कश्मीर की सरहदों से दूर तक...भांड पाथेर

भांड पाथेर...परंपरा ने इसे इसी नाम से पुकारा और अवाम ने मनोरंजन के सुन्दर ताने-बाने से सजी फन की इस मिसाल को सिर आंखों पर थामा.

Source: News18Hindi Last updated on: December 30, 2020, 10:03 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
कश्मीर की सरहदों से दूर तक...भांड पाथेर
भांड पाथेर का मंचन. (file pic)
अपनी सरज़मी की सौंधी खुशबुओं में घुले संगीत की थिरकन और संवाद तथा अदाकारी की दिलकश बानगियों के बीच जब कोई अफ़साना कोई किस्सा, कोई याद मन को रिझाने लगे तो यकीन मानिये कि रंगमंच पर बरसों पुरानी एक रवायत आपसे गुफ़्तगू कर रही है. भांड पाथेर...परंपरा ने इसे इसी नाम से पुकारा और अवाम ने मनोरंजन के सुन्दर ताने-बाने से सजी फन की इस मिसाल को सिर आंखों पर थामा.

कुदरत ने खुले हाथों बहारों से ख़ुशबूदार मौसमों से हिन्दुस्तान के जिस सूबे को जन्नत की तरह सवारा, उसी कश्मीर की आब-ओ-हवा से उठती आवाज़ों को एक मुद्दत से थाम रखा हैं भांड पाथेर ने. एक ऐसी नाट्य शैली, जिसके किरदार अपने वक़्ती हालातों की नब्ज़ पर हाथ रखते हुए कभी कटाक्ष, तो कभी हास-परिहास के बीच किसी गंभीर मुद्दे पर जनता को आगाह करने के लिए बेमिसाल हुनर रखते हैं. यानी लबो-लहज़ा कुछ ऐसा कि मजे़-मजे़ में खरी-खरी कह जाने का कौशल.

इस रंगभूमि पर खेला जा रहा नाटक राजनीति, समाज, संस्कृति, पर्यावरण, पुराने किस्सों और समसामयिक घटनाओं के आसपास कथानक तैयार करता है.


पेशकश का तरीक़ा इतना निराला और दिलचस्प कि दर्शक पूरे समय उसमें बंधा सा रहता है. इस सम्मोहन के पीछे अभिनय, संवाद, संगीत और नृत्य में दक्ष कलाकारों की भूमिका होती है. व्यंग्यात्मक शैली में अपनी त्वरित बुद्धि से संवाद में रोचकता जगा लेने का गज़ब का सामर्थ्य उन कलाकारों के पास होता है. न तो लंबी पटकथाएं होती हैं और न ही मंचन के लिए तकनीकी संसाधन या अन्य सजावटी उपकरणों की दरकार उन्हें होती है. सम्प्रेषण की सारी उर्जा का स्रोत भांड पाथेर की दैहिक चेतना ही होती है.
भांड पाथेर का यह प्रदर्शन एक नमूना है जिसके रूबरू होकर उसकी तासीर और तस्वीर के कुछ पहलुओं को समझा जा सकता है. ये कहानी जन, जंगल, जानवर और ज़मीन की है. इनकी आपसदारी की है. पर्यावरण की है. इंसानी दुनिया से प्रकृति के उस रिश्ते की है जिसके बनते-बिगड़ते सारी क़ायनात पर ख़ुशहाली और बदहाली के मंज़र सिमट आते हैं. इस दास्तान को सुनाते हुए कलाकार मानवीय प्रवृत्तियों पर तंज भी करते हैं और हंसी-ठहाकों के बीच एक सबक के आसपास प्रस्तुति ठहर जाती है.

भांड पाथेर का इतिहास बहुत पुराना तो नहीं लेकिन इसके गुजिश्ता दौर पर नज़र डालें तो कई रोचक संदर्भ सामने आते हैं. ज़ाहिर है कि इसकी बुनियाद में सामाजिक जनजागरण और मनोरंजक का ही लक्ष्य रहा लिहाज़ा अपनी बात को कलात्मक ढंग से कहने की शैली ने कश्मीर की आंचलिकता से ही रस, रंग और खुशबुओं को समेटा. कश्मीरी लोक धुनें, लोक गीत, साज़-बाज़, वहां की बोली-भाषा, वहां के परिधान-गहने और वहीं की किस्सागोई.

गांव की गलियों, खेत-खलिहानों, मेलों-ठेलों और शादी-ब्याह से लेकर रजवाड़ों की बड़ी महफिलों तक भांड पाथेर की टोलियां मनोरंजन के लिए बुलायीं जाती. ये टोलियां जाति, नस्ल, भाषा और मज़हब को दरकिनार करते हुए सांस्कृतिक भाईचारे की आदर्श मिसाल बन गयीं. इसलिए कि़स्से-कहानी सुनाते हुए किरदार कश्मीर की शीरी जुबां में फ़ारसी, उर्दू, हिन्दी और कभी-कभी संस्कृत के शब्द भी इस्तेमाल करते. शहनाई की तरह मीठी तान जगाने वाली सुरनाई और ढोलक की थापें भांड कलाकारों में नया उत्साह जगाती. आज भी भांड पाथेर का मंच इसी उर्जा से भरा है.दिलचस्प यह कि इस नाट्य शैली का सारा वजूद मौखिक परंपरा की विरासत ने गढ़ा है. इन कलाकारों के पास कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं है. बहुत लंबे कथानक या विषय वस्तु से बचते हुए कम अंतराल में ही अपनी बात बेहद मुकम्मल तरीके से कह देने का कौशल इनके पास होता है.

यहां ग़ौर करने का पहलू यह भी कि इन कला जत्थों को संगीत-नृत्य और अभिनय का प्रशिक्षण देने का दायित्व मागुन का होता है. मागुन, यानी कलाओं की गहरी समझ रखने वाला वरिष्ठ मुखिया. यह गुणी मार्गदर्शक भांड पाथेर का नेतृत्व करता है. वह प्रस्तुति के आरंभ या समापन में मंच पर भी प्रकट होता है. वह दर्शक और भांडों के बीच एक सेतु की तरह सक्रिय रहता है. प्रस्तुति के दौरान मिलने वाली बख्शीश, उपहार या नज़राना मागुन ही प्राप्त करता है और बाद में उसे मंडली के कलाकारों में वितरित कर देता है. प्रस्तुति के रंग-ढंग और उसकी सफलता-असफलता का सारा दारोमदार मागुन की ज्ञान-कुशलता और तजुर्बे पर टिका होता है. यानी भांड पाथेर, गुरू-शिष्य परंपरा का निर्वाह करने वाली लोक नाट्य शैली है.

भांड पाथेर के प्रदर्शन इतने लोकप्रिय रहे हैं कश्मीर की वादियों का लुत्फ़ लेने आए पर्यटक भी इससे महरूम नहीं रहना चाहते. साज़-बाज़ का सिलसिला छिड़ता है और देखते ही देखते भांडों की महफिल जमने लगती है.


हिन्दुस्तान के रंग पटल पर नज़र डालें तो भांड पाथेर की धड़कनें सिर्फ कश्मीर की सरहदों तक सीमित नहीं हैं. राजस्थान में यह बोया-बोनी, पंजाब में मिसारी या नक्काल और उत्तर प्रदेश में भांड के नाम से यह शैली चलन में रही है. नाट्य प्रदर्शन ही इनकी रोज़ी का ज़रिया रहा और इसी में रमते हुए, लोगों का मनोरंजन करते हुए ये कलाकार अपनी जिंदगी गुज़ार देते हैं. गौरतलब है कि भांड पाथेर शैली से प्रभावित होकर अनेक रंगकर्मियों ने इसका प्रयोग अपने नाट्य प्रदर्शनों में किया है. प्रख्यात नाट्य निर्देशक पद्मश्री बंसी कौल ने विदूषकीय, शैली के माध्यम से अपने रंगकर्म को जो नयी दिशा दी, वह इसी भांड पाथेर से प्रेरित है. बंसी कौल की सरज़मीं भी जम्मू-कश्मीर रही है. उन्होंने इस दृष्टि से अपनी मिट्टी का ऋण ही चुकाया है.

देश-दुनिया के बदलते हालातों और नई चुनौतियों से भांड-पाथेर भी अप्रभावित तो नहीं रहा. दुश्वारियां यहां भी दस्तक देती रहीं लेकिन भांड पाथेर का कारवाँ कभी-भी थमा नहीं.

भांड पाथेर का रंगमंच एक बार फिर हमें लोक संस्कृति अन्तर्निहित ताक़त पर भरोसा करने के लिए प्रेरित करता है जिसे स्वयं लोक ने गढ़ा. लोक ने ही उसकी रक्षा की और आने वाली पीढि़यों को उसे विरासत की तरह सौंप दिया. क्या वजह है कि सदियों के लंबे अंतराल में भी इसका वज़ूद बचा रहा. कारण अनेक हो सकते हैं लेकिन असल वजह तो अभिव्यक्ति का आनंद ही है. अपने समय, बिरादरी और नैतिक-अनैतिक आचरण से विचार और मनोरंजन का ताना-बाना जोड़कर समाज के मानस में उसे नए उद्वेलन की आकांक्षा के साथ प्रस्तुत करने की पहल ही 'भांड पाथेर' का मकसद रही. यह इस विमर्श का भी प्रस्ताव है कि आत्मनिर्भरता की नई बहसों के बीच पारंपरिक कलारूपों की तरफ सहानुभूति और आदर के साथ रूख किया जाए.

सच यह है कि 'भांड पाथेर' मनोरंजन के तकनीकी बीहड़ और ग्लैमर की चकाचौंध में आज हाशिये पर ठेल दी गयी विधा है. उसकी काया कुम्हला सी गयी है लेकिन सांसें अभी उखड़ी नहीं है. बस उसे दरकार है उस मदद की जो बुझे-बेजार कलाकारों की रूह में हौसला जगाए. इस रंगभूमि पर उम्मीद की मुस्कुराती रौशनी में फिर कोई किस्सा चहक उठेगा! (डिसक्‍लेमर- यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: December 30, 2020, 9:58 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर