रंग भीनी यादों में सौंधी सी महक

संजू जैन का काम पूरे देश में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु, भोपाल, इंदौर, लखनऊ और कुछ अन्य कला केंद्रों में प्रदर्शित किया गया है. उनके काम को कला आलोचकों तथा कला प्रेमियों ने लगातार सराहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 25, 2021, 1:04 PM IST
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रंग भीनी यादों में सौंधी सी महक
भोपाल की रहवासी संजू ने अपनी कलाकृतियों के लिए प्रेरणादायक 'भाव' और कलात्मक ऊर्जा प्रकृति तथा अपनी बचपन की यादों से प्राप्त की है.
आओ दुखते पैरों को सहलायें .....छाया बैठें, बीती यात्रायें दोहराएं ....'तार सप्तक' के कवि श्रीकांत जोशी का यह शब्द-बिम्ब यादों के दरीचे पर दस्तक देता है. वक्त के साथ बीत गए उन लम्हों को पुकारता है ,जो जीवन की यात्रा में कभी ख़ुशी, कभी खरोचों का चेहरा बन आते रहे-जाते रहे. लेकिन एक मुद्दत बाद किसी मुकाम पर ठहर कर इन्हें दुलारना, इनसे गुफ़्तगू करना भी कितनी राहत देता है. सच, गुज़रे वक्त की मासूम गवाही बन जाती है स्मृतियां. समय के पैन फड़फड़ाने लगते हैं और कोई धड़कन वजूद से टकराकर अचानक गाने लगती है -'आंगन सपनों के रीत गए ,मन के मंच पर सुधियों के घुंघरू बाजे और थम गए'.

यकीनन, यादों की जुगाली का कोई मौसम , कोई मुहूर्त नहीं होता. तयशुदा वादों से परे आसमान पर अचानक घिर आई किसी बदरी की तरह ये बरस पड़ती हैं और मन की धरती पर मल्हार मचलने लगता है. संजू जैन के रंग-बिरंगे कैनवस सुधियों की ऐसी ही सुगन्धित अनुभूतियों से तरबतर हैं. यहां वो सौंधा अहसास है, जिससे आज हमारी शहरी ज़िंदगी महरूम है.

स्मृतियों को भला दस्तक देने की आदत कहां होती है. ये तो अचानक आती हैं और अपना अलबम खोल कर बैठ जाती हैं.... मनोहर काजल की कहानी 'अनछुई गंध 'का यह जुमला यकायक चौखट में जड़े कुछ चित्रों की हमज़ुबां बनकर खामोशियों को सहला देता है. यकीनन यह बीहड़ सन्नाटे का वक्त है और मन बार-बार बीत गए की आगोश में बिरमना चाहता है. स्मृतियों की हरी दूब पर पांव धरकर अतीत की पगडंडियों पर चलना सदा ही मन को भाता है. गोया कि भीतर यादों की एक नदी है जिसके किनारों पर बैठकर वक्त की लहरों को गिनना भी भला कितना सुखकर है.

दरअसल ऐसी ही कुछ स्मृतियों का लेखा-जोखा लिए चित्रकार संजू जैन के केनवास मेरी आंखों के सामने हैं. बेमिसाल सृजन के लिए प्रतिष्ठित रज़ा पुरस्कार से सम्मानित संजू ने अपने निजी एकांत में उभरे स्मृति बिम्बों को यहां सिरजा है. इन्हें याद करने का सन्दर्भ इस वक्त इसलिए भी कि यहां उस देहाती मन की छापें हैं , जो अपनी सरज़मीं की धरती-धूल ,पेड़ -पहाड़,नदी-सरोवर,आकाश -पंछी ,वन-वनस्पतियों से अपने गहरे सरोकारों या परस्परता में बिंधे स्वस्थ और खुशहाल जीवन को गाता है. यानी प्रकृति और स्मृति के आलोक में यहां एक चितेरे की कल्पना का स्वाधीन संसार खुलता है.
पेपर मेशी, हैंडमेड पेपर और एक्रेलिक रंगों के संयोजन से संजू की कलाकृतियां कुछ इस तरह खिल आयी हैं कि खोई हुई सी कोई दुनिया, सुना-अनसुना सा कोई अफ़साना, अच्छा सा कोई मौसम, तनहा सा कोई आलम या किसी महान प्रार्थना की तरह प्रकृति में लय हो जाने की पवित्र उत्कंठा जाग उठती है. कुछ गहरे, कुछ हल्के रंगों को सतह पर फैलाते हुए संजू का आग्रह स्मृतियों के ज़रिये एक आध्यात्मिक यात्रा पर चल पड़ने का आमंत्रण भी है. उनका कला पक्ष खुलासा करता है कि गांव की गुहार लगाती ये सुनहरी यादें शहरों के यांत्रिक बंधन से मुक्त उस जीवन के प्रति आस्था जगाती हैं जो सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भरता की कसौटी पर अपनी हदों में संतुष्ट है.

ग्रामीण परिवेश के आसपास खिलखिलाते चालीस चित्रों की नुमाईश वे जहांगीर आर्ट गैलेरी, मुम्बई में कर चुकी हैं. बकौल संजू , ये चित्र उनकी रूह के बेहद क़रीब है क्यूंकि ये उनके लड़कपन की बेशुमार यादों के मरकज़ हैं. वक्त का वो चेहरा भी उन्हें यहां नुमाया होता है जब एक स्वस्थ, खुशहाल और समरस जीवन हमारे वजूद का हिस्सा था. हम कुदरत के कितने नज़दीक थे और कुदरत खुद हम पर कितनी निहाल थी.

संजू जैन का काम पूरे देश में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु, भोपाल, इंदौर, लखनऊ और कुछ अन्य कला केंद्रों में प्रदर्शित किया गया है. उनके काम को कला आलोचकों तथा कला प्रेमियों ने लगातार सराहा है. हमेशा एक नयी ऊर्जा और सृजन के माध्यम को नए ढंग से प्रयोग में लाने वाली प्रक्रिया के चलते संजू ने अपनी हर प्रदर्शनी में बिलकुल नयी छवियों का संग्रह पेश किया है. यकीनन यह सब दर्शकों को रास आता रहा है.भोपाल की रहवासी संजू ने अपनी कलाकृतियों के लिए प्रेरणादायक 'भाव' और कलात्मक ऊर्जा प्रकृति तथा अपनी बचपन की यादों से प्राप्त की है. उनका बचपन होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) के पास ग्रामीण इलाके में बीता जो हरे आम के पेड़, हरे मैदान, बेहतरीन वनस्पति-जीव और विभिन्न फसलों से भरपूर थे. उन्हें कम उम्र में ही कागज़ की लुगदी से बनने वाली घरेलु वस्तुओं के प्रति रुझान हो गया था.

इन वस्तुओं को बनाने के लिए उनकी मां और घर की अन्य महिलाओं ने एक विशेष तकनीक विकसित की थी. संजू जैन तकनीक की विभन्न प्रक्रियाओं को बड़े ही कौतुहल और ध्यान से देखतीं. तकनीक से बनायीं जाने वाली टोकरियों और अन्य कृतियों को न सिर्फ उन्हें देखने में मज़ा आता था बल्कि वे उन्हें एक संवेदात्मक आहात की तरह लेती रहीं. उन वस्तुओं की बनावट और और रंग उन्हें अत्यंत रिझाते रहे. और जब वो बड़ी हुईं और एक कलाकार के रूप में अपना करियर बनाने लगीं, तब दोबारा वो इस तकनीक की ओर लौटीं और इसे बिलकुल अलग ढंग से अपना बनाते हुए प्रयोग में ढलने लगीं.

इस तकनीक द्वारा बनावट, प्रधान भाग और रंगों के लहज़े को वे जिस तरह प्राप्त करती हैं वह कमाल का है. भले वह विभिन्न रंगों के साथ काम करें या सिर्फ काले और सफ़ेद या फिर मात्रा एक ही रंग का प्रयोग करें; तकनीक कलाकृतियों को अपनी प्रतिध्वनि, आकर्षण और गौरव देती ही है.

उनकी आर्किटेक्चर की कल्पना उनके काम को एक विरला रूप देती हैं. कभी वह एक गढ़ी हुईं छवि के रूप में नज़र आती हैं तो कभी उनके चित्र एक छाप धारण करते हैं जो ग्राफ़िक प्रिंट्स के समान नज़र आते हैं. उनके काम में तात्कालिकता भी है. ऐसा लगता है जैसे 'तकनीक' उन्हें गुज़ारे हुए वक़्त से आज और आज से बीत गए को हासिल करने का मौका प्रदान करती है.

फलक पर छलक उठे ये रंग यादों को मूल्यवान सम्पदा की तरह सहेज कर रखने का आग्रह करते हैं.अच्छी यादें विरासत होती हैं.अपने वक्त की इबारत. सच का दामन थामती हुई.खामोशियों की उदास चौपालों पर स्मृतियों की ऐसी ही गुलज़ार महफ़िलें मुबारक.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: May 25, 2021, 1:04 PM IST
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