जुड़े मेरे संशयों और सवालों के समाधान बनकर पेश आए. अभिमान से विरत सहज मनुष्यता से अंतरंग सुनील कोठारी नृत्य कला की चलती-फिरती कार्यशाला थे. उनसे आख़री मुलाक़ात गए बरस बिलासपुर के डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय में हुई थी. वे रायगढ़ घराने के कथक पर केन्द्रित कार्यशाला में बतौर विशेषज्ञ आमंत्रित थे. भरतमुनि के नाट्य शास्त्र से लेकर शास्त्रीय नृत्यों के नवाचार, प्रयोग और नई चुनौतियों पर उनसे लंबा संवाद भी हुआ था.

कोठारी जी ने बरसों-बरस अंग्रेज़ी और हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं में लिखा. उनकी प्रतिक्रिया नर्तकों के लिए सबक और सलाह की तरह हुआ करती थी. वे स्मृति और ज्ञान से भरे थे. उनका न होना नृत्य के एक सच्चे गुणग्राहक और मूर्धन्य की अनुपस्थिति है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: January 6, 2021, 4:22 PM IST
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