शब्द, स्वर और लय-गतियों में गमकता गणतंत्र

26 जनवरी यानि भारतीय गणतंत्र के मान और शान में जब दिशाओं तक देश भक्ति का संगीत लहराता है तब यह जानना दिलचस्प हो जाता है कि सुर में सुर मिलाता यह उन्मादी कारवां कब और कैसे हमारी थाती बन गया.

Source: News18Hindi Last updated on: January 26, 2021, 10:11 AM IST
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शब्द, स्वर और लय-गतियों में गमकता गणतंत्र
देश आज मना रहा है 72वां गणतंत्र दिवस. (Pic- ANI)
जन-मन की आकांक्षाओं का एक उत्सवी रंग जब वतन परस्ती के अहसासों में घुलता है तो उसके स्वर, लय और गलियों में, आरोह-अवरोह में एक अलौकिक सम्मोहन जागने लगता है. 26 जनवरी यानि भारतीय गणतंत्र के मान और शान में जब दिशाओं तक देश भक्ति का संगीत लहराता है तब यह जानना दिलचस्प हो जाता है कि सुर में सुर मिलाता यह उन्मादी कारवां कब और कैसे हमारी थाती बन गया. आज़ादी के अरमानों के साथ सामूहिक स्वरों में जागा यह जज़्बा आज भी पीढि़यों के रूह-रक्त में रोमांच जगाता है.

संगीत की भाषा में इसे सामूहिक गान, वृन्द गान, सामुदायिक गान, समवेत गान या कोरस सिंगिंग भी कहा जाता है. इसकी सुरमयी यात्रा के अनेक रोचक पड़ाव हैं लेकिन गणतंत्र की संवैधानिक ताक़त, उसके अधिकार और फर्ज़ की याद दिलाते गीतों की अनुगूंज और गतिमय स्वर लहरी एक ऐसा सांगीतिक दस्तावेज़ है जिसमें गुज़रे हुए कल की स्मृतियां हैं, उपलब्धियों और चुनौतियों से भरी आज की आवाज़ें हैं तथा आने वाले कल की संभावना भरी आहटें भी हैं. एक भरी-पूरी मनुष्यता का सामूहिक उद्घोष यह वृन्द संगीत.

समवेत यानि समूह में गायन की परंपरा का आदिकाल से दुनिया के कमोबेश सभी आदिम समाजों में चलन रहा है. यह संगीत आनंद का एक ऐसा स्रोत है जो एक-दूसरे के साथ मिलकर सामूहिकता का बोध कराता है. जीवन के एकाकीपन और नीरसता को छांटकर एक ही स्वर धारा में अनेक स्वरों के लय हो जाने की अलौकिक घटना है- समूह गान. पोथियों के पन्ने पलटने पर मालूम होता है कि हिन्दुस्तानी संगीत की संस्कृति में एक साथ गाने की परंपरा वैदिक काल से रही है. सामवेद के ऋषियों ने इस ग्रंथ की ऋचाओं को गाने की जो पद्धति विकसित की उनमें ध्वनियों के आरोह-अवरोह के साथ सामूहिक स्वरों का विशेष महत्व रहा. दक्षिण भारत की पूजा-प्रार्थनाओं तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में आज भी सामूहिक मंत्रोच्चार की रवायत है.

हमारा जनजातीय और लोक संगीत श्रुति और स्मृति की परंपरा का पालन करते हुए समूह में ही अपने सांस्कृतिक उत्कर्ष या आनंद को पूरा होता अनुभव करता है.
पश्चिमी देशों में आज से पांच-छह शताब्दी पहले चर्च के प्रार्थना संगीत में वृन्द गान शामिल हुआ. बहरहाल, समूह गान की शक्ति और उसके असर को जब हम आज़ादी के महासमर के आसपास ठहरकर देखते हैं तो यह सफरनामा कई किरदारों, घटनाओं और प्रसंगों को समेटता हमारे अतीत पर गर्वोचित भाव से सिर झुकाने को विवश कर देता है.

संदर्भों से होकर गुज़रने पर मालूम होता है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सेनानायक अजीमुल्ला ख़ां का गीत "हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान इमारा" राष्ट्रभक्ति के रूप में अंगीकार किया गया तराना था. अंग्रेज़ी सरकार भी इस गीत के व्यापक प्रभाव से विचलित थी. युद्ध करने वाली सभी टुकड़ियां इसे प्रयाण गीत के रूप में उपयोग कर रही थी. यह गीत अपनी सरल हिन्दुस्तानी भाषा और जोशीले शब्दों के कारण सबके कंठ का हार बना. इसके बाद 1863 में दूसरा प्रभावशाली गीत 'वंदे मातरम्' रचा बंकिमचंद्र चटर्जी ने. 19वीं शताब्दी के पहले दशक के आते-आते यह गीत भी लोकप्रिय हो गया. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसकी एक धुन बनाई, जो बहुत ऊंचे सुर में थी. वे इसे ऊपर के सप्तक में गाते थे. 1905 में कलकत्ता में मोहन बोस टॉकिंग मशीन कंपनी ने ग्रामोफोन रिकार्ड बनाकर इसे जारी किया.

अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दशक में बंगाल में स्वदेशी आंदोलन का ज़ोर था. कांग्रेस का जन्म हो चुका था. बंगाल में तीन बड़े कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर, द्विजेन्द्र लाल राय और रजनीकांत सेन मातृभूमि और देश को लेकर रचनाएं लिख रहे थे.
सामान्य जन इन गीतों को समूह में गाकर आंदोलन में प्रयोग करते थे. एक रोचक प्रसंग है- रजनीकांत सेन, दार्जिलिंग से कलकत्ता लौटे थे. 'वसुमति' पत्रिका के कार्यालय में अपने मित्र अक्षय कुमार मैत्रेय के पास बैठे साहित्य चर्चा कर रहे थे. तभी आंदोलनकारी कुछ युवकों ने उन्हें घेर लिया और एक गीत और धुन बनाकर देने का अनुरोध करने लगे.

गीत प्रेमी रजनीकांत ने तुरंत चार पंक्ति लिखी-
"मायेर देऊया मोटा कॉपड़/माथाय तुले ने रे माई/ दीन दुःखीनी मां जे तोदेर/तार बेशी आर साध्य नाई".
आशय यह कि इस दीन दुखिया (भारत) मां के पास जो कुछ मोटा कपड़ा है, उसे सिर से लगाओ, यही तुम्हारा साध्य है याने स्वदेशी अपनाओ.


तुरंत लोकधुन पर आधारित इसका संगीत तैयार हो गया. गीत की अन्य पंक्तियां बाद में लिखी गई. इन चार पंक्तियों को युवकों ने उन्मादभरे स्वरों में गा गाकर स्वदेशी आंदोलन का प्रचार करना शुरू किया. पूरा गीत प्रकाशित होने के बाद यह स्वदेशी आंदोलन का मुख्य गीत बन गया. गीत के अन्य अंतरे में कहा गया- कि उस मोटे सूत के कपड़े में मां का असीम प्यार गुंथा हुआ है, उसे छोड़कर हम दूसरे के दरवाज़े से भिक्षा मांग रहे हैं याने विलायती कपड़ा पहन रहे हैं, अगले अंतरे में लिखा कि देश में सबके खाने के लिए प्रचुर मात्रा में अन्न नहीं है, फिर भी अनाज को बेचकर, विलासिता के सामान जैसे कांच, दर्पण, साबुन और मोजा खरीद रहे हैं. आओ, हम प्रतिज्ञा करें कि जो वस्तुएं हमारी मां के घर में उपलब्ध हैं, उन्हें हम विदेश से नहीं खरीदेंगे, ना उपयोग करेंगे. इस गीत को समवेत स्वरों में प्रस्तुत कर आज भी पूरे बंगाल में गाया जाता है, रेडियो पर प्रसारित किया जाता है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ये तीनों महत्वपूर्ण कवि- रवीन्द्रनाथ ठाकुर, द्विजेन्द्र लाल राय और रजनीकांत सेन संगीत रचनाकार भी थे. आज सौ वर्ष बाद भी उनका स्वरूप जस का तस बरकरार है. 1905 में बांग्लार आंदोलन के समय गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ने सामाजिक सरोकार से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण रचनाएं लिखी. एक गीत ने आंदोलनकारियों को स्फूर्ति और ओज से भर दिया. इस गीत का बाद में हिन्दी में अनुवाद किया भवानीप्रसाद मिश्र ने जो बहुत लोकप्रिय हुआ- "देश की माटी, देश का जल,/देश की हवा, देश के फल,/पुण्य हो, पुण्य हो, हे भगवान". इसके अलावा टैगोर का प्रसिद्ध गीत- "आमार शोनार बांग्ला आमि तोमाय भालो बॉशी" आज बांग्लादेश का राष्ट्रगीत बन चुका है. 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में यही गीत लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत बने थे.

एक महत्वपूर्ण गीत द्विजेन्द्रलाल राय का है- "धन धान्य पुष्प भरा, आमादेर एई वसुंधरा", जिसमें देश के प्राकृतिक सौन्दर्य का मनोहारी वर्णन है. 'कलकत्ता यूथ क्वायर'‘की रूमा गुहा ठाकुर्ता ने अपने वृंदगान दल के माध्यम से पूरे देश और विदेशों में इन गीतों को प्रस्तुत कर, समवेत गान के सौन्दर्य को श्रोताओं के सामने रखा. प्रसिद्ध संगीतकार सलिल चौधरी ने भी कोरस के लिए अनेक संगीत रचनाएं तैयार की है. स्वाधीनता की 25वीं वर्षगांठ पर शुभो दासगुप्ता का लिखा गीत "ओ आमार जन्मभूमि-आमार मातृभूमि सौंपेछि तोमाय प्राण" उन्होंने 'काबुलीवाला' के गीत 'ए मेरे प्यारे वतन' की धुन पर कम्पोज़ किया, जो अत्यंत कर्णप्रिय बना है.

स्वराज साहित्य के अध्येता इलाशंकर गुहा के अनुसार 1915 में महात्मागांधी के भारत में आगमन के साथ ही स्वाधीनता की केन्द्रभूमि बंगाल से हटकर पुणे, मुंबई की ओर आ गई. गांधीजी के साथ आम जनता भी इस आंदोलन में शामिल हुई. हिन्दी और उर्दू की देशभक्ति रचनाएं एक नया माहौल रचने लगी. 1931 में बोलती फिल्म 'आलमआरा' से मनोरंजन और सामाजिक उद्देश्य के एक नए माध्यम का अर्विभाव हुआ. संगीतकारों, कवियों और प्रस्तुतकर्ताओं को एक नया मंच मिला. यहां से समवेत गान के लिए एक अभिनव, कल्पनायुक्त संसार शुरू हुआ- क्योंकि इसमें दृश्ता थी, प्रस्तुति के लिए तकनीकी सुविधाएं थीं और व्यवसायिक निपुण कलाकार जो एक निर्देशक की कमान में थे.

1939 में अशोक कुमार और समूह स्वर में गाया गया फिल्म 'बंधन' का गीत 'चल चल रहे नौजवान' एक प्रेरणादायी गीत था. इसे कवि प्रदीप ने लिखा था. दो मिनट के इस गीत में बच्चों का कोरस अपने आरंभिक स्वाभाविक अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया था.


फिल्म 'किस्मत' का गीत "आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है" समवेत गान का एक विरल उदाहरण है. इसमें संगीतकार अनिल बिस्वास ने कोरस के पाश्त्य अनुशासन के हिसाब से अलग-अलग रेंज के मंद्र और खरज वाले स्वरों का उपयोग कर उसे अद्भुत गीत बना दिया है. इसमें आम आदमी के भाव को महसूस किया जा सकता है- इसी कारण ये गीत बहुत लोकप्रिय हुआ. तत्कालीन अंग्रेजी शासन भी इस के सामाजिक प्रभाव से विचलित हुआ.

स्वाधीनता आंदोलन के उस दौर में फिल्म 'शहीद' का गीत 'वतन की राह में' वतन के नौजवां शहीद हो' बहुत सुना गाया और लोकप्रिय भी हुआ. इस गीत में भी समूह स्वरों में पंक्तियों का दुहराना, प्रभावशाली दृश्य बना था- जो आज भी दर्शकों और श्रोताओं की आंखें नम कर देता है. फिल्म 'नया दौर' का गीत "साथी हाथ बढ़ाना साथी रे" अपनी सामूहिक शक्ति में शामिल होने का आह्वान करता है. संदेश की बिना हाथ से हाथ मिलाए, एक सूत्र में बंधकर कोई नवनिर्माण की रचना नहीं हो सकती. सारी संभावनाएं एक होने में ही है.

मन को छूने वाला एक दृश्यांकन फिल्म 'दो आंखें बारह हाथ' के गीत- 'ए मालिक तेरे बंदे हम' में किया गया है. संगीतकार नौशाद ने कोरस के स्वरों को वायलिन के आकेस्ट्रा के साथ मिला, मूक हाथ बांधे खड़े अपराधियों के मन की बात को दर्शकों तक पहुंचाया है. इसमें समवेत स्वरों के उतार चढ़ाव उपस्थित कलाकारों के स्पंदन को ध्वनित करते हैं, उनकी वेदना उनका अपराधबोध, उनके आन्तरिक दुख को कोरस जिस रूप में उभारता है, वह अकल्पनीय है.

नवनिर्माण के संकल्पों को रूपायित करता 'आदमी और इंसान' का गीत 'जागेगा इंसान जमाना देखेगा' वास्तव में देश के नए रूप में ढलने का गीत है. समवेत स्वरों में मोनोफोनिक प्रभाव है पर गीत के शब्द सामाजिक सरोकार को परिभाषित करते हैं. साहिर लुधियानवी ने अपने प्रगतिशील विचारों और देश में हो रहे बुनियादी बदलाव को अपने गीत में सरलता से दर्शया है. संगीतकार रवि ने श्रमिकों के काम करते क्षणों को समूह स्वरों का भिन्न रूप देकर उसे जीवंत और ऊर्जा संपन्न गीत बना दिया. महेन्द्र कपूर का ओजस्वी स्वर इसे नया कलेवर प्रदान करता है.

देश में कई समूह हैं जो आज भी समवेत गान के प्रभावशाली कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं. कलकत्ता यूथ क्वायर 1958 में रूमा गुहा ठाकुरता ने सलिल चौधरी और सत्यजित राय के सहयोग से आरंभ किया. इसका उद्देश्य समवेत स्वरों में देशभक्ति, सामाजिक सोद्देश्ता, प्रार्थना और जागरण गीत तैयार करना है. पिछले पचास वर्षों में विविधता से भरे हिन्दी बांग्ला के अनेक महत्वपूर्ण कवियों के गीतों को तैयार कर जनमंच पर प्रस्तुत करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से इनका निरंतर प्रसारण जारी रहता है.

इसी कड़ी में महत्वपूर्ण नाम है- शिलांग के विभिन्न क्वायर समूहों का. ये आधुनिक प्रयोगों के साथ विभिन्न स्वर संयोजन में हिन्दी, अंग्रेजी, खासी, बांग्ला, असमिया आदि भाषाओं में प्रेरणा दायक गीतों की प्रस्तुति के लिए विख्यात है. इन सभी कलाकारों की मातृभाषा खासी या नागामीज़ है किन्तु इनके क्वायर की प्रस्तुति, संगीत के माध्यम से राष्ट्रीय एकता के लिए एक मिसाल है. इस तारतम्य में आकाशवाणी और दूरदर्शन की कुछ कोरस गान प्रस्तुतियाँ स्मरणीय हैं. 'हिन्द देश के निवासी' और 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' की मिसाल ली जा सकती है. संगीतकार सतीश भाटिया, मधुप मुद्गल और ओमप्रकाश चौरसिया के प्रयासों को अनदेखा नहीं किया जा सकता. उनकी धुनों में बिंधे कुछ तराने कालजयी हो गए हैं. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
विनय उपाध्याय

विनय उपाध्यायकला समीक्षक, मीडियाकर्मी एवं उद्घोषक

कला समीक्षक और मीडियाकर्मी. कई अखबारों, दूरदर्शन और आकाशवाणी के लिए काम किया. संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगकर्म पर लेखन. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उद्घोषक की भूमिका निभाते रहे हैं.

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First published: January 26, 2021, 10:09 AM IST
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