रंगीले राजस्थान की रंगभूमि पर एक ख्याल गाथा

नैतिक मूल्यों (Moral values) के सबक देती एक ऐसी ही नाट्य शैली अपनी बेशकीमती सांस्कृतिक परंपरा (Precious Cultural Tradition) का परचम थामें आज भी मरूभूमि राजस्थान (Rajasthan) की रंगभूमि की पुरज़ोर आवाज़ है. सदियां बीत गयीं लेकिन मारवाड़ और मेवाड़ की धरती की मटियारी महक कुचामणि ख्याल के साथ उड़ान भरती लोक की आत्मा में गहरे तक उतर जाती है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 5, 2020, 5:22 PM IST
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रंगीले राजस्थान की रंगभूमि पर एक ख्याल गाथा
रंगीले राजस्थान के रंगमंच पर अहोभाव के साथ लोक जीवन ने अपनी सहज अभिव्यक्ति का एक अनूठा रूपक रचा है और नाम दिया कुचामणि ख्याल
नगाड़ा, खंजरी या खड़ताल को लय-ताल पर अपने आराध्य देवता की मनुहार भरा स्वर उभरता है. प्रार्थना के पवित्र भाव लोक कल्याण की कामना लिए मंच और दर्शकों (Stage and audience) की आत्मा में घुल जाते हैं और खेल शुरू हो जाता है. राग-रागिनियों में बंधी रस भरी बंदिशों में सोरठा, कविता, कुण्डालियां, छन्द, छप्पय, दोहे, चन्द्रायणी और ग़ज़ल के बोल आबाद होते जाते हैं. कहानियां, चहक उठती हैं. इतिहास (History) के पन्ने रौशन होने लगते हैं.

राजा हरिशचन्द्र, मोरध्वज, वीर तेजाजी, मीरा मंगल, अमरसिंह राठौर, भक्त प्रहलाद, श्रवण कुमार और नौटंकी शहज़ादी जैसे अमर क़िरदारों की ज़ुबानी हिन्दुस्तान (India) का शौर्य, पराक्रम, भक्ति, श्रृंगार, त्याग, बलिदान और संकल्प जीवंत हो उठता है. नैतिक मूल्यों (Moral values) के सबक देती एक ऐसी ही नाट्य शैली अपनी बेशकीमती सांस्कृतिक परंपरा (Precious Cultural Tradition) का परचम थामें आज भी मरूभूमि राजस्थान (Rajasthan) की रंगभूमि की पुरज़ोर आवाज़ है. सदियां बीत गयीं लेकिन मारवाड़ और मेवाड़ की धरती की मटियारी महक कुचामणि ख्याल के साथ उड़ान भरती लोक की आत्मा में गहरे तक उतर जाती है.
काव्य छन्द कुछ नहीं जाणु/आ गुरवां की माया है/
शागिर्द होय के बदल जावे/वो सतमुता की जाया है
रंगीले राजस्थान के रंगमंच पर इसी अहोभाव के साथ लोक जीवन ने अपनी सहज अभिव्यक्ति का एक अनूठा रूपक रचा और नाम दिया कुचामणि ख्याल. ख्याल यानी अपने सोच, अपनी कल्पना, अपने विचार का ताना-बाना जो कविता के छन्दों, संवादों, लोक धुनों के संगीत, नृत्य और अभिनय के अनूठे सिलसिले के साथ बढ़त लेता मानवीय संदेश की सौगात बन जाता है.

कहते हैं इस रोचक खेल तमाशे की शुरूआत राजस्थान के कुचामन शहर से हुई और ललित कलाओं में पारंगत पंडित लच्छीराम ने इसकी परिकल्पना की. उन्होंने ही ऐतिहासिक-पौराणिक, कथाओं-घटनाओं और प्रसंगों के ख्यालों की शब्द रचना की. उन्हें कविता का रूप दिया. ये वे सुगढ़ छंद थे जिन्हें राजस्थानी लोक धुनों या शास्त्रीय राग-रागिनियों में आसानी से संगीतबद्ध किया जा सकता था. इन्हीं पदों में संवाद और भाव-भंगिमाओं की प्रचुर संभावनाएं थी. यहां मारवाड़ी बोली की मिठास और उसके साथ सहज उभरकर प्रवाह पाती लोक शैली में बिंधा अभिनय ख्याल की मौलिकता पर मोहर लगा देता और खेल अपनी रवानगी में चल निकलता. इन्हीं तमाम तत्वों की नुमाइंदगी आज भी इस मंच पर होती है तो निश्चय ही पीढ़ियों की लोक आस्था और उनके रचनात्मक पुरूषार्थ पर गर्व होता है.
‘कुचामणी ख्याल’ के जनक, अभिनेता, नर्तक व निर्देशक पंडित लच्छीराम कुचामन शहर के पास बूडसू गांव के निवासी थे. वे भरूड़िया ब्राहृण एवं मेघवाल जाति के गुरू भी थे. ऐतिहासिक, धार्मिक, श्रृंगार और सामाजिक कुरूतियों के खिलाफ़ उन्होंने अनेक नाटक लिखे. यही ख्याल के नाम से लोकप्रिय हुए.
सोरठा, कक्ति, शेर, लावणी, ग़ज़ल, कुण्डलियां, छन्द, छप्पय, चन्द्रायणी, दोहा आदि के माध्यम से इतनी शालीनता एवं गंभीरता से इन ख्यालों को मंच पर प्रस्तुत किया जाता है कि वे सीधे दर्शकों के मन में समा जाते हैं. इस शैली की राग-रागिनयां और रंगते भी सीधी सपाट होने के कारण पूरी प्रस्तुति दर्शकों को रस विभोर कर देती हैं. लय, ताल, अभिनय, नृत्य और भाव-भंगिमाएं भी पूरे कथ्य को स्पष्ट करते प्रतीत होते हैं. यह शैली अपनी मौलिकता के लिए जानी जाती है. राजस्थान के मारवाड़ और मेवाड़ क्षेत्र में आज भी यह अत्यंत लोकप्रिय है.

पं. लच्छीराम के बाद इस ख्याल को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का श्रेय पं. उगमराज खिलाड़ी व बंशीलाल चुई व मारवाड़ लोक कला मण्डल, राम रहीम कला मण्डल सहित अन्य मण्डलों को दिया जाता हैं. उन्होंने नीदरलैंड में अलारिपु संस्थान के सहयोग से भक्त शिरोमणि मीरांबाई के जीवनवृत्त पर ‘मीरा मंगल’ ख्याल बनाकर उसका निर्देशन एवं प्रदर्शन देश-विदेश में किया है.

लच्छीराम हुकमीचन्द पोखरणा को अपना गुरू मानते थे. हालांकि उनकी हुकमीचन्द से कभी भेंट तक नहीं हुई थी. गुरू और शिष्य का रिश्ता द्रोणाचार्य और एकलव्य की याद दिलाता है. उन्हें यह भी पता नहीं था कि हुकमीचन्द कहां के रहने वाले थे और क्या वह स्वयं भी किसी ख्याल पद्धति के प्रवर्तक रहे थे. मगर लच्छीराम अपनी ख्याल शैली में हमेशा गुरू का सुमिरन करते रहे- ‘‘नाम सुण उस्ताद थरदियो/ पिछलो धरम निभायो है/ हुकमीचन्द जी पोकरणा रो/ म्हे दर्शन नहीं पायो है/ कवि काव्य छंद कुछ नहीं जाणूं/ आ गुरूवां की माया है/ शार्गिद होय बदल जावे तो/ व्हो सतमुता का जाया है.’’

नाम सुनकर गुरू स्वीकार करना और उसे अपनी पूरी प्रतिभा समर्पित कर देना निश्चय ही कलाकार की महानता के परिचायक है. पं. लच्छीराम सम्पूर्ण कला पुरूष थे. मां सरस्वती ने उन्हें सभी विधाओं से धन्य किया. वे अच्छे लेखक, कवि, गीतकार, संगीतकार, अभिनेता, निर्देशक के अलावा कुशल संगठक भी थे. उन्होंने अपने समय में अपनी नाट्य मण्डली तैयार कर इस शैली को देश-विदेश में लोकप्रिय किया. उनके बारे में कई रोचक प्रसंग हैं. उनके द्वारा रचित आशु कविता की ख्याति दूर-दूर पहुँच जाने से बूडसू के ज़मींदार ने जब उनके कला प्रेम और काव्य रचना की चर्चा सुनी तब उन्हें बुलाकर एक विषय दिया और रात भर में उस पर एक ख्याल रचने की चुनौती दी गई. लेकिन लच्छीराम ने दूसरे ही दिन न केवल रचना तैयार की बल्कि उसे मंचित भी करके दिखा दिया था.
पं. लच्छीराम अपनी व्यावसायिक मंडली के साथ मारवाड़ के विभिन्न गांवों में घूमते हुए ‘ख्याल’ का प्रदर्शन किया करते थे. रात में इनकी मंडली गाँवों के चैपालों पर मंच बना कर नगाड़ा, ढोलक और हारमोनियम जैसे संगीत के यंत्रों पर मधुर लोक भजनों, क़िस्सों के साथ दर्शकों का मनोरंजन करते थे. कुछ समय बाद लच्छीराम कुचामन शहर में बस गये. कुचामन मारवाड़ (पूर्व जोधपुर राज्य) का प्रसिद्ध कस्बा है. यहां के लोकप्रिय ठाकुर को राजा साहिब का खिताब भी प्राप्त था. सेठों एवं व्यापारियों की यह नगरी हमेशा से ही साहित्य, संस्कृति, कला एवं स्थापत्य का प्रमुख केन्द्र रही है. इसी नगर के नाम से यह शैली प्रचलित है.

कुचामणि ख्याल गरिमा का रंगमंच है. बेशक यह मर्यादा उसके बुनियादी अनुशासन की उपज है. यहां सामूहिक उर्जा और आपसदारी की झलक मिलती है जो पात्रों की रूप सज्जा, वेशभूषा, अभिनय, संगीत और मंच के पूरे विधान में विद्यमान है. पुरूषों की मंडलियाँ ही इस पूरे कौशल से साधती हैं. महिलाओं की भूमिका भी पुरूष ही निभाते हैं. यह निर्वाह इतना कुशल होता है कि दर्शक आश्चर्य और आनंद से भर उठते हैं.
कहानी या विषय वस्तु के चयन के अनुसार यहां प्रेम, करूणा, हास्य, रूदन, शौर्य, भक्ति और बलिदान से लेकर संयोग-वियोग की छवियां मनोरंजन के रास्ते सकारात्मक शिक्षाप्रद संदेश की सौगात बन जाती है.

कुचामणि ख्याल में हिस्सा लेने वाले सारे कलाकार अपनी परंपरा में प्रशिक्षित और दक्ष होते हैं. वे अनेक भूमिकाओं को सहजता से अभिनीत करने का हुनर रखते हैं. गांव-गांव घूमकर इस खेल से जनता के बीच मनोरंजन करना और स्वयं आनंदित होना इन कलाकारों का शगल है. इस यात्रा के दौरान हुए अनुभवों में वे इतने तप जाते हैं कि समय और परिस्थिति के अनुसार मंच पर स्वयं ही ख्याल के पद रचकर संवाद में उनका इस्तेमाल कर लेते हैं.

एक ज़माना था जब यह खेल-तमाशा राजस्थान के गांव-शहरों में रात-रात भर चलता था. चैपालों या खुले आंगन में मंच सज जाता. ख्याल का संगीत अपनी स्वर लहरी के साथ पूरे माहौल में गमक पैदा करता और आयोजकों तथा दर्शकों की मांग पर कथानक और क़िरदार जीवंत हो उठते.
इस नाट्य शैली की ख़ासियत इस बात में है कि वह हर कहानी से वर्तमान प्रवृत्तियों या घटनाओं के सूत्र जोड़ने का माद्दा रखती है.

कहते हैं विरासत भी अपने भविष्य पर कुछ इस तरह मुस्कुराती है कि उसका सौभाग्य बोलने लगता है. रेतीले समंदरों और तपिश भरी वादियों में भी तहज़ीब के रंग गुलज़ार रखने वाले राजस्थान का एक ऐसा ही नूर है कुचामणि ख्याल.
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: October 5, 2020, 5:01 PM IST
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